ग़ज़ल की मुख़्तसर तारीख़ और हिंदी- उर्दू ग़ज़लों का इरतक़ाई (विकसित) पहलू 2020 तक
– अफरोज़ आलम
उर्दू अदब के शोहरा आफ़ाक़ नक्क़ाद ( World fame critic) कलीमुद्दीन अहमद कलीम (पटना) की शख़्सियत उस वक्त मुतनाज़ा (controversial ) हो गई जब सन् 1940 में उनकी किताब “उर्दू शायरी पर एक नज़र ” शा’ए हुई। जिसमें उन्होंने लिखा था कि ग़ज़ल नीम वहशी  सिन्फ़ ए सुख़न (Half Madness  Style of poetry ) है । जवाबी कार्यवाही में प्रोफ़ेसर रशीद अहमद सिद्दीक़ी (अलीगढ़) ने अपनी किताब जदीद ग़ज़ल (1955) में लिखा कि” ग़ज़ल  उर्दू शायरी की आबरू है”।कई तन्क़ीद निगारों (आलोचकों) के सख़्त हमले और आशीक़ान-ए- शेर ओ अदब के दिफ़ाआ (Defence) की बदौलत ग़ज़ल  की मक़बूलियत  में रोज़ ब रोज़  इज़ाफ़ा  हुआ। आगे चलकर इस मज़मून में हम 21वीं सदी में ग़ज़ल में इरतक़ाई (Development) पहलू पर तफ़सील से गुफ्तगू करेंगे ।
लफ़्ज़  ग़ज़ल का अरबी मतलब “महबूब से गुफ्तगू के हैं “।तारीख़ के रू (Angel) से  लफ़्ज़ ग़ज़ल, ग़ज़ाल से  बना है  जिसके मानी ऊर्दू में ‘हिरन’  के हैं । दरअसल सहराई इलाक़े  (मरूस्थल) में पलने वाला यह हलाल जानवर हिरन अपनी ख़ूबसूरती के सबब निहायत महबूब (बहुत प्यारा) होता है ।सहरा में आज़ाद फिरने वाला  ये जानवर घरेलू भी होता है। हिरन  को फ़ारसी में ‘आहू ‘ कहते हैं। जबकि अरबी में ‘महा’ भी कहते हैं ।अहले अदब  के नज़दीक ख़ूबसूरती  के लिहाज़ से हिरन  की आंखों को जानवरों में सबसे ख़ूबसूरत तस्लीम किया गया है।
अरब में तौहीदी ( एकेश्वरवाद) मज़ाहिब  के इरतक़ा (विकास) के बाद जब पर्दे का चलन आम हुआ तो औरत की आंखों के अलावा कोई और। हिस्सा  ग़ैर मर्द के सामने नज़र नहीं आता था ।मेरा ख़्याल है कि इसलिए दोशीज़ा (कुंवारी लड़की) की तशबीह (उपमा) हिरन  से देने का रिवाज़ बन गया होगा और  दो मिसरों  में पूरे मज़मून  (आलेख) को भरने वाले ख़ूबसूरत तरीन (अतिसुंदर) सिन्फ़ ए सुख़न (Style of poetry)  को ग़ज़ल का नाम दिया  होगा। शोअरा ( Poets ) ने अपनी शायरी में भी आंखों का ख़ूब-ख़ूब इस्तेमाल किया ।
इस्तआतारा और तशबियाह ( Symbol & Shades) भी बनाया।  आइए पहले आँखो के हवाले से अशआर का लुत्फ लेते हैं। फिर  गुफ्तगु को आगे बढ़ाएंगे ।
शेर है-
तेरे जमाल की तस्वीर खींच दूँ  लेकिन
ज़बां में आंख नहीं, आंख में ज़बान नहीं
(जिगर मुरादाबादी )
जवाँ मासूम आंखों ने दिए थे
वो धोखे आज तक मैं खा रहा हूँ
(फिराक गोरखपुरी)
लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा  है मुझसे
तेरी आंखों ने तो कुछ और कहा है  मुझसे
(जाँनिसार अख़्तर )
आंख जो उठाए तो मुहब्बत का गुमां हो
नज़रों को झुकाए तो शिकायत सी लगे है
(जाँनिसार अख़्तर )
खुदा बचाए तेरी मस्त- मस्त आंखों से
फरिश्ता हो तो बहक जाए आदमी क्या है
(ख़ुमार बाराबंकवी)
कभी-कभी छलक पडती हैं यूं ही आंखें
उदास होने का कोई सबब नहीं होता
(डॉ0 बशीर बद्र)
बहुत दिनों से तुम्हे देखा नहीं है
ये आँखों के लिए अच्छा नहीं है
(मुनव्वर राणा)
