आलेख : डॉ संजीव जैन

रागदरबारी : मानवीय संवेदना के भौथरेपन का प्रतिदर्श

रागदरबारी मानवीय संवेदना के निरंतर भौंथरे होते जाने की कहानी है। इसको पढ़ते हुए पाठक के मन में किसी भी पात्र या स्थिति के प्रति कोई सकारात्मक संवेदना पैदा नहीं होती हम सिर्फ हंसते हैं, चौंकते हैं और खिन्न होते हैं, हर चरित्र पर हर स्थिति पर और प्रत्येक संबंधों पर। इसमें कोई कहानी नहीं है, चरित्रों का कोई विकास नहीं है, संबंधों की बुनावट नहीं है, सब कुछ चित्रों की तरह होता हुआ नजर आता है। दृश्य पटल पर संवाद, स्थितियाँ, चरित्र और उनके आपसी तयशुदा संबंध, घटनायें उभरती रहती हैं, पाठक रामलीला की तरह देखता रहता है। इसकी भाषा और शिल्प की बुनावट में ही संवेदना नहीं है। एक पूरा समाज जो अपनी संपूर्ण मानवीयता खो चुका है, चित्रित है। कुल मिलाकर जो कहानी बनती है वह यह है -‘‘दरअसल उपन्यास की मुख्य कथा शिवपालगंज का जीवन और वहाँ की संस्कृति का वर्णन करना है, जहाँ दबे कुचले असहाय लोगों को घिसटते दिखाया गया है। बल्कि कहें कि अभावों विपदाओं और भ्रष्टताओं से जूझकर अपना जीवनयापन करने वाले लोगों की जिजीविषा को दिखाया गया है जिनका वर्चस्वशाली वर्ग शोषण कर रहा है और विडम्बना यह है कि वे उसी में मगन हैं। उनमें कोई चेतना नहीं है। लेखक को उनकी स्थिति पर आक्रोश है। वे उनकी इस स्थिति की आलोचना करते हैं – व्यंग्य विनोद उपहास की शैली में। बल्कि वे उनकी जिंदगी के चारों ओर फैली गंदगी, वहाँ की अमानवीय स्थितियों को उघाड़ते हैं। पर क्या यह कहें कि इस गंदगी और अमानवीय स्थितियों का पर्दाफाश करना ही रागदरबारी का उद्देश्य है?’’1

यह जो प्रश्नचिन्ह आलोचक ने लगाया है कि अमानवीय स्थितियों का पर्दाफाश करना ही रागदरबारी का उद्देश्य है? यह इसके संवेदनहीन शिल्प की ओर इशारा करता है। इसमें व्यंग्य है, विडंबना है, विसंगतियाँ है, विरोधाभास है, अमानवीयता और क्रूरतापूर्ण व्यवस्था है, शोषण और भ्रष्टाचार है, गरीबी है, गरीब हैं, अभाव है, अभावग्रस्त स्थितियों में जीने वाले लोग हैं पर इन सबके प्रति संवेदनात्मक अनुभूति नहीं उपजती यह इस उपन्यास की विशिष्टता भी है और कमजोरी भी। हम उनके अन्य उपन्यास पढ़ते हैं तो किसी न किसी पात्र या स्थितियों के प्रति हमारा मन द्रवित हो जाता है और हम विचलित हो उठते हैं, किसी से सहानुभूति, समानुभूति, करुणा, दया या ममता और अपनेपन का अनुभव करते हैं, पर रागदरबारी के साथ ऐसा नहीं होता। वैद्य जी और रंगनाथ जो इसके नायक हैं इनके प्रति हमारे अंदर किस तरह की मानवीय अनुभूति पैदा होती है? न वितृष्णा न सहानुभूति, अन्य पात्र सिर्फ स्थितियों को उपस्थित करने के लिए और वैद्य जी के कुशल मदारीत्व को उच्चतर स्थिति पर पहुँचाने के एक घटक के रूप में आते हैं। अंत में जो मदारी का दृश्य है, वास्तव में ठीक से उपन्यास की संरचना को प्रतीकित करता है। अपने जीवन की वास्तविकता में जिस समय हम सड़क पर मदारी और बंदर का खेल देखते हैं, उसे देखते हुए और देखने के बाद हमारे अंदर किस तरह की अनुभूति पैदा होती है? न हम बंदर के प्रति सहानुभूतिपूर्ण हो पाते हैं न मदारी के प्रति क्षुब्ध। बस देखते हैं और समाप्त होने पर हंसते हुए उठकर चले जाते हैं। ठीक ऐसा ही रागदरबारी के साथ होता है। उसमें पाठकीय गुण भरपूर है, इसलिए वह बांधे रहता है, रवानगी है भाषा की और तराशा हुआ शिल्प है जो हमें हतप्रभ करता है पर अनुभूति से सराबोर नहीं करता। इसमें भारतीय राजनीति की विकृत होती जा रही स्थितियाँ हैं, पर उनके खिलाफ, उन्हें बदलने के प्रति कोई चेतना की बैचेनी नहीं है।

