आलेख : संजीव जैन

पारिवारिक विघटन और हिंदी महिला उपन्यासकार

पितृसत्तात्मक परिवार की जिस संरचना और स्वरूप को हमने अब तक समझा है उसके संदर्भ में महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में पारिवारिक विघटन की स्थितियों और कारणों को समझने और परखने का प्रयास करेगें।
महिला उपन्यासकारों के संदर्भ में जब हम भूमंडलीय प्रवृत्तियों का अध्ययन करते हैं तो सबसे पहले हमारे सामने आती है पारिवारिक विघटन की प्रवृत्ति। पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली जिस सिद्धांत पर कार्य करती है उसमें ‘उपभोग’ उपभोग के लिए होता है आवश्यकताओं के लिए नहीं। उपभोग को उत्पादन से जोड़ दिया गया है। अर्थात अब उत्पादन होता है तब आदमी को उपभोग करना ही होगा। पूँजीवादी प्रणाली आम आदमी को उपभोग करने के लिए मजबूर करती है। सामंतीय व्यवस्था में उत्पादन आदमी की आवश्यकता से पैदा होता है। अब उत्पादन है इसलिए उपभोग है।
इस व्यवस्था ने सामाजिक विकास या परिवर्तन की दिशा में जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया वह यही कि उसने सामंतीय संयुक्त परिवार प्रणाली को समाप्त करा दिया। आधुनिकता का, स्वतंत्रता और समानता का नारा मानवीय स्वतंत्रता के लिए नहीं था, दरअसल उसके पीछे जो मंशा थी वह मनुष्य को उपभोक्ता बनाने की थी। यह मंशा संयुक्त परिवारों के रहते संभव नहीं थी। संयुक्त परिवार पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली की सफलता में सबसे बड़ी बाधा थे। अतः पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था ने स्वतंत्रता के नाम पर संयुक्त परिवार को विघटित कर दिया। व्यक्ति के विकास के लिए एकल परिवार की आवश्यकता का बखान आधुनिकतावाद ने जम कर किया और धीरे-धीरे संयुक्त परिवार टूटने लगे। अब विरले ही कोई संयुक्त परिवार मिलते हैं।
पूँजीवाद के विकास के इस तीसरे चरण में जिसे वृद्धपूँजीवाद कहा जाता है, में एकल परिवार भी सुरक्षित नहीं है। यह पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली के मूल में निहित है, क्योंकि जिस तरह प्रारंभ में संयुक्त परिवार उसके लिए खतरा थे उसी तरह अब नई तकनीक के जमाने में एकल परिवार भी उसके विकास के मार्ग में बाधा दे रहे हैं। अतः एकल परिवार एक छत के नीचे तो मिलेगा, परन्तु उसके अपने अलग-अलग यंत्र होंगे। टी.वी., मोबाईल, वाइक, कार, कमरे, अन्य उपभोग के सामान सब स्वतंत्र होंगे। यह परिवार के अंदर का विघटन है। जो भूमंडलीकरण ने पैदा किया है।
परिवार समाज और व्यक्ति के बीच की इकाई है। यह व्यक्ति को समाज का सदस्य बनाती है और समाज को व्यक्ति नामक इकाई से जोड़ती है। समाज संरचना का अनिवार्य हिस्सा है परिवार। आधुनिकतावाद ने समाज को विघटन के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। समाज अपने परिप्रेक्ष्य से कटता जा रहा है। पूँजीवाद अनिवार्य रूप से व्यक्ति के सामाजिकबोध को विघटित करता है। वह व्यक्ति के अंदर के शैतान को उभारता है और उसे एक अनैतिहासिक व्यक्ति के रूप में स्थापित करता है। ‘‘आधुनिकतावादी साहित्य में परिवेश के साथ मनुष्य का संश्लिष्ट संबंध नष्ट होते दीखता है, इससे व्यक्तित्व का विघटन और बढ़ा। मनुष्य का अपने परिवेश के साथ जो घात-प्रतिघात, संघर्ष और समझौता होता है, उसी से उसके व्यक्तित्व का विकास होता है। परिवेश से इसी संघर्ष से वह सृजनशील होता है।’’१ चूँकि व्यक्ति, परिवार और समाज एक सूत्र में बंधे होते हैं अतः किसी एक का विघटन दूसरे को विघटित कर देता है। ‘‘अब समाज विघटित हो गया है, ध्वस्त हो गया है, उसमें व्यक्ति कैसे जिएगा, व्यक्ति के सामने दो विकल्प हैं, या तो उस भ्रष्ट, ध्वस्त समाज के ही लोगों की तरह वह आचरण करे या वह स्नायुरोगी बनकर जिए।’’२ जब व्यक्ति और समाज आन्तरिक रूप से विघटित हो गया है तो उसके बाह्य रूप परिवार का विघटन कैसे रुक सकता है? परिवार जिन व्यक्तियों के संयुक्तबोध का नाम है वह विघटित बोध में बदल गया है।
आधुनिकता के अन्तिम चरण में यानि की साठ और सत्तर के दशक में भारतीय परिवार और समाज विकास और जड़ता के कई अन्तर्विरोधों से गुजर रहा था। नगरीयबोध ने जिस व्यक्ति को स्वतंत्र किया था उसने उसे अकेला और बेगाना भी बनाया था। इस स्थिति में घर में कैद स्त्री और घर से बाहर काम पर जाती हुई स्त्री दोनों ही सबसे अधिक प्रभावित हुई थी। उसने काम के बोझ और गृहस्थी का भार दोनों को एकसाथ सम्हालने का जो बीड़ा उठाया था, उसने उसे बहुत अकेला कर दिया। वह घर और आफिस के दो पाटों के बीच में पिसने लगी। इस दबाव और घुटन ने उसे परिवार की संरचना के खिलाफ विद्रोह करने पर उतारू कर दिया। इस विद्रोह को हम उपन्यास साहित्य में कई स्तरों पर घटित होते देखते हैं।
