आलेख :: संजीव जैन

भूमंडलीकरण: विभिन्न आयाम
– संजीव जैन

भूमंडलीकरण एक महत्वपूर्ण ही नही अत्यंत ताकतवर परिघटना है जिसकी जननी ‘आधुनिकता’ की अवधारणा थी। आधुनिकता की बहुत ही खास प्रवृत्ति थी कि वह सभी सभ्यताओं और संस्कृतियों को समरूपीकरण की ओर ले जाने का प्रयास करती रही है। यूरोपीय पुनर्जागरण से जन्मी आधुनिकता हमेशा से ही सार्वभौमिक संस्कृति और सभ्यता का स्वप्न देखती रही है और यूरोप ने इसे उपनिवेशीकरण के माध्यम से विस्तृत भी किया है। आज भाषा – अंग्रेजी, सभ्यता ब्रिटिश (आधुनिकता के दौर में) अब अमेरिकी, को विश्वभर में मानकीकृत किया गया है और सभी भाषाओं और संस्कृतियों के ऊपर इन्हें थोपने का प्रयास ही भूमंडलीकरण की अवधारणा की जनक रही है। चूँकि अब वह आर्थिक क्षेत्र में अधिक मुखर है अतः उसे विश्वग्राम की अवधारणा से समझा जा रहा है। भूमंडलीकरण की मुख्य विशेषता है ‘समरूपीकरण’ की परियोजना। यह परियोजना आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के साथ-साथ व्यक्ति की चेतना के अत्यंत सूक्ष्म और गहरे स्तर तक परिघटित होने को तैयार है और हो रही है। यह समरूपीकरण वास्तव में होता नहीं है इसे थोपा जाता है कभी राजनैतिक ताकत के बल पर और कभी पूँजी निवेश के लालच और आतंक के बल पर। इसका एक अन्तविर्रोध यह है कि यह एक ऐसा भ्रम है जिसे सर्वव्यापी सत्य की तरह स्वीकार कराया जाता है। आज तक पूरी दुनिया में किसी भी चीज का समरूपीकरण पूर्णतः घटित नहीं हुआ, परन्तु भूमंडलीकरण के प्रवक्ताओं ने अपने सबसे सशक्त हथियार मीडिया के द्वारा यह झूठ इतनी बार और इतने तरीकों से बोला है कि न चाहते और न जानते हुए भी सब यह कहने लगे हैं कि आज दुनिया विश्वग्राम बन गई है। एक उदाहरण के रूप में अंग्रेजी भाषा को ही ले लें जिसे पिछली तीन-चार शताब्दियों से लगातार दुनिया पर थोपा जा रहा है, अर्थात् भाषा के स्तर पर समरूपीकरण के प्रयास किए जा रहे हैं, पर क्या ऐसा संभव हुआ? दुनिया में कितने प्रतिशत
लोगों की मूल भाषा अंग्रेजी बनी या है? और क्या इसे वास्तविक अर्थों में भूमंडलीय भाषा कहा जा सकता है? पूँजी चूँकि अपने उत्पाद मशीनों से एक समरूपीकृत सांचे से उत्पादित करती है अतः वह चाहती है कि उपभोक्ताओं की अभिरूचियाँ समरूपीकृत हों तो उसके उत्पाद अधिक संख्या में बिक सकेंगे। आज का मीडिया विज्ञापन और अन्य तरीकों से यही कार्य करता है, वह दुनिया भर के लोगों की अभिरूचियों को अनुकूलित कर एक से उत्पाद के लिए बाजार तैयार करता है। सच्चे अर्थोें में यहीं भूमंडलीकरण की परिघटना घटित होती हुई दिखाई देती है। इस संदर्भ में भी भूमंडलीकरण का एक अन्तविर्रोध यह सामने आता है, कि वह स्वयं समरूपीकृत नहीं रह पाता है। पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था का स्वरूप ही है कि वह निरन्तर अपने उत्पादन को बदलती रहे और न केवल उत्पादन को बल्कि उत्पादन के तरीकों को भी, साथ ही सामाजिक संबंधों और मूल्यों को भी। इसी और केवल इसी स्थिति में पूँजीवाद अपने को जिंदा रखपाता है। पहले यह प्रक्रिया बहुत धीरे-धीरे घटित होती थी अब कोई एक ‘माडल’ छह माह से अधिक बाजार में नही टिकता। कंपनी स्वयं अपने पुराने मॉडल
को बेकार मानकर नया मॉडल बाजार में उतार देती है। अतः भूमंडलीकरण अपनी मूल विशेषता को स्वयं निरंतर विरूपीकृत करता जाता है, परन्तु वह यह चाहता है कि उपभोक्ता की अभिरूचि समरूपीकृत बनी रहे ताकि उसके उत्पाद बिकते रहे हैं।
भूमंडलीकरण का अर्थ एक ऐसी सभ्यतामूलक एकता पैदा करना है जो पश्चिमी प्रतिमानों पर आधारित हैं। पूँजी प्रवाह का अर्थ है कि पश्चिम विशेषकर अमेरिका की पूँजी का प्रवाह दूसरी और तीसरी दुनिया की ओर होना। यह प्रवाह उल्टा कभी नहीं होगा। न इसके बारे में कभी सोचा गया होगा कि आधा भारत अंग्रेजी सीखे तो आधा अमेरिका या ब्रिटेन हिन्दी या तमिल या मराठी सीखेगा। या कि कपड़े हम आपके अनुसार पहनेंगे तो भोजन आप हमारी तरह करेंगे? या पूँजी आप भेजेंगे तो उसी अनुपात में हम मजदूर आपके यहाँ भेजेगें?
