आदिवासी स्त्रियाँ (निर्मला पुतुल की कविताओं के विशेष संदर्भ में)
                                                                     – डॉ मनमीत कौर

वर्तमान भारत में आदिवासियों की कुल आबादी लगभग आठ प्रतिशत है। इसमें आदिवासी स्त्रियों इसका आधा हिस्सा हैं। आदिवासी स्त्रियों के संबंध में आम धारणा है कि यह अपने पति को ईश्वर नहीं मानती। पति या सास-श्वसुर द्वारा सताए जाने पर घुट-घुट कर जीने के बजाए उसका त्यागकर दूसरा मनपसंद साथी या पति का वरण करती हैं। आदिवासी समाज इस व्यवहार को मान्यता भी देता है। यह ठीक है कि आदिवासी स्त्रियों को मनपसंद साथी चुनने का अधिकार है किंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे पूरी तरह स्वतंत्र हैं। स्त्रियाँ तो शोषित हुई हैं, चाहे वह आदिवासी स्त्री हो या गैर आदिवासी ।
डायन प्रथा तो इनके यहाँ का अभिशाप है। आदिवासी समाज में स्त्री को मनुष्य खाने वाली डायन कहकर कुचला जाता है। उसे ‘बिन बुद्धि की बड़-बड़ करने वाली स्त्री’ कहकर उसकी सम्भावित भागीदारी गाँव पंचायत में नकारी जाती है। दहेज देकर आदिवासी को खरीदा जाता है और समाज में स्त्री से वस्तु या सामान अथवा गुलाम की तरह व्यवहार किया जाता है। एक से अधिक पत्नियाँ रखने का रिवाज होने के कारण और उससे पैदा होने वाले झगड़ों को ‘स्त्री विरूध स्त्री’ का रूप देकर स्त्री को कुचला जाता है। दारू पीकर स्त्री के साथ बेदम मारपीट की जाती है।1 यह सभी आदिवासी स्त्रियों के शोषण के तरीके हैं। संथाली कवयित्री निर्मला पुतुल आदिवासी स्त्रियों की इस दशा से व्यथित हैं। वह प्रश्न करती है, ‘क्या तुम जानते हो’ स्त्री का उपभोगवादी दृष्टि से परे भी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व और अस्तित्व है।
‘अपनी जमीन तलाशती बेचैन स्त्री’ में वे लिखती हैं कि स्त्रियाँ अभ्यस्त हैं, स्वयं को मानक पुरूष-दृष्टि से देखने की। परंतु अब यह आवश्यक हो गया है कि वह स्वयं को स्वयं की दृष्टि से देखे और एक ऐसी जमीन तलाशे जो सिर्फ उसकी अपनी हो। कवयित्री को आश्चर्य होता है कि ‘आदिवासी स्त्रियाँ’, जिनके हाथ की बनी वस्तुएँ पता नहीं कैसे दिल्ली पहुँच जाती हैं जबकि यदि वे अपने अधिकारों की बात करें तो राजमार्ग तक उनकी बस्ती के रास्ते पहुँचने से पहले ही समाप्त हो जाते हैं। उनकी दुनिया तक नदियाँ भी आने से पहले ही सूख जाती हैं किंतु फिर भी उनकी तस्वीरें महानगरों में आसानी से पहुँच जाती हैं, संग्रहालयों में प्रदर्शनी लगाकर वाहवाही लूटने के उद्देश्य से,
“कैसे पहुँच जाती हैं उनकी चीजें दिल्ली / जबकि राजमार्ग तक पहुँचने से पहले ही / दम तोड़ देतीं उनकी दुनिया की पगडण्डियाँ / नहीं जानतीं कि कैसे सूख जाती हैं / उनकी दुनियाँ तक आते-आते नदियाँ / तस्वीरें कैसे पहुँच जाती हैं उनकी महानगर / नहीं जानतीं वे! नहीं जानतीं!!”2
