पिघलता हिमालय और सूखता भारत

  •        मधुकर वनमाली

भारतवर्ष भागीरथ का देश है। हिमालय और गंगा का भी। जल से पूरित भूमि। नदियों को यहां माता का दर्जा दिया गया है। इन नदियों के उदगम स्थल गंगोत्री, यमुनोत्री और अमरकंटक हमारे लिए पवित्र तीर्थ स्थल हैं। भारत के अलावा शायद हीं ऐसा कोई देश होगा जो हिमनद (ग्लेशियर) को देवतुल्य मानता होगा। शायद‌ यह हमारे पूर्वजों की प्राकृतिक शक्तियों के प्रति गहन आस्था के कारण हो। पर इस तथ्य से इंकार नही किया जा सकता कि आर्यावर्त के प्राचीन निवासी पारिस्थितिकी के सभी जैव-अजैव घटकों में संतुलन को जरुरी मानते थे। अतः इस के संरक्षण का प्रयास उन्होंने ने इसे धार्मिक स्वरूप प्रदान कर किया था। अपने पवित्र पहाड़ों को बचाने के लिए हीं उन्होंने ने इन पहाड़ों के‌ शिखरों पर चढ़ने की भी मनाही कर रखी थी।

फिर साम्राज्यवाद , पूंजीवाद और वैश्वीकरण ने पूरब की आस्था के दीप को पश्चिमी कुतर्क की आंधी से बुझाना शुरू किया। मैकाले की शिक्षा नीति के द्वारा भारत में आधे अधूरे शिक्षित लिपिक तैयार किए जाने लगे। अपनी जड़ों से कटे इन अंग्रेजीदां लोगों ने अपने पूर्वजों के विश्वासों को नकार,शाश्वत खड़े कालजयी पहाड़ों को विकास की अंधी दौड़ में झोंक दिया। पहाड़ों के द्वार ,दून और मर्ग सब बड़े शहरों के नाम में प्रत्यय बन कर रह गए । शहरीकरण की इस अंधी दौड़ का नतीजा अब सामने है?

हिमालय के सनातन हिमनद पिघल रहे हैं। कई तो खत्म होने की कगार पर है। जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन का नकारात्मक प्रभाव अब दिखने लगा है। सब से अधिक नकारात्मक प्रभाव इन हिमनदों पर ही पड़ा है। इन के पिघलने की दर तेजी से बढ़ी है,जब कि हिमपात में कमी आई है। हिमालय में स्थित हिमनदों का ज्यादा बुरा हाल है। इसी गति से पिघलते रहने पर अगले सौ वर्षों में इनके पूरी तरह से समाप्त हो जाने की संभावना है। जलवायु परिवर्तन से इतर भूस्खलन,भूकंप,अल नीनो प्रभाव , प्रदूषण, वैश्विक तापन, कार्बन उत्सर्जन, कंक्रीट के जंगल, वनों की कटाई, ग्लेशियरों के पास बढ़ती मानवीय आवाजाही और मीथेन गैस की बढ़ती मात्रा भी इन हिमनदों के पिघलने का प्रमुख कारण है।

गंगा , सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसे प्रमुख और इन की सहायक नदियां भारत , पाकिस्तान, नेपाल ,भूटान तिब्बत और बर्मा के लिए ताजे जल का प्रमुख स्त्रोत है। ये नदियांँ हिमालय के अथाह हिमनदों से निकलने के कारण हीं सदानीरा रही हैं। हमारे धर्मग्रंथों में कलियुग में जीवनदायिनी गंगा के विलुप्त होने की भविष्यवाणी को हल्के में मत लीजिए। ग्लेशियरों के पिघल कर समाप्त हो जाने से गंगा हीं नहीं , बाकी सभी नदियों की भी यही दशा होगी। हो सकता है पहले कभी पौराणिक नदी सरस्वती भी इसी तरह विलुप्त हुई हो। उस के बाद आधुनिक राजस्थान का बड़ा हिस्सा थार के मरुस्थल में बदल गया होगा। अगर बाकी नदियों के साथ यह होता है तो सभी दक्षेस देशों के लिए यह भयानक जल संकट की स्थिति होगी।