मजदूर जाते तो हैं मगर आई. आई. एम. या आई. आई टी. से निकले हुए। या आपके यहाँ बर्गर, पिज्जा, सेल फोन, पेस्ट, क्रीम पावडर हमारे यहाँ आयेगा तो भारत से मटके, कुल्लड, रोटी बनाने के कइले और तवा, चंदेरी की साड़ी, भुसावल के केले, आगरे के पेठा और जूते आपके यहाँ जायेंगे? नब्बे के दशक को वित्तीय पूँजी के भूमंडलीकरण के लिए जाना जाता है। भारत में 24 जुलाई, 1991 के बजट से भारत का भूमंडलीकरण की ओर पहला कदम था। इस बजट के बाद भारत ने उदारीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ की और लाइसेंस राज की समाप्ति की घोषणा। इससे भारत विश्वभर की कंपनियों और अमेरिकी पूँजी के लिए खुल गया। भूमंडलीकरण की दिशा में यह पहला कदम था। भूमंडलीकरण से जो मूलभूत परिवर्तन हुए उनमें प्रमुख हैं – गाँव के स्थान पर अब अर्थ और सत्ता के केन्द्र शहर हो गए और व्यक्ति के स्थान पर उपभोक्ता का निर्माण होने लगा। नारी को जिंस में बदला जाने लगा।
जो, जिंस और उपभोक्ता बनने लायक नहीं है उनके अस्तित्व को ही परिदृश्य से हटा दिया गया। इस तरह भूमंडलीकरण कुछ मुट्ठीभर लोगों का विश्वग्राम बन गया और उस पर तुर्रा यह कि सारी दुनिया विश्वग्राम के तले आ गई है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि भूमंडलीकरण सिर्फ कुछ लोगों के लिए बेतहाशा समृद्धि का पैगाम लेकर आया, लेकिन उनकी यह समृद्धि बहुसंख्यक लोगों की गरीबी, बेकारी, भुखमरी, आत्म हत्या और हत्या बलात्कार, शोषण और अनेक तरह की विषमता का अर्थशास्त्र बन कर आया। हासिये पर और उसके आसपास रहने वाले लोगों का अस्तित्व ही खतरे में डाल दिया गया। पहले वे अपनी रोजी रोटी कैसे भी कमा लेते थे, अब विकास के नाम पर और आभिजात्य संस्कृति के मूल्यों के कारण उन्हें
उनके रोजगार के स्थानों, सड़कों और झुग्गी झोपडियों से बेदखल किया जा रहा है। दिल्ली में मेट्रों के निर्माण में कितनी बस्तियों को उजाड़ा गया और उन्हें उनके रोजगार के स्थलों से इतनी दूर जगह दी गई कि वहाँ तक आने में ही उनकी सारी शक्ति और पैसा चुक जाता है। रिंग रोड पर सामान्य रिक्शा चलाने के अनुमति नहीं है। फुटपाथ पर खोमचा लगाने की अनुमति नहीं है। तो कहाँ जायें ये लोग? अन्ततः इनमें से कुछ लोग विवशता और भुखमरी के कारण अपराध और देहिक शोषण के रोजगार में लग जाते हैं। इसके साथ यह भी एक सवाल है कि क्या कभी विकास के नाम पर किसी मल्टी प्लेक्स को हटाया गया, किसी बड़े उद्योग पति की फैक्ट्री को हटाया गया? क्या किसी पूँजीपति या उद्योग पति, नेता या कोई पॉश कॉलोनी इस विकास के रास्ते में आई जिसे हटाया गया हो और शहर से इतनी दूर जगह दी गई हो कि वहाँ बाजार ही उपलब्ध नहीं हो? नहीं। तथाकथित अमेरिकी मानकों के विकास के रास्ते में हमेशा ही मध्यवर्ग, निम्नमध्यवर्ग और अत्यंत गरीब वर्ग ही क्यों आता है? इसलिए कि उसकी आवश्यकता किसी को नहीं है। न राष्ट्र को, न भूमंडलीकरण को। उसका होना न होना कोई मायने नहीं रखता क्योंकि वह न तो अच्छा उपभोक्ता बन सकता है और कुशल मजदूर जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादन