पारंपरिक जनजातीय लोक कला सोहराई – कुमार कृष्णन

पारंपरिक जनजातीय लोक कला सोहराई
– कुमार कृष्णन

झारखंडी संस्कृति में सोहराई कला का महत्व सदियों से रहा है। बदलते परिवेश में कथित आधुनिकता के नाम पर लोगों का शहरीकरण के कारण आज दुर्भाग्यवश इस कला के प्रति उपेक्षाभाव, इसके अस्तित्व पर संकट बनकर आ खड़ा हुआ है। आधुनिकीकरण और शहरीकरण के कारण आज की नई पीढ़ी इस प्रागैतिहासिक कला को पिछड़ेपन का प्रतीक मानकर नकार रही है। राज्य के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सोहराई पर्व के दौरान दुधि माटी से सजे घरों की दीवारों पर महिलाओं के हाथों के हुनर अब बमुश्किल से देखने को मिलते हैं।
सोहराय पर्व हमारे सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक है। यह पर्व पालतू पशु और मानव के बीच गहरा प्रेम स्थापित करता है। यह पर्व भारत के मूल निवासियों के लिए विशिष्ट त्योहार है, क्योंकि भारत के अधिकांश मूल निवासी खेती-बाड़ी पर निर्भर है। खेती-बाड़ी का काम बैलो व भैंसों के माध्यम से की जाती है, इसलिए सोहराय का पर्व में पशुओं की पूजा की जाती है. इस दिन बैलों व भैंसों को पूजा कर किसान वर्ग धन-संपत्ति वृद्धि की कामना करते हैं। यहां आज भी सोहराय कला प्राचीन मानवों द्वारा बड़े-बड़े नागफन चट्टानों में बनाए गए है। इसे शैल चित्र या शैल दीर्घा कहा जाता है। झारखंड में कई ऐसे स्थल हैं, जहां शैल चित्र पाए गए हैं। ये कलाकृतियां दर्शाती है कि प्राचीनकाल में यहां भी विकसित मानव सभ्यता थी। झारखंड में ऐसे शैल चित्रों की

बहुतायत थी। सिंहभूम तथा कैमूर पर्वत श्रृंखला में कई स्थानों पर शैल उत्कीर्णन के प्रमाण मिले हैं। हजारीबाग तथा रांची जिले के कुछ भागों में मिलनेवाली शैल चित्र कलात्मकता की दृष्टि से अत्यंत उत्कृष्ट श्रेणी के हैं।
रांची से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर टांगर-बसली नामक स्थान पर पहाड़ों के मध्य प्राकृतिक पत्थरों पर आकर्षक शैल चित्र पाए गए हैं, लेकिन उचित देखभाल न होने के कारण बहुमूल्य कलाकृतियां धीरे-घीरे नष्ट होती जा रही है। इसी तरह हजारीबाग से लगभग 45 किलोमीटर दूर बड़कागांव की घाटी में इस्को नामक गांव के समीप अवसारी पहाड़ी श्रृखंला की सती पहाड़ी पर नाग के फन की आकृतिवाली लगभग 2500 वर्गफीट की दीवार पर शैल चित्रों की श्रृंखला बनी हुई है। हजारीबाग में इस्को के अतिरिक्त प्लांडू तथा मंडेर नामक दो अन्य स्थानों पर भी शैल चित्र दीर्घा मिली हैं। ये शैल चित्र प्राचीनकाल में आदिमानव के निवास तथा उसकी विकसित सभ्यता तथा संस्कृति को रेखांकित करते हैं।
इन शैल चित्रों का प्रागैतिहासिक कालीन होना ही इसकी प्राचीनता को दर्शाता है। सबसे प्राचीन शैल कला का प्रमाण कॉवरेट (फ्रांस) में मिला है, जिसका समय 35000 वर्ष ईसा पूर्व माना गया है। मानव सभ्यता का विकास विभिन्न चरणों में हुआ। कई स्तरों पर पाषाण काल के