उषा प्रियंवदा उन प्रारंभिक उपन्यासकारों में से हैं जिन्होंने साठ के दशक में अपनी लेखनी चलाना प्रारंभ की थी। इस समय के पारिवारिक माहौल में स्त्री कई स्तरों पर अवमानवीय दशाओं को झेलती है। उसका स्वत्व और अहं सब जगह छला जाता है। जो स्त्री इस अवमानवीयता को स्वीकार कर लेती है, वह व्यवस्था द्वारा अपना ली जाती है, या खपा दी जाती है। जो स्त्री इस दशा को अस्वीकार करने का साहस करती है, उन्हें यह व्यवस्था कई तरह से प्रताड़ित करती है और अन्ततः वह व्यक्तित्व के विघटन की दशा तक पहुँच जाती है। उषा जी के उपन्यास हमें स्त्री की विघटित दशा से रूबरू कराते हैं। उनका पहला उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ ‘सुषमा’ की विघटित जिंदगी को प्रत्यक्ष करता है। विश्वविद्यालय का हॉस्टल उसकी कैद बन जाता है। उसका नौकरी करना ही उसके जीवन का अभिशाप बन जाता है। वह कामकाजी स्त्री है, उसकी तनख्वाह से उसका घर चलता है। उसके छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई और विवाह उसके वेतन से ही चलते हैं। इस दशा में उसके माता-पिता ही उसके विवाह के बारे में नहीं सोचते हैं। यह माता-पिता की सोच हमारी परंपरागत परिवार संरचना के कारण है। लड़का कमाने लगे तो उसके विवाह के बारे में सबसे पहले सोचा जाएगा और लड़की कमाने लगे तो उसका विवाह घर की आमदानी बंद होने की संभावना के कारण नहीं किया जायेगा। यह परंपरागत पितृसत्तात्मक संरचना के मूल्यों और उससे उपजी सोच के कारण है। लड़का और लड़की के अधिकार और दायित्व के असमान वितरण के कारण है। विवाह के बाद लड़का और लड़की को अलग-अलग ढांचे में रखे जाने के कारण है। असमानता की विचित्र स्थितियों के कारण सुषमा जैसी हजारो लड़कियाँ अविवाहित रहने के लिए विवश हैं। वे सिर्फ अविवाहित ही नहीं रहतीं उनसे प्रेम करने का अधिकार भी छीन लिया गया है, क्योंकि प्रेम तो विवाह के बाद होता है या जिससे प्रेम हो उससे विवाह करना अनिवार्य होता है। विवाह और प्रेम को परिवार और पितृसत्तात्मक ढांचे में कैद करने के कारण ही सुषमा जैसी कुंवारी लड़कियाँ जीवन के सामान्य अधिकारों से भी वंचित होकर जीवन जीने को विवश हैं।
सुषमा नील से प्रेम करती है, उससे विवाह भी करना चाहती है, पर पारिवारिक दायित्वबोध उसे अपना परिवार बसाने से रोक लेता है। वह इस ढांचे के खिलाफ खड़े होने के बारे में जानती तो है, पर विद्रोह करने का साहस उसमें नहीं था। उसमें नए विकल्प को चुनने का साहस भी नहीं था जिसमें वह प्रेम, विवाह और माता-पिता के परिवार के प्रति दायित्व तीनों को निभाने का साहस करती और नील को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार करती। वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था के ढांचे में इस तरह कैद है कि न तो वह नील जैसे पुरुष को इस व्यवस्था के खिलाफ अपने पक्ष में कर पाती है और न अपने माता-पिता को जो उसकी ही कमाई पर अपने दायित्वों को निभा रहे हैं।
इस सांमतीय पितृसत्तात्मक पारिवारिक ढांचे में स्त्री कितनी बुरी तरह से जकड़ी हुई है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है सुषमा का जीवन।
उषा जी के दूसरे उपन्यास ‘रुकोगी नहीं राधिका’ की ‘राधिका’ भी घर नहीं बसा पाती। इसके मूल में भी हमारा पितृसत्तात्मक पारिवारिक ढांचा ही है। दरअसल वह घर न बसाकर परंपरागत परिवार की अवघारणा को ही विघटित कर देती है। सुषमा और राधिका में अन्तर यह है कि सुषमा व्यवस्था द्वारा विवश है, परिवार न बसाने के लिए लेकिन राधिका ने यह विकल्प स्वयं चुना है। वह पिता, भाई और दोस्तों द्वारा अपने जीवन का निर्णय नहीं करवाती। उसे कैसा जीवन जीना है इसका निर्णय स्वयं उसका है। वह कहती भी है कि अब वह बालिग है अपने बारे में स्वयं निर्णय ले सकती है। वह पुरुषों के साथ और उनके सामने अपने स्वत्व को समाप्त नहीं कर सकती, अपनी पहचान को नहीं खोना चाहती। उसका जीवन उसका अपना है और किसी और का उस पर अधिकार नहीं है। यदि कोई उसे इस रूप में स्वीकार करना चाहे तो सोच सकती है वह भी। पर वह स्वयं को इस्तेमाल नहीं होने देना चाहती। यही उसका स्वत्वबोध है, उसकी अस्मिता की चेतना है।
‘शेष यात्रा’ की ‘अनुका’ का परिवार विघटित होता है। उसका पति उसको छोड़ कर दूसरी औरत के साथ रहने का निर्णय लेता है। अनुका भी जीवन में नया विकल्प चुनती है, वह डॉक्टर बनती है और दूसरा विवाह कर लेती है। इस तरह एक परिवार का विघटन और दूसरे का बनना विदेशों में बहुत सामान्य बात है।
अन्तर्वंशी की ‘वाना’ शिवेश के साथ विवाह करके अमेरिका जाती है। वहाँ की जीवन शैली, महत्वकांक्षा और सुख-सुविधायें उसे शिवेश की कमजोर स्थिति से विमुख कर देती हैं और वह शिवेश को छोड़कर राकेश के साथ जाने का मन बना लेती है। इसी बीच शिवेश ड्रग्स बेचने के अपराध में भागता फिरता है और एक रात जब वह घर वापस आता है और वाना उसे राकेश के साथ जाने के बारे में बताती है तो वह आत्महत्या कर लेता है। इस तरह वाना का परिवार टूट जाता है। इसके साथ ही सरिता की मृत्यु, अंजी के परिवार का विखर जाना इत्यादि पारिवारिक विघटन के संकेत हैं।
