प्रसाद और बेनीपुरी के ऐतिहासिक नाटकों की चरित्र योजना :: डॉ शेखर शंकर मिश्र

प्रसाद और बेनीपुरी के ऐतिहासिक नाटकों की चरित्र योजना
– डॉ शेखर शंकर मिश्र

नाटक दृश्यकाव्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विधा है, जिसे ‘अवस्था की अनुकृति’ कहा गया गया है | नाटक की मुख्य संरचना नाट्य वस्तु पर ही निर्भर करती है, दूसरे शब्दों में नाट्य वस्तु विभिन्न घटनाओं के मध्य चरित्रों का कार्य व्यापार है | नाटक ऐतिहासिक हो या सामाजिक उसके मुख्य और सहयोगी चरित्र ही कथावस्तु को गति प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होते हैं | ऐतिहासिक नाटकों की सर्जना इतिहास विश्रुत कथानक और उक्त कालखंड से सम्बद्ध चरित्रों के आधार पर होती है किन्तु साहित्य और इतिहास में एक मौलिक अंतर है | नाटककार इतिहास की घटनाओं को ज्यों का त्यों अपनी नाट्यकृति में उपस्थित नहीं कर सकता | वह इतिहास का भी पुनर्सृजन करता है, जिसमें उसकी अपनी रचनात्मक कल्पनाशक्ति सहयोगिनी बनती है |

डॉ. सुरेन्द्रनाथ दीक्षित के शब्दों में- “इतिहास मानव-समुदाय के संघर्षों की प्रवहमान धारा है | उसके जीवन में झंझा और झकोरों से, गर्जन-तर्जन से, युद्ध और हिंसा से, सभ्यता और संस्कृति से, कला और सौन्दर्य से मानव जाति के इतिहास की रचना होती है |1

साहित्य और इतिहास पृथक-पृथक ज्ञानधाराएँ होते हुए भी एक दूसरे से असम्बद्ध नहीं हैं | इसलिए साहित्यकार हो या इतिहासकार दोनों को अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए दोनों विधाओं का सहारा लेना पड़ता है | साहित्य और इतिहास की अपनी अपनी मर्यादाएँ हैं | उनकी पृथक भावना, भाषा और भंगिमा है | इतिहासकार जहाँ केवल तथ्यों का आकलन करता है वहीं साहित्यकार या नाटककार इतिहास विश्रुत चरित्रों को भी अपनी कल्पना से परिष्कृत करने का प्रयास करता है | इस कारण इतिहास के कई खल चरित्र भी मानवीय बोध से संपृक्त होकर नये रूप में हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं और सदियों से निंदनीय चरित्र भी स्तुत्य हो जाते हैं | साहित्यकार कभी-कभी काल्पनिक घटनाओं को भी ऐसी जीवन्तता दे देता है कि उनमें सामाजिकों को ऐतिहासिक-सत्य का अनुभव होने लगता है | यह बात साहित्यकार की सर्जनात्मक प्रतिभा और उसकी कल्पना शक्ति पर निर्भर करती  है| साहित्यकार का इतिहासबोध जितना ही सजग होगा, उसकी रचना में उसी मात्रा में विश्वसनीयता आ पाएगी |

किसी भी ऐतिहासिक नाट्यकृति में इतिहास की घटनाओं का ब्योरेवार एवं तथ्यपूर्ण अंकन नहीं होता| नाटककार इतिहास के बिखरे पन्नों से अपने चरित नायक या नायिका के जीवन की कुछ प्रमुख घटनाओं का चयन कर उन्हें अपने नाटकीय कथासूत्र में पिरोता है | इस कार्य में वह अपनी कल्पना का पुट देकर ऐतिहासिक घटनाओं में कुछ परिवर्तन भी करता है तथा कुछ ऐसे चरित्रों का सृजन भी करता है, जिनका इतिहास में तो अस्तित्व नहीं होता किन्तु वे उन ऐतिहासिक चरित्रों के मध्य इस प्रकार घुल मिल जाते हैं कि इतिहास के उन कालखंडों के अनिवार्य अंगों की तरह दीखने लगते हैं | उन अनैतिहासिक चरित्रों के कारण पाठक भ्रम का शिकार होकर इतिहास में उसकी प्रामाणिकता के सूत्रों की खोज करने पर विवश हो जाता है | कई बार ऐतिहासिक नाटकों की कथावस्तु में अवस्थित मुख्य ऐतिहासिक चरित्रों के विकास में उन अनैतिहासिक चरित्रों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है |