बाद धातु युग, पशुपालन तथा खेती का विकास हुआ। इसके साथ ही मानव सभ्यता तथा संस्कृति क्रमशः परिष्कृत होती गयी। आदिमानव ने विकास के विभिन्न चरणों में अलग-अलग स्थलों पर इन शैल चित्रों का निर्माण किया।
हजारीबाग क्षेत्र में पाए जानेवाले शैल-चित्र अपेक्षाकृत बाद के समय के प्रतीत होते हैं। यहां के पकरी, सिसिया आदि स्थान मेगालिथिक स्टोन ब्रीड क्षेत्र के अंतर्गत आते है। भारतीय पुरात्त्व सर्वेक्षण के अनुसार यह क्षेत्र 6000 वर्ष ईसा पूर्व का है। इस क्षेत्र में काम कर रहे कलाकर्मी श्री बुलु इमाम के अनुसार, इस्को में कोहबर गुफा निकट एक पॉलिस किया हुआ पाषाण सेल्ट प्राप्त हुआ है, जो 4000 वर्ष ईसा पूर्व का है।
पाषाणकालीन कलाकारों द्वारा निर्मित शैल चित्रों में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती है। इनमें सांकेतिक, प्रतीकात्मक, चित्र संबधी अमूर्त तथा निरपेक्ष चित्रों की बहुलता है। प्रकृतिवादी चित्रों में मुख्य रूप से आखेट का दृश्य, विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षी यथा गवल, घोड़ा, मवेशी तथा मैमथ आदि दिखाई देते हैं। इसी प्रकार इन शैल चित्रों में कई अन्य जीव जंतुओं को भी दर्शाया गया है। जैसे शेर, बैल, गदहा, सांभर, भेड़िया, लोमड़ी, खरगोष, मछली, रेंगनेवाले जीव आदि। इन सबके अलावा बिंदु, लकीर, चिह्न तथा प्रतीकों की बहुलता है।
वर्ष 1991 में गांधी फाउंडेशन, लंदन द्वारा ‘अंतराष्ट्रीय शांति पुरस्कार’ एवं ‘पद्म श्री’ से पुरस्कृत बुलु इमाम के द्वारा हजारीबाग के बड़कागांव से 45 किलोमीटर दूर इस्को की गुफाओं में चित्रों की खोज इस बात का प्रमाण है कि सामाजिक अवसरों की उत्तर जीविता तकरीबन दस हजार वर्षों से बनी हुई है। झारखंड के इस्को में पाए जानेवाले शैल दीर्घा के रूप स्वरूप को देखने से कई दृश्य उभरते हैं। यहां दाहिनी ओर से चित्र समूह को गौर से देखने पर प्रतीत होता है कि एक पुरोहित अपने आसन पर बैठकर अन्य आसन पर बैठे स्त्री-पुरूष को सूर्य आदि के चित्रों को भी दर्शाया गया है। इसी तरह शैल दीर्घा की बायीं ओर के चित्रों को देखने पर शिवलिंग का स्वरूप स्पष्ट दिखायी देता है। इसके अलावा यहां पान का पत्ता, तलवार, स्वास्तिक, जानवरों की बलि के लिए फांसा आदि के चित्र भी बड़े ही साफ ढंग से बनाए गए हैं। शैल चित्रों में इतनी विविधता निश्चित रूप से किसी उद्देश्य की तरफ इशारा करती है। इस लिहाज से हजारीबाग तथा निकटवर्ती जिलों के भौगोलिक क्षेत्र में बिखरी पड़ी मानव सभ्यता की अमूल्य निधियों को सहेजना सबकी जवाबदेही है।
शैल चित्र के मकसद के संबध में ठीक-ठीक कुछ कह पाना मुश्किल है। आरंभ में पुरा मानवशास्त्रियों की यह धारणा थी कि इसका निर्माण मूल रूप से सजावट की दृष्टि से किया गया होगा। गहन अन्वेषण के बाद विद्वानों के नजरिए में बदलाव आया। पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर कुछ लोगों की यह धारणा है कि चित्रयुक्त् गुफाएं पाषाणकालीन मानव के अस्थायी निवास स्थल थे, वहां रहने के दौरान उनलोगों ने शैल चित्रों को मूर्त रूप दिया। कुछ विद्वान शैल चित्रों के निर्माण का कारण पुरोहित द्वारा संपन्न धर्मानुष्ठान में भी खोजते हैं। झारखंड के संदर्भ में कुछ शोघकर्ताओं ने इन शैलचित्रों क मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता से जोड़कर सिंधु लिपि का होना मानते हैं। इतना ही नहीं इसके आधार पर गुढ़लिपि का अर्थ निकालने का प्रयास किया जा रहा है।
