देखिए, अब जिंदगी की तर्जुमानी है ग़ज़ल

–  लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता

‘‘ग़ज़ल कभी भी देशों या मज़हबों की सरहदों में कै़द नहीं हो पाई। इसे ज़बरदस्ती रूहानी या आध्यात्मिक लिबास नहीं पहनाया जा सका। यह हमेशा इंसानी भावनाओं, उसकी सांसारिक सोच की ऊँचाइयों–गहराइयों और दु:ख–सुख का साथ देती रही। ग़ज़ल ने दिल की कुदरती ख़लिश और दर्द को तराश कर और दिमाग़ी सोच की बेचैनियों को अल्फ़ाज का अमली जामा पहनाकर वह तहज़ीब पैदा की जो दिलो–दिमाग़ की सरहदों पर होने वाले हमलों का मुकाबला सदियों से करती रही है और आज भी उसकी पहरेदारी कर रही है। ग़ज़ल एक साँस लेती, जीती–जागती तहज़ीब है। इसी तहज़ीब को हिन्दी और उर्दू ने अपनाया यह विधा या तो सौंदर्य की इबादत करती रही या सौंदर्य को विकृत किये जाने के खि़लाफ़ जधो–जहद में जुटी रही। इसने हर समय, हर तरह, हमेशा इंसान के सपनों का साथ दिया। जब–जब मनुष्य के सपनों को साहित्य ने उलझाया, ग़ज़ल ने उसे सुलझाया।’’1
कथाकार कमलेश्वर का यह बयान ग़ज़ल के विकास का मुकम्मल मूल्यांकन माना जाना चाहिए। इस विधा ने अपने जन्म से लेकर अब तक के हज़ारों सालों में अलग–अलग मुल्कों में जो कुछ जोड़ा है, वह न सिर्फ़ भाषा के हवाले से मौजूँ है; बल्कि उसका गहरा ताल्लुक़ उस मुल्क के सामाजिक–सांस्कृतिक बनावट से भी है। उसके ढहते–बनते इतिहास से ही नहलृ, बल्कि उसकी आबोहवा से भी है। राहे हक़ में फ़ना हो जाने से ही नहलृ, बल्कि जि़न्दगी के दर्द को समझने से भी है। ग़ज़ल ने इंसान को जिस हद तक समझने की कोशिश की है और इंसान ने जितना कुछ उसमें पाया है; उसी का नतीजा है कि हज़ारो साल पुरानी संरचना के बावजू़द यह अब भी जवान है और न सिर्फ़ अपनी अदा से आमजन को रिझा रही है, बल्कि उन्हें जि़न्दगी के असल मायने सीखा रही है। यह तकनीक के तनाव को समझती है और विकास के बिखराव को भी समेटने की कोशिश करती है। किसी पाक दिल की पैदाइश यह विधा आज भी बिल्कुल पाकीज़ा है।
कमलेश्वर ने बिल्कुल सही कहा है कि यह एक ऐसी तहज़ीब जो सौंदर्य की इबादत करती है। उसे विकृत किये जाने के खि़लाफ़ लड़ती है। यह सौंदर्य सिर्फ़ और सिर्फ़ रूप का नहलृ है, बल्कि मनुष्य को मनुष्य बनाये रखे जाने वाले मूल्यों का भी हैं। यह सौंदर्य श्रम का भी है, जिसकी पहचान शायर करता है–
सो जाते हैं फुटपाथ पर अख़बार बिछाकर,
मज़दूर कभी नलृद की गोली नहलृ खाते।2
इस विधा ने हमेशा ही एक बेहतर दुनिया का ख्व़ाब देखा और दिखाया है। पीड़ा में हँसना सिखाया है। जटिल होते जीवन को सहज बनाये रखने की ईमानदार कोशिश की है। इसकी परम्परा को बहुत कम शब्दों में निदा फ़ाज़ली ने कुछ यूँ बयाँ किया है, ‘‘ग़ज़ल का इतिहास बहुत लंबा–चौड़ा है। इसमें कई देशों की संस्कृति और तहज़ीबों का सौंदर्य शामिल है। इसमें कई सदियों का फैलाव है, जिसको समेटने की कोशिश करूँ तो यूँ कहूँगा– ग़ज़ल अरब के रेगिस्तान में इठलाई, ईरान के बाग़ों में लहराई और वहाँ से चलकर जब गंगा और हिमालय के देश आई तो उसका हुस्न कुछ ऐसा था, उसके माथे पर ज़ोरोस्टर का नूर था, दिल में गीता थी, हाथों में कुरान था और उसका नाम धर्मनिरपेक्ष हिन्दुस्तान था।’’3
ग़ज़ल का जन्म अरब की वादियों में हुआ। वहाँ के सौंदर्य और संघर्ष को उस समय की ग़ज़लों में देखा जा सकता है। जब यह विधा ईरान में आई तो इसको बहुत विस्तार मिला। उस दौर में रौदकी, बेदिल, शेख़ सादी, अमीर खु़सरो, हाफि़ज जैसे शायरों ने इसे जो लहज़ा और अर्थवत्ता दी, उसने इसे बहुत सशक्त बना दिया। ग़ज़लों में सूफ़ीयाना तत्त्व ईरानी शायरों ने ही शामिल किया। उन्होंने गुफ़्तगू की इस विधा को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया। लेकिन, हिन्दुस्तान में जब अमीर खुसरो ने इसे अपनाया तो उन्होंने अपनी तरह की भाषा गढ़ी (यहाँ ध्यान रखें कि उनकी अधिकांश ग़ज़लें फ़ारसी में हैं। उनकी गिनती फ़ारसी के शीर्षस्थ शायरों में की जाती है। हिंदी में दो ग़ज़लें ही मिलती हैं, उसमें भी एक तो फ़ारसी और हिंदी भाषा का अनूठा मिश्रण है।) ‘जब