अश्क ए ग़म से ,मैं तहारत कर रहा हूं ऐ खुदा
उम्र भर आंखों का मेरी ये  वज़ू बाक़ी रहे
(डॉक्टर कलीम क़ैसर)
हम दिल को क्या नाशाद करें क्या वक्त अपना बर्बाद करें बेवजह तुम्हें क्या याद करें आंखों को ख़ून  रूलाएं क्या
(डॉक्टर कलीम क़ैसर)
मेरी आंखों में डालकर आंखें
उसने रख ली संभाल कर आँखें
(बाक़ी अहमदपूरी )
सूखी हुई शाखें  कभी शादाब ना देखीं
आंखों से कहो ऐसा कोई ख्वाब न देखें
(डॉक्टर अंजुम बाराबंकवी)
आंखों में नरम-नरम सी  पाकीज़गी के साथ
फूलों से सर झुका के मिलो, तुम नशे में हो
 (डॉक्टर अंजुम बाराबंकवी)
दर्द सीने में हज़ारों, आंख नम रखता हूं मैं
 जब भी कागज़ पर कभी अपना क़लम रखता हूं मैं
 (डॉक्टर सईद रोशन )
अंधेरा आंख दिखाता है हमको
हमीं ने जैसे बुझाया है चिराग़ अपना
(मुज़फ्फ़र अब्दाली)
वह मेरे सामने बैठे हुए हैं
मेरी आंखें इबादत कर रही हैं
(सबीन सैफ़)
मेरे सब दर्द, ग़म व  रंज समेटे ख़ुद में
अश्क आंखों से निकल आए हैं क़लंदर की तरह
(हिना रिज़वी हैदर)
हाय उस शोख़ की मस्ती भरी आंखों का नशा
चश्मे आहू  से उलझने का हुनर रखते हैं
(अफरोज़ आलम)
निगाह मिलते ही पलकों का वो झुका लेना
हया में कितनी है चाहत, किसी को क्या मालूम
 (अफरोज़ आलम)
मैंने समझा था कि तू है तो दरक्शां  है हयात
तेरा ग़म है तो ग़में दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में  बहारों को सबात
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है
– फ़ैज़  साहब की मशहूर नज़्म ‘मुझसे  पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग’ से
हिरन
यानी  ग़ज़ाल की कजरारी
आंखों की कशिश जानलेवा है
(डॉक्टर सागर त्रिपाठी की  नज़्म  ‘हिरण’ से)
21वीं सदी पहुंचने के बाद हम सबको अब इस नुक़्ते पर जिरह करना बहुत ज़रूरी है कि “महबूब से गुफ्तगू के क्या मानी है” ? पिछली सदी में उसका  मफ़हूम (Meaning) क्या था और इस हालिया सदी में इसका मतलब क्या होगा ।ये सवाल वाज़ेह (clear open) करना भी ज़रूरी है कि बर्रे सग़ीर (sub continent ) में उर्दू तहज़ीब व सक़ाफ़त (Auticastes  &     Culture)  के ख़मीर (Yeast) से  जिस  मुआशरे (Society)  का ख़द ओ ख़ाल (face & Skin )  उभरता है क्या उसके बदन पर आलमी जँग (पहली और दूसरी)  बर्रे सग़ीर  में बंटवारे-  (1947 और 1971) खलीजी  जंग- (17 अगस्त 1990- फरवरी 1991) नाईन इलेवन -( 11 सितंबर 2001) करोडो  का तावान (Extersion) वसूलने वाली मीडिया के नाम पर गिरोह चलाने वालों की करतूतों और बाबरी मुआमलात जैसे वाक़आत (घटनाओं) का समाज पर कोई असर नहीं हुआ होगा ? 1947 में जिस मुआशरे (समाज) का तालीमी तनासुब (Percentage ) 18 फ़ीसदी  था जो 2020 में 65 फ़ीसदी हो गया है,  क्या इसमें इंसानी आदात व अतवार में कोई तब्दीली नहीं हुई होगी ? यक़ीनन यह सब अनासिर (Elements) इंसानी शऊर (Senses ) के ज़हन पर अपना असर छोड़ेंगे। आज की महबूबा बशऊर है और जिंस से लेकर ज़ीस्त (Life)  के हर मसाइल पर अपनी राय रखती है। इसलिए 21वीं सदी में लफ़्ज़  ग़ज़ल के माने महबूब से गुफ्तगू नहीं बल्कि महबूब से मतनवअ (Diffrent variety)  गुफ़्तगु हो चुका  है।
