बलात्कार एक सामाजिक अपराध बनाम बीमार समय और समाज : संजीव जैन

बलात्कार एक सामाजिक अपराध बनाम बीमार समय और समाज
   हम जिस समय और समाज में रह रहे हैं वह अपने सामूदायिक दायित्वों की पूर्ति की दृष्टि से बीमार है और निरंतर अपाहिज होते जाने की ओर बढ़ रहा है। इस बीमारी के लक्षण दैहिक तो हैं ही, इसमें तो कोई शक है ही नहीं, परंतु मानवीय अभिवृत्तियों और मनोवृत्तियों का विश्लेषण हमें चौंका देता है कि दर असल हम कहां जा रहे हैं?
   बीमार समाज के सबसे महत्वपूर्ण लक्षण हैं, हिंसा और बलात्कार। स्त्रियों के प्रति बलात्कार और फिर क्रूरतम तरीकों से हिंसा की घटनाएं जिस तरह से देश में बढ़ रहीं हैं यह बढ़ता हुआ ग्राफ हमारे पूरे समाज के गंभीर रूप से विक्षिप्त होते जाने के लक्षण हैं। सच तो यह है कि हम आपराधिक समाज की ओर बढ़ते जा रहे हैं।
   बलात्कार और हिंसा को तात्कालिक रुप से रोकना और अपराध होने पर सजा देना कानून का काम है‌। समाज और परिवार भी ऐसे लोगों को अपने तरीके से सजा दे सकता है और हमें सजा देना चाहिए। परंतु इतने मात्र से अपराध रुकने या कम होने की संभावना बिल्कुल नहीं है। दरअसल हमें इस पर गंभीरता से सोचना और  विचारना होगा कि स्त्रियों के प्रति यह मनोविकृति कैसे पैदा हो रही है और बढ़ रही है? बीमारी यह है कि हम इस स्थिति के पैदा होने के कारणों का विश्लेषण करने की स्थिति में भी नहीं है?
   बलात्कार और हिंसा को व्यक्तिगत अपराध मानकर उनसे निपटने की बात करना बहुत हल्के में लेना है इस समस्या को। यह अपराध सामाजिक अपराध हैं। यह विकृति हमारी समाज के बीच से पैदा होती है। स्त्री को मात्र दैहिक उत्तेजना पूरी करने का साधन मानना और उसे अंजाम देना हमारी सामाजिक सोच का परिणाम है। हमारा समाज स्त्री को व्मक्ति की गरिमा प्रदान नहीं करता और एक वस्तु की तरह उसके साथ व्यवहार करता है इस कारण उसके साथ बलात्कार की और हिंसा जैसी बर्बतायें घटित होती हैं।
   हम इस तरह की घटनाओं पर संदर्भों दो चार दिन बहस करते है और फिर अगली घटना होने तक सब शांत हो जाता है।   मैं इस पर थोड़े अलग ढंग से अपनी बात रखने की कोशिश कर रहा हूं।
   मैं सिक्किम की यात्रा पर गया था। वहां हमारा कार ड्राइवर राम था। जिसकी शादी होने वाली थी। हम उसके साथ सात दिन रहे। जब हमने उससे वहां लड़कियों के बारे में पूछा तो उसने बताया कि हमारे यहां कभी भी बलात्कार तो संभव ही नहीं, छेड़छाड़ भी असंभव है। वहां लड़कियों के साथ सामान्य रूप से छेड़छाड़ की घटनाओं भी नहीं होती। किसी भी स्त्री को रात को अकेले जाने आने में (जंगल में या) कहीं भी जाने में कोई डर नहीं लगता। वहां के थानों में कभी भी इस तरह के अपराध के मामले दर्ज नहीं होते। सवाल है क्यों?
