“आधुनिक परिप्रेक्ष्य में टैगोर”
सत्यम शिवम सुंदरम
गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर भारतीय सांस्कृतिक विरासत के शाश्र्वत प्रतिनिधि हैं और रहेंगे। विश्व कवि,चित्रकार, शिक्षाविद और सब से बढ़ कर मानवतावादी विचारक। संकुचित और संकीर्ण राष्ट्रवाद के ख़तरों को आज से एक सदी पूर्व हीं उस दूरदर्शी मनीषी ने भांप लिया था। वे अपने आपको वैश्विक नागरिक मानते थे। वास्तव में टैगोर के मानवतावाद की हीं अंतिम परिणिति अंतराष्ट्रीयतावाद में हुई।
गुरुदेव उपनिषदों के प्रकांड ज्ञाता थे। जीवन की एकता और ब्रह्म की सर्वव्यापकता को उन्होंने उपनिषदों से ग्रहण किया था। आत्मा के रूप में मनुष्य को अनंत ब्रह्म का हीं भाग मानते थे।
          अयम आत्मा ब्रह्म:।
          मानडूक्योपनिषद)
बंगाल वैष्णव संतों की कर्मभूमि रहा है। पारिवारिक संस्कारों से वैष्णव भक्ति गीतों से परिचित होना स्वभाविक था। गुरुदेव के सार्वभौमिक ईश्वरीय प्रेम पर वैष्णव कवियों का प्रभाव दिखता है। गीतांजलि के प्रेम गीतों पर भी जयदेव के गीत-गोविंद और विद्यापति की पदावलियों का प्रभाव है।
टैगोर विशुद्ध मानवतावादी थे। समूची सृष्टि को को एक ईश्वरीय व्यवस्था मानते हुए, मानव मात्र को उसका सूक्ष्मतर अंग कहते थे। सभी मनुष्य एक हीं ईश्वर की कृति है,जो अपने हिस्से का सुख और दुख भोगते हैं। ईश्वर देवालयों या देवलोक का निवासी नही है। न हीं व घने अरण्यों या पर्वतों की कंदराओं में रहता है। टैगोर ईश्वर का निवास ऐसे व्यक्ति के अंत: करण में मानते हैं, जिसमें कमजोरों एवं पीड़ितों के प्रति सहानुभूति होती है। जीवन का आनंद अहम को त्याग कर अपने को परमात्मा में विलीन करने में है। वैष्णव कवियों ने कहा भी है-
” या अनुरागी चित्त की, गति समझै नहि कोई,
  ज्यों-ज्यों बूझै श्याम रंग,त्यों-त्यों उज्जवल होई।”
जिस प्रकार समस्त नदियों का जल समुद्र की ओर प्रवाहमान रहता है,और समुद्र से वर्षण के द्वारा नए जलकणों की सृष्टि होती रहती है,उसी प्रकार मानव जीवन भी जल- चक्र की भाँति ब्रह्म में एकाकार होने एवं पुनः नया जीवन पाने की प्रवृत्ति रखता है।
मार्क्स की तरह टैगोर भी राज्य को शोषण का एक तंत्र मानते थे। राज्य के प्रभाव का वो परिसीमन चाहते थे। राज्य को उन कार्यों का दायित्व अपने उपर नही लेना चाहिए,जो वास्तव में लोगों को स्वयं करने चाहिए। वे राज्य की तुलना में सामाजिक सहकार्य को अधिक महत्व देते थे। प्राचीन भारत में इस प्रकार की व्यवस्था विद्यमान थी,जिस में समाज राज्य को सामुदायिक कल्याण के दायित्वों से मुक्त रखता था। विभिन्न प्रकार की विकास योजनाओं में कमीशनखोरी के फैले हुए जाल को देखते हुए टैगोर का यह सुझाव उचित हीं लगता है। आधुनिक स्विस गणराज्य में प्रत्यक्ष लोकतंत्र इसी प्रकार की प्रणाली का एक सफल उदाहरण है।
मानवाधिकारों के टैगोर प्रबल हितैषी रहे। उन्हों ने इन अधिकारों का संबंध मनुष्य की आत्मा से जोड़ा। उन का विचार था कि मनुष्य को अपने अधिकारों के लिए याचना नही करनी चाहिए। बल्कि अपनी रचनात्मकता एवं आत्म- त्याग से स्वत: अपने लिए पैदा करना चाहिए।  टैगोर के अनुसार मनुष्य आत्मिक रुप से स्वतंत्र है। राजनीति या राज्य येन-केन प्रकारेण इस स्वतंत्रता को कमतर करने का प्रयास करता है।वे स्वतंत्रता को केवल बंधनों का आभाव न मानकर उसे अंधविश्वास,भय और संकुचित दृष्टिकोण से मुक्ति के रुप में देखते थे।