‘‘अधिकांश अभिजात वर्ग जो सत्ता के शीर्ष पर पहुँचकर नीति निर्धारण से लेकर उसके अनुपालन से जुड़ा था, उसने भी व्यापक समाज या देशहित के स्थान पर संकुचित दृष्टि अपनाते हुए स्व या स्वार्थ पर दृष्टि केन्द्रित की। इसका असर समाज में नीचे तक गया। ऐसे में कुछ भी मूलभूत बदलाव नहीं हुए। ऊपरी नोंक पलक दुरुस्त करते हुए दिखाया जरूर गया पर चालाक सामंती मानसिकता वाले शक्तिशाली तत्वों ने इन सभी संस्थाओं पर अपना कब्जा जमा लिया। दिखाने के लिए वे लोकतांत्रिक हो गए पर मूल आचार-विचार ज्यों के त्यों बने रहे। ‘रागदरबारी’ उपन्यास का शिवपालगंज गाँव वहाँ का सारा कार्यकलाप इसका जीवंत उदाहरण है।’’२

रागदरबारी एक गाँव के परिवेश में लिखा गया भारतीय समाज की आन्तरिक विकृति का चित्र उपस्थित करता है-‘‘रागदरबारी के कथानक में शिवपालगंज कोई एक गाँव नहीं; बल्कि संपूर्ण भारत है, यहाँ प्रजातंत्र की शक्ल हलवाहों जैसी है, प्रजातंत्र कुर्सी के नीचे पंजों के बल बैठा गिड़गिड़ाता रहता है, विश्वविद्यालयों की दशा अश्वशालाओं जैसी है और विद्वान प्राध्यापक केवल भाड़े के टट्टू हैं। यहाँ का थाना प्रागैतिहासिक युग से गुजर रहा है। छुआछूत धर्म पर्याय है, और आबोहवा दुर्गंधयुक्त होने के बावजूद धार्मिक संभावनाओं से भरापूरा है। शुक्ल जी की पैनी दृष्टि कचहरी से लेकर मिठाई की दुर्गति तक भी गई है। उनके व्यंग्यकार की प्रतिभा जोगनाथ की सर्फरी भाषा या बेला के फिल्मी पात्रों तक ही सीमित नहीं है। वैद्यजी, सचीचर रामधीन, रंगनाथ, गयादीन लंगड़, बद्री, पहलवान, सभी पात्रों में शुक्लजी ने सूक्ष्म मौलिकताओं की खोज करते हुए समाज में व्याप्त झूठ को नंगा करने का प्रयास किया है। उन्होंने हमेशा झूठ की तलाश की है और उसे अनावृत करते हुए अपनी रचनाओं में व्यक्त किया है और सच्चाई की खोज की है।’’३

