आलेख : अनिरुद्ध सिन्हा

हिन्दी ग़ज़ल – संवाद और संदर्भ
– अनिरुद्ध सिन्हा

इससे सहमत हुआ जा सकता है कि दुष्यंत कुमार से पहले हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में जो बहुत सारी वैचारिक तथा कलात्मक प्रवृतियाँ पनपी थीं ,वे सभी समाजवादी यथार्थवाद की परिधि में पूरी तरह आती हैं या नहीं आती हैं, आज भी विवाद का विषय है । कुछ आलोचकों ने इसी विवाद के सहारे हिन्दी ग़ज़ल को विभ्रमों, अतार्किक असंगतियों,अंतर्विरोधों की परिधि में लाकर खड़ा कर दिया है। उनका कहना है कि हिन्दी ग़ज़ल में आधुनिक संस्कृति के विकास की यथार्थवादी प्रवृतियाँ प्रतिबिंबित नहीं होतीं हैं मात्र पूर्व की संश्लेषणात्मक प्रवृतियों का ही सामान्य अनुवर्तन है। जहां तक मैं समझता हूँ आज का हिन्दी आलोचक साहित्य का सबसे बड़ा भ्रमित प्राणी है …..न ये दूध समझता है और न ही पानी । इसके मुँह से कब किसका मंत्रोच्चार हो जाए? पता नहीं । तो क्या यह मान लिया जाए कि समकालीन आलोचक हिन्दी ग़ज़ल के मामले में छद्म चेतना का सहारा ले रहे हैं जिस कारण उन्हें हिन्दी ग़ज़ल का यथार्थ साफ-साफ नहीं दिखता । जब कि तर्कसंगत स्थिति यह है कि हिन्दी ग़ज़ल वर्तमान स्थिति का संदर्भ लेकर अनंत विरोधों और संभावनाओं का द्वार खोलती है। अन्य काव्यविधाओं की तरह भाषा की लीला नहीं करती । इसी बिन्दु से पाठ के अंदर और पाठ के बाहर इसके संवाद और संदर्भ को पकड़ने की कोशिश होती है। अंदर के पाठ से मेरा आशय है ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जिसके शेरों में परत दर परत अर्थ की गुंजाइश बनी रहती है ।रिचर्ड्स ने भी माना है सत्य-संबंधी जो कथन सत्योद्घाटन –सिद्धांतों में मिलता है उसका अभिप्राय वही नहीं होता जो ऊपर से प्रतीत होता है। असल में ऐसे वाक्य कलाओं के मूल्य की व्याख्या करते हैं पर उन्हें वैज्ञानिक प्रतिपादन के रूप में अनूदित करना आसान नहीं होता। उन वाक्यों की व्याख्या करते समय भाषा के विभिन्न प्रयोगों पर ध्यान रखना होता है चूंकि उनमें भाषा के एक खास ढंग का प्रयोग हुआ है,जिसे भावात्मक प्रयोग कहेंगे।

इस प्रकार ग़ज़ल की यह परंपरा ज्ञान के मूल्य के आधार पर काव्यानुभूति के मूल्य का निर्धारण करती है।हिन्दी आलोचक के साथ यही समस्या है, आलोचकीय संतोष के आधार पर छंद की जानकारी के अभाव में भी ग़ज़ल के संदर्भ में अपनी बात कहने से नहीं हिचकते। छंद के वैज्ञानिक प्रयोग तक नहीं पहुँचने के कारण मिथ्याप्रतीतियों का भावुकतापूर्ण प्रतिपादन होता है और उसका प्रभाव भी देखा जाता है। छंद कला का एक सूक्ष्म रूप होता है। रिचर्ड्स के अनुसार कला वह साधन है जिससे कलाकार को दो प्रकार से अत्यधिक शक्ति मिलती है =(1)सामान्य जीवन-क्रम में संचय और केन्द्रण का वह रूप उसे सुलभ होना कठिन है जिसके लिए कला उसे अवसर प्रदान करती है। (2)कला वह साधन प्रस्तुत करती है जिसके द्वारा मानवीय प्रयत्नों को विज्ञान की तरह का ही,किन्तु उससे अधिक सूक्ष्म ढंग का,नैरंतर्य प्राप्त होता है। कला का महत्व यहीं तक सीमित नहीं है। वह और भी अधिक व्यापक है।छंद के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कविता,नाटक,कहानी,उपन्यास के पात्रों को स्वीकार करते समय जीवन में उनके स्वरूप,कार्य एवं स्वभाव के विषय में हमारी जो धारणाएँ रहती हैं उनकी अनुरूपता हम उनके काव्यगत रूप में देखना चाहते हैं। यह हमारे समाज की मनोवैज्ञानिक प्रवृति है।