   हमें उसकी बात पर बहुत आश्चर्य हुआ। जबकि वहां शराब टैक्स फ्री है और सभी ‘बार’ लड़कियों के द्वारा चलाये जाते हैं। इसके बावजूद वहां कोई घटना नहीं होती।
   सवाल है ऐसा कैसे होता है? हमने उससे बातचीत में वहां के समाज में स्त्रियों की स्थिति के बारे में जानकारी ली। तो उसने बताया कि वे दहेज में लड़की वालों से कुछ लेते नहीं बल्कि उनके परिवार को कुछ कीमती चीज देकर आते हैं। वहां लड़की को वस्तु की तरह व्यक्तिगत संपत्ति नहीं समझा जाता। वहां के लोग लड़कियों का सम्मान करते हैं। उनकी वैयक्तिक गरिमा का ख्याल रखते हैं। उन्हें एक मानवीय इकाई माना जाता है। स्त्री न वहां देवी है न भोग्या। वह पुरुष के बराबर है समान धर्मा‌। इसलिए वहां नारी के प्रति अपराध न्यूनतम हैं या नहीं हैं।
   समझने की बात यही है कि जब तक हमारे समाज में लड़कियों को वस्तु मानकर उनका लेन-देन होता रहेगा तब तक ऐसी घटनाओं को रोकना असंभव है। लड़कियों को मानवीय और बराबर की इकाई नहीं माना जायेगा तब तक उनके साथ रबड़ की गुड़िया की तरह बर्ताव बंद नहीं होगा।
दहेज देने का मतलब है कि लड़की वस्तुओं के साथ खरीदी बेची जा सकती है। यह सोच लड़कियों को वस्तु की तरह समाज में रखती है। जो लोग इतना क्रूर व्यवहार करते हैं उनसे बातचीत की जाये तो पता चलेगा कि उनके लिए लड़की सिर्फ एक देह है। जैसे मुर्गी को खाना उनका अधिकार है वेसे ही लड़कियों को भोगना उनका अधिकार है। वे कहते हैं कि लड़कियां हैं ही इसीलिए। यह बात हमारा समाज कदम कदम पर अनेक तरीकों से व्यवहार में लाता है। इसलिए बलात्कार एक सामाजिक अपराध है।
   जब हमारे संचार और मनोरंजन के माध्यम लड़कियों को तंदूरी चिकन बनाकर गर्म गोश्त की तरह प्रस्तुत करते हैं तब हम मजे लेते हैं। यह जो सोच है वहीं से लड़कियों के प्रति हिंसा हमारे अंदर भर जाती है। यही सोच बलात्कार और हिंसा की घटनाओं को अंजाम देने के लिए उकसाती है। हमें इस तरह की सोच से लगातार संघर्ष करना होगा।
   पूरी दुनिया में जिन समाजों में लड़कियों को एक चीज की तरह नहीं देखा जाता और उसका संपत्ति के साथ लेने देने नहीं किया जाता उन समाजों में लड़कियों के साथ बलात्कार और हिंसा न्यूनतम है या नहीं है। इसका संबंध शिक्षा से नहीं है और न कपड़ों से है। केरल सौ प्रतिशत साक्षरता है पर संज्ञेय अपराध की दर भी सबसे ज्यादा वहीं है। जबकि नागालैंड में साक्षरता बहुत कम है। वहां संज्ञेय अपराध भी सबसे कम हैं।
   हम बुद्धिजीवियों को समाजों का अध्ययन करके यह बताना चाहिए कि अपराध के वास्तविक कारण क्या हैं? कपड़े पहनने या रात को जाने आने से इनका संबंध नहीं है। यदि ऐसा होता तो फिल्मी तारिकाएं सबसे कम कपड़े पहनतीं हैं तो बलात्कार उनके साथ होना चाहिए पर ऐसा नहीं होता।
    हमें नेताओं और मीडिया के स्टेटमेंट से परे वास्तविक कारणों पर बहस करनी चाहिए।
   निजी संपत्ति की अवधारणा ने हमारे परिवारों में लड़कियों को भी संपत्ति की तरह का दर्जा दे दिया है। जब तक लड़कियों को संपत्ति की तरह किसी न किसी रूप में माना जाता रहेगा तब तक बलात्कार और बर्बरता होती रहेगी। बलात्कारी को सजा देना एक अलग मसला है जो प्रशासन और न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में है। इससे अपराध नहीं रुकेंगे।
   अपराध घटित ही न हो यह वातावरण बनाना हम सब की जिम्मेदारी है। यही सही न्याय होगा कि किसी भी स्त्री के साथ किसी भी रूप में बलात्कार और हिंसा न हो। न्याय अपराधी को सजा देना नहीं है। यह तो अपराधोत्तर प्रक्रिया है। न्याय का मतलब बराबरी और समयमान से जीने देने का अधिकार है। यह अधिकार सबको हर समय मिले यह न्याय है। हम सामाजिक और सामूदायिक रूप से अपने आसपास लोगों को जागरूक करें। लड़कियों की गरिमा की रक्षा हर जगह और हर समय करने का प्रयास करें। युवाओं से इसके लिए बातचीत करें।
   अपने आसपास मनोविकृति को पनपने न दें। यही न्याय है।
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– लेखक चर्चित आलोचक व समीक्षक हैं

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