रागदरबारी में एक चरित्र है ‘लंगड़’ जो कि जीवन भर अदालती बाबू से नकल लेने की ईमानदारी लड़ाई लड़ता है और असफल रहता है, क्योंकि वह पाँच रूपये मांग रहा था और लंगड़ उसे दो रूपये देने के लिए तैयार हो गया था, लेकिन इस विवाद में लंगड़ नकल पाने में असफल ही रहा। उसने कसम खाई थी की वह रिश्वत नहीं देगा – ‘‘मैं रिश्वत नहीं दूंगा और कायदे से ही नकल लूंगा, उधर नकल बाबू ने कसम खाई है कि मैं रिश्वत न लूंगा और कायदे से ही नकल दूंगा। इसी की लड़ाई चल रही है।’’४

यह जो चरित्र है हमारे अंदर इसकी स्थिति के प्रति भी संवेदना पैदा नहीं होती। उससे हम किसी तरह की सहानुभूति नहीं रख पाते हैं। जबकि लेखक चाहता तो उसकी शारीरिक दशा और व्यवस्थागत विकृति के बीच उसके प्रति मानवीय संवेदना पैदा कर सकता था। पर ऐसा नहीं हुआ। इसके पूरे धर्मयुद्ध को लेखक ने व्यवस्था की भ्रष्ट होती जा रही स्थिति के नजरिये से पेश किया है इसलिए पाठक को सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टहोते जाने की जानकारी मिलती है न कि लंगड़ जैसे लाखों करोड़ों लोगों की स्थिति के प्रति सवंदेनात्मक लगाव पैदा होता है। रवीन्द्र नाथ त्यागी लिखते हैं – ‘‘सारे गाँव में लंगड के अलावा कोई और ईमानदार इंसान नहीं है और लंगड़ जो है वह ‘दो नगरों की कथा’ में स्वेटर बुनने वाली स्त्री की तरह पार्श्व में हमेशा रोता रहता है।’’५

ज्ञान चतुर्वेदी रागदरबारी की इस संवेदनहीनता के संबंध में मुद्रा राक्षस के लेख का जिक्र करते हुए लिखते हैं -‘‘सबसे पहले मुद्राराक्षस के उस चर्चित लेख की चर्चा कर ली जाए जो ‘समकालीन साहित्य’ में छपा था। इस बेहद आक्रामक लेख में, बेहद निर्ममता और कदाचित लगभग इकतरफा इंदाज में मुद्रा जी ने ‘रागदरबारी’ को एक नए ही कोण से देखा था। ‘कौन किस पर हंस रहा है? शीर्षक से इस लेख में मुद्रा जी ने यह स्थापित करने की कोशिश की थी कि श्रीलाल जी ने रागदरबारी में गाँव की ‘वेदनाओं का कार्टुन’ ही प्रस्तुत किया है और यह करते हुए वंचितों, पिछड़ों आदि का मखौल उड़ाने की कोशिश की है। मुद्रा जी का मानना था कि यह ‘शहरी दृष्टि’ से देखा हुआ गाँव है-एक शहरी लेखक जिसे सड़क किनारे शौच करने को मजबूर गाँव की औरतें भी मजाक का विषय लगती हैं। शहराती संवेदनहीनता से देखोगे तो गाँव के मेले ठेले, बस स्टैण्ड, बाजार और लोग ऐसे ही दिखेंगे। जब तक आप में वह संवेदना नहीं है जो यह पहिचाने कि गाँव का आदमी भिनभिनाती मक्खियों से पगी मिठाइयाँ खाने का शौकीन है या मजबूर और उसकी किसी भी मूर्ति को पूजने या किसी भी अंधविश्वास को पूरे दिल से मानने के पीछे उसकी मूर्खता है या लंबा वंचित, सुविधाहीन और तिरस्कारपूर्ण जीवन जीने से उपजी हताशा से बचाव का तरीका। तब तक आप इन बातों का मखौल ही उड़ा सकते हैं।’’६

