कवि स्वप्निल श्रीवास्तव से युवा कवि राजीव कुमार झा की बातचीत

कवि स्वप्निल श्रीवास्तव से युवा कवि राजीव कुमार झा की बातचीत

  • राजीव –आप लम्बे समय से लेखन कर रहे हैं । आपने कविता लेखन कब शुरू किया था और साहित्यिक पत्र – पत्रिकाओं में प्रतिष्टित कवि के रूप में कब स्थापित हुये थे। उस समय आपकी पीढ़ी में और कौन से लोग कवितायें लिख रहे थे ।

….. कविता का रोग तो बचपन से लगा था । बचपन में मां के साथ तुकबंदी करता रहता । कविता साथ रह गयी और मां असमय हमें छोड़ कर चली गयी । यह मेरे और कविता के लिये बड़ा आघात था । गम्भीर रूप से 75 के बाद लिखना शुरू हुआ । आप जानते है कि 75 के बाद का समय राजनीतिक रूप से बदलाव  का समय था । आपातकाल और सत्ता परिवर्तन की घटना हम लोगो के सामने थी । राजीव जी प्रतिष्ठित मेरे लिये एक भ्रामक शब्द है । हां अस्सी के बाद मैं कवि पाठक समाज में लोग मुझे जानने लग गये थे । उस समय राजेश जोशी और उदयप्रकाश नवोदित कवि थे । नागार्जुन , त्रिलोचन और शमशेर को नये सिरे से रेखांकित किया जा रहा था । थोड़ा उसके पहले आलोकध्न्वा , वीरेन डंगवाल , मंगलेश डबराल और ज्ञानेंद्रपति जिसे सक्रिय कवि थे । इनकी भाषा सहज थी और सम्प्रेषण का कोई संकट नही था ।

2….आप मूलत: कवि हैं आपने साहित्य के अन्य विधाओं में कितना लेखन किया है ।

…… राजीव जी , मेरी मुख्य विधा कविता है लेकिन मुझे लगता है  कि जीवन के बहुत से अनुभव कविताओं में व्यक्त नही किये जा सकते , इसलिये मैंने उसके लिये कहा.नी और संस्मरण विधा का चुनाव किया । एक पवित्र नगर की दास्तान , स्तूप और महावत – दो कहा,नी संग्रह तथा जैसा मैंने जीवन देखा – संस्मरण की किताब प्रकाशित हो चुकी है । इसके अलावा यदा – कदा पसंद की किताबों की समीक्षा भी ।

 

3… कविता कैसी कला विधा है ? इसकी विलक्षणता पर प्रकाश डालिये ।

मेरे ख्याल से कला विधा में कविता श्रेष्ठ विधा है , वह सीधे हमारे मन को छूती है । आदमी ने जब बोलना सीखा होगा तो उसका पहला वाक्य कविता जैसा हुआ होगा । कविता में एक लय और ध्वनि है । जब आदमी दुख में होता है तो कहा.नी नही पढ़ता , गीत या कविता गाता है । जीवन और अनुभव की सघना कविता में व्यक्त होती है  ।

4… हिंदी  कविता की महान परम्परा अपनी उर्जस्विता के स्वरों को किन श्रोतो से ग्रहण करती है । आज के हिंदी कविता के लेखन में हुये बदलाव पर रोशनी डाले ।

….. कविता अपने समय की गतिविधियो और सामाजिक परिवर्तनो से अपनी उर्जा ग्रहण करती है । इसलिये ही तो साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है । कविता अपने समय के सवालों से टकराती है । हिंदी कविता निराला , नागार्जुन , मुक्तिबोध , रघुवीर सहाय , केदारनाथ सिंह से होते हुये इस मुकाम तक पहुंची है । उसने एक लम्बी यात्रा तय की है । सामाजिक और आर्थिक परिस्थियो के बीच कविता की निर्मिति हुई है } हिंदी कविता समय और अनुभव के साथ निरंतर बदल रही है । हमारे समय का यथार्थ बहुत जटिल है , इसलिये कविता के सामने कठिन चुनौतियां हैं ।

कविता के सामने कम अवरोध नही रहे है लेकिन उसका प्रवाह रूका नही है । यही कविता की शक्ति है।

5……अपने  बचपन , घरपरिवार और साहित्य के प्रति कायम होनेवाले रूझानों के बारे में बतायें ।

