एक मिशन के आधार स्तंभ स्वामी सत्यानंद सरस्वती : कुमार कृष्णन

एक मिशन के आधार स्तंभ  स्वामी सत्यानंद सरस्वती

– कुमार कृष्णन

स्वामी शिवानंद ने कहा था कि—’ प्राय: सभी महान उपलव्ध्यिों के सुंदर और आकर्षक पक्ष ही हमें दिखाई देते हैं। भव्यता हमें प्रभावित और विस्मृत कर देती है। इस चमक—दमक के बीच हम उन परिश्रमी,आत्मनिग्रही सेवकों को भूल जाते हैं,जिसकी सहायता से मिशन तैयार होता है। वास्तव में सारा श्रेय और यश तो उन्ही को जाता है।’ स्वामी सत्यांनद के संदर्भ यह बात काफी सटीक है। स्वामी सत्यानंद सरस्वती देश के ऐसे संत हुए जिन्होंने न सिर्फ योग को पूरी दुनिया में फैलाया बल्कि सामाजिक चिंतन के जरिए विकास के मॉडल को पेश किया। स्वामी सत्यानन्द जी के जीवन प्रवाह में भी हम पाते है कि पढ़- लिख कर भरे- पूरे परिवार से आने वाला एक 20 वर्षीय युवक आध्यात्म की राह पर चल पड़ता है। वे गुरू सेवा में लीन होने के बाद नचिकेता वैराग्य प्राप्त कर 12 वर्षों बाद एक परिव्राजक के रूप में देश दुनिया में योग के प्रसार में लग जाते हैं। दुनिया के कई देशों में लाखों लोग भारत भूमि के प्राचीन  योग विद्या से परिचित होते है जिसका परिणाम है कि आज संयुक्त राष्ट्र ने योग को आधिकारिक मान्यता दी है। पुनः 1988 में मुंगेर त्यागने के बाद रिखियापीठ में आकार 1991 से रिखिया के स्थानीय लोगों के शैक्षिक – सामाजिक -आर्थिक उत्थान के काम का बीड़ा उठाते हैः एक ऐसी आर्थिक -सामाजिक व्यवस्था जो धारित विकास  के मूल्यों का मॉडल विश्व के समक्ष प्रस्तुत करता हो। आत्मिक विकास के साथ -साथ आर्थिक स्बाबलंबन के उनके प्रयास को वैश्विक अर्थव्यवस्था और ग्लोबल विलेज के परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता है।स्वामी सत्यानंद का योग जहां व्यक्तित्व के शोधन— शुद्धिकरण—परिस्कार,उन्नयन—उत्थान विकास तथा ईश्वरीकरण की दिशा निश्चित करता है, वहीं उनका दर्शन सामाजिक— आर्थिक परिवर्तन के सिद्धांत का प्रतिपादन एवं क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त करता है।उनका वेदांत शास्त्रीय अथवा किताबी नहीं बिल्कुल व्यवहारिक, प्रयोगात्मक,उपयोगी और मानवतावादी है।

उत्तराखंड के अल्मोड़ा में 25 दिसम्बर 1923 को जन्मे स्वामी सत्यानंद सरस्वती इस शताव्दी के महानतम संतों  में हैं, जिन्होंने समाज के हर क्षेत्र में योग को समाविष्ट कर, सभी वर्गों, राष्ट्रों और धर्मों के लोगों का आध्यात्मिक उत्थान सुनिश्चित कर दिया।  योग का तात्पर्य होता है जोड़ना। और परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने योग का संसार में जिस वैज्ञानिक रूप में पुनर्जीवन किया उस योग ने पूरी दुनिया को एक सूत्र में जोड़ कर रखा है। आज पूरब से लेकर पश्चिम तक जिस योगलहर में योगस्नान कर रहा है उसके मूल में स्वामी सत्यानंद सरस्वती का कर्म और उनके गुरू स्वामी शिवानंद सरस्वती का वह आदेश है जो उन्होंने सत्यानंद को दिया था।

जन्म से ही उनमें अभूतपूर्व आध्यात्मिक प्रतिभा परिलक्षित हुई। युवावस्था आते-आते उनकी आघ्यात्मिक आकांक्षा अत्यंत तीव्र हो गयी, और सन् 1943 में गुरू की तलाश में अपना घर-परिवार त्याग दिया। इसकी खोज ऋषिकेष में जाकर समाप्त हुई, जहां उन्होंने महान संत स्वामी शिवानंद को गुरू के रूप में वरण किया। उनके गुरू स्वामी शिवानंद सरस्वती ने 1956 में उनसे कहा कि ‘सत्यानंद जाओ और दुनिया को योग सिखाओ।’’ स्वामी सत्यानंद गुरू आश्रम त्यागकर परमहंस परिव्राजक सन्यासी हो गये। गुरू के आदेशानुसार उनके जीवन का एक ही लक्ष्य था- योगविद्या का प्रचार-प्रसार, द्वारे-द्वारे तीरे-तीरे। गुरू के इस आदेश के बाद वेदान्त का एक विद्यार्थी दुनिया को आसन-प्राणायाम सिखाने निकल पड़ता है। जब वे आश्रम से निकले तो उनके तन के वस्त्र के अलावा उनके पास कुछ नहीं था।