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में भी पारिवारिक विघटन की प्रवृत्ति बहुत साफ दिखाई देता है। उनके पहले उपन्यास ‘डार से बिछुड़ी हुई’ की नायिका का परिवार कई बार टूटता है। उसके मामा मामी उसकी हत्या की योजना बनाते हैं, वह भाग कर दीवान जी के यहाँ शरण लेती है, इसके बाद दीवानजी भी मर जाते हैं। इस तरह वह डार से बिछुड़ी हुई शीर्षक को सार्थक करती हुई भटकती रहती है।
‘तिन पहाड़’ में ‘जया’ का परिवार श्रीदा के साथ नहीं बस पाता और वह दूसरे के साथ जीवन जीने का प्रयास करती है। वह आत्महत्या की कोशिश भी करती है। ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ की नायिका ‘रत्ती’ या रतिका जीवन भर अकेले ही रहती है और कई पुरुषों के सम्पर्क में आकर भी वह अकेले ही रहती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने उसे उस अपराध की सजा दी जो उसके ऊपर स्वयं पुरुष ने किया। उसकी मानसिक संरचना और व्यवस्था में स्वयं को अनफिट महसूस करने के ही कारण वह घर परिवार नहीं बसा पाती। ‘दिलो दानिश’ में परिवार का आन्तरिक विघटन है। वकील साहब अपने वैध परिवार के साथ एक रखैल महकबानो को भी रखे हुए हैं और उससे भी उनके दो बच्चे हैं। वे जीवन भर दोनों नावों पर पैर रखकर चलने के कारण आन्तरिक रूप से विघटित जीवन ही जीते हैं। ‘महकबानो’ भी अन्ततः उन्हें छोड़कर दूसरों के साथ रहने लगती है। ‘समय सरगम’ में ‘आरण्या’ का परिवार उसे छोड़ चुका है और ईशान का भी। वे दोनों अकेले हैं और एक आन्तरिक चेतना मे बंध जाते हैं।
मृदुला गर्ग जी का रचना परिवेश और परिप्रेक्ष्य आधुनिकताबोध और नगरीय है। उनके चरित्र आधुनिक जीवन मूल्यों के साथ जीते हैं। अतः उनके उपन्यासों में पारिवारिक विघटन की प्रवृत्ति बहुत सामान्य है। नगरीयकरण ने संयुक्त परिवार की सामंतीय संरचना को विशृंखलित कर दिया और अब वह धीरे-धीरे एकयुगलीय परिवार को भी विघटित कर रहा है। स्त्रियों में अकेले रहने की प्रवृत्ति बड़ रही है और पितृसत्तात्मक संरचना वाले एकयुगलीय परिवार के बरक्स ‘लिव इन रिलेसनशिप’ को बढ़ावा मिल रहा है। स्त्री के जीवन और विचारों में यह जो परिवार का मोह टूटता दिख रहा है, इसकी सतर्क अभिव्यक्ति मृदुला गर्ग के उपन्यासों में देखी जा सकती है। दूसरी ओर परिवार के प्रति उनकी आस्था भी दिखाई देती है। उनके उपन्यास ‘मैं और मैं’, चित्तकेाबरा, अनित्य, मिलजुल मन और वंशज में परिवार नामक संस्था के प्रति आस्था दिखाई देती है, परन्तु कठगुलाब, परिवार नामक संस्था के अस्तित्व की धज्जियाँ विखेर देता है और हर स्तर पर स्त्री अपने लिए नया रास्ता चुनती और उस पर चलती नजर आती है।
‘मैं और मैं’ की ‘माधवी’ अपने परिवार के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है और उसे वह समय भी देती है। परिवार के हिस्से – पति और बच्चों के प्रति वह पूर्णतः समर्पित है। अपने परिवार में खुश भी है और पति की प्रशंसा भी करती है। कौशल उसके परिवार में फांक डालने की बहुत कोशिश करता है, परन्तु माधवी उसके तमाम प्रयासों को असफल करती है और अपने परिवार को बनाए रखती है। माधवी जैसे चरित्र अपनी पहचान भी बनाना चाहते हैं और सुरक्षा छत्र को भी नहीं छोड़ना चाहते हैं। परिवार की धूरी पर वह घूमती रहती है। अपने रचनात्मक व्यक्तित्व को प्रतिष्ठित करने के लिए कौशल से तमाम घृणा करने के बावजूद उसकी ज्यादतियों को सहन करती रहती है। भारतीय समाज के अधूरे आधुनिकताबोध का ही प्रतिफल है माधवी जैसे चरित्र। माधवी की बौद्धिक भूख उसका पति नहीं कौशल ही पूरी कर सकता है अतः वह न तो पूर्णतः कौशल के प्रति समर्पित हो पाती है और न पूर्णतः पति और परिवार के प्रति। वह इस द्वन्द्व में पूरी जिन्दगी पिसती रहती है। ‘‘नहीं नहीं, माधवी के जीवन में शून्य है, बहुत बड़ा शून्य है! बौद्धिक अनुकूलता का अभाव आदमी को बिलकुल अकेला कर देता है। मन की बात मैं बहुत कम किसी से कह पाती हूँ, उसने कहा था। शिष्ट-सभ्य-सर्द व्यवहार, यही हमारा जीवन है, उसने कहा था। वह जानता है, उसकी बौद्धिक आवश्यकताओं और चेतना की मांग को सिर्फ कौशल पूरा कर सकता है।’’३ परिवार के प्रति आस्था का एक संदर्भ और सामने आता है –
‘‘क्रोध कीजिए पर काम भी कीजिए। परिवार बनाया है तो बच्चों के प्रति कर्त्तव्य भी निभाना होगा।’’४ कौशल अपने परिवार के प्रति एकदम क्रूरता प्रदर्शित करता है। वह माधवी के परिवार और बच्चों के प्रति भावनात्मक कमजोरी का फायदा उठाने के लिए कहता है –
‘‘क्यों निभाऊँ? मैंने स्वेच्छा से विवाह नहीं किया, स्वेच्छा से बच्चे पैदा नहीं किए। उनके जन्म के लिए मैं जिम्मेवार नहीं हूँ तो उन्हें मौत से बचाने की जिम्मेदारी मेरी क्यों है? मरने दो सब सालों को!’’