डॉ. बच्चन सिंह ने लिखा है –“इतिहास-पुराण से इतिवृत्त ग्रहण करके भी नाटककार उसपर अपनी कल्पना की कूँची फेरता है, ऐसा करने में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कल्पना के समावेश से वृत्त की ऐतिहासिकता या पौराणिकता में किसी तरह का विकार उत्पन्न न हो|”2

जयशंकर प्रसाद और रामवृक्ष बेनीपुरी दोनों ही नाटककार इतिहास विश्रुत कथा-प्रसंगों और चरित्रों को अपने नाटकों के माध्यम से चित्रित करनेवाले हिंदी के महत्त्वपूर्ण नाटककार हैं | इन दोनों ही नाटककारों की अधिकांश नाट्य कृतियों की कथावस्तु ऐतिहासिक है | दोनों ही नाटककारों ने अपने ऐतिहासिक नाटकों की कथावस्तु के संयोजन में यथातथ्य इतिहास के साथ अपनी मौलिक कल्पना का भी सहयोग लिया है | ऐसा उन्होंने ऐतिहासिक इतिवृत्त के कलात्मक उपस्थापन के लिए किया है | कल्पना का यह योग एक ओर नूतन उद्भावनाओं की सृष्टि करता है तो दूसरी ओर नाटक के मूल लक्ष्य की प्राप्ति में भी सक्रिय रूप से सहयोगी होता है |

प्रसाद और बेनीपुरी ने अपने ऐतिहासिक नाटकों में कल्पना का जो पुट दिया है, उससे ऐतिहासिक इतिवृत्त में नूतन उद्भावनाओं की सृष्टि उनके उद्देश्यों के अनुरूप हुई है और उससे नाटकीय-अन्विति में पूर्णता आ गयी है | दोनों नाटककारों के ऐतिहासिक इतिवृत्त में कल्पना का जो प्रभावी योग दिखाई पड़ता है, वह या तो बिखरे हुए वृत्त-सूत्रों को संगठित, विकसित एवं एकान्वित करने के लिए हुआ है या पात्रों के शील-निरूपण के लिए अथवा पूरे ऐतिहासिक परिवेश के समग्र बोध के लिए | ऐसा करने के लिए उन्होंने अनेक काल्पनिक पात्रों तथा घटनाओं की सृष्टि की है | ऐतिहासिक चरित्रों के जीवन में उनसे सम्बद्ध इतिहास सम्मत घटनाओं और प्रसंगों के अतिरिक्त भी कुछ अन्य घटनाएँ नितांत कल्पना प्रसूत होती हैं किन्तु नाटककार का कौशल ही है, जो उन चरित्रों और घटनाओं को भी अपनी लेखन-कला से विश्वसनीय बना देता है | प्रसाद के ‘स्कंदगुप्त’ शर्वनाग,चक्रपालित और मातृगुप्त तथा बेनीपुरी कृत ‘अम्बपाली’ नाटक के अम्बपाली तथा अजातशत्रु जैसे चरित्रों में नाटककार ने अपनी कल्पना शक्ति का पर्याप्त उपयोग किया है | प्रसाद और बेनीपुरी दोनों ही नाटककार नाटकीय प्रवाह और अन्विति के लिए ऐसी घटनाओं और चरित्रों का सृजन करते हैं | ऐसे प्रसंगों की उद्भावना  मुख्य चरित्रों के विकास के लिए की जाती है |

बेनीपुरी का ऐतिहासिक दृष्टिकोण उतना गहन, इतिहास सम्मत नहीं है, जितना प्रसाद का | बेनीपुरी की ऐतिहासिक नाट्यवस्तु में कल्पना का योग अधिक है | उनके ऐतिहासिक चरित्र इतिहास के सम्बद्ध कालखंडों की उपज भले ही हों किन्तु बेनीपुरी ने इतिहास से अलग भी उन्हें एक मौलिक स्वरूप प्रदान किया है, जो उक्त ऐतिहासिक चरित्र से कई मानवीय कारणों से अलग  दिखाई देते हैं| प्रसाद ने सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय साहित्य, धर्म एवं दर्शन, इतिहास एवं पुरातत्त्व का गहन अध्ययन किया था | यही कारण है की उनका इतिहास का ज्ञान बेनीपुरी की अपेक्षा अधिक गहन एवं प्रामाणिक है |

