रचनाकार स्मरणः ‘अंधेरे में रोशनी की सेंध’ की कवयित्री :: डॉ रमेश ऋतंभर

रचनाकार स्मरणः ‘अंधेरे में रोशनी की सेंध’ की कवयित्री

“रश्मिरेखा का नाम समकालीन साहित्य के पाठकों के लिए अपरिचित नहीं है। उनकी टिप्पणियाँ और कविताएँ लगातार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं और मेरे जैसे पाठकों का उन्होंने ध्यान आकृष्ट किया है।लम्बे समय से रचनारत इस युवा कवयित्री का यह पहला संग्रह है ‘सीढ़ियों का दुख’। अपने नाम की व्यंजना की तरह संग्रह की अधिकांश कविताओं में भी एक स्त्रीसुलभ गहरा विषाद देखा जा सकता है, परंतु यदि इतना ही होता तो कोई खास बात न थी। मुझे जो विशेष बात दिखाई पङी वह यह कि अपनी सीधी-सादी बनावट में ये कविताएँ दूर तक असर करती हैं। एक और अच्छी बात मुझे यह लगी कि ये कविताएँ उतना ही बोलती हैं जितना उन्हें बोलना चाहिए।इस तरह इस कवयित्री ने मितकथन का अपना एक अलग ठाट तैयार किया है। जीवन की छोटी-छोटी चीजें जैसे-चटाई, चाबी, कटोरी इत्यादि के द्वारा जीवन के बङे अर्थों को सम्प्रेषित करने की एक सधी हुई कोशिश दिखाई देगी। अगर इस संग्रह की एक पंक्ति के द्वारा कहना चाहें तो इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ एक स्त्री रचनाकार के द्वारा ‘अंधेरे में रोशनी की सेंध’ लगाती कविताएँ हैं-उम्मीद से भरी सोचती हुई कविताएँ।”
-स्मृतिशेष प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह, दिवंगत कवयित्री के कविता-संग्रह ‘सीढ़ियों का दुख’ के फ्लैप से.

रोशनदान
– रश्मिरेखा

कमरे में स्याह अँधेरा था
मैं खोज रही थी सूई
आँखों ने दे दिया था जवाब
आसपास नहीं थी कोई माचिस की तीली
नहीं था रोशनी का कोई दूसरा हिसाबो-किताब
कि तभी चमका
ईशान कोण में धूप का चकत्ता
मैंने जाना उसी दिन ‘रोशनदान’ का मतलब
अँधेरे में रोशनी की सेंध लगाने की बेचैनी।
●●● -‘सीढ़ियों का दुख’ कविता संग्रह से.

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