ज्ञान चतुर्वेदी जी स्वयं व्यंग्य लेखक हैं और व्यंग्य की धार और लक्ष्य को बखूवी समझते हैं। अतः वे अन्ततः इस बात से सहमत हैं कि रागदरबारी में उपेक्षित, वंचित, भ्रष्ट गाँव पाठक की संवेदना और सहानुभूति का उपलक्ष्य हो जाता है। वे लिखते हैं – ‘‘रागदरबारी का व्यंग्य अंततः उस सबके विरुद्ध ही तो है, जो गाँव में ये परिस्थितियाँ पैदा कर रहे हैं कि गाँव मखौल उड़ाने के विषय बन गए हैं। इन्हीं सारे मुद्दों को लेकर भी उपन्यास बन ही सकता था, परंतु तब वह रागदरबारी बनता जो आप तक अपने पाठकों के साथ ही अपने समग्र भाव में मुझे तो ‘रागदरबारी’ में गाँव के प्रति संवेदना और सहानुभूति का भाव ही दीखता है।’’७

रागदरबारी में ऐसा ग्रामीण समाज है जिसने विडम्बनाओं को ही नियति मानलिया है। इसमें बद्री पहलवान, रप्पन, छोटे पहलवान, जोगनाथ, सनीचर तथा भीखमखेड़वी जैसे चरित्र हैं जो वैद्य जी के कुशल नेतृत्व में रंगमंच पर बंदरगुलाटी खाते रहते हैं। एक मात्र स्त्री चरित्र बेला के प्रति भी किसी तरह की मानवीय संवेदना लेखक पैदा नहीं कर पाया है। वह छतों को पार करके रुप्पन के पास आती है। यौनसुख पाना ही जैसे उसके जीवन का लक्ष्य है। उसे जिस तरह से प्रस्तुत किया गया है, वह लेखकीय असहिष्णुता का प्रतीक है। पूरे उपन्यास में मानवीय संबंधों और दशाओं का खोखलापन ही चित्रित है। यह खोखलापन भी जिस तरह उभरता है उसमें उसे रंगमंच पर पर्दें के पीछे से आता हुआ दिखाया गया है, वह स्थितियों से संबंधों से पैदा नहीं होता है। यही कारण है रागदरबारी मानवीय संवेदनाओं को जगाने में असफल रहता है।

इस तरह – ‘‘राग दरबारी मूलतः नकारवादी मुहावरे की रचना है, लेकिन उसका नकारवाद व्यक्तिगत कुंठा व निराशा का परिणाम न होकर उन सामाजिक विद्रूपताओं व कुरुपताओं का परिणाम है, जिसकी भारतीय समाज में गहरी जड़े हैं। इनका उद्घाटन करने के लिए श्रीलाल शुक्ल क्षुद्र व साधारण की सामाजिक पड़ताल करते हैं। क्षुद्रताओं का महावृत्ताांत रचते हुए ही वे तन्त्र की विकृतियों की पहचान करते हैं। जिस राजनीतिक समय में ‘राग दरबारी’ की रचना हुई थी, वह सम्पूर्ण नकार का दौर था। राजनीति के स्तर पर जहाँ डॉ. राममनोहर लोहिया इस नकारवाद के मुखर प्रवक्ता थे, वहीं साहित्य के स्तर पर राजकमल चौधरी व धूमिल सहित युवा रचनाकारों की बड़ी जमात इसे अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त कर रही थी।’’८