हिंदी की नाट्य परंपरा भारतेंदु हरिश्चंद्र के पश्चात् अगर किसी व्यक्तित्त्व की ऋणी है तो वह है जयशंकर प्रसाद का व्यक्तित्व | प्रसाद ने हिंदी नाट्य साहित्य को पहली बार भारतीय संस्कृति और इतिहास से जोड़ा | उन्होंने साहित्य में प्रायः उपेक्षित होती भारतीय संस्कृति को अपने ऐतिहासिक नाटकों के द्वारा नया जीवन प्रदान किया |

रमेशचन्द्र शाह के अनुसार “भारतीय पुनर्जागरण की उस सांध्य चमक के दिनों में देश के अतीत के चित्र ही सबसे ज्यादा दर्शकों की भावनाओं को जगानेवाले हो सकते थे | वह राजनीतिक उथल-पुथल का समय था | संस्कृति की समस्याएँ उपेक्षित प्राय थीं और राजनीतिक समस्या ही सब पर हावी थी  राष्ट्रीयता, देश-भक्ति, विदेशी शिकंजे से देश को आज़ाद करने का संघर्ष, एकता का और सामूहिक जागरण का स्वप्न यही उनदिनों की प्रेरक शक्तियाँ थीं और इन्हीं को प्रसाद जी ने अपने नाट्य लेखन की प्रेरणा के रूप में नियोजित किया |”3

इतिहास मानव समुदाय के संघर्षों का कालबद्ध और यथातथ्य अंकन होता है | कला की किसी भी विधा में इतिहास का यथातथ्य अंकन संभव नहीं, नाटक प्रदर्श्य कला का सबसे प्रखर उदाहरण है किन्तु यहाँ भी इतिहास का सीधा और अविरल प्रस्तुतीकरण संभव नहीं | कई बार इतिहास की घटनाएँ और चरित्र सम्बद्ध युग में जिस रूप में अवस्थित होते हैं, उनके ऊपर मानवीय कमजोरियों की धूल की एक परत भी जमी होती है | कालान्तर में ऐतिहासिक चरित्रों के ऊपर जमी धूल विचारधाराओं की हवा से साफ़ हो जाती है | ऐतिहासिक चरित्रों का एक भिन्न मानवीय चेहरा दृष्टिगत होता है, जो इतिहास से बाहर लोकप्रियता अर्जित करता है | सहृदय समाज इसी परिवर्तित चेहरे को ह्रदय में स्थान देकर उससे प्रभावित होता है तथा उसे अपना आदर्श बनाकर अपने हृदय में प्रतिष्ठित करता है | यह कला की विभिन्न विधाओं में कलाकार के कौशल के कारण ही संभव हो पता है | साहित्य और इतिहास में यही अंतर होता है कि साहित्य-सरिता में स्नात होकर इतिहास के निंदनीय पात्र भी स्तुत्य हो जाते हैं | मगर साहित्यकार को ऐसा करने के लिए कुछ नितांत कल्पना प्रसूत घटनाओं और चरित्रों की सृष्टि करनी पड़ती है | यह इतिहास के तथ्यों से छेड़-छाड़ नहीं है बल्कि उसे परवर्ती युग में प्रासंगिक बनाए रखने का एक साहित्यिक उपक्रम है |

प्रसाद एक सर्वमान्य ऐतिहासिक नाटककार हैं | किन्तु उनके नाटकों की ऐतिहासिक कथावस्तु में कई स्थलों पर नवीन उद्भावनाओं का समन्वय भी मिलता है | अतीत को आधार मानकर भी प्रसाद ने अपनी नाट्यवस्तु में वर्तमान की कहीं भी उपेक्षा नहीं की है | अतीत और वर्तमान का यही समन्वय उनके नाटकों के कथानक की मूलभूत विशेषता है