ऐसा नहीं था कि टैगोर राष्ट्रवादी नही थे। परंतु उनका राष्ट्रवाद संकीर्ण नही था। राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद के बीच की महीन सी रेखा उन की दृष्टि में छिपे न रह सकी। राष्ट्रवादी उद्वेग को अपनी नजरों के सामने महायुद्धों में परिणत होते देखना उन के लिए दुखदाई था। कहीं न कहीं आज संपूर्ण विश्व पुनः उसी युद्ध के मुहाने पर है। ऐसे में युवाओं को टैगोर को गंभीरता से पढ़ने और मनन करने की आवश्यकता है।
टैगोर ने ‘आमार सोनार बांग्ला’ गीत बंगाल विभाजन के बाद उभरे स्वदेशी आंदोलन के दौरान लिखा था। बंग- भंग को रोकने हेतु बंगाल के लोगों को रक्षाबंधन की प्रेरणा उन्होंने हीं दी थी। जालियांवाला बाग की घटना से क्षुब्ध हो उन्होंने ब्रिटिश सरकार से प्राप्त नाइटहुड की उपाधि को लौटा दिया था। पर उन का देशप्रेम और राष्ट्रवाद उच्चकोटि का था, दिखावे का सतही नही। कहीं न कहीं उन्हें राष्ट्रवाद के पीछे पूंजीवादी शक्तियों का प्रपंच तब हीं दिख गया था। तभी उन्होंने ने राष्ट्रवाद को एक बहुत बड़ा उत्पाद तक डाला था। आज भी वैसी शक्तियां उग्र राष्ट्रवाद की आड़ लिए, कहीं न कहीं देश की बहुसंख्यक जनता के हितों पर कुठाराघात करने में तत्पर है।
टैगोर देशभक्त थे। उन्हें अपनी मातृभूमि से अटूट स्नेह था। प्रार्थना में कहा करते थे-
” हे ईश्वर हमें शक्ति देना जिससे हम निर्बलों एवं पीड़ितों का अपमान न कर सके। हमारा प्यार उस समय आसमान की उँचाईयों तक पहुंच सके,जब हमारे आसपास की  वस्तुएं धूल में गिरी हुई हो।”
देशभक्ति के नाम पर कट्टर जातीय-धार्मिक समूहों को वो नापसंद करते थे। देशभक्ति को भौगोलिक सीमाओं में न बांध,वे इसे संपूर्ण मानवता से जोड़ते थे। उन्होंने ने भारत के सांस्कृतिक मूलमंत्र ” वसुधैव कुटुंबकम्” को अंगीकार किया था। इस प्रकार वे राष्ट्रीयता को विश्वशांति का बाधक भी मानते थे। वे मानते थे कि संसार का कोई भी राष्ट्र एक- दूसरे से पृथक रह अपना कल्याण नही कर सकता। उपनिषदों की “सर्वे भवन्तु सुखिन:” की विचारधारा का वो हृदय से सम्मान करते थे। उनका सारवभौमवाद इसी पर आधारित था।
टैगोर सामाजिक विषमताओं के विरोधी थे। सभी को आजीविका एवं धनोपार्जन हेतु समान अवसर मिले। समाज के सदस्यों के बीच प्रेम और सहानुभूति के हिमायती थे। टैगोर समन्वय के आधार पर संगठित समाज की कल्पना करते थे। नगरों के विकास के साथ-साथ ग्रामोत्थान के भी समर्थक थे। टैगोर मानते थे कि सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था नैतिकता पर आधारित होनी चाहिए।
टैगोर तत्तकालीन शिक्षा प्रणाली से असंतुष्ट थे। शिक्षा ऐसी हो जो मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उसका नैतिक-आध्यात्मिक विकास भी करे। वह अज्ञानता के तिमिर का नाश करने वाली हो। शिक्षा में राजनीति के प्रवेश को भी वर्जित मानते थे। आधुनिक स्कूली शिक्षा उदात्त चरित्रों के नागरिकों का निर्माण करने में अक्षम है। अतः उन्होंने प्राकृतिक वातावरण में शिक्षा हेतु शांतिनिकेतन की स्थापना की। उन का मानना था कि विद्यालयी शिक्षा बच्चों को प्रकृति एवं परमात्मा से दूर करती है। शिक्षा का माध्यम अनिवार्य रूप से मातृभाषा हो। अंग्रेजी शिक्षा को वे अनुचित एवं अपर्याप्त मानते थे। पाठ्यक्रम में समाजिक मूल्यों एवं नैतिक मानदंडों के समावेश पर बल देते थे। पाश्चात्य अंधानुकरण के विरुद्ध थे। हां प्राच्य एवं पाश्चात्य विचारों का संगम जरुर चाहते थे। 1921 में उनके द्वारा विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना का यही लक्ष्य था। वे सही मायनों में विश्वगुरु है। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन-
“अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥”
सत्यम शिवम सुंदरम
मधुकर वनमाली
मुजफ्फरपुर बिहार
७ अगस्त 2020
मो 7763815199
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