हजारीबाग के इस्को में मिलनेवाले इन शैल चित्र समूहों का विशिष्ट सामाजिक महत्व है। इस क्षेत्र में निवास करनेवाले विभिन्न समुदायों यथा कुरमी, कुम्हार, उरांव, संथाल आदि ने इसके सामाजिक मूल्यों को आत्मसात किया है। मिट्टी के घरों में रहनेवाले इन समुदायों के सदस्य विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक अवसरों पर इन शैलचित्रों की आकृतियों को अपने घर में उकेरते हैं। घर की बाहरी तथा भीतरी दोनों दीवारों पर प्राकृतिक रंगों के माध्यम से सामान्य दातुन की कुंची, कंघी आदि का प्रयोग कर इन चित्रों को बनाया जाता है। यहां के गांव शैल चित्रों की आकृतियों से पटे हुए अत्यंत आकर्षक लगते हैं। यह परंपरागत कला सामाजिक जीवन में जीवंत है।संस्कृति की इस विरासत को बचाकर रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। गांव के लोरा पशुओं को सुबह जंगल को ओर ले जाते है एवं अपराह्न में उनका अपने द्वार पर स्वागत करते हैं। इस क्रम में वे अपने घर के द्वार पर अरिपन का चित्रण करते हैं। अरिपन भूमि पर किया जाता है। जमीन को साफ कर उस पर गोबर-मिट्टी का लेप लगाया जाता है। फिर चावल के आटे से बने घोल से अरिपन का चित्रण किया जाता है। ज्यामितीय आकार में बने इन चित्रों पर चलकर पशु घर में प्रवेश करते हैं। यह चित्रण भी घर की महिलाओं के द्वारा ही किया जाता है। इन लोक कलाओं की शिक्षा हर बेटी अपनी माँ या घर की अन्य वरिष्ठ महिलाओं से पाती है। सोहराई चित्रों में दीवारों की पृष्ठभूमि मिट्टी के मूल रंग को होती है। उस पर कत्थई राल, गोद (कैओलीन) और काले (मैंगनीज) रंगों से आकृतियों बनायी जाती है। कोहवर एवं सोहराई चित्रों में विभिन्न आदिवासी समूह या उपजाति के अनुसार, थोडी भिन्नता पायी गईं है।
जनजातीय कलाओं की विशेषता इसका धार्मिक सांस्कृतिक पहलू है। सबमें सादृश्यमूलक तत्व की तरह मौजूद है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें समानता की वजह इसके प्राचीन प्रस्तरयुगीन संबध हैं, आखिर जनजातीय भाषाओं के बीच तो ऐसा प्रस्तरयुगीन साम्य है। इस पारंपरिक कला को माएं पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी बेटियों को सिखाती आई हैं। ऐसे गिने-चुने नामों में से एक नाम है रूकमणी देवी का। हजारीबाग जिले के बड़कागांव प्रखंड की रहनेवाली रूकमणी कहती है कि यह कला मैंने अपनी मां से सीखी थी और मां ने अपनी मां से। बकौल रूकमणी आदिवासी संस्कृति में इस कला का महत्व जीवन में उन्नति से लगाया गया था, तभी इसका उपयोग दीपावली और शादी-विवाह जैसे अवसरों पर किया जाता था। जिससे कि धन और वंश दोनों की वृद्धि हो सके। रूकमणी बताती है कि इस कला के पीछे एक इतिहास छिपा है। जिसे अधिकांश लोग जानते तक नहीं हैं। इसे मातृसत्तात्मक कला परंपरा मान सकते हैं। दामोदर के कोहवर और सोहराय गांवों की कला को यूनेस्को ने जीवित और सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी है।