    मुख्यधारा के लोगों द्वारा आदिवासी स्त्रियों के साथ किया गया ऐसा व्यवहार अति निंदनीय है। श्रम के मामले में आदिवासी स्त्रियाँ पुरूषों से किसी भी प्रकार कमतर नहीं है। इनकी जीवन-शैली मुख्यधारा की स्त्रियों की अपेक्षा कहीं अधिक कठिन होती है। विश्वग्राम के नाम पर मेहनतकश आदिवासी स्त्रियों का शोषण लगातार जारी है। ‘बाहामुनी’ में आदिवासी स्त्रियों के श्रम के दोहन को चित्रित किया गया है। आदिवासी स्त्रियों के हाथ की बनी वस्तुएँ शहर तक पहुँचते-पहुँचते दाम में दुगुनी-तिगुनी हो जाती हैं किंतु बनाने वाले हाथ को उनके श्रम का इतना भी मोल नहीं मिल पाता कि वे अपनी भूख मिटा सकें,
“तुम्हारे हाथों पत्तल पर भरते हैं पेट हजारों / पर हजारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेट ।”3
‘बिटिया मुर्मू के लिए’ कविता में कवयित्री आदिवासी स्त्रियों को अपने ऊपर हो रहे शोषण के विरूद्ध आवाज उठाने के लिए प्रेरित कर रही है। वह क्रांति का उदघोष कर रही है। वह चाहती है कि आदिवासी स्त्रियाँ अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो, अपना भला-बुरा समझें। आधुनिकीकरण के कारण उनकी बस्तियों के पेड़ काटे जा रहे हैं, बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है। प्रकृति को नुकसान पहुँचाया जा रहा है। यह प्रकृति अपने वन-भक्तों से प्रश्न जरूर करेगी कि उन्होंने उसे कटने क्यों दिया? जबकि प्रकृति तो उन्हें आश्रय देती है। कवयित्री चाहती है कि आदिवासी स्त्रियाँ अपने आश्रयदाता पर हो रहे इस तरह के दुर्व्यवहार का विरोध करें। पारिस्थितिक स्त्रीवाद भी यही कहता है कि जहाँ कहीं प्रकृति का दोहन-शोषण हो रहा हो, वहाँ स्त्री इसकी सुरक्षा के लिए आगे बढ़े। और फिर इन आदिवासी स्त्रियों के लिए तो प्रकृति सबसे ऊपर है, कवयित्री आदिवासी स्त्रियों का आह्वान करती है,
“उठो, कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो / जैसे तूफान से बवण्डर उठता है / उठती है जैसी राख में दबी चिंगारी।”4
कवयित्री कहती हैं कि उन्हें जिस अंधेरे गर्त में धकेला जा रहा है उसे पहचानो, अपने खिलाफ हो रही इस साजिश के विरूद्ध आवाज उठाओ। वे सोचने को विवश करती हैं कि जब तुम्हारे हाथों उगाये गये अनाज वापस घूम फिर कर तुम्हारी बस्ती की दूकानों पर आते हैं। तब उनकी कीमत इतनी बढ़ चुकी होती है कि वे तुम्हारी ही पहुँच से दूर हो जाते हैं तो तुम स्वयं को कितना असहाय महसूस करती होंगी। वे आगे कहती हैं कि हालात से समझौता मत करो, अपने अधिकार के लिए सजग हो। बाहरी दुनिया की उपभोगवादी दृष्टि को पहचानो। वे तुम्हारे शुभचिंतक बनकर तुम्हारी संस्कृति में पहले प्रवेश करेंगे, तुम्हारी प्रशंसा करेंगे और फिर अपना स्वार्थ साधेंगे। पहाड़ों पर आग लगायेंगे ताकि उस स्थान का आधुनिकीकरण किया जा सके। तुम्हारे बच्चे उनकी दूकानों पर काम करेंगे, उनका बचपन उनसे छीन लिया जायेगा। मजदूरी करने के लिए तुम्हारी लड़कियों को अपने यहाँ ले जायेंगे। उन्हें मानसिक व शारीरिक कष्ट देंगे। इस तरह वे तुम्हारा अहित ही करेंगे क्योंकि वे सौदागर जो हैं। आधुनिक कहे जाने वाले – ‘उपभोगवादी प्रवृत्ति के सभ्य मनुष्य’, जो प्रकृतिपूजक नहीं बल्कि पूँजीपूजक हैं।