माधवी घबरा गई। ‘‘यह कैसे हो सकता है?’’ उसने कहा।
‘‘बिल्कुल हो सकता है। अभी कौन सी शानदार जिंदगी जी रहे हैं जो मरने से बचाना होगा। मेरा काम बच्चे पालना नहीं, लिखना है। मरने दो मेरे बीबी-बच्चों को। मिलने दो पूरे परिवार को मिट्टी में। मैं लिखूंगा। बस लिखूंगा। आप देखेंगी, मेरे बच्चे की मौत मेरे उपन्यास को और तीखा रंग देगी।’’५ माधवी अपने परिवार को और व्यक्तित्व को विघटित नहीं होने देना चाहती और इसके लिए वह अपने पति से स्वयं को बचाने की अपेक्षा रखती है और मांग भी करती है। ‘‘हूँ। कमजोर हूँ। माधवी ने कहना चाहा मुझे संभाल लो। जाने दो रुपया। सख्ती से उससे कहो मुझसे संपर्क न करे। मुझे इस दलदल से बाहर निकाल लो, राकेश। तुम मेरे पति हो, तुम्हारा कर्त्तव्य है कि मेरी रक्षा करो। माँ को बचाए रखने के लिए यदि मुझे उससे मिलना पड़ा। बात करनी पड़ी तो मेरा व्यक्तित्व टूट जायेगा, हस्ती मिट जायेगी। मौत से भी भयानक है अपने व्यक्तित्व को यूं मिटने देना। ऐसा मत होने दो, राकेश।’’६ मृदुला जी की एक विशेषता यह है कि वे बहुत सफाई से परिवार के विघटन की स्थितियों को मोड़ देती हैं। मैं और मैं की ‘माधवी’ और कौशल के बीच सेक्स संबंध बनने की बहुत गुंजाईश थी और उन्हें इस तरह के संबंधों से परहेज भी नहीं है, फिर भी उनके बीच इस तरह का संबंध नहीं बन पाता और माधवी का परिवार टूटने की स्थितियों का सामना करने से बच जाता है। इस स्थिति से एक कदम आगे बढ़ती हैं वे चित्तकोबरा में।
चित्तकोबरा में वे प्रेम को शरीर और चेतना दोनों स्तरों पर उतारती हैं। मनु दो बच्चों की माँ है। रिचर्ड से बेइन्तहा प्रेम करती है और अपना सब कुछ समर्पित भी कर देती है, परन्तु वह अपने पति से संबंध विच्छेद नहीं करती और चूँकि पति को शरीर की ही माँग होती है अतः वह शरीर बन कर स्वयं को पेश करती है। यहाँ भी परिवार के विघटन की लगभग सभी परिस्थितियाँ विद्यमान थीं, परन्तु उनका परिवार आन्तरिक रूप से विघटित होकर भी बना रहता है। यहाँ मृदुला जी ने परिवार की मूल जड़ विवाह के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। विवाह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की देन है जिसमें स्त्री की मानवीय चेतना कुंठित हो जाती है और उसकी यौनिकता को देह के जड़ भोग तक सीमित कर देती है। यौनिकता चेतना के व्यापक विस्तार को अंजाम नहीं दे पाती। प्रेम यौनिकता के साथ व्यापक मानवीय चेतना को समर्पित हो जाता है। चित्तकोबरा इस मानवीय विस्तार को प्रेम के माध्यम से प्रतिष्ठित करके विवाह और परिवार की वर्तमान संरचना को कठघरे में खडा कर देता है।
वंशज में परिवार टूटता भी है और बना भी रहता है। इसमें टूटने-विखरने के बीच का द्वंद्व है। इसके बाद उनका बिलकुल नया उपन्यास आता है मिलजुल मन। इसमें भी दोनों बहनों का एक ही लड़के से प्रेम होता है और इसको लेकर उनके परिवार टूट सकते थे, परन्तु नहीं टूटते। ‘गुल’ और ‘मोगरा’ अपने परिवारों में खुश हैं। अनित्य के नायक का परिवार भी अन्ततः बना रहता है। वह काजल से प्रेम करता है, परन्तु अपनी बीमार पत्नी को छोड़ता नहीं है।
परिवार के विघटन की स्थितियाँ हमें दो उपन्यासों में देखने को मिलती हैं। ‘उसके हिस्से की धूप’ और ‘कठगुलाब’। उसके हिस्से की धूप की नायिका ‘मनीषा’ पहले जितेन से विवाह करती है और दो साल बाद ही उसकी मुलाकात मधुकर से होती है। वह और मधुकर एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं और मनीषा जितेन से तलाक मांग लेती है। यहाँ पहले ही उपन्यास में लेखिका आधुनिक परिवार को टूटते हुए दिखाती हैं। उनके परिवार के टूटने का कारण जितेन का दृष्टिकोण और रूखा जीवन है। यह जीवन आधुनिकता की देन है। पूँजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य को आत्मपरायेपन से ग्रस्त कर रखा है। बंगलूर जैसे शहर में इस तरह परिवारों का टूटना कोई नई बात नहीं है। मनीषा का मधुकर के प्रति आकर्षण उसके परिवार के टूटने की वजह बनता है। इसके बाद जब जितेन उसे पुनः मिलता है तो वह उसके प्रति आकर्षित होती है और मधुकर से संबंध विच्छेद का भी वही कारण है जो पहले जितेन से विच्छेद का था। इस तरह मनीषा का परिवार दो बार बनता और टूटता है।