सोहराई पेंटिंग की खासियत है कि यह सकारात्मक गतिविधियों को ही दर्शाता है। इसमें कथा, कहानियां और लोक परम्पराओ को चित्रों के माध्यम से दर्शाया जाता है। प्राकृतिक सदभावना के विभिन्न स्वरूपों मानव, जीव-जंतु और पशु पक्षियों को एक ही चित्र में बनाकर वास्तविक जीवन के खुबसूरत दृश्यों को चित्रित करना इस कला की खासियत है। झारखंड की जनजातीय कला के रूप में लोग इसे वंश वृद्धि और फसल वृद्धि के रूप में चित्रित करता हैं। झारखण्ड के संथाल, मुंडा, असुर व बैगा जनजातियों में आज भी इस भित्ती चित्रकला का खास महत्व है। इस कला को घर की दीवारों पर उकेरने की परंपरा चली आ रही है।
बुलु इमाम के प्रयास से इस कला को सामाने लाने का एक ठोस प्रयास हो रहा है।इनके संस्कृति म्यूजियम में देश विदेश के कलाप्रेमी इस पारंपरिक कला की विशिष्टताओं से परिचित होते हैं। इन्होनें सोहराई कला को कैनवास और हैण्ड मेड शीट पर उकेरा। इन्होनें हजारीबाग में इस कला में पारंगत महिलाओं को एकजुट करके विदेशों में भी जाकर इसका प्रदर्शन किया और झारखण्ड की इस कला को विश्व पटल पर रखा। सालों पहले इमाम ने इस कला पर पढ़ना-लिखना शुरू किया और साल 1990 में छह महिलाओं को लेकर एक संगठन बनाया फिर कपड़े, कागजों के साथ दीवारों पर उनकी मेहनत को मांजा और अब वो वक्त आया है जब ढाई से तीन सौ महिलाएं सीधे तौर पर सरकारी-गैर सरकारी स्तरों पर इस काम से जुड़ गई हैं।
इस कला के लिए कार्य कर रहे हजारीबाग के बुलु इमाम बताते हैं कि इस प्राचीन कला की स्थिति वर्तमान में दयनीय हो गई है।उन्होंने बताया कि इस कला को हड़प्पा संस्कृति के समकालीन माना गया है। मान्यता है कि जिस घर की दीवारों पर कोहबर व सोहराई की पेंटिंग होती हैं, उनके घर में वंश और फसल वृद्धि होती रहती है।
हजारीबाग के मांडू की पुतली गंझू इस कला में माहिर हैं।उनकी कोहबर और सोहराई पेंटिंग आस्ट्रेलिया की आर्ट गैलरी ऑफ न्यू साउथवेल्स सिडनी में वर्ष 2000 में लगाई गई थी।वहां लगने वाली यह भारत की पहली पेंटिंग थी। मिलान, लंदन व जर्मनी में भी उनकी पेंटिंग को काफी सराहा गया। इसकी कला से जुड़ी हजारीबाग की पार्वती देवी ने भी इसे देश-दुनिया में मंच पर दिखाया है। सुप्रसिद्ध छायाकार वॉनशावन चार सालों के दौरान चार बार हजारीबाग के दौरे पर आयीं। अपने संग्राहलय के पास एक घर की दीवारों पर आकृतियों को दिखाते हुए कहते हैं कि पेरिस की प्रदर्शनी में यह शामिल है।
जानेमाने पत्रकार मार्कटली भी कुछ दिन पहले हजारीबाग आकर इन महिलाओं से मिले और इनके काम की तारीफ कर चुके हैं।