हाँ,  एक बात की रियायत (Discount)  ज़रूरी है कि आपकी गुफ़्तगु  एक पढ़ी-लिखी मुहज़्ज़ब  महबूबा से है ,इसलिए ज़बान में शिरीन, मज़मून में गुदाज़ (softness )  और बर्ताव में लोच  ज़रूरी है ।
आइए अब हम वहां चलते हैं जहां ग़ज़ल की रूह तब्दील किए बग़ैर हिंदी का जामा पहनाने का ऐलान किया जा रहा है इस पर ज़रा तफ़सील से गुफ़्तगु  की जाए,,,,,,
शुमाली हिंद में पिछली सदी की आख़री चौथाई से हिंदी ग़ज़ल नाम की एक अदबी चिड़िया बहुत परवाज़ कर रही है ।आइये  इसका जायज़ा लेते हैं। हिंदी ग़ज़ल की  मुख़्तसर तारीख़ ये है कि ऊर्दू ग़ज़ल की मक़बूलियत ने  जब अपने पंख पसारे तो उसका असर हिंदी अदब ने क़ुबूल किया। एक ही जुगराफ़िआई हदूद (सीमा ) में बोली और बरती जाने वाली ज़बानें शाना ब शाना  (Shoulder to shoulder) चलती रहीं और कभी-कभी मजबूरन और कभी फ़ैशन के तौर पर एक दूसरे का दुपट्टा बदलने लगीं ।अहद जिगर मुरादाबादी में  महाकवि निराला और उनके हम असर हिंदी शुअरा ने कभी कभी ग़ज़ल  पर अपने लोह  व क़लम (क़ाग़ज व क़लम)  का इस्तेमाल करना शुरू किया लेकिन हिंदी शुअरा को नसतालिक़ हरूफ़ (ऊर्दू लिपि के अक्षर)  की तालीम व  तरबियत न होने के सबब वो ग़ज़ल  के कैनवस पर न तो वो कोई रंग भर सके न ही क़वायद की उस तरह पासदारी को बरक़रार रख सके जो ख़ालिस उर्दू शुअरा का तरीक़ा है।
हिंदी शुअरा की  लिखी और कही गई इन ग़ज़लों ने  भारत में अदब के मंज़रनामें पर हिंदी  ग़ज़ल के नाम से एक नया परचम लहराना शुरू किया। ये सिलसिला जब तवील से तवीलतर (लम्बा से लम्बा)  हुआ तो हिंदी ग़ज़ल का एक मजमुआ (संकलन)  “साए में धूप” अज़ दुष्यंत कुमार नज़रनवाज़ (दिखाइ देना ) हुआ। ये  वो संगे मील   था जिसने हिंदी शुअरा को हिंदी ग़ज़ल के लिए  सनद बख़्शा ।जो आज भी हिंदी ग़ज़ल और हिंदी शुअरा के लिए मस्ल ए  राह (Head light ) है।
 उर्दू ग़ज़ल अरबी और फारसी से होते हुए उर्दू में पहुंची ,उर्दू में आने के बाद क्लासिकी ,तरक्क़ी पसंद, जदीदियत (आधुनिक) और माअबद ( after modernisom )जदीदियत के अदवार (Era)  से गुज़रती गई,  उसके लिए सबसे पहले हिंदी ज़बान व अदब को समझना ज़रूरी है। हिंदी ज़बान का रस्मुल ख़त  देवनागरी है। आज जो ज़बान हमारे समाज में बोली बरती जा रही है उसकी तारीख़ के अदवार (Era) को मैं इस तरह बाँटता हूं-
 1-  क़दीम  हिंदी – शोमाली  और मरक़ज़ी  हिंद   (North & central India )में बरती जाने वाली सन 1000 से पहले वाली वो ज़बान  जिसका रस्मुल ख़त  देवनागरी और नाम ‘देसी’ था। दरअसल  ये ज़बान नहीं बोली के ज़मरे ( class ) में आती है।
 2-  हिंदी – शोमाली और मरक़ज़ी  हिंद में बरती जाने वाली वो ख़ालिस हिन्दी  ज़बान जो सन् 1000 के बाद 1860 तक बोलते -लिखते  और पढ़ते रहे जिसका रस्मुल ख़त  देवनागरी हर तरह से एक चुस्त ज़बान  जिसके पास अपना लुग़त (शब्दकोश) क़वायद, बाशऊर (Adult) और  जय्यद अदीब (veteran Wrier ) मौजूद हैं।