संदर्भ ही संवाद को विमर्श का विषय बनाता है। रूप एवं आचरण का निर्धारण करता है। परंपरागत छवियों से लेकर वर्तमान छवियों,प्रतीकों और सम्बन्धों पर इसका नियंत्रण रहता है जो हमें क्षेत्रीय और सामाजिक-राजनीतिक विभाजनों के बावजूद सारे देशवासियों को एक सूत्र में बांधता है। संदर्भ के बिना इतिहासविहीन और विचारविहीन दुनिया की मात्र तस्वीर खड़ी की सकती है।

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल छोटे-छोटे सूत्रों और संदर्भों के सहारे चेतना में प्रवाहित स्मृतियों को पकड़कर अपनी शक्ल अख़्तियार करती है और पाठकों के समक्ष अपने सारे वैचारिक और रचनात्मक वैशिष्ट्य प्रकट कर देती है। यही प्रकटीकरण अन्य विधाओं से अलग करते हुए इसे श्रेष्ठ और पठनीय बना देता है। इस बिन्दु पर आपत्ति हो सकती है क्या अन्य विधाएँ ऐसा नहीं करती ?करती हैं लेकिन उनमें लय का लोप होता है। हमारी पूरी सामाजिक संस्कृति लय की नीव पर खड़ी है। हम छंद का तिरष्कार कैसे कर सकते हैं। क्या समाजरहित साहित्य की कल्पना की जा सकती है?अगर नहीं तो मुक्तछंद कविता का औचित्य क्या रह जाता है । मुक्त छंद कविता से मेरा आशय है वैसी कविता जो लघुकथा की शक्ल में लिखी जा रही है।

हिन्दी ग़ज़लकारों ने मध्यवर्ग के सपनों,उनकी नई आशाओं,आकांक्षाओं और इस अंधी दौड़ में ध्वस्त होते मानवीय मूल्यों की तस्वीर को बहुत ही कलात्मक तरीके एवं संवाद के जरिए विश्वसनीय यथार्थ को प्रस्तुत किया है। इनकी ग़ज़लों में समकालीन यथार्थ के प्रतीक विश्वबोध के असीम व्योम में फैले मिलते हैं साथ ही कभी-कभी उनके प्रसंग दुष्यंत कुमार की परोक्ष छाया ग्रहण कर अपनी अलग विचिछत्ती उत्पन्न करते हैं जिससे सच्चाई और विश्वसनीयता आ जाती है। इनके सामने न भाषा की कठिनाई और न ही वाचन की समस्या। अपनी ग़ज़ल को बातचीत की लय में ढाल देना इनकी विशेषता है जो हमें मानसिक रूप से सक्रिय बनाए रखती है। हमारी जिजीविषा कभी कमजोर नहीं पड़ती। यह हिन्दी ग़ज़ल की क्षमता का परिचायक है।तर्कसंगतता की गुंजाइश सदैव बनी रहती है।

कत्ल के पीछे कोई किस्सा भी है
उसने अपने हाथ पे लिक्खा भी है
इन पहाड़ों पर घने जंगल भी हैंहौसला है तो वहाँ रस्ता भी है
– अशोक मिजाज़