यार देखा नयन भर/दिल की गई चिंता उतर,’ कोई रचनाकार कितना जीवंत हो सकता है, यह आमाण अमीर ख़ुसरो की हिंदी रचनाएँ हैं। सात सौ सालों बाद भी ऐसा लगता है कि घर–आँगन में कोई बोल रहा है। अफसोस! इस परंपरा को जो विस्तार मिलनी चाहिए थी, नहलृ मिली। ख़ुसरो के बाद उत्तर भारत में यह पाँच सौ साल तक तो दिखाई ही नहलृ पड़ती। ढूँढ़ने वालों ने बडी मुश्किल से दो–तीन नाम ढूँढ तो लिये हैं, किंतु सब बेअसर जान पड़ते हैं। कबीर की एकमात्र ग़ज़ल ‘हमन है इश्क़ मस्ताना हमन को होशियारी क्या’ भाव और भाषा दोनों गहरा असर छोड़ती है, किंतु यह अपनी आामाणिकता को लेकर संदिग्ध है। ऐसा भी नहलृ है कि अमीर ख़ुसरो के बाद ग़ज़लें नहलृ लिखी गईं, लिखी गईं और खूब लिखी गईं। किंतु उत्तर भारत में नहलृ; दक्षिण में लिखी गईं। दक्षिण में यह विधा निरंतर फूल–फल रही थी। इसकी भाषा वही थी, जो दिल्ली में विकसित हुई थी। लिखने–पढ़ने वाले लोग वही थे, जो दिल्ली से तुगलकी फरमान के साथ बीजापुर–गोलकुंडा में जाकर बसे थे। यदि कुछ नया था तो वह उनकी लिपि, फ़ारसी लिपि में ही रचनाएँ होती थलृ। इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि इस भाषा का जन्म ही ज़रूरत की तरह हुआ था और जो लोग इसे बोलते थे, उनकी लिपि फ़ारसी ही थी, वे देवनागरी जानते ही नहलृ थे। जिन्हें देवनागरी आती थी, वे भी फ़ारसी लिपि का ही आयोग करते थे, क्योंकि यह शासन के द्वारा स्वीकार्य भाषा थी। किंतु, दिल्ली से दूर बीजापुर–गोलकुंडा में जो भाषा विकसित हुई वह फ़ारसी से भिन्न् थी (ध्यान रखें कि उस समय तक भाषा के रूप में ‘उर्दू’ जैसी शब्दावली का आयोग नहलृ हुआ था। रचनाकार अपनी भाषा के लिए हिंदवी, हिंदी, गुजरी, देहलवी, रेख़्ता, दक्खिनी का ही आयोग करते थे।) और उस दौर के रचनाकारों के हवाले से कहूँ तो वह हिंदी थी। शासन का भी बड़ा सहयोग मिला। दक्खिनी को राजभाषा का पद प्रापत था। नतीजतन, हिंदी का विकास अच्छी तरह हुआ। लेकिन, यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यह भाषा जिस देशकाल में आकार ले रही थी, वहाँ का आभाव भी पड़ा; इसीलिए आप नुस्रती, क़ुली कुतुबशाह, वली दकनी आदि को पढ़ते हुए यह पायेंगे कि इनकी भाषा में जो क्रियाएँ हैं और जो ‘टोन’ है; वह बिल्कुल अलग है। यही वे तत्त्व हैं जो इस भाषा को अमीर ख़ुसरो की भाषा से अलग कर देते हैं। ख़ुसरो की भाषा में क्रियाएँ और ‘टोन’ उत्तर भारतीय है। यही वजह है कि वली दकनी की भाषा दक्खिनी उत्तर में आते ही अपने पुराने लहजे को ओढ़ लेती है। जहाँ एक बार फिर से ख़ुसरो की खड़ीबोली जी उठी। दरअसल, वह अचानक नहलृ जी उठी, बल्कि दक्खिनी के निरंतर विकास ने उसे जिं़दा रखा। जब वह अपने पुराने घर में लौटी तो पुन: खिलखिला उठी।
वली दकनी के बाद उर्दू शायरी हो या हिंदी कविता (हिंदी कविता को यह भाषा ग्रहण करने में सौ वर्ष लग जाते हैं, किंतु गिरिधर दास और भारतेन्दु की ग़ज़लों को ध्यान में रखकर इस विकास को समझा जा सकता है।) दोनों का तेवर बदल जाता है। 1857 ई0 की क्रान्ति के बाद हिंदी क्षे॑ा का नवजागरण हिंदी भाषा को माजकर रख देता है। इस दौर में दोनों भाषाओं को भारतेंदु और ग़ालिब जैसी शख्ि़सयतों का नेतृत्व मिलता है, जिसका परिणाम यह होता है कि पद्य एवं गद्य दोनों में वैचारिक लेखन को बढ़ावा मिलता है। जहाँ एक तरफ हिंदी कविता रीतिकालीन दरबारी संस्कृति से बाहर आकर घरबारी होने लगती है, वहलृ दूसरी तरफ उर्दू शायरी हुस्नो–इश्क़ के दायरे को तोड़कर जीवन–जगत के  दर्द से बतियाने लगती है। यदि हम उर्दू और हिंदी बँटवारे को भुला दें, जो बहुत कुछ अंग्रेज़ी सियासत की ‘फुट डालो, शासन करो’ नीति का ही परिणाम थी तो दोनों भाषाएँ एक ही है, लिपि दोनों की अलग–अलग है। इसका वैज्ञानिक कारण भी है, हमने भाषा के विस्तृत अध्ययन से यह पाया है कि किसी व्यक्ति को एक से दूसरे क्षे॑ा में स्थानांतरित कर दिया जाये तो वह वहाँ की भाषा तेजी से ग्रहण करता है, किंतु बीसों सालों रहने के बावजूद लिपि उसकी समझ से परे रहती है। वह उस दिशा में आयास भी नहलृ करता, क्योंकि भाषा तो वह ग्रहण कर ही लेता है। यही बात फ़ारसी लिपि के साथ ही है। जो फ़ारसी जानते थे उन्होंने बनती हुई भाषा को भी इसी में रचा–बुना! देवनागरी की तरफ नहलृ भागें। इसकी ज़रूरत महसूस नहलृ की। चूँकि शासन के द्वारा फ़ारसी ही स्वीकृत थी सो अदब से रिश्ता रखने वालों ने उसी को अपनाया।