दरअसल में इस शताब्दी में योग की कहानी 1940 के दशक से आरंभ होती है। उस समय तक लोग योग से अनजान थे। योग का अस्तित्व तो था त्यागियों वैरागियों और साधु सन्यासियों के लिए 1943 में स्वामी शिवानंद सरस्वती ने ऋषिकेश में शिवानंद आश्रम की स्थापना की। उन्होंने दिव्य जीवन का ज्ञान और अनुभव प्रदान करने के लिए दो विधियों का उपयोग किया योग और वेदांत। स्वामी शिवानंद के साथ वे निरंतर रहे।

उनके मुताबिक परिव्राजक जीवन की दो धाराएं होती है- एक साधना का पुष्टिकरण और दूसरा ज्ञान का विवरण। ये कार्य अकेले ही करने पड़ते हैं। इस दौरान उन्होंने पूरे भारत की यात्रा के साथ—साथ पाकिस्तान, अफगानिस्तान,वर्मा,बाग्लादेश, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों की भी यात्रा की। परिव्राजक के रूप में बिहार यात्रा के क्रम में छपरा के बाद मुंगेर 1956 में पहली बार मुंगेर आए। पहले वे लाल दरवाजा में रूकते थे। अब राय बहादुर केदारनाथ गोयनका के आनंद भवन में रहते थे। यहाँ की प्राकृतिक छटा उन्हें आकर्षित करती थी। यहां उन्होंने चातुर्मास भी व्यतीत किया। जब वे यहां रहते तो कर्णचौड़ा अवश्य जाते। कभी ध्यान करते तो कभी सो जाते। यहां उन्हें विशेष अनुभूति होती थी। यहीं उन्हें दिव्य दृष्टि से यह पता चला कि यह स्थान योग का अधिष्ठान बनेगा और योग विश्व की भावी संस्कृति बनेगी। आनंद भवन में रहकर उन्होंने सिद्ध भजन पुस्तिका तैयार की। 1961 में अंतर्राष्ट्रीय योग मित्र मंडल की स्थापना की तब तक योग निंद्रा और प्राणायाम विज्ञान, पुस्तक प्रकाशित हो चुकी थी। ‘लेशन आन योग’ का अनुवाद योग साधना भाग-एक, दो आ चुके थे।

1962 में इंटरनेशनल योग फलोशिप का रजिस्ट्रेशन हुआ। साथ ही पुस्तकें सत्यानंद पब्लिकेशन सोसायटी नंदग्राम से प्रकाशित हुई। सत्यम स्पीक्स, वर्डस ऑफ सत्यम, प्रैक्टिस ऑफ त्राटक, योग चूड़ामणि उपनिषद, योगाशक्ति स्पीक्स, स्पेट्स टू योगा, योगा इनिसिएशन पेपर्स, पवनमुक्त आसन (अंग्रेजी)में, अमरसंगीत, सूर्य नमस्कार, योगासन मुद्रावंध प्रमुख है। जगह-जगह शिविर लगाते कार्य योजना को अंजाम देना शुरू किया। 1963 से अंग्रेजी में योगा और योगविद्या निकालना आरंभ किया। 16 जुलाई 1963 को स्वामी शिवानंद ने महासमाधि ली। गुरूदेव का आदेश था कि परिव्राजक जीवन समाप्त हो चुका है और योग को जन-जीवन में वितरित करना है।

परिव्राजक जीवन की समाप्ति के बाद वसंत पंचमी के दिन 19 जनवरी 1964 को बिहार योग विद्यालय की स्थापना की।वे आरंभ से इस बात के लिए प्रयत्नशील रहे कि  योग विद्या के विज्ञान और जीवनशैली के रूप में किस प्रकार विकसित ​की जाय। वे सिर्फ एक योग शिक्षक नहीं ​बल्कि अनेक आंदोलनों के प्रवर्तक थे। योग की प्रकाशन क्षमता के प्रतीक के रूप में स्वामी शिवानंद की अखंड ज्योति प्रज्जवलित की। साथ ही सत्यानंद योग रिसर्च लाइब्रेरी भी शुरू किया गया। यह तय किया गया कि मुंगेर आश्रम में तीन वर्ष रहकर 15-15 दिनों सत्रों में योग कथाएं लेंगे तथा सत्संग करेंगे। इस कार्यक्रम के तहत सुबह आसन-प्राणायाम, फिर दलिया का मीठा पेय, उपनिषद गीता पाठ, 10 बजे भोजन, एक बजे से लिखित जप, नाद योग, योग निंद्रा, कर्मयोग, भोजन, भजन, कीर्तन सत्संग, प्रवचन, आठ बजे विश्राम, चैथे दिन शंख प्रक्षालन, तेरहवें दिन मौनव्रत, चौदहवें दिन नियमित कार्यक्रम, दो बजे से रामायण पाठ, आरती, प्रसाद, भोजन और पंद्रहवें दिन विदाई कार्यक्रम होते थे। इस तरह से लोगों की संख्या बढ़ने लगी।