समय के अनुरूप साहित्य अपनी दिशा निर्धारित करता है। इसकी अनिवार्य स्थितियाँ व्यक्ति और सामाजिक जीवन से गहरा संबंध रखती हैं। कई बार देखा गया है कि बड़े-बड़े लेखकों की रचनाएँ उतनी प्रभावशाली नहीं हो पातीं और साहित्यजगत में अनपहचानी रह जातीं इसका प्रमुख कारण है आमजगत से सीधा संवाद नहीं हो पाना । अशोक मिजाज़ पाठकों से सीधा संवाद कर रहे हैं और संदर्भ के लिए जगह भी छोड़ते हैं “कत्ल के पीछे कोई किस्सा भी है”

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के आंतरिक साक्ष्य से प्रमाणित होता है कि यह केवल सर्द रात में गरम दूध पीनेवालों या असाध्य स्वप्नशील टेक तक ही सीमित नहीं है। इसकी चिंतनशीलता इसके भीतर की अनिवार्य अभिव्यक्ति है जिसे इसी की शर्तों पर देखना होगा। इसके ही ढंग के प्रगतिशील और विजनरी ख़याल से….. अन्यथा बहुत कुछ कहा हुआ भी अनकहा रह जाने का डर बना रहता है।

हिन्दी ग़ज़ल इस युग के महान संघर्ष का काव्य है, सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक स्तरों पर देख सकते हैं। जहां-जहां भी विकृतियाँ नज़र आईं इसने प्रहार किया है। इसकी यही कोशिश आलोचकों को भ्रम में डालती है। आलोचक अभी कल के आशंकित चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाए हैं ।जब कि सच तो यह है कि ग़ज़ल की इस अनुभव-यात्रा में परतें धीरे-धीरे खुलती हैं और चकाचौंध करती हैं। इसे समझने के लिए गंभीर आलोचना-दृष्टि अख़्तियार करनी होगी । ऊपरी सतह पर चलकर जमीन की गहराइयों का पता नहीं चलता।

उसकी नासमझी का अंदाज़ा लगाओ
कह रहा है ख़ुद समझदारी बहुत है
– राजेन्द्र तिवारी

समाज का मंगल होता है तो निश्चित तौर पर व्यक्ति का मंगल होगा। यही कारण है कि समकालीन ग़ज़लें व्यक्ति में उन्हीं ठोस मानवीय प्रवृतियों को जगाने की कोशिश करती हैं जिससे समाज उन्नतशील हो। ग़ज़ल के इस स्वरूप को जानने की आवश्यकता बनी हुई है। इसके प्रति मिथ्या प्रचार और झूठे सिद्धांतों को छोड़ना होगा। यह सच है कि राजनीतिक चेतना ने दुष्यंत कुमार के लेखकीय दायित्व-बोध का रूप लिया और इस दायित्व-बोध के माध्यम से उन्होंने समाज के आम लोगों तक ग़ज़ल के मिजाज़ को पहुंचाने में कोई कोर-कसर उठा नहीं रखा। अपनी बढ़ती हुई राजनीतिक चेतना के फलस्वरूप दुष्यंत कुमार ने सामाजिक उत्थान से संबन्धित विषय-वस्तुओं के घेरे में हिन्दी ग़ज़ल को ला खड़ा किया और ग़ज़ल को जन-साधारण तक पहुंचाने लगे। फलतः ग़ज़ल को अपने अंदर वैचारिक कश्मकश की स्थिति से जूझना पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे स्थितियाँ सामान्य होती चली गईं और हिन्दी ग़ज़ल हिन्दी काव्य विधा में स्थापित होने की ओर बढ़ने लगी।

समाज के कमजोर वर्ग समाज की दुहरी-नीति के द्वारा हो रहे शोषण तथा कमजोर वर्ग में विद्यमान सहनशीलता को देखकर हिन्दी ग़ज़लकारों ने अपनी चुप्पी तोड़ी और उनके अधिकार के प्रति अपना विद्रोह प्रदर्शित किया ……….