में सहयोग दे सके। राष्ट्रीय सरकारों को कंपनियों के घाटे की चिन्ता तुरंत होने लगती है और पेट्रोल के दाम बड़ा दिए जाते हैं या कंपनियों को बांड जारी कर दिए जाते हैं, या सबस्डी दे दी जाती है। मगर आम आदमी की रोजी रोटी छिन जाने के बारे में कभी सरकार को चिन्ता नहीं होती? किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं इसके बारे में सोचने की आवश्यकता और समय दोनों नहीं है। अभी हाल में एयरलाईंस कंपनियों को होने वाले घाटे से बचाने के लिए उनर्के इंधन को सस्ता कर दिया गया मगर अन्तरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम आधे से कम हो जाने पा भी आम आदमी के हित में पेट्रोल के दाम कम नहीं किए गए क्योंकि अभी उनका घाटा पूरा नहीं हुआ है। दोनों ही स्थितियों में सरकार को कंपनियों की चिन्ता है कम करने और न करने में। इस परिदृश्य से आम आदमी गायब है। आम आदमी की याद तब आयेगी जब चुनाव सर पर आयेंगे और वोट की आवश्यकता नेताओं को होगी। तब भी यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि वह आम आदमी के हित में लिया गया निर्णय होगा। इस तरह भूमंडलीकरण सिर्फ विषमता का अर्थशास्त्र बन कर रह गया है। भूमंडलीय दैत्य आर्थिक मुखौटा पहनकर सारी दुनिया को आतंकित कर रहा है, परन्तु इसका सर्वाधिक खतरनाक चेहरा है मानवीय चेतना को विज्ञापन और कामनाओं के सौंदर्यमूलक मायावी संसार में भटकाना। अभी इस बात का मूल्यांकन होना शेष है कि जिस तरह आधुनिकता ने मानवीय चेतना को औद्योगिक पूँजीवाद के लिए अनुकूलित किया था उसी तरह भूमंडलीकरण ने मानवीय चेतना को वृद्ध पूँजीवाद के लिए कितना और किस तरह अनुकूलित किया है और भविष्य में कितना करेगा। मानवीय चेतना को अनुकूलित करने के लिए अब इसके पास बहुत बड़ा माध्यम जनसंचार के साधनों के रूप में है। यह वे साधन हैं जो बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबको अपनी गिरफ्त में ले लिया है। वयस्क तो पूरी तरह इससे अभीभूत है। उसके लिए तो वही दुनिया जीवन है जो मीडिया परोस रहा है। मोबाईल, इंटरनेट, मल्टीप्लेक्स, मंहगी गाडियाँ, बर्गर, पिज्जा, ब्रांडेड टी शर्ट और जीन्स, गोरे होने की क्रीम, शेम्पू, हेयर स्टाइल, कोल्ड ड्रिंक्स इत्यादि के अलावा भी कोई जिन्दगी होती है आज के शहरी युवा वर्ग के लिए यह सोचने की फुर्सत कहाँ है। कान से मोबाईल चिपका रहता है हाथ लेपटॉप के की बोर्ड पर चलते रहते हैं और ‘दिमाग’ बेचारे की क्या क्या औकात जो इन सबके अलावा कुछ सोच सके। यही तो है भूमंडलीय दैत्य का जादू है जो सर चढ़कर बोल रहा है। लेकिन जब पूँजीवाद अपने पतन के दौर में होता है और कंपनियों से लोगों को निकाला जाता है तो उनके ऊपर फैला चकाचौंध का आसमान यर्थाथ के धुँए में रूँधा हुआ दिखाई देता है और पैरों के नीचे की जमीन तो होती ही नहीं है जो खिसक सके। इस दैत्याकार भूमंडलीकरण की खासियत यह है कि इसने हर चीज को ‘पण्य’ बना दिया है और हर चीज से पैसा कमाना सीख लिया है। अब उत्पादन के रूप में वस्तु ही नहीं