समाज और व्यक्ति के छिटपुट दुराग्रहों को छोड़कर विचार करें तो अमीर ख़ुसरो की हिंदी भाषा का क्रमबद्ध विकास वली दकनी तक दक्खिनी में और उसके बाद दिल्ली के आस–पास के क्षे॑ाों में होता रहा। नवजागरण के लेखन ने इस भाषा को मजबूत आधार दिया। निराला ने इसके गद्य रूप के संदर्भ में जो कहा– ‘गद्य जीवन संग्राम की भाषा है’– उस से हिंदी के वैचारिक लेखन के महत्त्व को तो समझा ही जा सकता है, साथ ही गद्य के भविष्य की आहट भी महसूस की जा सकती है। हमारे दौर में गद्य की स्थिति निराला की दूरदर्शिता का आमाण है।
जिस खड़ीबोली या हिंदी पर महावीर आसाद द्विवेदी की मूँछें तनी हुई हैं। जिसके विकास का बहुत बड़ा श्रेय ‘सरस्वती’ पि॑ाका को जाता है। दरअसल, उस हिंदी के क्रमबद्ध विकास में ग़ज़ल विधा का महत्त्वपूर्ण योगदान है। अमीर ख़ुसरो से लेकर वली दकनी, वली दकनी से लेकर ग़ालिब और ग़ालिब से शमशेर बहादुर सिंह तक की भाषा का ठीक–ठीक अध्ययन करने के ‘ग़ज़ल’ का मुकम्मल अध्ययन जरूरी है। इससे भाषा की कई बनी बनाई अवधारणाएँ ढह जायेंगी। ‘ग़ज़ल’ का जन्म ही समन्वय की चेष्टा के साथ हिंदुस्तान की सरज़मीं पर हुआ था। इसने उत्तर और दक्षिण भारत को एक भाषा सू॑ा में पिरो दिया।
यह लंबी भूमिका इसलिए देनी पड़ी है कि हिंदुस्तानी सरज़मीं पर ग़ज़ल को हमेशा ही आयातित काव्य–विधा के रूप में देखा गया। जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि इस विधा ने जो ताक़त और रवानी यहाँ की मिऐी से ली थी, वह तो नेपथ्य में चली ही गई, उसके साथ ही इसने भाषा के साथ–साथ हिंदुस्तानी समाज से जो सरोकार स्थापित किये थे, उसे भी बहुत ही सतही ढंग से लिया गया। अमीर ख़ुसरो से लेकर स्वतं॑ाता तक की ग़ज़लों (चाहे वे फ़ारसी लिपि की हो या देवनागरी लिपि की) पर गंभीरता से बातचीत नहलृ हुई। उसे बड़े फलक पर देखने–समझने की कोशिश तो कई बार हुई, किंतु साहस का अभाव कहें या राजनैतिक दबाव, उसने इसकी परिधि को फैलने नहलृ दिया। भला हो अयोध्या आसादा गोयलीय, जानकी आसाद शर्मा, आकाश पंडित जैसी आतिभाओं का जिन्होंने फ़ारसी लिपि का रूपांतरण देवनागरी में कर व्यापक जन समुदाय को इस विधा से परिचित कराया। लगभग इतना ही श्रेय जाता है कुंदनलाल सहगल, बेगम अख़्तर, मेंहदी हसन, जगजीत सिंह, गुलाम अली, चंदन दास जैसे ग़ज़ल गायकों को, जिनकी आवाज़ ने इस विधा की नाजुक मिजाज़ी और इसके तेवर को दुनिया के सामने रखा। आज की तारीख में हिंदुस्तान की शायद ही कोई साहित्यिक पि॑ाका हो जो इस विधा को तवाज़ों ने दे।
स्वतं॑ाता के बाद जिन शायरों ने इस विधा का लबो–लहज़ा बदला, इसे जीवन के संघर्ष से जोड़ा, इसे सामजिक सरोकार का पैरहन मुहैया कराया, इसे हुस्न से ज़्यादा रोटी के लिए जरूरी माना; उनमें दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी का नाम आमुख है।ख्’ चूंकि लेख की सीमा है, अत: इन दो को आधार बनाकर ही इस विधा के स्वातं॑योत्तर पक्ष पर आकाश डाला गया है।,’ आजाद हिंदुस्तान में जिस शायर ने बहुत कम लिखकर भी इस विधा को सबसे ज्यादा आभावित किया, वह दुष्यंत कुमार हैं। दुष्यंत ने अपने समकालीनों पर ही नहलृ, आने वाली पीढ़ी पर भी गहरा असर छोड़ा। यह असर रचनात्मक कलात्मकता के साथ–साथ सरोकारों के स्तर पर भी था। यदि आजाद हिंदुस्तान के पहले इस विधा को सबसे ज्यादा गालिब ने आभावित किया तो निश्चित तौर पर इसके बाद दुष्यंत ने ही किया। दुष्यंत ग़ालिब की पीड़ा और इस विधा के आसार की क्षमता का वर्तमान और भविष्य दोनों देख रहे थे। उन्होंने स्वयं कहा, ‘‘ग़ज़ल लिखने या कहने के पीछे एक जिज्ञासा अक्सर मुझे तय करती रही है और वह ये कि भारतीय कवियों में सबसे आखर अनुभूति के कवि मिर्जा गालिब ने अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए ग़ज़ल माध्यम ही क्यों चुना? और अगर ग़ज़ल के माध्यम से गालिब अपनी पीड़ा को इतना सार्वजनिक बना सकते हैं तो मेरी दुहरी तकलीफ (जो व्यक्तिगत भी है, सामाजिक भी) इस माध्यम के सहारे एक अपेक्षाकृत व्यापक पाठक वर्ग तक क्यों नहलृ पहुँच सकती?’’4 साल की छोटी आयु पाने वाले दुष्यंत की व्यक्तिगत पीड़ा क्या रही होगी, यह समझ पाना कठिन है। कविताओं में निहित संकेतों को समझने की कोशिश की जाये तो ये मिल जायेंगी–
