ट्वईंटी-ट्वईंटी के प्लाट पर प्रेम :: चित्तरंजन कुमार

ट्वईंटी-ट्वईंटी के प्लाट पर प्रेम
– चित्तरंजन कुमार

किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे खफा है तो जमाने के लिए आ
-अहमद फराज

बातें हुई तो प्रेम, नजरें मिली तो प्रेम, रूठ गए तो प्रेम, मनाने पर मान गए तो प्रेम । वाकई, प्रेम भी अजीब है । हो जाए तब भी मुश्किल, न हो तो भी मुश्किल । हद है मन में उफखी-बिखी है, फिर भी प्रेम है । प्रेमिका मिल जाए तो कुछ बोलते डर लगे, न मिलें तो कल्पनाओं का दौर……….। प्रेम न हुआ कि लाइलाज मर्ज हुआ । कदम-कदम पर प्रेम, सांस-सांस में प्रेम । प्रेम का संयोग-पक्ष सुखद अनुभूति है, तो वियोग-पक्ष दारूण-करूणा से ओत-प्रोत । प्रेम पंथ के रास्ते पर न जाने कितने बर्बाद हुए तो कितने बर्बाद होते-होते बच गए । कुछ पागल प्रेमी ऐसे हुए कि प्रेम के असफल होने पर दुनिया छोड़ गए तो कोई शहर । प्रेम ने भी कई दौर देखे हैं – आदम-हव्वा, राध-कृष्ण, पद्मावती-रतनसेन, चंदवरदाई-पृथ्वीराज, कालीदास-तिलोत्तमा, लैला-मजनूँ, हीर-राँझा, जूलियट-सीजर आदि । प्रेम का भरा-पूरा संसार है । किसी ने प्रेम को पा लिया तो कोई बलिदान और त्याग की मूर्ति बनकर बिखर गया । प्रेम का ठहराव पक्ष प्रेमी-प्रेमिका को पागल कर गया । आँखों के रास्ते दिल में उतरा ठहराव प्रेम के कई पर्याय गढ़ गया – कभी इश्क, कभी मोहब्बत, कभी लव, कभी प्यार, कभी जुनून, कभी जिंदगी तो कभी जानेमन की हद को पार कर गया । ‘‘आई लव यू’’ बोलते ही रक्त संचार बढ़ जाए, सांसे महक जाए, अंगों में झनझनाहट हो जाए तो समझ लेना चाहिए, अब केवल जिस्म दो हैं-जान एक है । इस एहसास की व्याख्या पर अनगिनत पृष्ठ रंग गए परंतु मुकम्मल उत्तर मिला हो, ऐसा अब तक नहीं हुआ है । दिल की खलिश को भला शब्द कहाँ संभाल पाएगा ।

कोई मेरे दिल से पूूछे तीर-ए-नीम-कश को
ये खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
– गालिब