आदिवासी समाज ‘विकास रूपी आतंक’ के शिकार होने के साथ-साथ सांस्कृतिक अतिक्रमण के भी शिकार हो रहे हैं। ये अपनी स्वतंत्रता, अस्तित्व और अस्मिता को बचाए-बनाए रखने के लिए निरंतर संघर्षरत है। इस संदर्भ में बड़ी सार्थक टिप्पणी करते हुए रमेशचंद मीणा लिखते हैं, “आदिवासी विमर्श आज की जरूरत इसलिए भी है कि जब देश के विकास की बात आती है तब हम न केवल आदिवासी से उनकी जमीन छीनते हैं, अपितु आने वाली मानवता से उसका पर्यावरण हमेशा-हमेशा के लिए खत्म किए दे रहे हैं। जब जंगल कटता है और पहाड़ टूटता है तब केवल आदिवासी का झोपड़ा ही नहीं छीनता बल्कि आने वाली कौम के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है।”5 आज पूरा विश्व इस बात पर चिंतित है कि हाशिए पर खड़े इस आदिवासी समाज का विकास कैसे किया जाए। विकास के दावे, कंक्रीट के पसरते जंगल, स्मार्ट सिटी का मोहजाल यह सभी आदिवासियों को विनाश के कगार पर ले जा रहा है। उन्हें उनकी सभ्यता-संस्कृति (जो पूरी तरह प्रकृतिनिष्ठ है) से दूर कर रहा है। ‘संथाल परगना’ में इसी की चर्चा है। ‘खून को पानी कैसे लिख दूँ’ में कवयित्री स्पष्ट कहती हैं कि वे विकास के नाम पर अपनी जडों से कटना नहीं चाहती हैं।
भारतीय संस्कृति में, ‘माता पृथ्वी पुत्रोहं पृथीव्या’ – कहकर पृथ्वी को माँ समान दर्जा दिया गया है। आदिवासी समाज में तो यह संवेदना गर्भनाल की भाँति जुड़ी हुई है। प्रकृति से अलग इनका अस्तित्व अकल्पनीय है। ‘बूढ़ी पृथ्वी का दुख’ कवयित्री से देखा नहीं जा रहा। पृथ्वी पर हो रहे अत्याचारों को देखकर कवयित्री का हृदय व्यथित हो उठा है। उसे आदमी के आदमी होने पर संदेह है। चूँकि आदमी संवेदनशील प्राणी है, फिर भी उसे बूढ़ी पृथ्वी का दुख नहीं दिख रहा है। उसकी संवेदना जड़ हो गयी है। इसलिए उसके आदमीयत पर संदेह किया जा रहा है,
“कुल्हाड़ियों के वार सहते / किसी पेड़ की हिलती टहनियों में / दिखाई पड़े हैं तुम्हें / बचाव के लिए पुकारते हजारों-हजार हाथ? / …  / खून की उल्टियाँ करते / देखा है कभी हवा को, अपने घर के पिछवाड़े? / थोड़ा-सा वक्त चुराकर बतियाया है कभी / कभी शिकायत न करने वाली / गुमसुम बूढ़ी पृथ्वी से उसका दुख? / अगर नहीं, तो क्षमा करना! / मुझे तुम्हारे आदमी होने पर संदेह है।”6
सदियों से आदिवासियों का प्रकृति के साथ जो तादात्म्यपूर्ण रिश्ता बना हुआ है, उसे कैसे छिन्न-भिन्न किया जाए; इसे उन्हीं के विकास की ताक पर अंजाम दिया जा रहा है। ‘उतनी दूर मत ब्याहना बाबा’ में आदिवासी स्त्री का अपने प्राकृतिक परिवेश से लगाव स्पष्ट है। एक ओर जहाँ मुख्य धारा की स्त्री अपने ब्याह के लिए तमाम सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता देती है। वहीं आदिवासी स्त्री अपने लिए प्रकृति युक्त जीवन चुनती है। वह प्रकृति की गोद में प्रकृति की ही तरह स्वच्छंद रूप से जीना पसंद करती है। आदिवासी जीवन दर्शन से लैस चेतना सहजीविता, सहभागिता, सहअस्तित्व और सामूहिकता पर बल देती है। इसीलिए आदिवासी स्त्री चाहती है कि उसका ब्याह ऐसे देश में हो ‘जहाँ ईश्वर कम आदमी ज्यादा रहते हों तथा बकरी और शेर एक ही घाट का पानी पीते हों’7 अर्थात् जहाँ सभी सद्भावनापूर्ण जीवन जीते हों।