… राजीव जी , मेरा जीवन भले ही खुशहाल न रहा हो लेकिन मेरा बचपन बहुत सम्र्द्ध था । जंगल , नदी , बाग बगीचों और परिंदों के बीच मेरा बचपन बीता है । मैंने मजदूरों और किसानों से गीत और कहावते सुनी हैं । नाट्य मंडलिया देखने दूर दूर तक गया हूं । लोकजीवन के अनेक उत्सवों में शामिल हुआ हूं और यही मेरी असली पूंजी है । परिवार में साहित्य की कोई परम्परा नही थी । पिता बहुत पढ़ाकू थे , उनके हाथ में कोई न कोई किताब रहती थी । दूसरी तरफ मां की सम्वेदना  थी । इन्ही के बीच मेरे कवि क निर्माण हुआ ।

6…. वर्तमान हिंदी कविता लेखन की विशिष्टता को आप किस तरह रेखांकित करना चाहते हैं ।

…. 21वी शताब्दी में बहुत सी चींजों में बदलाव हुआ है । हमारी जीवन शैली बदली है । इसके साथ यथार्थ के रंग भी बदले है । जाहिर है कि हमारी कलाओं पर उसका असर पड़ा है । अब सोशल मीडिया जैसे माध्यम सामने है , कम्यूटर और नेट का आभासी संसार है । इसे युवा पीढ़ी अपने अपने ढ़ग से व्यक्त कर रही है । इसके बावजूद सम्वादहीनता बढ़ी है । यह हमारे समय का नया संकट है । लेखक बहुत जल्दी सर्वाधिक हासिल करना चाहता है । सम्मानों और पुरस्कारों का व्यामोह अलग है , इसलिये रचनाशीलता क्षीण हुई है । लेकिन इस बीच महत्वपूर्ण लिखा जा रहा है । नये लोगो के अनुभव उनकी रचनाओं में दर्ज हो रहे हैं । हिंदी कविता में नये शब्द और नवीन तथ्य आ रहे हैं । हमारी युवा पीढ़ी सजग है ।

7..आपके प्रिय रचनाकार कौन हैं ? आपकी काव्यचेतना पर किसका प्रभाव है ,किन लोगो की अनुगूज व्याप्त रही है ।

.. राजीव जी , अपने प्रिय कवियों में मै निराला , नागार्जुन ,त्रिलोचन , कुमार विकल और केदारनाथ सिंह का नाम शामिल करना चाहता हूं । ये हमारी कविता की पाठशाला थे । उनसे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और मैंने अपने ढ़ंग से लिखने की कोशिश की । मैं कितना सफल या असफल हुआ हूं , यह हमारे पाठक ही बता सकते हैं । मेरा आलोचको पर कोई भरोसा नही है । आज की आलोचना संदेह से परे नही रह गयी है । मैं यह मानता हूं कि भले ही हम श्रेष्ट न लिख सके लेकिन हम अपने लेखन की अलग पहचान तो बना सकते हैं । ऐसा करने की मैंने विनम्र कोशिश जरूर की है ।

8.. तार सप्तक के प्रकाशन के बाद अपनी रचनात्मकता में हिंदी कविता जिस जीवन चेतना को लेकर आगे बढ़ी थी , आज उसका अवसान हो चुका है । आलोचना में विचारशून्यता व्याप्त हो चुकी है । इस कथन पर आपकी सहमति है या असहमति ?