जाने माने कला समीक्षक एवं सूचना जनसंपर्क के उपनिदेशक आनंद के मुताबिक निःसंदेह इसका प्रसार बड़े पैमाने पर हो रहा है। केन्द्र से लेकर राज्य सरकार ने कई फैसले लिए हैं। हजारीबाग के दूरदराज के गांवों में इस पारंपरिक कला का व्यापक चलन है। परंतु स्थानीय स्कूली बच्चे ,सामान्य जन इस कला की विविधता,विशेषता एवं मूल स्वर से वाकिफ नहीं जान पड़ते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए बुलु इमाम के आलेख जो ‘‘हजारीबाग स्कूल आफ आर्ट’’ शीर्षक से लैप लैमबर्ट एकेडेमिक पब्लिशिंग,जमर्नी द्वारा प्रकाशित की गयी थी। उसका पुर्नप्रकाशन एक पुस्तिका के रूप में कराया है। इसका निःशुल्क वितरण किया जा रहा है।
बुलू इमाम के बेटे जस्टिन इमाम बताते हैं कि भित्ति चित्रों की कंघी से कटाई देखते बनती हैं।तब कला की बारीकियों को समझना बड़ा कठिन होता है।ग्रामीण महिलाओं तथा नई पीढ़ी की जनजातीय लड़कियों को इस कला की ओर वे प्रेरित करते रहे हैं।वे कहते हैं कि अब वे लोग विदेशी कला के साथ इस जनजातीय कला को जोड़कर फ्यूजन आर्ट पर काम कर रहे हैं, ताकि रोजगार के अवसर बढ़ें और युवा पीढ़ी भी हुनर का मर्म समझ सकें।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मन की बात में हजारीबाग रेलवे स्टेशन की दीवारों को सोहराय और कोहबर की पेंटिंग से सजाने की तारीफ करते हुए कहा कि स्वच्छता अब सौंदर्य के साथ भी जुड़ रहा है। गंदगी की चर्चा छोड़ स्वच्छता की चर्चा शुरू हो गयी है। हजारीबाग रेलवे स्टेशन पर देख रहा हूं कि आदिवासी महिलाएं, स्थानीय नागरिक, कलाकार, विद्यार्थी उसे सजाने में लगे हैं।
जहाँ पहले सरकारी दीवारे पीले रंग की या सफेद या फिर कोरी हुआ करती थी, वहीं अब उनपर कोहबर और सोहराई पेंटिंग के नमूने देखने को मिल रहे हैं। शुरू में इसे एक प्रयोग के तौर पर अपनाया गया लेकिन अब सभी सरकारी इमारतों की दीवारों पर सोहराय पेंटिंग दिख रही है, इससे स्वच्छ भारत अभियान का सपना भी पूरा करने में मदद मिल रही है। दरअसल कला एवं संस्कृति विभाग ने इसे एक प्रयोग के तौर पर शुरू किया। इसका सफल रूप सिमडेगा जिले में देखने को मिला। वहां की सभी सरकारी इमारतों की दीवारों को सोहराय के अलग अलग रंग से रंग गया। इसी के बाद अब पूरे राज्य में इसे अपनाया जा रहा है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने झारखंड की इस पहल को बेस्ट प्रैक्टिस के रूप में शामिल किया है। प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना के तहत बने घरों पर सोहराई पेंटिंग करने को देश अपनाएगा। यह वर्टिकल-4 के तहत बने मकानों पर लागू होगा। इसके तहत लाभार्थी को अपनी जमीन पर मकान बनाने के लिए केंद्र सरकार डेढ़ लाख रुपए और झारखंड सरकार 75 हजार रुपए देती है। झारखंड में प्रधानमंत्री शहरी विकास योजना को सोहराई पेंटिंग या फिर कई रंगों को मिलाकर आकर्षक बनाने की कवायद की जा रही है। ये देखने में काफी आकर्षक होते हैं। लखनऊ में आयोजित केंद्रीय शहरी विकास योजनाओं के राज्य पदाधिकारियों के सम्मेलन में इसे प्रस्तुत किया गया। इसकी देश भर के अधिकारियों ने प्रशंसा की। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने इसे बेस्ट प्रैक्टिस के रूप में शामिल किया है।