1964 में मुंगेर प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग सम्मेलन हुए, जिसका उद्घाटन बिहार के तात्कालीन राज्यपाल अनंत शयनम् आयंगर ने किया। इसके उपरांत डेनमार्क,फ्रांस, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के योग शिक्षकों को प्रशिक्षित किया। प्रशिक्षण के उपरांत इनलोगों ने अपने— अपने देशों में प्रथम विद्यालय और योग केन्द्रों की स्थापना की। इसके परिणामस्वरूप सत्तर के दशक में योग का कार्य पूरी दुनिया में फैलने लगा। इसी प्रकार 1966 में दूसरा और उसके बाद तीसरा योग सम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हुआ। बिहार योग विद्यालय, मुंगेर की गुरू परंपरा आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित श्रृंगेरी मठ से सम्बद्ध है। 1967 में रायगढ़ में योग विद्यालय की स्थापना की। इसी वर्ष मुंगेर में नौ माह का योग प्रशिक्षण सत्र हुआ। इसकी यह खासियत थी कि इस अवधि में बाहर की दुनिया से सम्पर्क नहीं रहेगा। आज भी यहां के लोगों का बाहरी परिवेश से कोई ताल्लुक नहीं होता है। गोंदिया में चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय योग सम्मेलन में शिक्षा के क्षेत्र में योग के समावेश पर गहन चर्चा हुई। बाद में आश्रम बनाकर समर्पित किया गया।

26 अप्रैल 1968 को योग के प्रचार के लिए स्वामी जी ने विदेश प्रस्थान किया तथा क्वालालामपुर, हांगकांग, सिडनी (आस्ट्रेलिया), टोकियो, होनेलूलू, सेन फ्रांसिस्को, लॉस एंजिल्स, शिकागो, टोरंटो, नार्वे, फिनलैण्ड, हॉलैण्ड, बुसेल्स, एम्सटरडम, ओसलो, कोपेन-हेगेन, हमवर्ग, एम्टगर्ट, फ्रैंकफर्ट, वॉसेलन, जिनेवा, जूरिक, पेग, वियाना का भ्रमण कर योग का शंख बजाया। सिडनी, पेरिस में अंतर्राष्ट्रीय योग सम्मेलन हुए। स्वामी सत्यानंद सरस्वती दुनिया में कहीं भी गये हों लेकिन मुंगेर के कर्णचौड़ा को वे भूल नहीं सके। अंग्रेजों के जमाने में मीर कासिम ने इस पर अधिकार जमाया, भवन उसने बनवाया। बाद में इस स्थान को अंग्रेजों ने विजय नगर के राजा के हाथों बेच दिया। उस राजा से मुर्शिदाबाद के राजा अन्नदा राय ने खरीद लिया उनके पुत्र यहां रहते थे। संगीत गोष्ठी होती थी। जमींदारी उन्मूलन के बाद राजा आशुतोष राय व उनके पुत्र कमला रंजन राय मुर्शिदाबाद में रहने लगे। लोगों ने सुझाव दिया कि इस स्थान को योग का स्थान बनाए। 1978 में कमला रंजन सरकार से उन्होंने यह स्थान प्राप्त कर लिया। प्रॉपर्टी टैक्स ज्यादा होने के कारण सरकार का अधिकार था वह इसे बेचकर टैक्स वसूलना चाहती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सहयोग से यह स्थान प्राप्त हो गया। इसके बाद जनवरी 1979 में कर्णचौरा में पदार्पण हुआ। स्वामी जी ने कहा यहां से राजा कर्ण सोना बांटते थे, मैं योग बांटूगां। इस तरह कर्णचौरा का पुनर्जन्म गंगादर्शन के रूप में हुआ। अगले बीस सालों तक सत्यानंद ने तूफान की भांति पूरी दुनिया में योग को लोगों के बीच पहुंचाया। इसी दौर में उन्होंने दुनिया के 48 देशों की सघन यात्राएं कीं। अमरीका के बाहर यूरोप, आष्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, ग्रीस, कुवैत, ईरान, ईराक से लेकर नैरोबी और घाना जैसे देशों में योग की आधारशिला रखी. फ्रांस, इंटली, जर्मनी और आष्ट्रेलिया में तो सत्यानंद योग के पर्याय ही हो गये।