सोचा कि तू सोचेगी, तूने किसी शायर की,
दस्तक तो सुनी थी पर दरवाज़ा नहीं खोला।5
लेकिन, सामाजिक पीड़ा तो सार्वजनिक है। दुष्यंत ने जिस दौर में ये ग़ज़लें लिखीं, वह आज़ाद हिंदुस्तान की राजनीति का सबसे स्याह दौर है। आपातकाल का दौर 25 जून 1975 ई0 से 21 मार्च 1977 ई0 तक इंदिरा गाँधी का अलोकतांि॑ाक और तानाशाही फरमानों का दौरा जिसके बारे में जयआकाश नारायण ने कहा था, ‘‘भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि।’’6 भूखा–नंगा रहकर, सपनों को जोड़–तोड़ कर मनुष्य जी लेता है। आज़ाद हिंदुस्तान का मनुष्य भी सालों से कुछ इसी तरह जी भी रहा थे। कुछ आवाजें थलृ जो सत्ता के चरि॑ा को उधेड़ रही थलृ। कुछ हाथ थे जो आतिरोध में उठने लगे थे; किंतु शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि इस आबोहवा को आपातकाल की भेंट चढ़ाकर अभिव्यक्ति की स्वतंंत्रता भी छीन ली जायेगी। यूँ ही नहलृ दुष्यंत ने कहा होगा–
कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहलृ शहर के लिए।7
इस शेर के संदर्भ को उद्घाटित करते हुए विजय बहादुर सिंह लिखते हैं, ‘‘जब उन्होंने ग़ज़लें शुरू की तो एक ग़ज़ल सीधे तत्कालीन आधानमं॑ाी इंदिरा गाँधी को संबोधित थी– ‘कहाँ तो तय था’ कवि की इस भंगिमा में आत्मीयता की जितनी गहरी ऊष्मा थी, स्मृतियों का जितना सघन और पवि॑ा दबाव था, दर्द की उतनी ही बेइंतहाँ रेखाएँ भी। जितना तीखा आक्रोश और आक्रामकता थी, उतनी ही गहरी लोकभक्ति और लोक समर्पण भी। इन ग़ज़लों को पढ़कर कवि की मनोभूमि का साक्षात्कार किया जा सकता है।’’8 ऐसा नहलृ था कि यह बेचैनी और पीड़ा सहसा जाग उठी थी, यह सबकुछ बहुत पहले से दुष्यंत में विद्यमान था। यही कारण है कि अपनी काव्य–या॑ाा के आरंभ से अंत वे अपने आपको बदलते रहे। शुरुआत में गीत लिखें, (गाजि़याबाद में रहते हुए) मध्य में छंदमुक्त कविताएँ लिखलृ (इलाहाबाद में रहते हुए) और अंत में ग़ज़लें लिखलृ (भोपाल में रहते हुए) ऐसा लगता है कि जो कुछ वे कहना चाहते थे, पाठकों तक पहुँचाना चाहते थे; वह पहुँच नहलृ पा रहा था। दुष्यंत की पीड़ा की बड़ी वजह यह भी थी। जिस दौर में कविता की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी क्रांति के लिए (आपातकाल में ओस की स्वतं॑ाता को खत्म किया जाना), कविता संओषण के संकट से गुजर रही थी। वह एक–एक करके इतने वादों और प्रयोगों से गुजर रही थी कि सरोकार के सारे आयाम बंद हो गये थे। उससे क्रांति की उम्मीद नहलृ की जा सकती थी। दुष्यंत ने इस पीड़ा को कुछ यूँ बयाँ किया है– ‘‘मैं बराबर महसूस करता रहा हूँ कि कविता में आधुनिकता का छù कविता को बराबर पाठकों से दूर करता चला गया है। कविता और पाठकों के बीच इतना फासला कभी नहलृ था, जितना आज है, इससे ज्यादा दु:खद बात यह है कि कविता धीरे–धीरे अपनी पहचान और कवि अपनी शख्सियत खोता चला गया है। ऐसा लगता है मानो दर्जन कवि एक ही शैली और शब्दावली में एक ही कविता लिख रहे हैं और इस कविता के बारे में कहा जाता है कि यह सामाजिक और राजनीतिक क्रान्ति की भूमिका तैयार कर रही है। मेरी समझ में यह दलील खादी और यह वक्तव्य भ्रामक है जो कविता लोगों तक पहुँचती ही नहलृ वह भला क्रांति की संवाहक कैसे हो सकती है?’’8 यही कारण है कि वे हमेशा उस कविता की तलाश में थे जो लोगों तक पहुँचे। तत्पश्चात् उनकी चेतना का विस्तार करे। उन्हें सोचने पर विवश करे कि क्यों आज़ादी के इतने सालों बाद भी हम आज़ाद नहलृ हैं? किस तरह व्यवस्था ने हमें बरगलाया है और इसके साथ क्या किया जाना चाहिए?