जैसा कि मैंने लिखा कि रागदरबारी में संवेदना और सहानुभूति जैसे मानवीय मूल्य सिरे से गायब हैं उसमें सिर्फ विद्रूपता और हास्य है। इसी बात को वीरेन्द्र यादव भी स्वीकार करते हुए कहते हैं – ‘‘यहाँ यह तथ्य बेझिझक स्वीकार किया जाना चाहिए कि रागदरबारी की पाठकीय स्वीकृति व प्रशंसा ‘हाई कामेडी’ के जिस मुहावरे पर टिकी है, वही इस उपन्यास की सबसे बड़ी बाधा है। अवध की वाक्पटुता व व्यंग्य विनोद में रची पगी इस उपन्यास की भाषा ‘हाई कामेडी’ का ऐसा रूप ग्रहण करती है, जहाँ सब कुछ प्रहसन में बदल जाता है। उपन्यासकार जीवन की हर स्थिति व परिस्थिति में कामदी तलाशता है, भूख गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अशिक्षा, खान-पान, पहनावा, आचार व्यवहार सभी कुछ उसके व्यंग्य विनोद के लक्ष्य हैं। जहाँ विनोदी स्थितियाँ नहीं हैं वहाँ वह उन्हें गढ़ता है। इस प्रकार यह उपन्यास व्यंग्य विनोद का ऐसा प्रति संसार रचता है, जहाँ दुख, करुणा, सहानुभूति और सामाजिक सरोकार दृश्य से ओझल हो जाते हैं, यहाँ यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि रागदरबारी मात्र रूप के स्तर पर प्रहसन न होकर अपने कथ्य को भी प्रहसनात्मक बनाता है। उपन्यास में छोटे पहलवान और कुसहर प्रसाद प्रसंग (पृ.112-116) में बेटे द्वारा बाप की पिटाई को ‘परिवार के सनातन धर्म’ के रूप में प्रतिष्ठित करना कथ्य को प्रहसन में तब्दील करने का एक उदाहरण है।’’९

रागदरबारी में जीवन की त्रासदियों को कॉमेडी में बदल दिया गया है। यह कॉमेडी में बदलना रचना को संवेदनाहीन बना देता है। लेखक हर जगह उपस्थित है, हा स्थिति को, हर घटना को अपनी व्यंगयपूर्ण तकनीक से रिप्लेस कर देता है। वीरेन्द्र यादव ठीक ही लिखते हैं कि – ‘‘क्षोभ और आक्रोश पैदा करनेवाली स्थितियों को भी हंसोड़ बनाती रागदरबारी की शैली ‘हाई कॉमेडी’ में अंतर्निहित उस त्रासद करुणा का विलोप कर देती है, जो इसे सार्थक व सकारात्मक रूप देते हुए सामाजिक विसंगतियों को चिन्हित करने का सशक्त माध्यम बन सकती है। इसी संदर्भ में पुश्किन ने कहा था, ‘‘हाई कॉमेडी सिर्फ हास्य में ही नहीं होती, बल्कि यह चरित्रों के विकास में होती है और अक्सर यह त्रासदी के सन्निकट होती है।’’१०

लेखक पर व्यंग्य इतना हावी है कि वह दुखद और घृणास्पद स्थितियों को भी हास्य और व्यंग्य में ही प्रस्तुत करता है, जिन स्थितियों में हमारे अंदर अपार करुणा और संवेदना उभरनी चाहिए उनमें भी रचनाकार हमें हंसाने के लिए तैयार है और उस संवेदना का रिप्लेस कर देता है अपनी व्यंग्यात्मक शैली से, जो उपजनी चाहिए थी। इसमें एक लहुलुहान बूढ़े का चित्र इस तरह उतारते हैं, श्रीलाल शुक्ल – ‘‘अचानक ‘हाउ हाउ’ सामने आ गया। वह लगभग साठ साल का एक बूड्ढा आदमी था। देह से मजबूत। नंगे बदन। पहलवानी ढंग से घुटनों तक धोती बांधे हुए। उसके सिर पर तीन चोटें थीं और तीनों से अलग अलग दिशाओं में खून बह कर दिखा रहा था कि यह खून भी आपस में मिलना पसंद नहीं करता। वह जोर जोर से ‘हाउ हाउ’ करता हुआ, दोनों हाथ उठाकर हमदर्दी की भीख मांग रहा था।……. हाउ हाउ अब दु्रत लय छोड़ कर विलम्बित की तरफ आने लगा और बाद में बड़े ही ठस किस्म की ताल में अटक गया। ऐसी बात गायकी की पद्धति के हिसाब से उल्टी पड़ती थी, पर मतलब साफ था कि वे उखड़ नहीं रहे हैं, बल्कि जम कर बैठ रहे हैं।’’११