करोड़ों लोगों की दुनियाँ थी जिन लोगों के कब्ज़े में
वो केवल थोड़े से ही सन्त, मुल्ला, पादरी निकले
– कमलेश भट्ट कमाल

ग़ज़ल में पठनीयता की अपार संभावनाएँ हैं। पाठक अपने-अपने हिसाब से यथार्थ ग्रहण करते हैं। यह काव्याभिव्यक्ति का चरम उत्कर्ष है । शौक से नहीं लिखा जा सकता। इसमें शब्द गहन अनुभूति और विराट चेतना-चक्र से बाहर निकलते हैं। ग़ज़ल समय और धैर्य की मांग करती है और आज हमारे पास समय नहीं है । ऐसी परिस्थिति में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। साहित्य को आज समय की ज़्यादा कमी का सामना करना पड़ रहा है। उत्कृष्ट लेखन की संभावना समाप्त होती जा रही है। आलोचना के गिरते स्तर का एक यह भी कारण है ….लेखन में गंभीर तथ्यों की खोज का अभाव। पठनीयता का संकट भी इसी का नतीजा है। हमें इससे सबक लेना चाहिए।

लेखन की कसौटी का निर्धारण कैसे हो ? विशुद्ध साहित्यिक प्रतिमानों के आधार पर या अपनी युग-परिस्थितियों की पठनीयता और सहमतियों के आधार पर। इस बिन्दु पर आलोचक का मौन होना सृजनात्मकता के लिए अनिष्टकारी हो सकता है।प्रगतिशीलता के बहाने युग दायित्व का प्रतिवाद साहित्य की विशाल परिधि को सीमित करने जैसा है। मेरे खयाल से आज का आलोचना साहित्य अपना वैशिष्ट्य गंवा देने का जोखिम मोल ले रहा है । पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ तथ्यों को स्वीकार करने की आवश्यकता है। जो हो नहीं रहा । रिचर्ड्स ने बड़ी गहराई से यह अनुभव किया कि कविता के महत्व को काव्यात्मक उद्गारों द्वारा प्रतिष्ठित नहीं किया जा सकता । जब तक कविता को प्रकृति और कार्य की वैज्ञानिक व्याख्या न की जाएगी तथा मानवीय प्रयत्नों में उसके मूल्य का समुचित स्थाननिर्देश नहीं किया जाएगा,तब तक युग के बुद्धिवादी को संशयात्मकता नहीं मिटेगी । कविता सिर्फ मनोरंजन का हथियार ही नहीं,बल्कि एक सक्रिय सत्ता,हमारे साथ चलकर हमें योग्य बनाती है। जरूरी है यह एकांगी नहीं हो…………………….

जिसे देखो वो अपने शहर से अंजान दिखता है
जहां आसान हैं राहें वहीं हैरान दिखता है
पढ़ा करता हूँ रोज़ाना मैं खबरें जब ज़माने की
मुझे हर हाल अपने हाल का उन्वान दिखता है
– दीपक “दानिश”

दीपक दानिश अपने अवबोधन में वास्तविक सत्य की तलाश करते हुए यथार्थ और स्वयं के बीच सामंजस्य पैदा करते हैं। यह काव्यलेखन का हुनर है।दीपक दानिश इसी सामंजस्य के सहारे अपनी ग़ज़ल के कहन का मूल्य जांच कर लेते हैं । हालांकि यह कठिन कार्य है इसके लिए परिष्कृत रूचि,ज्ञान,अनुभव आवश्यक हैं। ये गुण लगातार परिश्रम से आते हैं।

शुद्ध अन्तःकरण नहीं मिलता
स्वस्थ वातावरण नहीं मिलता
कर्म से मन वचन नहीं मिलते
धर्म से आचरण नहीं मिलता
– घनश्याम