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।9
लेकिन, यह सबकुछ तभी हो सकता है जब ‘क्या किया जाना चाहिए’ पाठक तक पहुँचे। अन्यथ, वही होगा कि ‘जंगल में नाचा मोर, किसने देखा।’ दुष्यंत इस संदर्भ में कहते थे, ‘‘मैं ऐसे हवाई पाठक की कल्पना नहलृ करता जिनकी बौद्धिक आभा मेरे खाँचों से मेल खाते हों। मैं तो खुद पाठक के रूप में, उस खरी कविता की खोज में हूँ जो हर व्यक्ति की कविता हो और हर कंठ से फूटे।’’10 वे जानते थे कि सर्जक के खाँचों में पाठक की उपस्थिति मुश्किल है, अत: रचना की संओषणीयता और अर्थवत्ता इसी में है कि उसका खाँचा पाठक का बनाया हो। शायद, यही वह चिंतन है, जिसने अभिव्यक्ति के स्तर पर दुष्यंत को ज्यादा जीवंत बनाया। वे हमारे दौर में भी आतिरोध की सबसे मुखर आवाज़ हैं। क्या बच्चा, क्या बूढ़ा सब दुष्यंत के यहाँ अपना हल पाते हैं। अजब तो यह है कि ये सारे सुलझाव दुष्यंत के आश्न और बेचैनी में निहित हैं।
मेरी जुबान से निकली तो सिर्फ़ नज़्म बनी,
तुम्हारे हाथ में आई तो एक मशाल हुई।10
दुष्यंत की ग़ज़लों की दुनिया वायवीय नहलृ है, बेहद ज़मीनी है। सिर्फ़ इस एक शेर से यह मर्म स्पष्ट हो जाता है–
मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ,
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ।11
यहाँ कुछ भी जीवन के पार नहलृ, सबकुछ जीवन में ही है। जीवन और रचना में कोई फाँक नहलृ। जो बाहर है, वही अंदर है। सच कहूँ तो एक साधारण मनुष्य की सामान्य–सी इच्छाओं की पूर्ति चाहने वाला एक सार्थक जेन्यून कवि। एक ऐसा कवि जिसने रचना और राजीतिक के सार्थक सरोकार स्थापित किये। आम आदमी को उसकी ताक़त का अहसास कराया। भ्रम की टाटी को हटाने की सफल कोशिश की–
वे मुतमइन है कि पत्थर पिघल नहलृ सकता,
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए।12
कविता हिंदुस्तान में और शायद दुनिया के और मुल्कों में भी मनोरंजन का ही साधन रही है। लेकिन, दुनिया के और मुल्कों में चेतना के आसार का जो कार्य नाटक या कथा ने किया, हिंदुस्तान में वही कार्य कविता के माध्यम से हुआ। यही वजह है कि हिंदी साहित्येतिहास का मूल्यांकन सदैव कविता को केन्द्र में रखकर किया गया। आदिकाल से आधुनिक काल तक की कविता में बहुत कुछ ऐसा है जिसने अपने समय और समाज को दिशा देने के साथ–साथ हमारे समय और समाज को भी दिशा देने का कार्य किया है। हमारे दौर में समाज चेता होना कोई आसान कार्य नहलृ है, और यदि वह सर्जक हो तो फिर उसके समाज चेता होने का मतलब है; उसका कहलृ गुम हो जाना, कहलृ खप जाना। जब चारों तरफ शासन के अन्याय की लपटें उठ रही हों, और आम जन की बहुत छोटी और मामूली इच्छाएँ जल रही हों– लगभग तीन दशक की आज़ादी ने आम जन को पेट भर रोटी तो नहलृ दी; हाँ कुछ युद्ध और टूटे हुए ख़्वाब जरूर दिये। आतिरोध के लिए नक्सलबाड़ी दिया और उसे कुचलने के लिए आपातकाल। दुष्यंत के अंतिम दिनों की हालत को विजय बहादुर सिंह ने मेहर्न्सिसा परवेज़ के हवाले से दिखाया है, ‘‘होटल गये तो दुष्यंत भाई पैजामा और हल्के स्लेटी रंग की शर्ट पहने बिस्तर पर अधलेटे से बैठे कुछ लिख रहे थे। कमरे में ढेर सारी खाली बोतलें पड़ी थलृ। बीड़ी के टुकड़ों से पलंग का निचला भाग भरा था। कमरे की हालत देखकर लग रहा था, इसमें रहने वाला व्यक्ति रात भर सोया नहलृ है। यह ग़ज़लों का दौर था। ‘साये में धूप’ की तूफ़ानी ग़ज़लों का। कवि ने मेहरन्निसा जी से कहा था ‘‘इन दिनों मैं महीने भर से यही हूँ। किसी से नहलृ मिलता। बस अ‚फिस जाता हूँ और लौटकर यहलृ इसी कमरे में बंद हो जाता हूँ।’’13 परिस्थिति के चित्रण और दुष्यंत के कथन से दुष्यंत की बेचैनी और पीड़ा का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यूँ ही नहलृ दुष्यंत ने ग़ज़ल को अपनाया, किसी शायर ने बहुत सही कहा है इसके बारे में–
दिल में हो दर्द का तूफां तो ग़ज़ल होती है,
कोई मुश्किल न हो आसां तो ग़ज़ल होती है।
अपने वक्त़ की मुश्किलों को सहल करता हुआ शायर सबकुछ अपने शरीर पर झेलकर इस दुनिया से चल बसा। उनके बाद ग़ज़लकारों की बाढ़ सी आई, किंतु दुष्यंत की ऊँचाई हासिल न कर सकी। उन्हें शायद पता न था कि दुष्यंत सरीखा होने के लिए बेचैनी और तड़प के साथ–साथ खुदको खपा देने का साहस भी चाहिए। सुविधाओं के इस दौर में कुछ पाने का मोह छोड़कर व्यवस्था से टकराने का मधा भी चाहिए। कैफ़ भोपाली ने बहुत ठीक कहा है, ‘‘साये में धूपे’ की पहली ग़ज़ल का पहला शेर ‘कहां तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए’ एक राजनीति ज्ञान ही है जिसने पूरे देश को उन भूली हुई आतिज्ञाओं की याद दिला दी जिसे सत्ता राजनीति करने वालों ने लगभग धो–पोंछ डाला था। दुष्यंत की शायरी की असली जान यही राजनीति है।’’14
