आलेख

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पढ़िए गीता बनिए सीता 

                   – मीरा श्रीवास्तव

    लॉक डाउन की अंतहीन पुनरावृत्तियों से भरे ये तीन – चार महीने हर किसी के लिए बड़े भारी साबित हुए हैं। हर जगह संक्रमण की भयजनित आशंका ने ईश्वर को भी ताले में जड़ दिया , स्कूल- कॉलेज,  ऑफिस, दुकानें, पार्क- सड़कों को सन्नाटे से भर दिया। बाहर की वीरानगी घर की दीवारों, कमरों में भी भर गई। अकेलेपन का सच्चा साथी टीवी भी इस वीरानगी को बाँटने में कामयाब नहीं हो पा रहा था। स्टूडियोज बंद,  शूटिंग बंद , लॉक डाउन की पुनरावृत्ति पर पुनरावृत्ति, टीवी के सारे चैनल्स पुराने धार्मिक सीरियल्स की पुनरावृत्ति में व्यस्त हो गए। धीरे-धीरे मन इस अवसाद की स्थिति से उबरने के लिए आध्यात्मिकता के ओवरडोज के लिए तैयार हो ही गया। भक्ति, आस्था के भूले बिसरे भाव हर किसी के भीतर व्याप्त होने लगे। अपने विराट स्वरूप में कुरुक्षेत्र की रणभूमि में गीता का उपदेश देते कृष्ण ने अर्जुन के किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति को ‘ श्रुतिविप्रतिपन्न ‘ कहा – नितांत नया शब्द ! अर्थ ढ़ूंढ़ा – शास्त्रीय मतभेदों के कारण अर्जुन की बुद्धि के विचलित होने से मोहग्रस्त होना , एक उपलब्धि ही थी यह। यही स्थिति सबकी थी , धर्म , तर्क , आस्था के बीच द्वन्द्व बढ़ता ही जा रहा था। भक्ति सागर में अवगाहन करते करते एक दिन अचानक ही स्क्रीन पर एक सूचना आई कि 13 जुलाई से लगभग सभी चैनल्स अपने सीरियल्स के नये एपिसोड्स का प्रसारण शुरू करने वाले हैं। कहना न होगा कि यह सूचना मन को ठंडे बयार सी छू गई।

13 जुलाई की रात सारे काम काज निबटा बैठ गई टीवी के सामने। मधुर बैकग्राउंड संगीत के साथ स्क्रीन पर एक मुस्कुराता चेहरा नजर आया जो हँसने की कोशिश के बावजूद भी रोने के बहुत निकट पहुँचने में पूरी तरह से कामयाब था। फिर दिमाग में झटका सा लगा , ये कमबख़्त सीरियल वाले भी ना ! अच्छे खासे नाम ‘ अनुपमा ‘ का अपनी टीआरपी में इजाफा के लिए रूपांतरण ‘ अनुपमाँ ‘ में  कर दिया। लेकिन थोड़ी ही देर में जाहिर हो गया कि जिस औरत का वजूद किचेन और बच्चों में ही सिमट कर रह गया हो वह अनुपमाँ ही हो सकती है।

बचपन की सहेली का घर आना और बचपन को एक बार फिर से जीने की लालसा को बड़े जुगाड़ लगा सहेली काईंया सासु माँ से अनुपमा को अपने साथ ले जाने की इजाजत तो ले लेती है मगर इस शर्त के साथ कि अनुपमाँ के पति के घर आने से पहले उसे घर में बहरहाल होना चाहिए। अब अनुपमाँ को भी कहाँ पता था कि बचपन की भुलभुलैया से बाहर आना इतना आसान थोड़ा ही न है ? फिर पति ऐसा जो एक साथ राहु केतु और शनि की खिचड़ी हो ।भागती दौड़ती अनुपमाँ सात बजे के पहले घर पहुँच तो जाती है पर पति को समय से पहले घर पहुंचा देख सनाका खा जाती है। लानत मलामत के साथ उसका स्वागत पति करता है , अनुपमाँ के दसियों ‘ सोरी – सोरी’ का कोई असर नहीं पड़ता वनराज शाह नाम के इस प्राणी पर।अपने नाम के अनुरूप ही गरजता रहता है वह , घर के बाकी सारे सदस्य सिवाय एक बेटे के जुबान सिले बैठे रहते हैं। पति गरजता हुआ सवाल करता है बकरी सी मिमियाती पत्नी से , ‘ यह घर किसका है ?’ बड़े विश्वास से अनुपमाँ जवाब देती है, ‘ मेरा ‘ कि धमाका होता है, ‘ नहीं, ये घर मेरा है , और तुम्हारा काम सिर्फ घर के सभी लोगों का पूरा ख्याल रखना है ‘ नहीं ! अनुपमाँ की इस हिमाकत  की बस इतनी सी सजा ? पत्नी का हाथ पकड़ दरवाजे से बाहर निकाल दिया जाता है उसे ।