घनश्याम आदमीयत और ग़ज़ल दोनों के पक्ष में,दोनों के हक़ के लिए मजबूती के साथ उपस्थित होते हैं। इनकी ग़ज़लों में अनेक रंग रहने के बावजूद प्रत्येक रंग अपने स्वतंत्र अस्तित्व में दिखाई पड़ता है,समकालीन चुनौतियों से संवाद करने का रास्ता अख़्तियार करता है। सृजन की यही विशेषता है …..चुनौतियों के समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज करना। दावों की चुनौती कोई भी रचनाकर अपने संवेदनात्मक जीवन-मूल्यों को वर्तमान में रखकर करता है। सीधे -सीधे हम इसे भोगे हुए यथार्थ का प्रतिरोध भी कह सकते हैं। समकालीन हिन्दी ग़ज़लकारों की ग़ज़लों में बोध और अस्तित्व से जुड़े नए-नए रूपों को साकार करने की छटपटाहट है। यह बोध विभिन्न रूपों में व्यक्त होता है …कभी आक्रोश की शक्ल में तो कभी संवाद की शक्ल में। दोनों रूपों में प्रतिकार और प्रतिशोध के स्वर उभरते हैं। इतना होने के बाद भी ग़ज़लों के रंग बदरंग नहीं होते। सौंदर्यपरक मानवतावादी परंपरा से आंतरिक रिश्ता बना रहता है । आज की हिन्दी ग़ज़लें प्रतिकार,प्रतिशोध और मानवीय कल्पना पर आधारित हैं। उपरोक्त शेरों में घनश्याम की चिंता बहस का विषय हो सकती है जो मानवीय आचरण में दया,सहिष्णुता,परोकर व सेवा के अभाव के रूप में परिभाषित किया गया है। कोई भी कथन परंपरागत आदर्श से नहीं वर्तमान स्वरूप से आँका जाता है। यहाँ पर संदर्भ एक दूसरे को परिपुष्ट करता है। इसमें कहीं कोई शक नहीं कि आज पूरा समाज एकल अतिअमानवीय सत्ता से गुज़र रहा है।

अन्य काव्यविधाओं की रचना आरंभ करने के लिए कुछ ही सामान्य नियम हैं। और वे नियम भी केवल रस्मी हैं। लेकिन ग़ज़ल के साथ ऐसी बात नहीं है। वस्तिस्थिति का वर्णन करना या उसको प्रतिबिम्बित करना ही पर्याप्त नहीं है। व्याकरण के नियमों का पालन करते हुए तुकबद्ध और छंद की दृष्टि से सही तौर पर लिखी गई ग़ज़ल को ही ग़ज़ल माना जाएगा। ग़ज़ल लेखन के लिए धैर्य और समय चाहिए। सामाजिक मांग के अनुसार नए शब्दों में रचित, अर्थपूर्ण( कविता या) ग़ज़ल तभी रची जा सकती है जब पहले से ही काव्य-संबंधी अच्छी तैयारी की जा चुकी हो। लेकिन आम तौर पर ऐसा हो कहाँ रहा है। छंदमुक्त कविता के इस दौर में कविगण मांग के अनुसार कविता का उत्पादन कर तुरत में मान और सम्मान प्राप्त कर लेना चाहते हैं। ऐसा हो भी रहा है। जिन्हें कोई नहीं पढ़ता कचरा लिखकर भी मान और सम्मान पा रहे हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में उपेक्षा और अपमान सहकर भी अगर हिन्दी छंद जीवित है तो पूरे हिन्दी साहित्य को आश्चर्य करना चाहिए। द क्रिटिक ऐज़ आर्टिस्ट में आस्कर वाइल्ड ने लिखा है “प्रकृति नहीं,कविता और भावना रचना-शक्ति को प्रेरणा देती है।“वे कला और कविता की रूप-रचना को ही सर्वाधिक महत्व देते थे। उनकी रूप-रचना से कला के सभी रहस्य उद्घाटित हो जाते हैं। उनके विचार से छंद में तुक का विशेष महत्व है। उससे केवल छांदसिक सौंदर्य ही नहीं,वरन विचार का आध्यात्मिक पक्ष भी प्रकट होता है। कविता में अतिशय तथ्यात्मकता और प्रकृति की यथार्थता,कला को समाप्त कर देती है। भाव,भाव के लिए है—–यह कला का उद्देश्य होता है और भाव,कर्म के लिए है ……यह जीवन का उद्देश्य होता है। वहीं इलियट ने कविता को तीन स्वरों में व्याख्यायित किया है। प्रथम स्वर,वह है जिसमें कवि अन्य से नहीं,स्वयं से बात करता है। द्वितीय स्वर,वह है जिसमें वह श्रोताओं से बात करता है। तृतीय स्वर,वह है जिसमें कवि का अन्तर्धान हो जाता है और वह पात्रों या चरित्रों के माध्यम से बात करता है। मेरे ख़्याल से ये तीनों विशेषताएँ हिन्दी ग़ज़ल में समायी हुई हैं। यह भी जरूरी नहीं कि कविता को बनावटी अनुप्रासों से सुसज्जित किया जाए और असाधारण तुकांतों से भर दिया जाए। कविता में सबसे महत्वपूर्ण मितव्ययिता है। इसके उदाहरण ग़ज़ल के शेर और दोहे हैं।ऐसे ग़ज़ल हो या दोहा कठिन हैं। इनमें शब्दों की चालाकी नहीं होती। आज जो कवितायें लिखी जा रहीं हैं उनमें साधना कम और चालाकी अधिक है।