3-  हिंदुस्तानी – भारतेंदु की तख़लीक़ात ( रचनाओं) का वजूद में आने के बाद जदीद  हिंदी का तुलु ( उदय)  शेख़  ग़ुलाम हमदानी मसहफ़ी  ने पहली बार  लफ़्ज़ उर्दू का इस्तेमाल ज़बान के मानी में करना और भारतेंदु और मसहफ़ी  के हमअसरों ( समकालीन) का दोनों ज़बान की तालीम और तरबियत के नतीजे में दोनों ज़बानों  का एक दूसरे में मिल जाना।
फोर्ट विलियम कॉलेज कोलकाता का उर्दू ज़बान व अदब  के फ़रोग़ ( बढ़ोतरी)  में नुमाया किरदार का अदा करना। उर्दू में कसरत से फ़ारसी लफ़्ज़  का अमल- दख़ल बढ़ता है जहां से हिंदी और उर्दू के दरमियान की लकीरों का बारीक़  होता जाना।
बर्रे सग़ीर (Sub continent ) में उर्दू और हिंदी की इरतक़ा  की कुछ ख़ास वजह बनीं जिसके हवाले  से उर्दू के शुअरा आफ़ाक़ माहिर ग़ालबियत आनजहानी (स्वर्गीय)  ज्ञानचंद जैन  (1923 – 2008) ने अपनी मशहूर ज़माना किताब ” एक भाषा दो  लिखावट, दो अदब ”  सफ़हा (पृष्ठ)  153- 154 पर लिखते हैं कि प्रेमचंद जी के छोटे बेटे मशहूर  साहबे क़लम  मुहतरम अमृतराय (1921- 1994 ) ने अपनी किताब A houses divided  में लिखा है कि  “उर्दू की तारीख़ उस वक्त से शुरू होती है जब से उसका नाम उर्दू पड़ता है ” सन् 1780 में शेख़  ग़ुलाम हमदानी मसहफ़ी (1751- 1824) के यहां पहली बार लफ़्ज़ ऊर्दू  का इस्तेमाल ज़बान  के मानी में किया गया  और  जब से उस में हिन्दी अनासिर ( Element ) की जगह अरबी और  फ़ारसी अनासिर शामिल होना शुरू हो जाते हैं और ये दोनों चीज़ें  तकरीबन एक साथ वक़ू पज़ीर  ( appear )   होती हैं।
एक इक़तबास ( Paragraph ) और मुलाहज़ा  फरमाएं –
 देवनागरी रस्मुल ख़त में शाए होने वाला अदबी  रसाला “आँच ” की मुदीरा (संपादक) डॉ0 भावना ग़ज़लों  के इंतख़ाबी मजमुए (चयनित संकलन)  “21वीं सदी की ग़ज़लें” ( 72 शायरों  की 2- 2 ग़ज़लें ) के दीबाचा ( भूमिका) में लिखती हैं कि -हिन्दी अदब  की तारीख़ में भारतेंदु तख़ल्लुस  रखने वाले शायर हरिश्चंद्र ( 9  सितंबर 1840 -6 जनवरी 1884 ) का ज़हूर (Appearence) एक बहुत बड़ा इंकलाब था ।हिम्मत शर्मा की किताब जो  कि हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों ज़बानों  में कई बार शाए हुई है जिसका नाम  “भारतेंदु समग्र” (1989- थर्ड एडिशन) इसके मुताबिक़ जदीद ( आधुनिक)  हिंदी के  मोजिद ( Inventer ) भारतेंदु की तख़लीक़ी कायनात ( रचनात्मक संसार) जितना वसी ( विस्तृत) है उतना ही  इंकलाबी और मतनूअ (verity)भी ।उनकी सलाहयत ( योग्यता) ने अदब की किसी  भी सिन्फ़ ( विधा) को अछूता  नहीं छोड़ा। उनका शेरी मजमुआ “भारत दुर्दशा” में शामिल ग़ज़ल  से एक शेर मुलाहज़ा फरमाएं-
 न बोसा लेने देते हैं न लगते हैं गले मेरे
अभी कम उम्र हैं, हर बात पे मुझसे झिझकते हैं