… इसमें कोई संदेह नही है कि तारसप्तक की हिंदी कविता में बड़ी भूमिका रही है । सप्तक से मुक्तिबोध , रघुवीर सहाय , सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ,कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह जैसे कवियों का उदभव हुआ है । आगे चल कर उन्होने हिंदी कविता को समृद्ध किया है लेकिन मैं इस बात से सहमत नही हूं कि इसके बाद जीवन चेतना का अवसान हो गया है । आठवे दशक से हिंदी कविता के रंग रूप में चमकदार परिवर्तन हुये है । अज्ञेय के प्रभा मंडल के सामने उनकी पीढ़ी के अन्य कवि निष्प्रभ थे । अस्सी के बाद उनका प्रकटीकरण हुआ है । इन कवियों में आप नागार्जुन , त्रिलोचन , शमशेर आदि कवियों के नाम ले सकते हैं । इसी दौर में उदयप्रकाश , राजेश जोशी जैसे कवियों का उदय हुआ है । थोड़ा इससे पहले आप मंगलेश डबराल ,  आलोकधंवा . ज्ञानेंद्रपति ,वीरेन डंगवाल का नाम ले सकते हैं । लीलाधर जगूड़ी तो पहले से मौजूद थे । हमे इन सबसे ऊपर धूमिल को नही भूलना चाहिये , जिन्होने कविता के शास्त्र को बदल दिया था । हां आलोचना के बारे में आपकी शिकायत जायज है । हिंदी आलोचको में आप नंदकिशोर नवल और परमानंद श्रीवास्तव का नाम जरूर ले सकते हैं जिन्होने समकालीन कविता पर महत्वपूर्ण काम किया है । आज आलोचना की जगह शून्य व्याप्त है । इस सदी के लगभग दो दशक बीत चुके है लेकिन इस दौर की कविता पर सम्यक विचार नही किया गया हैं ।

9 …. आप प्रगतिशील परम्परा के उल्लेखनीय कवि है । आपकी पीढ़ी की कविता में क्या देन रही हैं ।

… हमारी पीढ़ी ने कविता को सहज बनाया है । उसे शब्दजाल और अतिक्रांतिकारिता से मुक्त कराया है । इस दौर की कविता में नये कथ्य और रूप आये हैं । शिल्प में परिवर्तन हुये है । भाषा में भी बदलाव हुये है । कविता की रूढि टूटी है । जिस बात को घुमा फिरा कर कहने की परम्परा रही है , उसका विघटन हुआ है । वह सहज लोगो को सम्प्रेषित होती है । इसके कम अपवाद नही है लेकिन पाठक अच्छी कविता का चुनाव कर सकता है । मैं यह बात एक कवि के रूप में नही , कविता के पाठक की हैसियत से कह रहा हूं । भले ही मैं बुरा कवि हूं लेकिन कविताओं का गुणी पाठक भी हूं ।

10 .. हिंदी में अज्ञेय ,मुक्तिबोध , नागार्जुन ,इनकी काव्य परम्परा का पतन होता क्यों दिखाई दे रहा है ?

… अब कोई कवि इन कवियों जैसा जीवन नही जीना चाहता । लेखन सुविधाभोगी कर्म नही है , उसके लिये यंत्रणा से गुजरना चाहता है । ये कवि पूर्णकालिक कवि थे , लिखने के लिये खतरे उठाते थे । आप अज्ञेय के जीवन को देखिये , वह पहले सेना में थे । उसके बाद खुद को साहित्य में समर्पित कर दिया । उन्होने विविध जीवन जिया । तार सप्तक का प्रकाशन किया । प्रतीक नाम की ऐतिहासिक पत्रिका निकाली । हिंदी की प्राय; सभी विधाओं में लेखन किया । नागार्जुन से सहित्य के लिये घर – परिवार छोड़ दिया । वे यायावरी करते रहे , दुर्गम यात्रायें की , तभी इस तरह की कविता सम्भव हुई । उन्होने निरंतर सत्ता का विरोध किया और उसके खामियाजें भुगते । एक बार उनके बड़े बेटे शोभाकांत जी से मैंने कहा था कि आपको गर्व होना चाहिये कि आप नागार्जुन जैसे बड़े कवि के बेटे हैं तो उन्होने कहा कि इसके लिये मेरे परिवार ने बड़ी कीमत चुकायी हैं । मुक्तिबोध का जीवन हमारे सामने है । वे आजीवन कविता के लिये संघर्ष करते रहे । अपने विचार के लिये उन्होने कोई समझौता नही किया । उनके जीवन – काल में उनकी कोई किताब नही प्रकाशित हुई । आज वे शीर्ष कवि है । राजीव जी आज कविता के लिये कोई कीमत नही चुकाना चाहता । बस महान होने की लालसा सब में है । साहित्य शार्ट्कट का रास्ता नही है , एक आग का दरिया और डूब के जाना होता है ।

11..हिंदी में हर तरह का साहित्यिक लेखन हो रहा है , पत्र – पत्रिकायें तादाद में निकल रही हैं । इसके बावजूद यह कहा जा रहा है कि अब समाज में साहित्य का दायरा सिमटता जा रहा है।