छंद के प्रति पाठकों का आकृष्ट होना स्वाभाविक है। कारण कि भारतीय समाज में पारिवारिक रिश्तों का ताना-बाना है जिसमें छंद है, लय है। इसी माधुर्यभाव के कारण जीवन के साथ छंद का आंतरिक सौंदर्य बना हुआ है। हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते। यही कारण है कि सर्वप्रथम छंद का विरोध पश्चिमी साहित्य ने ही किया। धीरे-धीरे यह विरोधरूपी प्रदूषण ने हिन्दी साहित्य को भी अपनी चपेट में ले लिया।

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में यथार्थ की बहुरंगी तस्वीर उभरकर सामने आती है। जीवन में सिर्फ हताशा और निराशा ही नहीं है। आदमी के भीतर आंतरिक क्षरण और बाहरी दुनिया के विध्वंस के अतिरिक्त उल्लास और जीवन के गहन अनुभव के मानवीय परिप्रेक्ष्य भी है।आज का आदमी तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी बुनियादी सौंदर्य-दृष्टि को बचाए रखता है। इसे हमारे परंपरागत काव्यविचार में सर्वोत्कृष्ट माना गया है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वास्तविक यथार्थ मनुष्य और समाज के दिग्दर्शन के स्थान पर उनके सभी रूपों का दिग्दर्शन कराता है और उन्हें परस्पर सम्बद्ध मानकर चलता है। किसी एक पक्ष के उद्घाटन से सत्य विकृत हो जाता है। यथार्थवाद इस सत्य को स्वीकार करता है कि साहित्य की कोई भी कृति न तो जीवनहीन औसत का चित्रण है और न ही किसी व्यक्तिवादी सिद्धान्त पर आधारित है। अरिस्टोफनीज़ ने साहित्य रचना में कल्पना के महत्व का प्रतिपादन किया तथा रूढ़ि,आडंबर और वैचारिक संकीर्णता का विरोध किया। उनका कहना था कि साहित्य, युगीन जीवन की सामाजिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों का आकलन तो करता ही है,साथ ही साथ वह नयी संभावनाओं का भी उद्घाटन करता है । अरिस्टोफनीज़ की कसौटियों पर आज की हिन्दी ग़ज़लें पूरी तरह खरी उतरती हैं ……

बेशक तन को घुन लग जाए लेकिन मन बीमार न हो
और किसी के भी आँगन में नफ़रत की दीवार न हो
खुली हवा में ज़िंदा रहना शायद हम भी भूल गए
जीने के बुनियादी हक़ से वंचित हर हक़दार न हो
– माधव कौशिक