मज़कूरह (Above mention / described  ) ग़ज़ल के अशआर को पढ़ते हुए ये साफ़ हो जाता है कि भारतेंदु की ग़ज़लों में हिंदी का लहजा है जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता। हालांकि कई लोग हिंदी ग़ज़ल के इरतक़ा और तशरीह (Devlopment & Marketing) का सेहरा सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (21 फरवरी 1897 – 15 अक्टूबर 1961) के सर बांधते हैं । इसकी  बुनियादी वजह  उनकी  ग़ज़लों  में ज़बान  और मीनाकारी के साथ-साथ सामाजिक और ख़्याली  रखरखाव भी ऊर्दू रवायत  से अलग देखते हैं।
20 वीं सदी में निराला का शेरी मजमुआ”बेला”( 1943) की इशाअत (प्रकाशन) हिंदी साहित्य की दुनिया में एक अहम वाक़्या (घटना) की शक्ल में हमारे सामने आती है जिसके दम पर निराला को हिंदी ग़ज़लों का प्रमोटर कहा जाता है। बेला के दीबाचे (भूमिका) में ख़ुद निराला ने लिखा है कि बेला मेरे नए गीतों का मजमुमा है। क़रीब-क़रीब सभी तरह के गीत इस मजमुए  में शामिल हैं ।ज़बान आसान और मुहावरेदार है ।देशभक्ति के गीत भी हैं ।इससे बढ़कर नई बात यह है कि अलग-अलग बहरों  की ग़ज़लें भी हैं, जिसमें फ़ारसी  के अरूज और बहर का ख़्याल रखा गया है। जो शायरी की कसौटी भी है।
निराला ने न सिर्फ़ हिंदी ग़ज़ल के नए मुहावरे दिए बल्कि हमअसरियत (Current age) का जामा भी  पहनाया जिसे “बेला”  की क़िरात (Reading) से आसानी से समझा जा सकता है ।निराला के अलावा त्रिलोचन, बलबीर सिंह, जानकी बल्लभ शास्त्री, शमशेर बहादुर सिंह, शलभ श्रीराम सिंह वगैरह ने  ग़ज़ल को नई ऊंचाई अता  की ।इन तमाम शुअरा की ग़ज़लों में अपनी- अपनी इन्फरादयत(विभिन्नताएं )  मौजूद हैं ,जो ग़ज़ल के रंग व  आहंग (Sound )  को समझने में आसानियां पैदा करते हैं ।
*[हिंदी ज़बान और देवनागरी दिबाचा (Preface) से ऊर्दू ज़बान और नसतालिक़  रस्मुल ख़त (Script) में तर्जुमा (अनुवाद) किया गया । उर्दू  नस्र के मिज़ाज के मुताबिक कई अल्फ़ाज़ को हटाया और बढ़ाया गया है।]*
डॉ0 बहादुर मिश्र के मुताबिक़ भारतेंदु कई ज़बानों,के जानकार थे बल्कि उन ज़बानों  में शायरी लिखते भी थे। उम्मीद ज़ाहिर   की जाती है कि वो यानी भारतेंदु ने  ग़ज़लें उर्दू में ही लिखी हैं जिसका बाद में रस्मुल ख़त  तब्दील कर दिया गया। इस तरह  असलियत के लिहाज़ से हिंदी ग़ज़ल के मोजिद (जनक) भारतेंदु नहीं बल्कि निराला ठहरते हैं। (तज़नी शुमारा नंबर 1,  गज़ल नंम्बर)
इन तमाम इक़तबास (Paragraph) के क़िरयत (Reading) से जो कुछ मैं  समझ पाया हूं, मैं यहां वाज़ेह (Clear) करना चाहता हूं कि भारतेंदु, निराला, दुष्यंत और इन सब शोअरा के हमअसर जो भी ग़ज़लें  कह रहे थे उसे वो  अपनी सहूलत के मुताबिक़ मनपसंद रस्मुल ख़त  में लिख रहे थे। जिस तकलीख़  के लिए यह कहना कि वह हिंदी ग़ज़ल थी *यह एक ख़ाम ख़्याली बात  दिवाने के  ज़्यादा कुछ नहीं है। मेरा ख्याल है कि अब तक की गुफ़्तगु से ग़ज़लों में उर्दू और हिंदी का रिश्ता वाज़ेह (स्पष्ट) हो गया है ।इसलिए मुख़तसरन (संक्षेप में) कहना  चाहूंगा कि दोनों ज़बानों के इरतक़ा (विकास)  के बाद क़दीम (प्राचीन) हिंदी और क़दीम (प्राचीन) उर्दू इतिहास के पन्नों और हिंदी भाषा की किताबों में तो है लेकिन हमारी रोज़मर्रा से गायब हो चुकी है। हिंदी की किताबों में जो ज़बान सिर्फ देवनागरी रस्मुल ख़त  जैसे ऑक्सीजन के सहारे आखिरी सांस ले रही है ।