19 जनवरी 1983 में बसंत पंचमी के दिन उन्होंने बिहार योग विद्यालय की अध्यक्षता स्वामी निरंजनानंद सरस्वती को सौंपी थी। बिना भेदभाव के साधना की सम्पूर्ण पद्धतियां सिखलाना, वैज्ञानिक आधार पर जीवन में इसकी उपादेयता सिद्ध करना, लोगों को शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य लाभ और आध्यात्मिक उन्नति बिहार योग विद्यालय व अंतर्राष्ट्रीय योग मित्र मंडल का लक्ष्य है। उनके योग आंदोलन का ही नतीजा है कि योग का प्रवेश भारतीय समाज के अनेक क्षेत्रों और वर्गों सेना, रेलवे,पुलिस, जेल और महाउद्योगों में हो चुका था और वह विकास के एक स्तर तक पहुंच चुका था।  जिस दिन से स्वामी निरंजनानंद ने गुरू पद तथा संस्थागत दायित्वों को संभाला, उन्होंने अपने गुरू स्वामी सत्यानंद के आदेश को पूरा करने के लिये वैसी ही दृढ़ संकल्प शक्ति का परिचय दिया। स्वामी निरंजननंद ने प्रेरक मार्ग दर्शन से आश्रम, मिशन और योग आंदोलन को एक सुदृढ़ स्वरूप प्रदान कर उनका एक नवीन यौगिक एवं आध्यात्मिक युग में पदार्पण कराया।

उनका पूरा दर्शन गांधीवाद से प्रभावित है। वे कहते हैं कि स्वच्छता का संस्कार सावरमती आश्रम से पड़ा है। तीन माह सावरमती आश्रम में रहे। गांधी जी अपना शौचालय खुद साफ करते थे, अपना कमरा खुद साफ करते थे, अपने चरखे पर कपड़ा खुद बुनते थे। वे रंगे कपड़े तो नहीं पहनते थे मगर पक्के सन्यासी थे। उनका रहन— सहन मेहनत सोचने का तरीका, उनकी निर्भिकता सब लक्ष्ण सन्यासियों जैसे थे। गांधी के आश्रम का सफाई का संस्कार अपने आश्रम बिहार योग विद्यालय में डाला। वे कहते हैं कि सन्यासियों को अपना काम खुद करना चाहिए।

गांधी के विकास के मॉडल के केन्द्र में गांव थे। स्वामी सत्यानंद जी भी कहते रहे हैं कि भारत में गरीबी मूलत: गांवों में है। शहरों में जो गरीबी है, वह मूलत: गांवों से खिसकी हैं। अपने कई व्याख्यानों में उन्होंने कहा कि—’ समाज की बुनियाद गरीब आदमी है और समाज का गुम्बद अमीर आदमी। लोग गुम्बद को देखते हैं, बुनियाद को नहीं।सेवा, प्रेम और दान को व्यवहारिक रूप प्रदान करने के लिए देवघर के रिखिया में रिखियापीठ की स्थापना की।संभवत: इसी नजरिये से यहां इस पीठ स्थापना की गयी।इस वंचित क्षेत्र में उन्होंने शिक्षा पर जोर दिया। कहते हैं जब एक बच्ची पास के गांव से आयी और कहा अंग्रेजी सीखना चाहती हैं। स्वामी सत्संगी को उन्होंने कहा—’यह तुम्हारा राजमार्ग है। उस एक लड़की से आरंभ किया गया अभियान आज पूरे क्षेत्र में हैं। वे व्यक्ति को दान पर निर्भर बनाने की अपेक्षा आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। इसी बुनियाद पर पूरे क्षेत्र में काम किया गया जिसका साकारात्मक परिणाम आज दीखता है। रिखिया के 80 पंचायतों में सेवा, प्रेम और दान के प्रसाद से वहां के जीवन में बदलाव आया है। 5 दिसम्बर 2009 को​ शिष्यों की उपस्थिति​ में महासमाधि में लीन हो गए। भले ही वे आज नहीं हैं लेकिन उनके योग आंदोलन का ही नतीजा है योग वैश्विक धरातल पर छाया हुआ है।

 

 

 

 

संपर्क: कुमार कृष्णन, स्वतंत्र पत्रकार
दशभूजी स्थान रोड, मोगलबाजार, मुंगेर, बिहार
मोबाइल नं:— 09304706646

Related posts

Leave a Comment