डॉ. सुरेन्द्रनाथ दीक्षित ने लिखा है –“उनके नाटकों में भारत की सभ्यता और संस्कृति ही नहीं,आर्यों के जातीय जीवन की गौरवगाथा, तुमुल कोलाहल और संघर्ष, उत्थान-पतन, हर्ष-विषाद जय-पराजय सबकी प्रांजल अभिव्यक्ति हुई है | यह सारी साहित्य-सृष्टि आर्य-जाति की महायात्रा में एक बेचैन तलाश है, जो असत् से सत्, अन्धकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरता की ओर बढती आई है|”4

जयशंकर प्रसाद के बाद रामवृक्ष बेनीपुरी इतिहास के जीर्ण प्रस्तरों में अपनी लेखनी से नया अर्थ प्रदान करने वाले एक ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने इतिहास के कथा-सूत्रों में वर्तमान की समस्याओं का समाधान ढूँढने का प्रयास किया है |

बेनीपुरी के नाटकों में इतिहास मात्र उज्ज्वल चरित्रों के चयन का माध्यम भर है वह नाटककार का लक्ष्य नहीं | अर्थात् वहाँ नाट्यवस्तु चरित्र योजना की सहयोगिनी है |

प्रसाद के अधिकांश नाट्य चरित्र उदात्त गुणों से संपन्न हैं और वे भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं | प्रसाद ने इतिहास के अनुरूप पात्रों की सर्जना तो की ही, साथ ही इतिहास के सत्य से सर्वथा जुड़े तथा वर्तमान की विषम परिस्थितियों के अनुरूप कुछ नवीन पात्रों की परिकल्पना एवं उद्भावना भी की, जिनमें नयी चेतना का समावेश कर उन्होंने उन्हें प्राणवंत बनाया है | ये पात्र उनके विचारों एवं जीवन-दर्शन के जीवंत विग्रह हैं | प्रसाद ने उत्पाद्य चरित्रों की अवतारणा इस प्रकार की है कि वे इतिहास के सत्य से भी अधिक सजीव, मुखर और समर्थ लगते हैं | यही कारण है कि उनके पात्रों की विश्वसनीयता असंदिग्ध हो जाती है |5

प्रसाद के नाट्य चरित्र विशेष रूप से ऐतिहासिक नाट्य चरित्रों का वैशिष्ट्य इस बात में भी है कि वे बाहर से बहुत कुछ समान दीखते हैं किन्तु जब हम नाटकीय कथावस्तु में उनके विकास पर गौर करते हैं तब कई अर्थों में उनका एक अलग वैशिष्ट्य दृष्टिगत होता है | स्वातंत्र्य चेतना से अनुप्राणित प्रसाद के नारी और पुरुष चरित्रों का महत्व अलग से रेखांकित करने योग्य है | प्रसाद के ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक के चन्द्रगुप्त, चाणक्य, सिंहरण, अलका तथा ‘स्कंदगुप्त’ नाटक की देवसेना, बन्धुवर्मा, पर्णदत्त, चक्रपालित, तथा ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक के चन्द्रगुप्त, मंदाकिनी एवं ‘राज्यश्री’ के हर्षवर्धन, राज्यश्री आदि की चरित्र- सर्जना राष्ट्रीयता और मानवता की उच्च भूमि पर हुई है |

प्रसाद के चरित्रों में महत्वाकांक्षा प्रबल है किन्तु कई स्थलों पर उनमें मानवीय दुर्बलताएँ भी दिखाई देती हैं | ‘अजातशत्रु’ नाटक में प्रसाद ने अजातशत्रु और विरुद्धक के चरित्र को समानांतर रखने की चेष्टा की है | किन्तु चरित्र-स्वातंत्र्य की दृष्टि से विचार करने पर दोनों चरित्रों की नाटकीय परिस्थितियाँ बहुत कुछ समान होते हुए भी कुछ निजी विशेषताओं के कारण दोनों में मौलिक अंतर भी स्पष्ट दीखता है | अजातशत्रु में महत्वाकांक्षा प्रबल है फिर भी वह आतंरिक दुर्बलताओं से मुक्त नहीं है | उसकी तुलना में विरुद्धक आत्मकेंद्रित और अहंवादी नहीं है बल्कि उसमें साहस, आत्मनिर्भरता और अपने भाग्य का स्वयं नियामक होने का भाव अत्यधिक प्रबल है | अनंतदेवी, छलना, सुरमा और विजया प्रारम्भ से भले ही महत्वाकांक्षिणी नारियों की भूमिका में उपस्थित होती हैं किन्तु कथावस्तु के विकासक्रम में वे भी मानवीय धरातल पर आकर खड़ी होती हैं और सामाजिकों की सहानुभूति अर्जित करती हैं | प्रसाद ने अपने प्रत्येक नाटक में कुछ ऐसे नारी-चरित्रों की सृष्टि की है निश्छल प्रेम, त्याग और उदात्त मानवीय गुणों के स्मरणीय हो गयी हैं |