यह ऐसा दृश्य है जहाँ रचनाकार एक मानवीय पीड़ा की स्थिति को चित्रित कर रहा है और मानवीय संवेदना की दरकार थी कि उसके प्रति संवेदनात्मक अनुभूति पैदा होनी चाहिए थी – लेखक की भी और पाठकों की भी, पर ऐसा नहीं होता है। बूढे के सिर से तीन खून की धारा बहाकर भी लेखक हास्य पैदा कर देता है गायकी की तान और लय के माध्यम से। यह मानवीय क्रूरता का उदाहरण है, व्यंग्य किन स्थितियों और पात्रों पर होना चाहिए इसका चुनाव भी रचनाकार की जिम्मेदारी है। इस स्थिति में भी यदि हमारे अंदर हास्य पैदा होगा तो मानवीय जीवन का विकास किस स्थिति में जायेगा इसकी कल्पना प्लेटो ने सही की थी कि लेखकों को देश निकाला दे देना चाहिए क्योंकि ये असामाजिक चेतना को उकसाते हैं।

व्यंग्य की दूसरी स्थिति उस दृश्य में हमें चौंकाती है जब वे कहते हैं कि – ‘‘वे महिलायें पाखाने की कार्रवाई को एकदम से स्थगित कर सीधी खड़ी हो गईं और उन्हें ‘गार्ड ऑफ आनर’ जैसा उन्हें देने लगीं।’’१२ यह वाक्य सामान्य तौर से असामाजिक है। जिस स्थिति को इसमें दिखाया गया है आम जीवन में रोज घटने वाली होने पर भी मानवीयता का तकाजा होता है कि इसकी अनदेखी और उपेक्षा ही की जाती है। पाखाना करते हुए किसी को भी चित्रित करना अपने आप में वितृष्णा सूचक है और उसमें महिलाओं को दिखाना तो और भी घृणास्पद है। इस स्थिति के चित्रण से कोई भी रचनाकार किसी भी सामाजिक विसंगति या विडंबना को नहीं उभार सकता है। यह महिलाओं की बेचारगी और बेवसी को मजाक बनाना है, जिसे श्रीलाल शुक्ल ने जानबूझ कर उभारा है। वे चाहते तो इस स्थिति से गुजरे बिना भी उपन्यास आगे बढ़ा सकते थे। यह अनुभव और सामान्य ग्रामीण जीवन की चेतना के खिलाफ है। आम तौर पर गाँवों में पाखाने के लिए जिस तरफ महिलायें जातीं हैं उस तरफ से पुरुष नहीं निकला करते हैं, वहाँ से बरक कर ही जाते हैं। पर लेखक जानबूझ कर वहाँ घुस रहा है। यह घोर अनैतिक और असामाजिक स्थिति है। फिर लेखक उनकी बेवसी को ‘गॉड ऑफ आनर देने जैसा कह कर मजाक उड़ा रहा है। मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि इस वाक्य के लिखने से लेखक किस पर व्यंग्य कर रहा है, उन महिलाओं पर जो नित्यकर्म के लिए गईं हैं? यदि हाँ तो क्यों? क्या वे व्यंग्य की पात्र हैं? शायद नहीं। इससे क्या देश की पाखाना व्यवस्था पर व्यंग्य किया जा रहा है? नहीं क्योंकि घर घर में शौचालय के लिए तो सरकार अब प्रयास कर रही है उपन्यास लिखे जाने के चालीस साल बाद। फिर क्यों इस तरह की चीजें लाई गईं। यह लेखक की मानवीय संवेदनाहीनता की द्योतक है। जो कि अपनी रचना को अधिक धार दार बनाने के लिए अमानवीय और क्रूरतम स्थितियों तक जाने का तैयार है।