साहित्य विरोध के साथ भविष्य भी रचता है संदर्भ चाहे जो हो। यदि ऐसा नहीं है तो साहित्य की समूची अवधारणा पर पुनर्विचार करना होगा। विमर्श के इस युग में यथार्थ केन्द्रित साहित्यिक परिप्रेक्ष्य को चुनौती के रूप में देखना होगा। हिन्दी ग़ज़ल जीवन के जटिल यथार्थ में भी प्रेम की खोज करती है । माधव कौशिक के उपरोक्त शेरों में दोनों पक्ष एक साथ उभरकर सामने आते हैं……मुहब्बत के फूल और संघर्ष का जज़्बा। मतलब जीवन चक्र व्यवहार में मौजूद है और इसी चक्र में ऊष्मा या ऊर्जा की निष्पत्ति है। इसी बात को अशोक रावत दूसरे ढंग से कहते हैं

चले आओ न सांकल है न कुंडी आंकड़ा ही है
तुम्हारी आस में हर वक़्त मेरा दर खुला ही है
दरख्तों से निभाने तो परिंदे अब भी आते हैं
मगर इंसान की फितरत तो कुछ इनसे ज़ुदा ही है
– अशोक रावत

व्यक्तिगत विचारधारा के प्रभुत्व के कारण जहां मनुष्यता का ह्रास और अवमूल्यन हो रहा है,लोग एक बंधी बंधायी लीक पर चलने को अभिशप्त हैं लेकिन ग़ज़ल के साथ ऐसी बात नहीं है। यह अपने आत्मछल से बचती है और संवेदना की तलाश के लिए प्रतिश्रुत है। जहां संवेदना है वहाँ प्रेम है। हिन्दी ग़ज़लकर निराशा, उदासीनता और आत्मग्रस्तता के विकल्पों को खारिज करते हुए विसंगतियों को प्यार से निरस्त कर देनेवाले तत्वों की खोज करते हैं।

अब न फिर दीवानगी के दिन पुराने आएंगे
हम तेरी गलियों में मौसम के बहाने आएंगे
अपने टूटे ख़्वाब की गीली सी खुशबू है यहाँ
फिर इसी मिट्टी में किस्मत आज़माने आएंगे
– ध्रुव गुप्त

उपरोक्त शेरों में संदर्भ और संवाद का सीधा कथन रूपगत विश्लेषण को महत्व तो देता है वहीं दूसरी ओर व्यापक सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भ की जीवंतता भी प्रस्तुत करता है। अपनी निजता है। भोगा हुआ दर्द है,परिस्थिति का प्रभाव और उसकी तड़प है लेकिन इनके बीच भी एक उम्मीद है जो नए रूप को रचती है “अपने टूटे ख़्वाब की गीली मिट्टी की खुशबू”………. एक स्वप्नदर्शी और प्रत्यक्षदर्शी की संवेदना का मिश्रण है। कोमलता और कठोरता का वरण ध्रुव गुप्त एक साथ करते हैं। ग़ज़ल की यही पाकीज़गी इसे श्रेष्ठ और पठनीय बनाती है। आलोचकीय दृष्टि से अगर बाहर रही तो इसका यह मतलब नहीं कि इसमें कथ्यसामर्थ्य नहीं है बल्कि आलोचक की छंदअज्ञानता है जिसे वे प्रकट नहीं चाहते।

केवल उत्तरधुनिकता और बाज़ारवाद के चंगुल से पाठक को मुक्त कराना ही काफी नहीं है अपितु पाठक की सांस्कृतिक उन्नति की भी आवश्यकता है। यथार्थवाद सिर्फ प्रगतिवादी विचारधारा की रचनात्मक पद्धति का नाम मात्र है । हमें तो देखना होता है कवि की दृष्टि कितने विषयों पर गई है। संवाद और संदर्भ कैसे हैं। संवाद और संदर्भ पाथेय होते हैं,जंजीर नहीं।
……………………………………………………….
परिचय : लेखक चर्चित ग़जलकार एवं आलोचक हैं.
संपर्क – गुलजार पोखर,मुंगेर(बिहार)811201
मोबाइल -09430450098
Email-anirudhsinhamunger@gmail॰com

Related posts

Leave a Comment