कठगुलाब तो जैसे परिवारों के विघटन की महागाथा है। इसमें जितने भी परिवार हैं वे सब के सब अन्ततः विघटित होते हैं। पहला परिवार जो विघटित होता है, वह स्मिता की बहिन नमिता का है। नमिता का पति स्मिता को अपने साथ रखता है और उसकी कीमत भी बसूलता है उसके साथ बलात्कार करके। स्मिता घर छोड़कर अमेरिका चली जाती है। बाद में नमिता के पति को लकवा मार जाता है और वह बिस्तर पकड़ लेता है। यहीं से शुरू होती है उसके परिवार के विघटन की कहानी। नमिता के दो बच्चे हैं – प्रदीप और नीरजा। वह स्वयं अपने पति का बिजनेस संभाल लेती है और उसका एक प्रेमी भी है जो उसके साथ काम करता है उसका बिजनेस संभालता है और नमिता से उसके शारीरिक संबंध भी हैं। प्रदीप और नीरजा की देखभाल और पति की सेवा के लिए नमिता नर्मदा को काम पर रख लेती है। उसके बच्चों में प्रदीप गलत आदतें पाल लेता है और उसे अपने पिता से कोई मतलब नहीं है। पूरे परिवार में बीमार पति से किसी को सहानुभूति नहीं है। नमिता तो लकवाग्रस्त पति को बिलकुल ही उपेक्षित कर देती है। यह पति का लकवा ग्रस्त होना तत्कालीन पूँजीवादी पितृसत्तात्मकता का लकवाग्रस्त होना है। नमिता का उसकी तरफ से उदासीन व्यवहार स्त्री का सदियों से शोषण करने वाले पति नामक पितृसत्ता के प्रतीक से विद्रोह की ओर संकेत करता है और वह इसमें स्मिता के साथ किए गए बलात्कार का बदला भी देखती है। इस तरह उसका पूरा परिवार बिखर जाता है, विघटित हो जाता है।
दूसरा परिवार स्मिता का है। स्मिता अमेरिका में जाकर जिम जारविस से विवाह करती है। वह उसका मनोवैज्ञानिक अध्ययन करते -करते एक पशु की तरह व्यवहार करने लगता है और उसे बेल्ट से मारता है। उसका होने वाला बच्चा मर जाता है और फिर स्मिता उसे छोड़कर भारत आ जाती है। इस तरह स्मिता के परिवार का भी विघटन हो जाता है।
नर्मदा अपनी बहिन के साथ रहती है। उसका जीजा भी उसका शारीरिक, मानसिक शोषण करता है। उसके काम के पैसे स्वयं लेता है और उसे तथा उसके भाई को मारता है। उसके बड़े होने पर उसके साथ ही विवाह करता है। उसका पूरा जीवन जीजा के अमानवीय व्यवहार का शिकार होता है। वह जीजा के यहाँ से भागकर दर्जिन बीबी के साथ काम करती है। नमिता के घर कार्य करती है और एक लड़के के साथ उसके शारीरिक संबंध हो जाते हैं। इस तरह उसका परिवार भी विखर जाता है। उसके परिवार की नींव ही शोषण के आधार पर थी जिसे तो विघटित होना ही था।
तीसरा परिवार है दर्जिन बीबी का। दर्जिन बीबी एक स्वाभिमानी स्त्री है। उसका पति उसे एक जिस्म की तरह उपयोग करता है। उसे सजना संवरना और रात को जिस्म की तरह सोना, स्वीकार नहीं है। वह पति की इस गैर इंसानी मांग को मानने से इंकार कर देती है। वह एक चेतन इकाई की तरह अपनी पहचान के साथ जीना चाहती है। उसका पति बंबई में दूसरी औरत के साथ रहने लगता है। दर्जिन बीबी को इस बात से कोई ऐतराज नहीं है, न तो वह उससे खर्चा मांगती है और न कोई अपेक्षा रखती है। वह अपने बच्चों का पालन अपने सिलाई संेटर के आधार पर करती है। बाद में जब उसके बेटे को उसके पिता के संबंध में पता चलता है तो वह माँ को बुरा – भला कहकर पिता के पास चला जाता है। उसकी बेटी असीमा को अपने बाप और भाई की इस हरकत से पुरुष जाति से नफरत हो जाती है और वह बाप को हरामी नंबर एक और भाई को हरामी नंबर दो इस तरह नंबर दे देती है। इस तरह दर्जिन बीबी का परिवार भी विघटित हो जाता है। असीमा तो परिवार बसाती ही नहीं है। यह परिवार के विघटित होने के आगे की दशा है जो विघटित होते परिवारों के परिणाम स्वरूप हमारे सामने आती है। इसी तरह नमिता की लड़की नीरजा भी विवाह नहीं करती। घर परिवार नहीं बसाती। यद्यपि वह विपिन के साथ बच्चे पैदा करने के लिए तैयार हो जाती है और तमाम लिव इन रिलेसनशिप की तरह विपिन के साथ रहती है, परन्तु उससे विवाह नहीं करती। यह परिवार के विघटन के परिणाम स्वरूप ही होता है।
मारियान इर्विंग के साथ विवाह करती है। उसके उपन्यास लिखने के लिए तमाम अध्ययन करती है। उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है। उसकी बार-बार बदलती थीम के अनुकूल फिर सामग्री जुटाती है। जब उपन्यास छपता है तो उसका नाम भी उस पर नहीं होता और इर्विंग उसे पागल सिद्ध कर देता है। मारियान टूट जाती है और अन्ततः इर्विंग से अलग हो जाती है। उसका परिवार भी विखर जाता है। इस उदाहरण से पश्चिम और पूर्व के बीच फैली पितृसत्ता के एक से व्यवहार को स्पष्ट किया गया है। दुनिया के हर कोने में पितृसत्ता स्त्री को मात्र देह के रूप में उपयोग करती है, उसकी पहचान, अस्मिता को कहीं भी नहीं बनने देना चाहती है। जो स्त्रियाँ अपनी पहचान के प्रति अपने ‘व्यक्तिपन’ के प्रति सचेत हैं उनके परिवार विघटित होते हैं या विघटन के कगार पर हैं।
ममता कालिया ने अपने पहले ही उपन्यास ‘बेघर’ में घर और परिवार की समस्या के विघटन को पुरुष के संदर्भ में देखा और परिवार के लिए परंपरागत मूल्यों की अपेक्षा प्रेम की आवश्यकता को अभिव्यक्त किया। संजीविनी भरुचा के साथ प्रेम में बंधा परमजीत पितृसत्तात्मक यौनशुचिता के मूल्यों के कारण संजीविनी को छोड़ कर रमा के साथ परिवार बसा तो लेता है, परन्तु परिवार का जो सुख और भावनात्मक सुरक्षा मिलनी चाहिए वह नहीं पाता। अन्त में उसे दिल का दौरा पड़ता है और वह अकालमृत्यु का शिकार हो जाता है। इस तरह परिवार का आन्तरिक विघटन दिखाया गया है। उनके आगे के सभी उपन्यासों में परिवारों के इसी आन्तरिक विघटन को प्रस्तुत किया गया है। ‘नरक दर नरक’ की ‘उषा’ और जगन प्रेम विवाह करते हैं, पर जल्द ही उषा घर के परंपरागत स्वरूप और जगन के उसी मर्दीय स्वभाव में आ जाने के कारण घर से भागने की सोचने लगती है। ‘एक पत्नी के नोट्स’ की ‘कविता’ भी प्रेम विवाह करती है, परन्तु संदीप के विकेडपन के कारण, उसके प्रति संदीप की क्रूरता के कारण वह भी घर छोड़कर चली जाती है। इस तरह परिवार के विघटन के संकेत उनके उपन्यासों में जगह जगह मिलते हैं। दौड़ में ‘स्टैला’ और उसके पति के सामने अपना कैरियर अधिक मुख्य है और वे विवाह करके भी अलग-अलग रहते हैं। इस उपन्यास में ममता जी ने पहली बार घर और परिवार नामक संस्था की पूर्णतः विदाई कर दी है। इसमें व्यक्तिपन अधिक मुखर हो उठा है।