रामवृक्ष बेनीपुरी के ऐतिहासिक नाटकों की चरित्र-योजना की प्रसाद से भिन्न्तर अपनी मौलिकता है | उनके ऐतिहासिक चरित्रों का विकास पूर्णतः मानवीय भावभूमि पर हुआ है | बौद्ध-स्रोतों से गृहीत अम्बपाली के जीवन वृत्त को नाटककार ने समकालीन राजनीतिक-सामाजिक जीवन के सन्दर्भ में अपनी मौलिक कल्पना के योग से सृजित किया है | बेनीपुरी की अम्बपाली सर्वप्रथम अरुणध्वज की समर्पित प्रेमिका है उसके बाद एक कर्तव्यनिष्ठ राजनर्तकी, जो समय आने पर एक वीरांगना और मानव-सेविका के रूप में ढल जाती है |

अपने समय की अनिन्द्य सुन्दरी, वैशाली की वह राजनर्तकी, जिसके चरणों पर हज़ार-हज़ार राजमुकुट लोटा करते हैं | एक ओर जहाँ उसके अल्हड़ यौवन और चंचल अंगों में ऐसा सम्मोहन और ऐसी मादकता है कि भगवान बुद्ध को भी अपने भिक्षुओं को उसके सामने आँख मूँद लेने का निर्देश करना पड़ा, वहीं उसमें प्रेरणा और स्फूर्ति का अजस्र स्रोत भी है, जिसे पाकर वृज्जी अपने शत्रुओं से लोहा लेने को कृत संकल्पित हुए |अम्बपाली जहाँ एक उदात्त मानवीय नारी चरित्र है, वहीं उसमें कुछ मानवीय दुर्बलताएँ भी हैं | अरुण उसके प्रेम में पागल हो जाता है किन्तु वह अपने पद की गरिमा नहीं भूलती | किन्तु युद्ध में वैशाली की पराजय और अम्बपाली की रक्षा में तत्पर अरुणध्वज की मृत्यु उसे तोड़ देती है |

डॉ. बच्चन सिंह के शब्दों में –“प्रवज्या-ग्रहण के मूल में अरुणध्वज की अतिशय करुण मृत्यु और भगवान बुद्ध के प्रति प्रबल आकर्षण का उदात्तीकरण (सब्लिमेशन) है |” ‘अम्बपाली’ नाटक के भगवान बुद्ध अहिंसा, शान्ति और मानव कल्याण के प्रवर्तक हैं | प्रस्तुत नाटक में वे सर्वाधिक महान चरित्र हैं, जो मानवीय छल-छद्मों से सर्वथा अलग विषय-वासनाओं और भव बाधाओं से निर्लिप्त, दिव्य आभा सम्पन्न एक अनुकरणीय व्यक्तित्व हैं | उन पर विजय की अभिलाषिनी अम्बपाली भी अंततः उनकी अनुगामिनी बन कर प्रवज्या ग्रहण करती है | प्रारम्भ में संघ में नारियों का प्रवेश वर्जित था | बुद्ध संघ के प्रचार-प्रसार में अम्बपाली की उपादेयता समझते हुए भी नारियों के प्रवेश से भयाक्रांत थे | इस कारण अम्बपाली को दीक्षा देकर वे स्वयं की पराजय मानते हैं | यह नाटककार की मौलिक स्थापना है, जिसके माध्यम से उन्होंने अम्बपाली के चरित्र की श्रेष्ठता प्रमाणित करने की चेष्टा की है | अजातशत्रु एक निरंकुश, रूपलिप्सा ग्रस्त, क्रूर सम्राट है | अम्बपाली के रूप के प्रति  आकर्षण ने उसे विवेकहीन बना दिया है | वह वैशाली पर विजय के उपरांत जब अम्बपाली के पास पहुँचता है तो अम्बपाली उसे उसके पिता मगधपति बिम्बसार के बारे में बताती है | अजातशत्रु पराजय की भावना से ग्रस्त हो जाता है और लौट जाता है |