राजनीति के साथ सीधा मुठभेड़ दुष्यंत की अपार सफलता का आधार है। यही वह बिन्दु है जहाँ खड़े होकर दुष्यंत पूरे मुल्क का नक्शा पाठकों के सामने आस्तुत कर देते हैं। जहाँ से अतीत और वर्तमान के साथ ही भविष्य के अंतर्विरोध भी स्पष्ट दिखाई पड़ने लगते हैं। आधुनिक हो रहे जटिल जीवन के सारे रहस्य आँखों के सामने नाचने लगते हैं और समय स्थिर होकर संवाद करने लगता है। इस स्थिति में पहुँचकर शायर को कोई मलाल नहलृ रह जाता। वह स्वीकार करता है–
दुख नहलृ कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश–सी छाती तो है।15
हिंदी आलोचना ने ग़ज़ल की नोटिस नहीं ली है, और यदि ली भी है तो नाकारात्मक रूप से। लेकिन, दुष्यंत और अदम की ग़ज़लों ने उनके विचारों को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है। एक साक्षात्कार में मैनेजर पाण्डेय कहते हैं, ‘‘अदम की ग़ज़लें पढ़ने के बाद मेरी यह धारणा बदली और लगा कि भाषिक चमत्कार तो ग़ज़ल का स्वभाव है। लेकिन अदम गोंडवी की ग़ज़लें जनता की या श्रोताओं या पाठकों की चेतना को स्तब्ध नहीं करतीं, बल्कि बेचैन करती हैं, जगाती हैं और आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देती हैं। यह मैं कह सकता हूँ और यही मुझे अपनी बात में सुधार करना जरूरी लगता है।’’16 एक सफल रचनाकार की यही ताक़त है कि वह अपनी रचनात्मकता से आलोचना की धारा भी मोड़ देता है। अदम ने कुछ ऐसा ही किया। इस विधा को जामो–मीना से दूर जि़ंदगी की तर्जुमानी में ले गयें–
जामो–मीना की खनक से थी ये वाबस्ता जरूर,
देखिए, अब जिंदगी की तर्जुमानी है ग़ज़ल।’16
कैफ़ भोपाली ने ‘समय से मुठभेड़’ की विस्तृत भूमिका में यह लिखा है, ‘‘दुष्यंत ने अपनी ग़ज़लों से शायरी की जिस नई ‘राजनीति’ की शुरूआत की थी, अदम ने उसे उस मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश की है जहाँ से एक–एक चीज़ बगैर किसी धुँधलके के पहचानी जा सके। इस ‘राजनीति’ का एक और मकसद राष्ट्रीय आंदोलन के घायल और लहुलूहान कर डाले गये उन मूल्यों की याद को कायम रखने और बचाने का भी जिनके बचने पर ही यह देश और इसकी आज़ादियाँ बच सकेंगी। यह शायरी एक अर्थ में, सचमुच शायरी कम है सीधी बात कहलृ अधिक। इस रूप में यह एक ऐसी आपदधमऍ कला है जो आग की लपटों के बीच धू–धू जलती बस्तियों को बचाने के लिए आगे आती है।’’17 सचमुच में अदम की शायरी आपदधर्मी कला है। उस बस्ती को बचाने के लिए जो ठाकुरों और रसूखदारों के आतंक और शोषण से जर्जर हो चली है। जहाँ वंचित–पीडि़त पुरुष हुक्म बजाने के लिए और मुफ़लिसी की भेंट चढ़ चुका सौन्दर्य हर पल स्याह होने के लिए ही जन्मा है। अदम की यह कला अपने ट्रैजिक कलेवर में भी आतिरोध का जो स्वर रचती है, वह साहित्य की परंपरा में बहुत कम देखने को मिलता है। दुष्यंत में यह रचाव है, किंतु विधा की नाजुकियत के साथ; जबकि अदम नाजुकियत के पैरहन को उतार फेंकते हैं और अपनी हिऒयों के सहारे ही शोषण करने वालों से टकराते हैं। बहुत सही कहा है कैफ़ भोपाली ने कि अदम सीधा संवाद करते हैं। कबीर की तरह सवालों की झड़ी लगा देते हैं। सदग्रंथों को मथकर रख देते हैं। भूख और रोटी की जधोजहद से बार–बार गुजरते हैं। जिस भूख को धूमिल ने सत्तर के दशक में कविता के केन्द्र में लाकर स्वतं॑ा भारत में आम आदमी के सुनहरे सपनों के टूटने की जो खनक पैदा की थी, उसकी अनुगूँज अदम की ग़ज़लों में बरकरार है। यह महज संयोग नहलृ है कि अदम की ग़ज़लों में भूख और रोटी बारहा आते हैं। स्वतं॑ाता के पूर्व और पश्चात् भी भूख और रोटी का मामला जस का तस रहा। इसी रोटी के चक्कर में आम आदमी देश से परदेश, उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम का चक्कर लगाता है। इसी रोटी की मर्यादा बचाते–बचाते किसानी सभ्यता का नायक होरी असमय ही मृत्यु के फँदे पर झूल जाता है। इसी रोटी का खेल है कि बुधिया को घीसू–माधव मरने के लिए छोड़ देते हैं। इसी रोटी की चाहत में कितने मासूमों के हाथों में बंदूक आ जाती है। इसके बावजूद रोटी का संघर्ष खत्म नहलृ होता। शायद, कभी होगा भी नहलृ–
इंसान काले–गोरे के खेमें में बँट गया
तहज़ीब के बदन पेर सियासी लिबास है
रोटी के लिए बिक गई धनियाँ की आबरूँ
लमही में ओमचंद का होरी उदास है18
अदम की शायरी उत्तर आधुनिकता के इस दौर में भी जिस यथार्थ से हमारा सामना कराती है, जो तस्वीर दिखाती है; वह हिन्दुस्तान की तरक्क़ी के सारे पोल खोलती नज़र आती है। अदम हमें उस गाँव–घर की ओर ले जाते हैं, जहाँ की दलित बस्ती पर अभी भी ठाकुरों का राज चलता है। जहाँ का कानून ठाकुरों की रखैल है। जहाँ फूलिया का कुएँ में डूब जाना ही उसकी नियति है। जहाँ मंगल को लंगोटी तक नसीब नहलृ। जहाँ कृष्णा रोटी के लिए जिस्म का सौदा करने को मजबूर है। जहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ सत्यनाशी लोग ही रहते हैं। जो पल–पल यह सोचने को अभिशप्त हैं कि गोया गलती से इस ग्रह पर आ गये हैं :–
धर्म के ठेकेदार बताएँ,
किस ग्रह के अधिवासी हैं हम?19