ड्ब्ल्यू. जी. आर्चर (1907-79) ने ‘ट्राइबल लॉ एंड जस्टिस’ के ‘द राइट्स ऑफ संताल वुमैन’ अध्याय (पृ. 187-201) में यह लिखा है कि व्यवहार में आदिवासी महिलाओं ने अपनी श्रमशक्ति और उपादेयता के कारण परिवार में भले ही निर्णयात्मक स्थान ग्रहण कर लिया हो सिद्धांतत: उन्हें समाज में पुरूष की तुलना में दोयम दर्जा ही हासिल है। … बहुत सारी सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों से महिलाओं को वंचित कर दिया गया। जैसे- हल चलाना, खेत को समतल करना, छप्पर छाना, तीर-धनुष चलाना, उस्तरे का उपयोग, बरमा से छेद करना, कुहाड़ी चलाना, बंशी-कांटा से मछली फंसाना, कपड़ा बुनना, खटिया बुनना आदि। वे पुरूषों का वस्त्र धारण नहीं कर सकतीं, न उनके उपकरणों का उपयोग कर सकती हैं। चूँकि महिलाएँ ही डायन बन सकती हैं इसीलिए न तो वे ‘शव’ के साथ अंतिम यात्रा में भाग ले सकती हैं,न ही मांझीथान में नगाड़ा बजा सकती हैं। स्पष्टतया अन्य समाजों की तरह ही जब सम्पत्ति की अवधारणा विकसित हुई तो आदिवासी समाज ने भी ‘स्त्री’ को मात्र एक ‘सम्पत्ति’ ही मान लिया। आदिवासी समाज में भी स्त्री पुरूष की प्रतिष्ठा और ‘शान’ की वस्तु है।8 संथाल आदिवासियों में स्त्री विधवा होने पर दूसरा विवाह कर सकती है किंतु दूसरे विवाह से अगर बेटा न होकर बेटी पैदा होती है तो उससे पूजा में शामिल होने का अधिकार छिन लिया जाता है। आदिवासी स्त्री अगर तीर-बीजर छूए तो उसका मुँह काला करके घुमाया जाता है। हल जोतने की सजा के रूप में बैल की जगह बाँधकर उससे हल जुतवाया जाता है, खूँटे से बाँधकर नाद में भूसा खाने के लिए विवश किया जाता है। अर्थात् यदि आदिवासी के परंपरानुसार परिस्थितियाँ न हों तो उनके समाज में इसके लिए कठोर दंड का प्रावधान है। ‘कुछ मत कहो सजोनी किस्कू!’ में इन्हीं दकियानूसी आदिवासी परंपराओं के विरूद्ध कवयित्री का आक्रोश प्रकट हुआ है,
“जानती हूँ कि अपने गाँव बागजोरी की धरती पर / जब तुमने चलाया था हल / तब डोल उठा था / बस्ती के माँझी-थान में बैठे देवता का सिंहासन / गिर गयी थी पुश्तैनी प्रधानी कुर्सी पर बैठे / मगजहीन ‘माँझी हाड़ाम’ की पगड़ी / पता है बस्ती की नाक बचाने खातिर / तब बैल बनाकर हल में जोता था / जालिमों ने तुम्हें / खूँटे में बाँधकर खिलाया था भूसा / … / आज धनुष छूते ही तुम्हारे / धरती पलट जाएगी / मच जाएगा प्रलय सजोनी किस्कू / मत छूना धनुष! / घर चू रहा है तो चूने दो / छप्पर छाने मत चढ़ना / ‘जातीय टोटम’ के बहाने / पहाड़पुर की ‘प्यारी हेम्ब्रम’ की तरह / तुम्हारा मरद भी करेगा तुमसे जानवराना बलात्कार / और नाक-कान काट धकिया निकाल फेंकेगा घर से बाहर।”9
घर न छाने अथवा हल न जोतने देने के पीछे पुरूष वर्चस्व की अवधारणा ही है ताकि कहीं स्त्री उसके बिना स्वावलंबी न हो जाए। स्त्री लकड़ी काटकर लाती है, दीवार बनाती है, खपड़ा चढ़ाती है, पर वह छत नहीं छा सकती। स्त्री खेत में रोपन करती है, निकोनी करती है, कटनी करती है, पर हल नहीं नाध सकती, यानी बीहन नहीं छींट सकती। बीहन छींटना यानी संतान उत्पन्न करने या वीर्य डालने के बराबर माना जाता है। पुरूष का काम है वीर्य डालना अर्थात् धरती जोतकर बीहन छींटना। धरती