वह हमारी रोज़मर्रा में नहीं है । जो रोज़मर्रा के इस्तेमाल में हो  उसी का नाम हिंदी रख लिया गया है जो कि उर्दू है ।दोनों ज़बानों की इख़्तेलात (sophistication) से जिस हिंदुस्तानी ज़बान का तसव्वुर  (Imagery) उभरता है उसका आप जो चाहे नाम दे दें, मेरी मां ने मुझे उसका नाम उर्दू बताया है इसलिए मैं उसे उर्दू कहता हूं । ” अब आप कहेज़बान किसे कहते हैं “? दरअसल ज़बान रस्मुल ख़त  को नहीं कहते, पूरे जुमले में इस्तेमाल होने वाले verb  ज़बानों की ज़मानत होती है, और पूरा जुमला पढ़ने के बाद उसी के सहारे यह तय किया जाता है कि यह कौनसी ज़बान है। अब हम ग़ज़ल की तरफ़ चलते हैं।
ग़ज़ल की क़वायद फ़ारसी और अरबी के मिलाप से बनी है। ऊर्दू नसतलैक़ रस्मुल ख़त से मरबूत (Tie-up ) है और नसतलैक़ रस्मुल ख़त (ऊर्दू लिपि) में लिखी जाती है। आप ग़ज़ल कहकर किसी भी रस्मुल ख़त में लिखे लें लेकिन क़ारईन (Reading), सामईन (listener) , मोहक़िक़ (Research scholar)  और नक़्क़ाद (Critic) उसकी जांच करने के लिए उस क़वायद  का इस्तेमाल करेंगे जो अरबी और फारसी के इख़्तलात (Mixer) से बनी हुई है, तो आप हमें बता दीजिए कि क्या आप क्रिकेट की गेंद से बैडमिंटन खेल सकते हैं ? यह मुमकिन नहीं तो नसतलिक़ (ऊर्दू लिपि) रस्मुल ख़त की तालीम (शिक्षा) हासिल करके ग़ज़ल के उफ़क़ पर एक सूरज के तुलु (उदय ) होने का इंतज़ार करें  वगरना देवनागरी की तारीक रातों में तारे गिनते हुए महबूब का इंतज़ार बेसूद (बेमतलब) होगा ।
आ तुझको बता दूं मैं अच्छी सी ग़ज़ल क्या है
अल्फ़ाज़ के सांचे में लफ़्ज़ों  का उतर जाना
             अफ़रोज़ आलम
 ग़ज़लों  के बदन पर रहें अल्फ़ाज़ के साए
 कुछ दर्द भी  अशआर में ढल जाए तो अच्छा है
………………………………………………………………..
– अफरोज़ आलम –  (जिद्दा)  सदर गल्फ उर्दू काउंसिल

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2 thoughts on “ग़ज़ल की मुख़्तसर तारीख़ और हिंदी- उर्दू ग़ज़लों का इरतक़ाई (विकसित) पहलू 2020 तक :: अफरोज़ आलम”
  1. समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में भी लोग अच्छा लिख रहे हैं, क्योंकि मैं उन्हें भी पढ़ती रहती हूँ ।
    मेरा मानना है कि ग़ज़ल, ऊर्दू शास्त्र विधान / व्याकरण के अनुरूप ही लिखी जानी चाहिए ।चाहे वो जिस भी भाषा में हो।
    अगर ऊर्दू लिपि सीख कर ग़ज़ल लिखी जाए ,,,,,तब तो कोई मसला ही नहीं पैदा होगा फिर चाहे वो किसी भी भाषा में हो।

  2. समकालीन हिन्दी ग़ज़लें मैं पढ़ती रही हूँ, इसमें भी भाव, कथ्य और शिल्प उभर कर सामने आते हैं ।
    लेकिन फिर भी मेरा मानना है कि ग़ज़ल ,ऊर्दू व्याकरण शास्त्र विधान के अनुरूप ही लिखी जानी चाहिए ।
    अगर ऊर्दू लिपि सीख कर ग़ज़ल लिखी जाए तो कोई मसला ही पैदा नहीं होगा ।

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