होती, बल्कि हमारी आपकी बात-चीत भी एक जिन्स बन गई है और उससे भी खरबों डालर का मुनाफाया कमाया जा रहा है। साहित्य, शिक्षा, कला, संस्कृति आदि वे सारे क्षेत्र जो पहले मानवीय संवेदना, अनुभूति, और विचार से संबद्ध थे और इनका प्रसार मानवीय चेतना को सवंर्द्धित करने के उद्देश्य किया जाता था। इनसे अर्थ की प्राप्ति होती थी, परन्तु ये पण्य वस्तु नहीं थीं। अब चेतना के इस सर्वग्रासी समय में ये सब ‘पण्य’ बन कर रह गईं हैं और इसीलिए आम आदमी से दूर – बहुत दूर चली गईं है। यही एक कारण है कि अब मानवीय चेतना संवेदना रहित क्रूर होती जा रही है। चेतना को चैतन्य बनाये रखने के जो साधन थे वे आभिजात्यीय विलास और ड्राइंग रूम की वस्तु मात्र बनकर रह गईं हैं।
भूमंडलीयकरण एक अलग किस्म के व्यक्ति का निर्माण कर रहा है। यह व्यक्ति नागरिक किसी भी राष्ट्र का हो सकता है, परन्तु उपभोक्ता सिर्फ अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का होता है। यह ऐसा व्यक्ति होता है जो अपनी जड़ों से पूरी तरह कटा हुआ होता है और इसके ऊपर कोई छत्र-छाया नहीं होती। नागरिकों के प्रति राष्ट्र के कुछ दायित्व होते हैं और राष्ट्र के प्रति नागरिकों के कुछ कर्तव्य होते हैं। इसके परिणाम स्वरूप राष्ट्र अपने नागरिकों को सुरक्षा देते हैं, परन्तु उपभोक्ता के प्रति बहुराष्ट्रीय निगमों के कोई दायित्व नहीं होते।
वर्तमान की मंदी से तो यह भी स्पष्ट हो गया है कि इन महाकाय निगमों ने तो अपने कर्मचारियों के प्रति भी कोई दायित्व महसूस नहीं किया। उनके मुनाफे में कमी हुई तो सबसे पहले अपने ही कर्मचारियों की छंटनी की जाती है बिना किसी दायित्वपूर्ण प्रतिदाय के। उनके लिए आप पैसा कमाने वाली मशीन थे, रेस में घोड़ा जीतना बंद कर दे तो उसे घास नहीं गोली खिलाई जाती है। यही स्थिति इन निगमों की होती अपने कर्मचारियों के प्रति। तो अब ‘उपभोक्ता’ नामक प्राणी की पहचान क्या है और उसका उस समय क्या होगा जब उसकी जेब खाली होगी? इसका कोई अता – पता नहीं है बर्गर, पिज्जा, ब्रांडेड टी शर्ट और जीन्स, गोरे होने की क्रीम, शेम्पू, हेयर स्टाइल, कोल्ड ड्रिंक्स इत्यादि के अलावा भी कोई जिन्दगी होती है आज के शहरी युवा वर्ग के लिए यह सोचने की फुर्सत कहाँ है। कान से मोबाईल चिपका रहता है हाथ लेपटॉप के की बोर्ड पर चलते रहते हैं और ‘दिमाग’ बेचारे की क्या क्या औकात जो इन सबके अलावा कुछ सोच सके। यही तो है भूमंडलीय दैत्य का जादू है जो सर चढ़कर बोल रहा है। लेकिन जब पूँजीवाद अपने पतन के दौर में होता है और कंपनियों से लोगों को निकाला जाता है तो उनके ऊपर फैला चकाचौंध का आसमान यर्थाथ के धुँए में रूँधा हुआ दिखाई देता है और पैरों के नीचे की जमीन तो होती ही नहीं है जो खिसक सके।