जब हम प्रसाद के नाटकों के चरित्रों से बेनीपुरी के चरित्रों की तुलना करते हैं तो पाते हैं कि दोनों में मौलिक अंतर है | प्रसाद के ‘अजातशत्रु’ नाटक के बुद्ध उदात्त गुणों से संपन्न एक दिव्य महापुरुष हैं | वे सर्वथा इतिहास सम्मत हैं, जिनके चरित्र में प्रसाद ने यथासंभव अपनी दृष्टि से आधुनिकता का भी समावेश किया है | ‘अम्बपाली’ नाटक में बेनीपुरी ने अम्बपाली के चरित्र को उभारने के क्रम में बुद्ध के व्यक्तित्व को कमजोर कर दिया है | प्रसाद ने ‘अजातशत्रु’ नाटक में बिम्बसार के चरित्र को अपेक्षित महत्व दिया है किन्तु बेनीपुरी के ‘तथागत’ में बिम्बसार का चरित्र अधिक विस्तार नहीं पा सका है | प्रसाद के ‘स्कंदगुप्त’ की देवसेना, विजया और अलका का सम्मिलित-समन्वित रूप हमें बेनीपुरी की अम्बपाली में देखने को मिलता है | प्रसाद की अलका आर्यभूमि की स्वतंत्रता के लिए स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ती है | बेनीपुरी की अम्बपाली भी जातीय गौरव-गरिमा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होती है और रणक्षेत्र में युवकों को प्रोत्साहित करती हुई स्वयं भी सशस्त्र उतर जाती है | प्रसाद के ‘स्कंदगुप्त’ नाटक की अनंतदेवी अपनी कठोरता और ईर्ष्या के कारण बेनीपुरी के ‘नेत्रदान’ नाटक की तिष्यरक्षिता से तुलनीय है | प्रसाद के ‘चन्द्रगुप्त’नाटक का चन्द्रगुप्त नाट्यशास्त्र में वर्णित धीरोदात्त नायक के सभी गुणों से सम्पन्न है | उसमें त्याग, कुलीनता, उदारता, तेजस्विता और वीरता जैसे सभी वरेण्य गुणों की अवस्थिति है | बेनीपुरी के ‘विजेता’ नाटक के प्रारम्भ में चन्द्रगुप्त इस बात से अपरिचित है कि उसकी शिराओं में राजकुल का रक्त है | चाणक्य ‘टीले के बाल राजा’ को अपने उद्देश्य-पूर्ति का माध्यम बनाते हैं | चाणक्य के स्वप्नों और आदर्शों को विजेता चन्द्रगुप्त ने पूरा किया | उसके राज्य में बारह वर्षों तक भीषण दुर्भिक्ष पड़ता है | चन्द्रगुप्त इसका दोषी स्वयं को मानते हुए पद त्याग देता है | साठ दिनों तक निर्जल, निराहार रहकर भूख पर विजय प्राप्त करता है और ‘विजेता’ बनता है | प्रसाद के ‘चन्द्रगुप्त’नाटक का चाणक्य कथानक में मेरुदंड की भाँति है | वह विलक्षण बुद्धि का एक प्रतिभावान कूटनीतिज्ञ ब्राह्मण है | वह शुद्ध ब्राह्मण शक्ति का सर्वोत्कृष्ट दृष्टांत है | बेनीपुरी के ‘विजेता’का चाणक्य भी इतिहास सम्मत अपने व्यक्तित्व से इतर नहीं है | किन्तु नाटक में कथावस्तु के विकासक्रम में वह नृशंसता, छल-छद्म और क्रूरता का प्रतीक बन जाता है | प्रसाद ने चन्द्रगुप्त को मोरिय सेनापति का पुत्र माना है, जबकि बेनीपुरी ने उसे राम और बुद्ध की वंश-परम्परा में शाक्यवंशी-सूर्यवंशी राजपुत्र माना है | दोनों ही नाटकों में चाणक्य के प्रभावशाली व्यक्तित्व के समक्ष चन्द्रगुप्त का चरित्र स्वतंत्र रूप से उभर नहीं पाता | ऐसा कहा जा सकता है कि दोनों ही नाटककार चाणक्य के समक्ष चन्द्रगुप्त के चरित्र के साथ न्याय नहीं कर पाए |