का काम है फसल यानी गर्भ धारण करना। इसलिए धरती का मालिक पुरुष ही होगा, स्त्री नहीं। यही सोच इस धारणा के पीछे काम करती है। आज भी झारखंड में स्त्रियों को इसीलिए संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता। घर का न छाना भी इसी अवधारणा का प्रतीक है कि कहीं स्त्री खुद आश्रदात्री न बन जाए। घर का छत पुरूष ही छाएगा और धनुष यानी हथियार पर भी उसी का अधिकार होगा, स्त्री का नहीं। मानाकि शहरों की औरतों की तरह वे देह की मुक्ति के लिए संघर्षरत नहीं है, क्योंकि उनके समाज ने अपनी जरूरत के अनुसार उन्हें इन बंधनों से मुक्त रखा है। वे परिवार छोड़कर काम करने जाने के लिए भी स्वतंत्र हैं। वे परिवार को पोसती हैं, परिवार पर आश्रित नहीं होतीं। इसके बावजूद सम्पत्ति में औरत का हिस्सा नहीं होता।10 स्पष्ट है, आदिवासी स्त्रियाँ अंधविश्वासों, रूढ़ियों, परंपराओं और रस्म-रिवाजों के कारण स्वावलंबी होते हुए भी खुद को स्त्री होने की हीन भावना से मुक्त नहीं कर पातीं।
आदिवासी स्त्रियाँ जानती हैं कि ‘मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी नजर में’। मुख्य धारा के लोग उनके कालेपन से घृणा करते हैं, उनके अनगढ़पन पर फब्तियाँ कसते हैं, उनकी भाषा-सभ्यता-संस्कृति का मजाक उड़ाते हैं। उन्हें जंगली, असभ्य और पिछड़ा कहते हैं। किंतु वे यह भी जानती हैं कि दिखावे के नाम पर ‘एक बार फिर’ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जैसे समारोहों के बहाने साल में कभी-कभार उनसे सहानुभूति के बोल बोले जायेंगे। जलने का दर्द भला राख से बेहतर कौन जान सकता है। इसीलिए आदिवासी स्त्रियाँ चाहती हैं कि उन्हें भाषणों या नारेबाजी में नहीं बल्कि वास्तविक जीवन में सम्मान मिले। उन्हें हेय दृष्टि से न देखा जाए, एक मनुष्य के रूप में उनका सम्मान किया जाए।
इसी प्रकार ‘ढेपचा के बाबू’ कविता में उनके विस्थापन का दर्द बयां हुआ है। विकास के नाम पर विस्थापित आबादी के लिए अब एकजुट होने के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष नहीं है। निर्मला पुतुल कहती हैं,
“मैं चाहती हूँ / आँख रहते अंधे आदमी की / आँखें बने मेरे शब्द / उनकी जुबान बने / जो जुबान रहते गूँगे बने देख रहे हैं तमाशा / चाहती हूँ मैं / नगाड़े की तरह बजें / मेरे शब्द / और निकल पड़ें लोग / अपने-अपने घरों से सड़कों पर।”11
आदिवासी समाज में ‘नगाड़ा’ बजाने का सांस्कृतिक महत्व है जिसका अर्थ होता है – क्रांति का उदघोष करना। मानाकि बहुत कुछ नष्ट हो चुका है परंतु अभी भी बहुत कुछ शेष है, बचाने को। कवयित्री कहती हैं, ‘आओ, मिलकर बचाएँ’ अपनी सभ्यता, संस्कृति और प्रकृति को। वह उन सभी चीजों को बचाना चाहती है जिससे कि सम्पूर्ण सृष्टि बची रहे। आदिवासी जीवन दर्शन दुनिया को बचाने का एकमात्र जीवन दर्शन है। क्योंकि आदिवासी जीवन दर्शन में मुनाफा कमाने की होड़ तथा सत्ता की लोलुपता नहीं है। ये तो केवल समानता और सहभागिता पर बल देते हैं, प्रकृति को बचाए रखने की वकालत करते हैं। ये प्रकृति पूजक होते हैं, इसीलिए प्रकृति को नुकसान पहुँचाने की सोच भी नहीं सकते। ये प्रकृति से उतना ही लेते हैं जितने की उन्हें जरूरत होती है।