इस दैत्याकार भूमंडलीकरण की खासियत यह है कि इसने हर चीज को ‘पण्य’ बना दिया है और हर चीज से पैसा कमाना सीख लिया है। अब उत्पादन के रूप में वस्तु ही नहीं होती, बल्कि हमारी आपकी बात-चीत भी एक जिन्स बन गई है और उससे भी खरबों डालर का मुनाफाया कमाया जा रहा है। साहित्य, शिक्षा, कला, संस्कृति आदि वे सारे क्षेत्र जो पहले मानवीय संवेदना, अनुभूति, और विचार से संबद्ध थे और इनका प्रसार मानवीय चेतना को सवंर्द्धित करने के उद्देश्य किया जाता था। इनसे अर्थ की प्राप्ति होती थी, परन्तु ये पण्य वस्तु नहीं थीं। अब चेतना के इस सर्वग्रासी समय में ये सब ‘पण्य’ बन कर रह गईं हैं और इसीलिए आम आदमी से दूर – बहुत दूर चली गईं है। यही एक कारण है कि अब मानवीय चेतना संवेदना रहित क्रूर होती जा रही है। चेतना को चैतन्य बनाये रखने के जो साधन थे वे आभिजात्यीय विलास और ड्राइंग रूम की वस्तु मात्र बनकर रह गईं हैं। भूमंडलीयकरण एक अलग किस्म के व्यक्ति का निर्माण कर रहा है। यह व्यक्ति नागरिक किसी भी राष्ट्र का हो सकता है, परन्तु उपभोक्ता सिर्फ अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का होता है। यह ऐसा व्यक्ति होता है जो अपनी जड़ों से पूरी तरह कटा हुआ होता है और इसके ऊपर कोई छत्र-छाया नहीं होती। नागरिकों के प्रति राष्ट्र के कुछ दायित्व होते हैं और राष्ट्र के प्रति नागरिकों के कुछ कर्तव्य होते हैं। इसके परिणाम स्वरूप राष्ट्र अपने नागरिकों को सुरक्षा देते हैं, परन्तु उपभोक्ता के प्रति बहुराष्ट्रीय निगमों के कोई दायित्व नहीं होते। वर्तमान की मंदी से तो यह भी स्पष्ट हो गया है कि इन महाकाय निगमों ने तो अपने कर्मचारियों के प्रति भी कोई दायित्व महसूस नहीं किया। उनके मुनाफे में कमी हुई तो सबसे पहले अपने ही कर्मचारियों की छंटनी की जाती है बिना किसी दायित्वपूर्ण प्रतिदाय के। उनके लिए आप पैसा कमाने वाली मशीन थे, रेस में घोड़ा जीतना बंद कर दे तो उसे घास नहीं गोली खिलाई जाती है। यही स्थिति इन निगमों की होती अपने कर्मचारियों के प्रति। तो अब ‘उपभोक्ता’ नामक प्राणी की पहचान क्या है और उसका उस समय क्या होगा जब उसकी जेब खाली होगी? आधुनिक युग में पूँजी सिर्फ विनिमय का माध्यम नहीं होती, वह नियंत्रणकारी शक्ति के रूप में स्वयं को विकसित करती है। यह नियंत्रण उत्पादन और उत्पादन के साधनों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक संबंधों, राजनीतिक और आर्थिक नीतियों, सांस्कृतिक रूपों, मानवीय चेतना औश्र ज्ञान विज्ञान के सभी क्षेत्रों तक पहुँच जाता है। पूँजी की यह नियंत्रणकारी भूमिका वृद्ध पूँजीवाद के युग में और अधिक बढ़ जाती है। भूमंडलीकरण के इस दौर में पूँजी नियंत्रण के नए-नए तरीके खोज लेती है। जैसे वर्तमान में विश्वबैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्वव्यापार संगठन पहले दूसरी और तीसरी दुनिया के देशों में आर्थिक संकट पैदा करने के लिए स्थितियाँ पैदा करते हैं फिर उन्हें ‘ऋण लेने के लिए मजबूर करते हैं और अपनी नियंत्रणकारी नीतियों को उन देशों पर लाद देते हैं। इसके साथ ही मीडिया आम आदमी की चेतना को नियंत्रित करने का सबसे सशक्त माध्यम है। राष्ट्रीय चेतना और मानवीय चेतना को नियंत्रित करके ही पूँजी अकूत मुनाफा कमाने का दुष्चक्र निरन्तर रखती है।

 

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