प्रसाद और बेनीपुरी दोनों ही नाटककारों में ऐतिहासिक नाटकों की रचना का अतुल्य कौशल है | प्रसाद ऐतिहासिक घटनाओं का यथातथ्य विवेचन करते हैं | वे ऐतिहासिक चरित्रों के स्थापन और विकास के लिए अनैतिहासिक और काल्पनिक चरित्रों का सृजन करते हैं | उन अनैतिहासिक चरित्रों को ऐतिहासिक चरित्रों के समीप इस प्रकार रखते हैं कि उनके मध्य परस्पर वैचारिक व्यावहारिक संवाद सुलभ हो जाते हैं और ऐतिहासिक चरित्रों के साथ वे भी आचरण और व्यवहार में उनके साथ ढलने लगते हैं और अंततः इतिहास के ही अंग बन जाते हैं | इतिहास के उस कालखंड में हो सकता है उनकी उपस्थिति न हो किन्तु इतिहास में उनकी जगह नाटककार बना देता है | सामाजिकों को नाटककार का यह पूर्णतः कल्पना प्रसूत चरित्र इतिहास का स्वाभाविक अंग लगने लगता है | अनैतिहासिक चरित्रों के स्थापन में बेनीपुरी का कौशल भी प्रसाद से बहुत अलग नहीं किन्तु प्रसाद के चरित्रों में एक भावात्मक दृढ़ता है वे प्रसाद के नियंत्रण से बाहर नहीं जाते | प्रसाद के अधिसंख्य अनैतिहासिक नारी चरित्रों में यह बात देखने को मिलती है | बेनीपुरी के अनैतिहासिक नारी चरित्र उनके हाथों से स्वतंत्र होकर अपना स्वाभाविक विकास करते हैं | ‘अम्बपाली’ नाटक की मधूलिका इसका उदाहरण है | प्रसाद के अनैतिहासिक नारी चरित्रों का सृजन सोद्देश्य हुआ है | नाटक के ऐतिहासिक चरित्रों से प्रसाद की जो अपेक्षाएँ हैं, प्रसाद उसकी क्षतिपूर्ति अनैतिहासिक नारी चरित्रों के माध्यम से करते हैं | ऐसे नारी चरित्र भले ही नाटककार की कल्पना से प्रसूत होते हों किन्तु वे नाटककार की मानस-संतति हैं | नाटककार अपनी नाट्यकृति से जो अपेक्षाएँ रखता है, वह जो समाज और सामाजिकों को सन्देश देना चाहता है, वह इन्हीं चरित्रों के माध्यम से देता है | ऐतिहासिक चरित्र इतिहास के उक्त कालखंड में कहीं सबल तो कहीं आसन्न परिस्थितियों के कारण निर्बल भी हो सकते  हैं, ऐसे में ये अनैतिहासिक चरित्र उनमें साहस भरने और उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित करने का काम करते हैं |
……………………………………………………………..
सन्दर्भ-ग्रन्थ सूची

1. प्रसाद के नाटकों में मानव संघर्ष, डॉ. सुरेन्द्रनाथ दीक्षित, बेला, वर्ष-8, अंक–9-10 (संयुक्तांक),1989, पृष्ठ-23
2. कथावस्तु, डॉ. बच्चन सिंह, हिंदी साहित्य कोश, भाग-1, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी,1985, पृष्ठ-160
3. जयशंकर प्रसाद, रमेशचंद्र शाह, साहित्य अकादमी, पृष्ठ-44
4. साहित्य देवता जयशंकर प्रसाद, डॉ. सुरेन्द्रनाथ दीक्षित, परिषद् पत्रिका, प्रसाद जन्मशती विशेषांक, वर्ष-29, अंक -1-2, अप्रैल –जुलाई 1989, पृष्ठ-36
5. प्रसाद और बेनीपुरी के ऐतिहासिक नाटक, डॉ.राजेन्द्र साह, पृष्ठ-128
6. वही, पृष्ठ-138
7. हिंदी नाटक, डॉ. बच्चन सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1975, पृष्ठ-138
…………………………………………………………
परिचय : लेखक चर्चित कवि हैं. फिलहाल एमपी सिंह साइंस कॉलेज, मुजफ्फरपुर में हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर हैं.

Related posts

Leave a Comment