कहीं प्रेम जीवन हो गया तो कहीं प्रेम व्यापार । जहाँ प्रेम जीवन हुआ, वहाँ नव कपोल अंकुरित हुई जहाँ व्यापार हुआ, वहाँ प्रेम के नाम पर शरीर की नुमाइश लगी । तिजारत वाले प्रेम में बड़े-बड़े व्यापारी आए, जिस्म के अनुरूप कीमत तय की गई और अनुभूति के बगैर ‘‘मशीनीकृत तरीके से संभोग’’ हो गया । इस किस्म के प्रेम का एक बड़ा बाजार है । उत्तर आधुनिक दौर में, ऐसे प्रेम की मार्केटिंग भी बदस्तूर जारी है । आज का प्रेम समर्पण आस्था से नहीं नोटों से चलता है । आजकल प्रेम चलता नहीं है, प्रेम को चलाना पड़ता है – सोशल मीडिया पर सुबह-शाम का अभिवादन करके या सामाजिक सरोकार स्थापित करके । प्रेम की हद तो मध्यकाल में भी पार कर गई थी । हामिदा बानो ने पुरुषसत्तात्मक समाज को चुनौती देते हुए हुमायूँ के प्रति अपना प्रेम निवेदित किया । जिसका जीता-जागता उदाहरण दिल्ली का ‘हुमायूँ का मकबरा’ है । इसी मकबरे से प्रभावित होकर शाहजहाँ ने मुमताज की याद में प्रेम के प्रतीक ‘ताजमहल’ का निर्माण करवाया था । मध्यकाल में प्रेम के विद्रूप पक्ष भी कम नहीं थे । इस काल में स्त्राी-पुरुष का संबंध भावना तक कम और शरीर तक ज्यादा था । यही वह काल है जिसमें बहु-पत्नी प्रथा, सती प्रथा, गणिकाओं से राजा के अवैध् संबंध् आदि अपने परम पर थे । प्रेम की कट्टरता के प्रतीक अकबर ने पुत्रा जहांगीर के प्रेम को खत्म करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए । अकबर ने जहांगीर की प्रेमिका अनारकली को दीवारों में चुनवाने और अन्ततः राज्य छोड़ने पर मजबूर किया । प्रेम के रास्ते की स्वाभाविक अड़चनें न तब समाप्त हुई थीं और न अब समाप्त हुई हैं । मध्यकाल की ही मीरा का प्रेम अप्रतिम है । लोकापवाद से कोसों दूर मीरा की यह घोषणा है कि वे कृष्ण की दासी हैं ।
‘‘मीरा कहे प्रभु ब्रज के बासी ।
तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी ।।’’
मीरा सामाजिक रूढ़ियों को जिस प्रकार हाथों-हाथ लेती हैं, वह अपने समय की महानतम उपलब्ध् िहै । प्रेम में आस्था, समर्पण और एकनिष्ठता का प्रतीक मीरा-साहित्य वर्तमान पीढ़ी के लिए दिल के दर्द को कम करने की कच्ची सामग्री है । यहाँ यह ध्यान देना होगा कि मीरा के प्रेम में ‘‘भौतिकवाद / बाजारवाद’’ के लिए कोई जगह नहीं है, इंद्रिय सुख पा ही लेना है, गर्भधरण कर ही लेना है, यह आखिरी मकसद नहीं है । प्रेम का मिलन पक्ष वैकल्पिक है । प्रेम में आत्मिक सुख की तलाश मौन से सृजित प्यार में ही उपलब्ध होता है । प्रेम में वर्चस्व के आगमन से या छल के मिश्रण से प्रेम अपनी मौलिकता खो देता है । प्रेम में आँसुओं की उपादेयता उसके पारदर्शी होने पर निर्भर करती है । प्रेम का संचार भाव बहुत कुछ हो सकता है, परंतु आंसू सर्वाधिक प्रबल हैं । वास्तव में, प्रेम-प्रेम है । इसे किसी दायरे में बांध्ने से ही कष्ट प्रारंभ होता है । जीवन-जगत की परिधि ही हमें स्वार्थी, अहंकारी, जातिवादी, कट्टरपंथी, ब्राह्मणवादी जैसे विचारधराओं का ज्ञान कराता है । प्रेम मनुष्य का निर्माण करता है – विध्वंस नहीं । धरती के कुछ ही प्राणी ऐसे होंगे, जो प्रेम की शक्ति को पहचानते हैं । जिन्हें कोयले की खान में दबे सोने की परख है, वही कुर्बानी भी देते हैं । ऐसी शहादत को सलाम करते हुए महादेवी वर्मा ने ‘मैं नीर भी दुख की बदली’ कविता में उद्धृ किया है –
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आज चली !
प्रेम के शीर्ष पर पहुँचकर बिखर जाना जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है । पितृसत्तात्मक समाज-घर परिवार, समाज, खानदान, जाति, धर्म आदि की इतनी दुहाई देता है कि प्रेम कहानी की नायिका अदृश्य हो जाती है और नायक दुनियादारी को ढोता है । उत्तर आध्ुनिक दौर, तकनीकी विकास, प्राइवेट संस्थाओं का शिक्षा पर अध्किार, ब्रांडेड कंपनियों का बाजार पर वर्चस्व आदि की उपलब्ध्यिों के बावजूद ‘‘खाप’’ पंचायतें जीवित हैं । विकास की अंधी दौड़ ने प्रेम को सभ्यता-संस्कृति से बाहर कर दिया ।
सृष्टि अपनी गतिशीलता के लिए प्रतिबद्ध है और मनुष्य अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के लिए । मनुष्य हर वक्त प्रेम करना चाहता है । मनुष्य के क्रियात्मक होने का सशक्त पहलू-प्रेम है । वह अपने अस्तित्व में प्रफायड के सिद्धांतों का समावेश इस प्रकार करते हैं कि किसी को जानकारी न हो । काम क्रीड़ा ;सेक्स के प्रति आकर्षित होना, मनुष्य का स्वाभाविक गुण है । शरीर की अन्य क्रियाओं की भाँति सेक्स भी एक क्रिया ही है । इसे भी सहजता से लेना चाहिए । पवन करण की कविताएँ इसका जीता-जागता उदाहरण हैं –
प्रेम की तीव्रता एकांत चाहती है और वह
प्रेमाभिव्यक्ति से देहाभिव्यक्ति की ओर बढ़ती है
और प्रेम में यह बढ़ना हो ही जाता है
मैं नहीं कहता कि देह अपवित्रा चीज है
लेकिन वह पवित्रा भी नहीं उतनी
कि हर समय उसकी चिन्ता में घुलते रहा जाए
लेकिन मैं कहता हूँ कि प्रेम अमूल्य है
उसका अहसास अवर्णनीय
बहुत गहरा संबंध् है प्रेम का देह से
दरअसल प्रेम का बचना ही देह का बचना भी है
प्रेम बचा रहता है तो देह भी बची रहती है
अपने विश्वास में
– ‘एक खूबसूरत बेटी का पिता’ कविता से उद्धृत
जितनी तेजी से दुनिया बदल रही है, उतनी तेजी से मानवीय संवेदनाओं के सरोकार भी बदल रहे हैं । यह बदलाव एक दिन में नहीं आया है । जब से हमारे ज्ञान के स्रोत का संबंध् तकनीक से हो गया है, तब से हमारे आस-पास की दुनिया में धैर्य की कमी देखी जा सकती है । आज तात्कालिक लाभ के लिए कुछ भी संभव है । सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि प्रेम के अस्वीकार को प्रेमी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है, पफलतः बलात्कार और एसिड अटैक जैसी घटनाएँ हो रही हैं । मनुष्य के असहिष्णु होने का दौर है । देश, दुनिया समाज जिस तेजी से टूट रहा है, उसे केवल प्रेम से ही बचाया जा सकता है ।
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परिचय : लेखक हिंदी के प्राध्यापक और आलोचक हैं

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