भारतीय परिवार स्त्री के जिस अहं के समर्पण पर चलता है, वह दौड़ में अपने स्वत्वबोध के सामने बिखरने लगता है। परिवार की आन्तरिक लय है स्त्री का घर और परिवार के प्रति सम्पूर्ण विसर्जन। आधुनिक स्त्री में यदि व्यक्तिगत चेतना है और वह उसे अपना कॅरियर मानकर चलती है तो परिवार का विघटन तो होना ही है। दौड़ में यह चेतना स्टेला और उसके पति दोनों में है अतः उनके बीच कोई संघर्ष की स्थिति नहीं बनती।
प्रभा खेतान अपनी विचारधारा और स्त्री मुक्ति के संघर्ष को अपने स्त्री चरित्रों में प्रतिष्ठित करती हैं। उनके सामने परिवार नामक संस्था में घुटती-पिसती स्त्री की तस्वीर साफ है और उन्हें इस परिवार नामक संस्था के चलते रहने में कोई दिलचस्पी नहीं है। वे चाहतीं हैं कि या तो इस संस्था का पुनर्सृजन हो या इसका कोई अन्य विकल्प ढूँढा जाये। उनके जीवन और व्यवहार दोनों में यह अवधारणा विकसित होती दिखाई देती है।
अभय कुमार दुबे अपने एक लेख में लिखते हैं – ‘‘परिवार की संस्था में संभावनायें देखने के जरिए प्रभाजी जाने-अनजाने नारीवाद की एक भारतीय किस्म को हाशिए से निकाल कर मुख्य फोकस में ला रहीं थी। हो सकता है कि वे परिवार के नए रूपों की तलाश में हों? हम देख सकते हैं कि किस तरह एक नया परिवार बसाने का प्रयोग उनकी जिंदगी के निजी दायरों को लगातार प्रभावित करता रहा था।’’७ प्रभा जी ने छिन्नमसता में ‘प्रिया’ के द्वारा और ‘पीली आंधी’ में ‘सोमा’ के द्वारा स्त्री को परिवार के नए विकल्प तलाशने और अपनाने के लिए तैयार किया है। प्रिया विवाह और मातृत्व दोनों के मोह को छोड़कर जीवन को नए तरीके से जीती है जिसमें सेक्स की मांग और आपूर्ति की कोई उन्मुक्त आकांक्षा नहीं है। विवाह और मातृत्व दोनों ने ही परिवार नामक संस्था को अतिशय प्रगाढ़ता प्रदान की है। अतः वे दोनों को ही विघटित करती हैं और इससे विघटित होने वाले परिवार को भी चित्रित करती हैं। परिवार पर पितृसत्तात्मक मूल्यों के हावी होने के कारण स्त्री की स्थिति काफी दयनीय होती है। प्रिया का पति नरेन्द्र प्रिया को एक सुन्दर दिखाई देने वाली गुडिया की तरह रखना चाहता है। प्रिया अपनी इस वस्तुकरण की स्थिति से विद्रोह करती है और मातृत्व, घर और परिवार को छोड़कर अपना नया संसार रचती है। सोमा भी अपने परंपरागत परिवार में दमघोटू माहौल को छोड़कर नया परिवार बसाती है।
अभय कुमार दुबे लिखते हैं – ‘‘पितृसत्ता कोई एकांगी शै नहीं है और दूसरी ओर परिवारों के भीतर आधुनिकता के आयामों का तेजी से प्रवेश हो रहा है, बनती हुई स्थितियाँ इशारा कर रही हैं कि जल्दी ही नई स्त्री परंपराजन्य पितृसत्ता से मुखामुखम होते हुए दिखेगी। स्त्री को घर और बाहर के बीच अभी तक बने समीकरण बदलते हुए दिखेंगे और घर के बजाय बाहर से उसका संवाद अधिक होगा।’’८
मन्नू भंडारी के उपन्यास ‘आपका बंटी’ की शकुन का परिवार तो विघटित ही है। इस उपन्यास की संरचना ही पारिवारिक विघटन को लेकर है। पति पत्नी के बीच के तनाव और तलाक के बाद बच्चे की स्थिति का मनोवैज्ञानिक विवेचन है।
मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में पारिवारिक विघटन का मूल कारण सामंतीय मूल्य पद्धति और पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण है। उनके उपन्यासों में पितृसत्तात्मक व्यवस्था अपने आदिम रूप में विद्यमान है। स्त्री के प्रति उसकी विचारधारा मृदुला जी के स्त्री पात्रों के प्रति उसकी विचारधारा से बहुत कुछ अर्थों में भिन्न है। मृदुला जी के स्त्री चरित्र प्रेम भी करते हैं, प्रेमी के साथ रहने का साहस भी रखते हैं। अपने पति से तलाक मांगने का साहस रखते हैं। पति दूसरी स्त्री रखना चाहता है तो उसके आगे रोना गिड़गिड़ाना न करके अपने स्वाभिमान को कायम रखते हैं। पितृसत्ता से वे उतने खौफज़दा नहीं है जितने मैत्रेयी के स्त्री पात्र। इदन्नम की ‘मंदा’ और उसकी माँ ‘प्रेम’ का परिवार टूटकर बिखर जाता है। मंदा अपना परिवार बसाना चाहती है, परन्तु वह नहीं बस पाता। ‘अगनपाखी’ की ‘भुवन’ का परिवार विघटित हो जाता है। उसके पति को उसके जेठ ही मरवा देते हैं। संपत्ति पर एकाधिकार के चक्कर में। वह जिसके साथ घर बसाना चाहती थी, नहीं