रागदरबारी एक ऐसे समाज को चित्रित करता है जिसमें मानवीय संवेदनायें सिरे से नदारद हैं। यह समाज लेखक की अपनी व्यंग्य कल्पना की उपज हो सकता है। मुझे नहीं लगता कोई भी मानव समूह इस तरह पूरी तरह से ‘खल’ समूह में बदल सकता है अभी परिस्थितियाँ कितनी भी खराब हो चुकी हों, इस तरह के समाज में रूपांतरण होने में सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं। मानवीय संवेदना से विहीन पहले नगरीय समाज होगा ग्रामीण समाज नहीं। लेकिन लेखक ने जिस ग्रामीण समाज को उठाया है वह भारतीय गाँव में तो मुश्किल है। समाज बदल रहा है पर पूरी तरह से संवेदनाहीन नहीं हो रहा। क्रूरता, नृशंसता बढ़ रही है, भ्रष्टाचार और शोषण भी निरंतर बढ़ रहा है पर आम आदमी पूरा समाज इस तरह का हो यह अकल्पनीय बात है।

‘‘श्रीलाल शुक्ल ‘रागदरबारी’ में ऐसे खल समाज की रचना करते हैं जहाँ स्वतंत्रता, जनतंत्र, न्यायपालिका, विकास, पंचायत राज, सहकारिता, तथा अन्य जनतांत्रिक संस्थायें ‘निहित स्वार्थों एवं अवांछनीय तत्वों के हाथों की कठपुतली भर बन कर रह जाती है। भारत जैसे अर्ध सामंती और विकासशील देश में जनतंत्र को कैसे निहित स्वार्थों के लूटतंत्र में बदला जा सकता है, शिवपालगंज इस की छोटी-मोटी प्रयोगशाला है। अपनी संपूर्णता में यह उपन्यास नेहरू युग की ‘माइक्रो आलोचना’ है। स्वातंत्र्योत्तर भारत में वैद्य जी सरीखे परजीवी वर्ग द्वारा जनतांत्रिक संस्थायें एवं विकास योजनाएं किस प्रकार व्यक्तिगत हित साधन हेतु अपहृत कर जी गईं, राग दरबारी इसकी मनोरंजक औपन्यासिक पैरोडी है। शिवपालगंज एक ऐसा प्रिज्म है, जहाँ से आधुनिक जनतंत्र का विकृत यथार्थ सैकड़ों किरणों के माध्यम से अपने विरूपित व कुरूपित रूप में कभी दीखता है कभी विलुप्त हो जाता है। रागदबारी के केन्द्र में वैद्य जी की बैठक, छंगामल कॉलेज, कोआपरेटिव सोसाइटी एवं ग्राम पंचायत सरीखी संस्थायें हैं, जिन्हें, जिस पर स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज के विकास की अवधारणाएं टिकी हैं। इन संस्थाओं की विकृतियों को चिहिन्त करते हुए उपन्यासकार ‘विलायती तालीम में पाये हुए जनतंत्र को कटघरे में खड़ा करता है।’’१३

संदर्भ सूची।
1. श्रीलाल शुक्ल विचार विश्लेषण एवं जीवन, डॉ. हरि मोहन शर्मा, संपा. प्रेम जनमेजय, पृ. 36
2. श्रीलाल शुक्ल विचार विश्लेषण एवं जीवन, डॉ. हरि मोहन शर्मा, संपा. प्रेम जनमेजय, पृ. 33
3. श्रीलाल शुक्ल विचार विश्लेषण एवं जीवन, रमेश सोबती, पृ. 86
4. रागदरबारी, प्रथम संस्करण, पृ. 47
5. श्रीलाल शुक्ल विचार विश्लेषण एवं जीवन, पृ. 20
6. श्रीलाल शुक्ल विचार विश्लेषण एवं जीवन, पृ. 15
7. श्रीलाल शुक्ल विचार विश्लेषण एवं जीवन पृ. 16
8. उपन्यास और वर्चस्व, वीरेन्द्र यादव, पृ. 106
9. उपन्यास और वर्चस्व, वीरेन्द्र यादव, पृ. 106 – 107
10 .उपन्यास और वर्चस्व, वीरेन्द्र यादव, पृ. 106 – 107
11. रागदरबारी पृ. 111
12. रागदरबारी पृ. 233
13. उपन्यास और वर्चस्व, वीरेन्द्र यादव, पृ. 106 – 107
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परिचय . लेखक वरीय साहित्यकार हैं. इनके कई आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं.

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