…. जब पाठक ही नही होगे तो किताबें और पत्रिकाओं को कौन पढ़ेगा । 50 करोड़ से ज्यादा हिंदी भाषी इस दुनिया में हैं लेकिन कविता संकलन या अन्य विधाओ की 300 से लेकर 500 प्रतियां छपती है । जो लेखक या कवि कोर्स में है , भले ही उनकी प्रतियां ज्यादा प्रकाशित की जाती हो । हिंदी के पाठक कहां से आयेगे , यह हमारे सामने के सवाल है । इस देश में सैकड़ों विश्वविद्यालय और हजारों कालेज है , वहां हिंदी विभाग भी है , वहां शिक्षक भी है । अगर वे अपने दायित्व का निर्वाह करे तो यह स्थिति बदल सकती है लेकिन आप इस संस्थाओं का हाल तो जानते होगे । एक बार राजेंद्र यादव ने इन्हे हिंदी का कब्रिस्तान तक कह दिया था । हिंदी के नाम पर देश में सैकड़ों संस्थायें है , जिसमें अपढ़ लोग बैठे हुये है और मलाई काट रहे हैं । लोग हिंदी के जिस डाल पर बैठे हुये हैं और उसे काट रहे तो हिंदी को गिरने से कौन बचा सकता है । इसी देश मे बंगाल . केरल जैसे प्रांत है – जहां के समाज में साहित्य की जगह है । मेरे लेखक मित्र अशोक अग्रवाल ने अपने संस्मरण में मिजो लेखक जेम्स डेकुमा का उल्लेख किया है । जेम्स ने उन्हे बताया कि उनके पास एक प्रेस है जिसमें वे अपनी किताबें छापते और बेचते है । उन्होने बताया कि आईजोल जैसे छोटे शहर में उनके किताब की पांच हजार प्रतियां बिक जाती है , जबकि मणीपुरी भाषा बोलनेवालों की संख्या मुश्किल से 20 – 25 लाख से ज्यादा नही होगी । जब हिंदी का नाम आता है तो कई तरह का रोना आता हैं ।

12 .. दलित लेखन और स्त्री – लेखन आंदोलन के बारे में क्या कहना चाहेगे ।

… मुझे लगता है कि दोनो विमर्श अंतरविरोध के शिकार है । दलित लेखक आत्ममुग्ध है , उनके बारे में कुछ कहिये तो हमलावर हो जाते है । वे सवर्ण व्यवस्था का विरोध करेगे और उसका फायदा भी उठायेगे । अच्छे ओहदे पर बैठे हुये अपनी गर्वीली गरीबी का बखान भी करेगे , जबकि दुख पर किसी वर्ग – विशेष का क्षेत्र नही है । आप राजनीति में ही देखे , कांसीराम ने दलितों के भीतर जो चेतना जगाई थी , मायावती ने उसका राजनीतिक लाभ लिया । उनका जीवन और रहन – सहन क्या किसी सवर्ण नेता से कम दिव्य है । यही हाल स्त्री विमर्श का है । उसे किस तरह देह विमर्श में बदल दिया गया है , इससे हम परिचित है । इस तथाकथित आंदोलन में शहरी स्त्रियों और लेखिकाओं की साझेदारी है । इसमें छोटे शहरों और कस्बों की स्त्रियों को शामिल नही किया गया है ।टी .वी मीडिया बड़े शान से इनकी बाइट चलाता है और हम समझे लेते हैं कि क्रांति हो गयी है । यह असली से ज्यादा नकली क्रांतिकारी हैं , उन्हे पहचाना मुश्किल है ।

और अंत में एक छोटी सी कविता ।

सुगना होते तो / जंगल की तरफ उड़ जाते / मछली होते तो / नदी – नदी होकर पहुंचते / समुन्दर / हवा होते तो बांस के जंगलों में / बांसुरी की तरह बजते / साधु ! हम मनुष्य हैं / हमें अपने दुख – सुख के साथ / इसी दुनिया में रहना है

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स्वप्निल श्रीवास्तव चर्चित कवि हैं. भारतभूषण अग्रवाल, फिराक सम्मान और केदार सम्मान के साथ रूस का अंतरराष्ट्रीय पुश्किन सम्मान मिल चुका है. राजीव कुमार झा ने इनसे साक्षात्कार लिया है.

 

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