बसा पाती और अंत में सती स्थल से भाग जाती है। ‘बेतवा बहती रही’ में ‘उवर्शी’ का पहला विवाह पति के मरने से टूट जाता है और उसका भाई उसे उसकी सहेली के पिता बरजोरसिंह के घर बछिया कर देता है अपने स्वार्थ के लिए। इस तरह उर्विशी का परिवार विशृंखलित ही रहता है। ‘अल्मा कबूतरी’ में तो सभी परिवार टूटकर बिखर गए हैं या बिखरने की कगार पर होते हैं। कदमबाई के पति की हत्या करवाकर मंसाराम उसके साथ बलात्कार करता है। उसका परिवार समाप्त हो जाता है। मंसाराम का कदमबाई के प्रति लगाव उसके परिवार को विघटन के कगार पर लाकर खड़ा कर देता है। अल्मा का परिवार तो बच ही नहीं पाता राणा व्यक्तिगत साहस के बावजूद उसे बचा नहीं पाता और अल्मा निरंतर बलात्कार की शिकार होती हुई अंत में श्रीराम शास्त्री की विधवा ही रह जाती है।
‘चाक’ में ‘सारंग’ का परिवार अंदर से बिखर चुका होता है। रंजीत और उसके बीच की दरार बढ़ती जाती है। चाक के अन्य नारी पात्रों में बहुत से परिवार विघटित हो जाते हैं। गुलकंदी, लौंगसिरी बीबी, खेरापतिन इत्यादि स्त्रियाँ विघटित परिवार की ही शिकार हैं। विजन में नेहा तो सहन करती रहती है अपनी पहचान को समाप्त होते देखते रहती है, परन्तु डॉ. ‘आभा द्विवेदी’ अपने पति के विचारों और व्यवहार के कारण उससे तलाक ले लेती है। इस तरह उनका परिवार भी विघटित हो जाता है। ‘झूलानट’ में ‘शीलो’ का कानूनी परिवार तो विघटित है ही, वह तो बालकिशन के साथ जीवन बिताने का साहसी निर्णय करती है, यह अलग बात है, परन्तु उसका स्वयं का परिवार तो बिखर ही जाता है।
नासिरा शर्मा के उपन्यासों में ‘शाल्मली’ की ‘शाल्मली’ का विवाह होता है। विवाह के बाद उसकी नौकरी लग जाती है और वह अपने पति से ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित हो जाती है। उसका वेतन और रुतवा दोनों बढ़ जाते हैं। इस स्थिति को उसका पति सहन नहीं कर पाता और वह अपनी पत्नी से जलने लगता है। स्वयं को शराब और जुए में उलझा देता है। उनके बीच का संबंध धीरे-धीरे समाप्त होता जाता है। वे एक घर में रहकर भी अलग-अलग ही रहते हैं। ‘ठीकरे की मंगनी’ की ‘महरूख’ की मंगनी रफत भाई से हो जाती हैं रफत भाई विदेश पढ़ने जाते हैं और वहाँ शादी कर लेते हैं। इस खबर के बाद महरूख अपने जीवन का रुख बदल लेती है और एक गाँव में जाकर स्कूल में नौकरी करती है। रफत भाई के वापस आने पर वह विवाह से इंकार कर देती है। यह विवाह से इंकार करना पारिवारिक संरचना के कारण ही है। वह अपना परिवार अकेले ही बसाती है। इस तरह आज स्त्रियाँ विवाह न करके अकेले रहने का निर्णय ले रही हैं। यह पारिवारिक विघटन का ही एक रूप है।
‘ठीकरे की मंगनी’ की महरूख के जीवन में परिवार बसने से पहले ही विघटित हो चुका है। उसके संबंध जो ठीकरे की मंगनी के टोटके से बचपन से ही बंध गए थे, वे जब वाकई बंधने का अवसर आया तो समाप्त हो चुके थे। संबंधों में विखराव समय की मांग थी या रफत भाई की आवश्यकता ताकि वह अपने को बढ़ा बना सके, महरूख को सीढ़ी बनाकर वह आसमान की सैर करना चाहता था तो उसने किया। महरूख ने इस विखराव को अपनी ताकत बनाकर एक नए जीवन का चुनाव किया। दिल में कसक तो जिंदगी भर बनी रही, परन्तु वह टूटी नही, विखरी नहीं, स्वयं को जलते तवे पर खड़ा रखकर भी जिंदगी का संतुलन बनाए रखा।
महरूख एक विचारशील लड़की है। वह इंसानी रिश्तों और खून के रिश्तों और सामाजिक रिश्तों के बारे में खुले दिल और दिमाग से सोचती है। उसे यह भी समझ में आता है कि इंसानी रिश्ते अन्य रिश्तों से ज्यादा ताकतवर होते हैं, सफल होते हैं -‘‘‘‘इन्सानी रिश्ते कभी कभी खून के रिश्तों से ज्यादा सुख देते हैं।’’९
‘‘अपनी जिंदगी जीता तो अकेला इंसान है, मगर उसकी जिंदगी में कितने लोग जुड़े होते हैं! कितने रिश्ते बंधते हैं, जो हालात् को बनाते-बिगाड़ते हुए चाहे-अनचाहे उस इन्सान की किस्मत का फैसला भी करते हैं और इन सबसे जुड़े रहने के बावजूद इन्सान को अपनी निजी जिंदगी की सलीब खुद उठानी पड़ती है, अपनी जिन्दगी का जबावदेह होना पड़ता है।’’१० महरूख ने स्वयं को किसी चीज या वस्तु की तरह देखे जाने का तीव्र विरोध किया। जब रफत कहते हैं कि मैं तो सोचता था कि जैसे मैं तुम्हें महकता हुआ छोड़ गया था, वैसा ही लौट कर पाऊँगा। तो महरूख कहती है ‘‘मैं जगह, चीज या मकान नहीं थी, रफत भाई, जो वैसी की वैसी ही रहती। मैं इन्सान थी, कमजोरियों का पुतला। मैंने आपको जिस भरोसे से भेजा था, आप भी वैसे कहाँ रह पाए? कुछ चीजें कितनी बेआवाज टूटती हैं। मैं बेआवाज टूटी थी, किरच-किरच होकर बिखरी थी। बड़ी मुश्किल से अपने को चुना है, समेटा है, जोड़ा है, तब कहीं जीने के काबिल हुई हूँ। मुझसे अब मेरी यह जिन्दगी वापस मत छीनिये।’’