अदम की शायरी की बड़ी विशेषता यह है कि वे जहाँ एक ओर व्यापक स्तर पर सत्ता के चरि॑ा का उद्घाटन करते हैं, वहलृ दूसरी ओर अपने गाँव के जन–जन की खबर लेते हुए उसके हवाले से हिंदुस्तान की सही तस्वीर बना डालते हैं। कई बार तो उनकी रचनाओं से गुजरते हुए आश्चर्य हो उठता है (जैसा कि कबीर को पढ़ते–सुनते हुए होता है) कि हाथ में कुदाल थामे हुए खेतों में काम करने वाला यह फक्कड़ आदमी देश और दुनिया की जिस स्तर पर समझ रखता है, वह गैर मामूली है। न सिर्फ़ हिन्दुस्तान की गहरी राजनैतिक समझ है अदम को, बल्कि दुनिया के तथाकथित विकसित मुल्कों की भी। और हो भी क्यों न? एक रचनाकार का जन्म कुछ मूल्यों के साथ होता है, उन्हलृ मूल्यों के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए वह सदैव संघर्ष करता है। कई दफा यह संघर्ष आतंरिक होता है (जैसा कि ग़ालिब में) और कई दफा बाह्य (जैसा कि कबीर में)। अदम इसी बाह्य संघर्ष के जुझारू और अक्खड़ योद्धा हैं–
दिल लिए शिशे का देखो संग से टकरा गई,
बर्गे गुल की शक्ल में शमशीर है मेरी ग़ज़ल।20
अदम की शायरी की एक और बड़ी विशेषता यह है कि वे स्ि॑ायों पर बात करते हुए न कबीर के साथ चलते हैं, न ही धूमिल के साथ। उन्हें पूरा स्पेस देते हैं। उनकी जि़न्दगी का सच सीधा–सीधा सामने रखते हैं। ज़रूरत होने पर उसकी पेचीदगी का विश्लेषण भी करते हैं। एक ही शेर में दोतरफा वार करते हैं। यह दिखाते हैं कि सभी चाहे दलित हो, चाहे सवर्ण; उसकी स्थिति कहलृ भी बेहतर नहलृ है–
औरत तुम्हारे पाँव की जूती की तरह है।
जब बोरियत महसूस हो घर से निकाल दो।21
आधुनिक होती दुनिया में ‘स्॑ाी–विमर्श’ के नाम पर जो कुछ भी हो रहा हो, उससे अदम के गाँव की स्ि॑ायाँ अनभिज्ञ हैं। वे आज भी उसी अँधेरे का शिकार हैं, जहाँ राजधानी की चौंधिया देने वाली रौशनी नहलृ पहुँचती। जहाँ आज भी अधिकार को समझने और उसके लिए आवाज़ उठाने वाले अक्षर नहलृ पढ़े जाते। जहाँ आज भी पति होने का मतलब परमेश्वर होना और स्॑ाी होने का मतलब दासी होना ही होता है। लेकिन, अदम इसको बदला हुआ देखना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि इनके श्रम और त्याग के सौंदर्य को समझा जाये। इन्हें रूह के स्तर पर महसूस किया जाये–
कहलृ हो जि़क्र अक़ीदत से सर झुका देना,
बड़ी अजीम ये औरत की ज़ात होती है।22
अदाम ऐसे शायर हैं, जिन्हें यह पता है कि अदब का संबंध जिं़दगी से किस तरह का है? और उसकी तर्जुमानी किस भाँति करनी है? यदि ऐसा करने में शायर असफल हो जाये तो वह तहज़ीब के सीने में नासूर जान पड़ता है–
अदब गर जि़ंदगी के दायरे से दूर होता है
तो वह तहज़ीब के सीने में इक नासूर होता है।23
साहित्य कला है। अत्यंत जिम्मेदार कला। मनुष्य का आतिनिधित्व करती हुई कला। मनुष्य को बिखरने से बचाती हुई और बिखरे हुए का समेटती हुई कला। इसकी जिम्मेदारी अन्य कलाओं से कहलृ अधिक है, मनुष्य को सँवारने में। अदम अदब से यही काम लेना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि समाज का ढाँचा, जो कि बड़ा ही ऊबड़–खाबड़ है वह कुछ समतल हो। वंचितों और ज़रूरतमंदों की नोटिस ली जाये। भूख और रोटी के संघर्ष को खत्म किया जाये। बहसों और वादों का भ्रम खत्म हो। हाँलाकि इस बेहया सियासत में यह सब संभव नहलृ है, तथापि ऐसी कोशिश तो की ही जानी चाहिए–
कभी तकरीर की गमऍ से चूल्हा जल नहलृ सकता
यहाँ वादों के जंगल में सियासत बेहया–सी है।24
जिस तरह दुष्यंत सत्ता के चरि॑ा को समझते थे, उसी तरह अदम भी समझते हैं। दरअसल, ‘सत्ता’ बहुअथऍ शब्द है। यही कारण है कि इसका खेल भी बहुआयामी है। यह खेल उत्कर्ष पर पहुँचे हुए व्यक्ति की शक्ति का खेल है। हमारे मुल्क में यह खेल चंद पूँजीपतियों और सियासी घरानों का खेल है। जहाँ जम्हूरियत के नाम पर एक ही सिक्के का राज सदियों की शक्ल लेने में सफल होता दिखाई पड़ रहा है। अदम कहते हैं–
मुल्क जाए भाड़ में इससे उन्हें मतलब नहलृ,
एक ही ख़्वाहिश है कि कुनबे में मुख़्तारी रहे।25
‘कुनबे में मुख़्तारी’ अब सिर्फ़ राजनीति के स्तर पर ही नहलृ, हर क्षे॑ा में दिखाई पड़ने लगी है। ज्ञान–विज्ञान, सिनेमा–साहित्य सबकुछ इसकी गिरफ़्त में है। नतीजा, एक आम आदमी को अपनी जगह बनाने में सौ मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। पहले तो यह आरोप सिर्फ़ कांग्रेंस पाटऍ पर लगता था, लेकिन अब देश की कोई ऐसी पाटऍ नहलृ; जिसमें कुनबावाद न हो। उत्तर–आदेश और बिहार की राजनैतिक पार्टियाँ भी इसी श्रेणी में आ गईं हैं। जिस जनता को वोट की ताक़त का अहसास कराया जाता है, उसके वोट का आखि़र हश्र क्या होता है? धूमिल और अदम दोनों संसद पर करारी चोट करते हैं। उसकी कार्य आणाली और भाषा दोनों की कड़ी आलोचना करते हैं। सच तो यह है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत में जो कुछ होता है, वह आम आदमी से छिपा नहलृ है। अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेंकी जाती हैं। कुसऍ के लिए जनता को दाँव पर लगा दिया जाता है। रुपये की लालच में विदेशी कंपनियों के हाथों जर–जंगल–ज़मीन का ही नहलृ, आदमी तक का सौदा कर दिया जाता है। मानवाधिकार की दुहाई देकर आम आदमी को उसके ही घर से निकाल कर बेघर कर दिया जाता है। उत्पन्न् विरोध को विकास के नाम पर खारिज़ कर दिया जाता है। यहाँ जो कुछ हो रहा है, वह बाप–दादा की शब्दावली में कहें तो ‘अंग्रेजों के समय में भी नहलृ होता था’ इतना क्रूर न तो डलहौजी था, नहलृ मैकाले की नीति–
जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे,
कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे।26
लेकिन, अदम को पता है कि निष्कर्ष क्या आने वाला है? अदम अधिनायकों के इतिहास से वाकि़फ़ हैं और उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं, जिस दिन पानी सिर के ऊपर से होकर बहने लगेगा। जिस दिन कौम को अपनी ताक़त का अंदाज़ा होगा, उस दिन सियासी खेल के सारे मंज़र बदल जायेंगे–
हैं कहाँ हिटलर हलाकू जार या चंगेज़ खाँ,
मिट गए सब कौम की औक़ात को मत छेडि़ए।27
अदम ‘समय से मुठभेड़’ करते हुए ‘धरती की सतह’ के शायर हैं। इनकी ग़ज़ले जि़ंदगी की तर्जुमानी करती हैं। इन्होंने मुहब्बत को हाशिए पर रखकर रोटी को तवाज़ो’ दी है। मशीनी दौर में मिटते अहसास को महसूस करते हुए अपनी शायरी के मार्फत भूख के शोलों में जलती कौम का इतिहास लिखा है। इन्होंने ठंडे चूल्हे पर पड़ी खाली पतीली के आगे फागुन की नशीली धूप को बेअसर करार दिया है। ग़ज़ल को एशियाई हुस्न की शक्ल दी है, जिसमें उसका यथार्थ पूरी ईमानदारी से दिखाई पड़ता है। ग़ज़ल को गाँव की माटी से जोड़ते हुए उसकी भाषा में नई धार पैदा कर दी है। ऐसे में कहा जा सकता है कि जब तक रोटी, धर्म, जाति, पुरुष, स्॑ाी के मतभेद और विसंगतियाँ रहेंगी तथा सियासी मसले रहेंगे’ अदम की शायरी आतिरोध बनकर गूँजती रहेगी।
दुष्यंत कुमार (साये में धूप) और अदम गोंडवी (समय से मुठभेड़) की ग़ज़लों के माध्यम से जो अध्ययन आस्तुत किया गया, वह हिंदी ग़ज़ल का एक पक्ष आस्तुत करता है, समग्र स्वरूप नहलृ। जटिल होती जिं़दगी के दौर में आतिरोध और पीड़ा के साथ ही ओम और करुणा की भी अभिव्यक्ति खूब हुई है, जिसे कई शायरों की शायरी में अलग–अलग तरह से देखा जा सकता है। हाँ, यह ज़रूर है कि हिंदी ग़ज़ल की लंबी परंपरा में यह बिल्कुल ही अनूठा स्वर होने के साथ ही समय की नब्ज़ टटोलता हुआ स्वर भी है। इस स्वर की अपनी सीमाएं हैं, अंतर्वस्तु एवं अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर। कहीं–कहीं दोनों शायरों की ग़ज़लें ग़ज़ल के काव्यशास्त्रीय ढांचे पर हिचकोले खाती नज़र आती हैं; दोनों शायरों ने बहुत सीमित बांहों में ही ग़ज़लें कही हैं। इसके बावजूद दोनों इस अर्थ में कालजयी हैं कि इन्होंने ग़ज़लों में जो गुफ्तुगू की है, वह माशूका से नहलृ; आवाम से की है। यही वजह है कि आज भी आवाम दोनों से बेइंतिहा मुहब्बत करती है।

संदर्भ सूची
1.कमलेश्वर : हिंदुस्तानी ग़ज़लें, राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली, संस्करण : 2009, पृ0 06
2.राना, मुनव्वर : मोर पाँव, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण : 2010, पृ0 79
3.फ़ाज़ली, निदा : तमाशा मेरे आगे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण : 2009, पृ0 15
4.कालिया, रवीन्द्र (संपादक) : नया ज्ञानोदय (ग़ज़ल महाविशेषांक) जनवरी 2013, पृ0 139
5.कुमार, दुष्यंत : साये में धूप, राधाकृष्ण आकाशन, नई दिल्ली, इक्कीसवाँ संस्करण : 2011, पृ0 39
6.विकीपीडिया- आपातकाल
7.कुमार, दुष्यंत : साये में धूप, राधाकृष्ण आकाशन, नई दिल्ली, इक्कीसवाँ संस्करण : 2011, पृ0 13
8.कमलेश्वर : हिंदुस्तानी ग़ज़लें, राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली, संस्करण : 2009, पृ0 6
9.कुमार, दुष्यंत : साये में धूप, राधाकृष्ण आकाशन, नई दिल्ली, इक्कीसवाँ संस्करण : 2011, पृ0 14
10.वही, पृ0 58
11.वही, पृ0 62
12.वही, पृ0 13
13.सिंह, विजय बहादुर : दुष्यंत कुमार, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, संस्करण : 2014, पृ0 39
14.गोंडवी, अदम : समय से मुठभेड़, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण : 2010, पृ0 16
15.कुमार, दुष्यंत : साये में धूप, राधाकृष्ण आकाशन, नई दिल्ली, इक्कीसवाँ संस्करण : 2011, पृ0 16
16.कृषक, रामकुमार (संपादक) : अलाव, संयुक्तांक : मई–अगस्त 2015, पृ0 138
17.गोंडवी, अदम : समय से मुठभेड़, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण : 2010, पृ0 66
18.वही, पृ0 14
19.वही, पृ0 91
20.वही, पृ0 39
21.वही, पृ0 75
22.वही, पृ0 56
23.वही, पृ0 34
24.वही, पृ0 94
25.वही, पृ0 55
26.वही, पृ0 52
27.वही, पृ0 40
28. वही, पृ0 88
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परिचय – शोध छात्र,
हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी,
मो0 09455107472

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