इन के पिघलने के शुरुआती दौर में नदियों में भयानक बाढ़ आ सकती है। ये नदियां हीं वस्तुत: उत्तर भारत के विशाल मैदान के उपजाऊ पारिस्थितिकी तंत्र के लिए उत्तरदायी रही हैं। पहले बाढ़ एवं फिर सूखे से इस क्षेत्र की कृषि विनष्ट हो जाएगी। करोड़ों लोग अपनी आजीविका खो देंगे। इतनी बड़ी जनसंख्या की खाद्यान्न मांग को पूरा करना तो असंभव ही हो जाएगा।

भयंकर सूखे की स्थिति के साथ साथ उत्तर का मैदान बिजली की भी भारी किल्लत का सामना कर सकता है। कोयला स्त्रोत तो तब तक समाप्त हो हीं चुके होंगे। जलाशयों में जल स्तर की कमी से जल विद्युत उत्पादन भी काफी कम हो जाएगा। भूमिगत जल तो पहले से ही कम होगा ,उस के दोहन हेतु विद्युत ऊर्जा भी उपलब्ध नही होगी।

हिमनदों के पिघलने से समुद्री जल स्तर में वृद्धि होगी। भारतीय उपमहाद्वीप तटीय बाढ़ से गंभीर रूप से प्रभावित होगा। बांग्लादेश, मालदीव, मुंबई जैसे स्थानों पर खतरा अधिक है।

हिमनदों के पिघलने से हिमालयी क्षेत्रों में कृत्रिम झीलों का निर्माण होगा। यह जल अनुपयोगी तो होगा हीं,साथ हीं इन झीलों का घेरा टूटने से बाढ़/भूस्खलन की समस्या उत्पन्न होगी।

राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना भारत सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना है। इस में हिमालय की सदानीरा नदियों को प्रायद्वीपीय पठार की बरसाती नदियों से जोड़ने पर काम चल रहा है।  जब हिमालय की नदियां स्वयं सदानीरा न रह पाएंगी,तो यह योजना भी निरर्थक हो जाएगी।

सागरों में बड़े पैमाने पर स्वच्छ जल के मिलने से सागरीय लवणता में कमी आएगी,जिस से सागरीय जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। हिमनदों के पिघलने से जो आपदाएं आएंगी,वो किसी एक देश‌ की सीमा में सीमित नहीं रहेंगी। प्राकृतिक सीमा रेखा समाप्त होने से दक्षिण एशिया में नए सीमा विवाद उत्पन्न हो सकतें हैं। पड़ोसी देशों के बीच नदी जल बंटवारे के विवाद गंभीर हो , युद्ध में परिणत हो सकते हैं। अकाल और दुर्भिक्ष के बीच युद्ध की भयावहता अकल्पनीय सी ही लगती है,वह भी तब जब इस क्षेत्र में धार्मिक और जातीय आधार पर राष्ट्रों का उदय हुआ है। इन देशों में धार्मिक उन्माद पहले से ही चरम पर है।

निष्कर्ष यह है कि हिमनदों के पिघलने से भारत के जल संसाधन नकारात्मक रूप में प्रभावित होंगे। सरकारों को इस संकट से निपटने का समन्वित और साझा प्रयास करना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर भी जल प्रबंधन तात्कालिक सामाधानों को लेकर चलाया जा रहा है। दीर्घकालिक उपायों पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। जरुरत है जल जैसी अमूल्य संपदा को बचाने के लिए फिर से किसी भागीरथ प्रयास की।

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परिचच : सहायक विद्युत अभियंता, मुजफ्फरपुर,  बिहार

 

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