सोहराय को दुनिया के सामने लानेवाले बुलु इमाम को पद्मश्री
झारखंड के इतिहास में बुलु इमाम एक ऐसे शख्स हैं जो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। सरकार ने उनको समाज के प्रति योगदान के लिए अलंकृत करते हुए पद्मश्री से नवाजा है।सांस्कृतिक क्षेत्र में सराहनीय योगदान के लिए पद्मश्री पाने वाले झारखंड के बुलु इमाम का जन्म 31 अगस्त 1942 को हुआ। बुलू पर्यावरण कार्यकर्ता के तौर पर झारखंड में आदिवासी संस्कृति और विरासत को संरक्षित करते रहे हैं। इसके लिए उन्हें 12 जून 2012 को लंदन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में गांधी इंटरनेशनल पीस अवार्ड से सम्मानित किया गया। बुलू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे सैयद हसन इमाम के पोते हैं।
वे आज भी जनजाति कला एवं संस्कृति विरासत के संरक्षण के प्रति समर्पित एक कद्दावर पर्यावरणविद हैं। हजारीबाग के सांस्कृतिक म्यूजियम के माध्यम उन्होंने सोहराय और कोहवर आदिवासियों की कला संरक्षण एवं संवर्धन किया। बुलू इमाम साल 1987 से इंटक हजारीबाग चैप्टर के संयोजक रहे हैं। 1991 में उन्होंने इस्को में झारखंड की पहली चट्टान कला की खोज की। बाद में उत्तरी कर्णपुरा घाटी में दर्जन भर से अधिक चट्टान कला स्थल का खोज किया। 1993 में उन्होंने खोवर (विवाह) कला और मिट्टी के घरों की दीवारों पर चित्रित सोहराई (फसल) कला को दुनिया के सामने लाया। सोहराय को आस्ट्रेलिया के मेलबोर्न, सिडनी, फ्रांस, जर्मनी एवं यूके के कई शहरों के म्यूजियम तक पहुंचाया। कई शहरों में प्रदर्शनी लगाकर सोहराय आर्ट से देश- विदेश को अवगत कराया।आज भी ग्रामीण जीवन की कला को संरक्षित करते हुए भविष्य की पीढ़ी को इससे परिचित कराने के लिए प्रयासरत हैं।
1995 में जनजातीय कला को बढ़ावा देने के लिए हजारीबाग में संस्कृति संग्रहालय और आर्ट गैलरी की स्थापना की। उस सांस्कृतिक म्युजियम के जरिए पूरे झारखंड की संस्कृति को दर्शाने की कोशिश की गई है। हजारीबाग के बड़कागांव, सदर, कटकमदाग, विष्णुगढ एवं चुरचू सहित अन्य प्रखंडों में बिखरे पाषाणकाल के अवशेषों को अपने आवास पर बने संस्कृति म्यूजियम में सुरक्षित व संरक्षित करने का काम किया है।
ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और यूके में खोवर और सोहराय चित्रों की 50 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों का आयोजन किया। वह पुस्तक ब्राइडल केव्स के लेखक हैं। उन्होंने आदिवासी कला और संस्कृति पर कई फिल्में भी बनाई हैं।
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परिचय : लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.
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