११ पुरुष हमेशा ही औरत के विरोध को, उसके पीछे छिपी मानवीय पहचान के दर्द को गुस्से या क्षणिक आवेग का नाम देकर उपेक्षित करता है। महरूख भी यह समझती है, तभी तो वह कहती है ‘‘मेरे जज्बात को सिर्फ गुस्से का नाम देकर इसकी अहमियत कम मत करिए। यह सब कुछ हमारी जिन्दगी की हकीकत है, जिसने हमें तोड़ कर अलग कर दिया है।’’१२ जब रफत भाई कहते हैं कि क्या अब तुम्हारी जिंदगी पर मेरा कोई हक नहीं तो महरूख का जबाव है – ‘‘अब मेरे पास समझ है। मैं अपना बुरा-भला खुद समझ सकती हूँ। ठोस जमीन पर ठोस जिन्दगी चाहती हूँ। मेरी जिन्दगी पर सिर्फ मेरा हक है।’’१३ यह ‘एक ब्रह्म वाक्य’ महरूख ने बोला है कि ‘मेरी जिन्दगी पर सिर्फ और सिर्फ मेरा हक है।’ इस वाक्य के पीछे पूरे स्त्री विमर्श का स्वरूप और सिद्धांत खड़ा है। स्त्री की जिंदगी पर से स्त्री का हक छीनने का ही तो पूरा षड्यंत्र पितृसत्ता ने रचा रखा है। यह बात कह कर महरूख ने स्त्री की आवाज को समाज के सामने पेश किया है।
परिवार का विघटन – शाल्मली के लाख चाहने पर भी उसका विवाह असफल हो गया। परिवार विखर गया और संबंध टूट गये। वे दोनों एक छत के नीचे रहकर भी नदी के दो किनारों की तरह रहते हैं। उनके अन्दर का बारीक सूत्र छिन्न-भिन्न हो चुका है। शाल्मली ने अपने व्यक्तित्व को किसी कीमत पर बचाए रखा और स्वयं को अन्दर से टूटने नहीं दिया। ‘‘उसके शरीर को लकवा मार गया हो। जब संबंधों का उत्साह मरने लगे, तो मन कुछ नहीं करना चाहता।’’१४
नरेश बार-बार उसका अपमान करता है, तिरस्कार करता है, उसके अस्तित्व को चोट पहुँचाता है, उसके बजूद को नकारता है। शाल्मली इस सबको सहन करती है क्यों? एक भारतीय परंपरा के संस्कार ही हैं जो उसे इस बात का अहसास दिलाते हैं कि शायद कभी नरेश उसकी बात को समझेगा, उसे समझने की कोशिश करेगा और यह संबंध शायद चल जाये। पर ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि नरेश न तो समझौता करने का तैयार है न समझने को।
पिता से उसके संबंध बहुत अच्छे हैं, पिता पितृसत्ता के प्रतीक उस रूप में नहीं है जिस रूप में पति है। महिला उपन्यासकारों की विशेषता है कि उनके स्त्री चरित्रों के पिता पितृसत्तात्मक व्यवस्था की उस क्रूर सोच के प्रतीक नहीं होते जैसे कि पति या दूसरे पुरुष होते हैं। छिन्नमस्ता की प्रिया, आवां की नमिता, महरूख इत्यादि।
चित्रा मुद्गल चित्रा जी के तीन उपन्यासों में से दो के स्त्री चरित्रों के परिवार विघटित हैं। ‘एक जमीन अपनी’ और ‘आवां’ दोनों ही उपन्यासों में पारिवारिक विघटन की स्थितियाँ देखने को मिल जाती हैं। ‘एक जमीन अपनी’ की नीता और अंकिता दोनों ही अकेली रहती हैं। अंकिता अपने पति का छोड़ देती है और नीता पत्नी न बनकर भी धोखा ही खाती है। इस तरह दोनों के परिवार नहीं है। आवां की नायिका नमिता, स्मिता और नमिता की सौतेली माँ सबके परिवार विघटित हैं। नीलम्मा, गौतमी और अंजना वासवानी आदि अत्याधुनिक स्त्रियों के परिवार भी विघटित ही है।
इस तरह पारिवारिक विघटन आधुनिक जीवन की विसंगति है या परिणति? इस सवाल का जबाव इस बात में निहित है कि हम व्यवस्था के पक्ष में खड़े हैं, या व्यवस्था के विपक्ष में। पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अनुसार यह परिवार का विघटन है और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विपक्ष के दृष्टिकोण से यह आधुनिक जीवन की परिणति है। आधुनिक सभ्यता ने सामंतीय समाज व्यवस्था के मूल्यों को परिवर्तित करके आधुनिक जीवन मूल्यों को प्रश्रय दिया। आधुनिक जीवन पद्धति ने उत्पादन की जिस प्रणाली को पैदा किया उसमें संयुक्त परिवार की व्यवस्था संभव नहीं थी। इसलिए संयुक्त परिवार विघटित होने लगे। यदि यह पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली समाप्त होने लगेगी तो इसकी जगह जो नई उत्पादन व्यवस्था आयेगी उसके अनुसार नए परिवार पैदा होंगे। यदि यह उत्पादन प्रणाली समाजवादी होगी तो संभवतः पितृसत्तात्मक परिवार पूर्णतः समाप्त हो जायेगें और समानता पर आधारित नए परिवार इसकी जगह लेगें।
हिन्दी महिला उपन्यासकारों ने पितृसत्तात्मक पारिवारिक ढांचे के टूटने के स्वरों को आवाज दी है और उनके टूटने के कारणों को उसकी संरचना में ही निहित बताया है। यह स्त्री का ही धैर्य है कि यह परिवार अब तक बचा हुआ है। अब जब उसकी सहनशीलता की हदें समाप्त होने लगी हैं तो उसके कंधों पर टिका यह पारिवारिक ढांचा विखरने लगा है। क्योंकि पुरुष ने तो हमेशा ही उन स्थितियों को निर्मित किया है जिनसे परिवार कब का टूट चुका होता।
संदर्भ
1. पहल -76, संपादक ज्ञानरंजन, संपादक ज्ञानरंजन, पृ. 191
2. वही, पृ.191, 192
3. मैं और मैं, मृदुला गर्ग, पृ.119
4. वही पृ. 134
5. वही पृ. 135
5. वही पृ. 194
6. हंस, नवम्बर, 2009 पृ. 17
7. हंस, नवम्बर, 2009 पृ. 19
8. ठीकरे की मंगनी, नासिरा शर्मा, पृ. 75
9. वही, पृ. 74
१०. वही, पृ. 117
१२. वही, पृ. 117
१३. वही, पृ. 117-118
१४. शाल्मली, नासिरा शर्मा, पृ. 14

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