वितृष्णा से भर उठा मन , स्त्री की अस्मिता के लिए क्यों नहीं सोचते ये सीरियल्स बनाने वाले? रघुवीर सहाय जी की ये पंक्तियाँ खुद ब खुद मन में अपने आप को दोहराने लगीं –

‘ पढ़िए गीता / बनिए सीता

फिर इन सबमें लगा पलीता/

निज घर – बार बसाइए/ होय कटीला/

लकड़ी सीली/ आँखें गीली/

घर की सबसे बड़ी पतीली/

भर – भर भात पकाइए/ ‘ – ये पंक्तियाँ ऐसा आभास नहीं देती लगतीं जैसे अनुपमाँ की पीड़ा को शब्द दे रही हों ? इतिहास के पन्ने दर पन्ने फड़फड़ाने लगे मन के भीतर- वेदज्ञ विदुषी गार्गी ने जब याज्ञवल्क्य को विदेह जनक के यज्ञ के शास्त्रार्थ में चुनौती दी तो अपने आसन्न पराजय का अनुमान कर उन्होंने भी यह कहते हुए गार्गी को मौन रहने को कहा – ‘ गार्गी माति प्राक्षीमार्ते मूर्धा व्यापप्त्त ‘ अर्थात् गार्गी चुप हो जाओ, कहीं तुम्हारे मस्तक के टुकड़े न हो जाएं। ‘ इस वाक्य में अस्फुट किन्तु प्रच्छन्न धमकी का स्वर सुनाई नहीं दे रहा ?

सीता विदेह जनक की पुत्री राम की स्वंम्बरा बन अवधपुरी आती है। राम जब पिता के वचन पालन हेतु वनवास के लिए प्रस्थान करते हैं , सीता सहज भाव से राजप्रासाद के सुखों का त्याग कर पति की अनुगामिनी बनना स्वीकार करती है। वन में ही रावण द्वारा अपहृत किये जाने पर एकनिष्ठता से राम की प्रतीक्षा करती है। रावण वध के पश्चात भी सीता को बगैर अग्नि परीक्षा के स्वीकारा नहीं जाता। अयोध्या आने पर राज्य के एक साधारण नागरिक द्वारा सीता की पवित्रता पर प्रश्न उठाए जाने पर सीता को फिर से एक बार राम की मर्यादा की यज्ञ अग्नि में समिधा बन जलना पड़ता है और वह भी तब जब वह गर्भवती थी। अग्नि परीक्षा सिर्फ सीता की  ही नियति क्यों?

वन प्रवास का ही एक और प्रसंग-   ऋषि गौतम की अनिंद्य सुंदरी पतिव्रता पत्नी अहिल्या की एकनिष्ठ भाव के प्रति गौतम यद्यपि निःशंक हैं किन्तु प्रवंचक इंद्र जब ऋषि वेष में अहिल्या का सतीत्व भंग करता है , ऋषि का विश्वास क्षण भर में कपूर की तरह उड़ जाता है और अहिल्या के लाख क्षमायाचना के बाद भी उसे प्रस्तर प्रतिमा में परिवर्तित हो जाने का शाप देते हैं।राम के वन प्रवास में ही अहिल्या उद्धार का प्रसंग भी आता है। गार्गी से अहिल्या , अहिल्या से सीता यानि वैदिक काल से लेकर त्रेता युग और आगे भी काल चक्र की गति से परे स्त्री की नियति में किंचित भी अंतर नहीं  आया है।अनुपमाँ भी उसी श्रृंखला की एक कड़ी मात्र है। स्त्रियों के प्रति पूर्वाग्रह ग्रस्त मानसिकता , सामाजिक रूढ़ियां , पुरुष वर्चस्ववादी अवधारणाएं स्त्री की अस्मिता को अक्षुण्ण बनाये रखने के उसके संघर्ष में सबसे बड़ी बाधाएं बनती रही हैं। पुरुष के अहम् एवं पुरुषार्थ की सिद्धि के लिए अनुपमाँओं की कतार टूटने नहीं पाए इस प्रयास में अनगिनत वनराज, हमेशा की तरह आज भी सन्नद्ध हैं ….पढ़िए गीता बनिए सीता ….नारी तुम केवल श्रद्धा हो.

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