समग्रत: निर्मला पुतुल ने अपनी कविताओं में आदिवासी स्त्री और उनकी अस्मिता, विस्थापन, संस्कृति एवं शोषण के मुद्दों को मुख्य रूप से उठाया है। उन्होंने आदिवासी स्त्रियों के लिए एक सम्मानजनक समाज की कल्पना की है। उनके अनुसार, “जिस गहराई से इंसान खुद अपनी पीड़ा व्यक्त कर सकता है, दूर से देखकर उस पीड़ा की उतनी प्रभावी अभिव्यक्ति नहीं दी जा सकती।”12 उन्होंने अपने समाज की समस्याओं को काफी करीब से देखा है तथा आदिवासी स्त्रियों के दर्द को भली-भाँति समझा है, जिसकी सशक्त अभिव्यक्ति उन्होंने अपनी कविताओं में की है। सच है, स्वानुभूति की जगह सहानुभूति कभी नहीं ले सकता है किंतु एक बात तो तय है कि वर्तमान में सम्पूर्ण मानव-जाति जिस गर्त की ओर अग्रसर है, सांस्कृतिक व अन्य कई प्रदूषणों से घिरा पड़ा है, उसमें कोई किसी का स्वामित्व बर्दाशत नहीं करेगा (चाहे मानव का मानव पर हो या मानव का प्रकृति पर)। क्योंकि अगर ऐसा होगा तो इसके विरोध में समय-समय पर नगाड़े भी बजेंगें और क्रांति भी होगी, भले ही उसकी कीमत जान गँवाकर क्यों न चुकानी पड़े (अमृता विश्नोई की तरह)। किसी शायर ने लिखा है – “यह काम नहीं आसां, इंसान को मुश्किल है / दुनिया में भला होना, दुनिया का भला करना।” किंतु पहल तो करनी ही होगी। आवश्यकता है, स्त्री-पुरूष सहयोगी बनकर साथ चलें और प्रकृति को बचाने की पहल में साथ आएँ।

संदर्भ –
1.गुप्ता, रमणिका (सं.), आदिवासी कौन, राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-2008, पृ. 21
2.पुतुल, निर्मला, नगाड़े की तरह बजते शब्द, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, संस्करण-2005, पृ.11
3.वही, पृ.12
4.वही, पृ.14
5.सिंह, अविनाश (सं.), इस्पातिका (पत्रिका), अंक-10, वर्ष-5, जुलाई-दिसंबर 2015, पृ.165
6.पुतुल, निर्मला, नगाड़े की तरह बजते शब्द, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, संस्करण-2005, पृ.31-32
7.वही, पृ.51
8.सिंह, अविनाश (सं.), इस्पातिका (आदिवासी विशेषांक), अंक-1, वर्ष-2, जनवरी-जून 2012, पृ.91
9.पुतुल, निर्मला, नगाड़े की तरह बजते शब्द, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, संस्करण-2005, पृ.23-24
10.गुप्ता, रमणिका, स्त्री मुक्ति : संघर्ष और इतिहास, सामयिक प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-2014, पृ.28-29
11.पुतुल, निर्मला, नगाड़े की तरह बजते शब्द, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, संस्करण-2005, पृ.93
12.तिवारी, मुक्तेश्वरनाथ (सं.), विश्वभारती पत्रिका, खण्ड-60, अंक-2, जुलाई-सितम्बर 2014, पृ.117
………………………………………………………………………………
परिचय : लेखिका जमशेदपुर के ग्रेजुएट कॉलेज फॉर वुमेन में सहायक प्राध्यापिका हैं. इनके रिसर्च पेपर व आलेख कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं.
संपर्क : बमनडीहा (डाकघर के पास), पो-सुंदरचक, जिला-बर्दवान, पश्चिम बंगाल-713360
मो.न.- 8436798282

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *