रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य और उनकी जीवन चेतना : राजीव कुमार झा

रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य और उनकी जीवन चेतना

– राजीव कुमार झा

रामधारी सिंह दिनकर आधुनिक काल के भारतीय लेखकों में अग्रगण्य हैं. उन्होंने अपने काव्य लेखन और गद्य चिंतन से हिंदी लेखन को विशिष्ट धरातल प्रदान किया और कविता में यथार्थवादी प्रवृत्तियों के समन्वय से अपने समय और समाज के तमाम संकटों और सवालों को लेकर गहरे चिंतन  की ओर साहित्य को उन्मुख किया . दिनकर के काव्य में यथार्थ और कल्पना का अद्भुत समन्वय है . उनकी प्रारंभिक काव्य रचनाओं में युवाकाल के उमंग और उत्साह का स्वर समाया है और इस काल में कवि का मन अपने देश में विदेशी शासन के प्रति भी आक्रोश से भरा दिखायी देता है . ओज और पौरुष दिनकर के काव्य के प्रमुख गुण कहे जाते हैं . इस प्रकार वे सामाजिक राजनीतिक चेतना से सम्पन्न कवि माने जाते हैं . दिनकर के काव्य संग्रहों में रेणुका , हुंकार , रसवंती ,सामधेनी का नाम उल्लेखनीय है . इसके अलावा रश्मिरथी और कुरुक्षेत्र भी इनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियाँ हैं . रामधारी सिंह दिनकर की काव्य कृति ‘ उर्वशी ‘ को आधुनिक भारतीय काव्य लेखन की विशिष्ट कृति के रूप में देखा जाता है . इसमें कवि ने उर्वशी और पुरुरवा की प्रेमकथा के माध्यम से काम और जीवन के सौंदर्य की अद्भुत कथा का बखान किया है . भारतीय सभ्यता और संस्कृति से दिनकर का गहरा प्रेम था और उनकी पुस्तक ‘ संस्कृति के चार अध्याय ‘ में उन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विविध रचनात्मक पहलुओं  की विवेचना की है . इस पुस्तक की जवाहरलाल नेहरू के द्वारा लिखित लंबी भूमिका भी पठनीय है . उनके साहित्य में समाज के शोषित वर्ग के लोगों के प्रति सहानुभूति का भाव प्रवाहित हुआ है . बिहार के शेखपुरा के बरबीघा के गाँधी उच्च विद्यालय में दिनकर कुछ काल तक प्राचार्य के रूप में कार्यरत रहे थे और इस विद्यालय के परिसर में उनकी सुंदर आदमकद प्रतिमा स्थापित की गयी है . अपने बरबीघा प्रवास के दौरान उनकी इस प्रतिमा के दर्शन का सौभाग्य मुझे भी मिला . दिनकर अगाध विद्वान थे और उनकी विद्वता का सम्मान करते हुए बिहार सरकार के द्वारा उन्हें भागलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति भी बनाया गया .

भारतीय संस्कृति में सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश

.प्राचीन काल से हमारे देश की संस्कृति में सांप्रदायिक सद्भाव को जीवन की मूल सामाजिक चेतना के रूप में देखा समझा गया है और यहाँ की विभिन्न संस्कृतियों के समन्वय से भारत की राष्ट्रीय संस्कृति का विकास हुआ है . इसीलिए स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यहाँ धर्मनिरपेक्षता को शासन व्यवस्था के बुनियादी तत्व के रूप में देखा गया और सभी धर्मों और पंथों के प्रति सम्मान के भाव को यहाँ के समस्त निवासियों के कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया . इस प्रकार हमारे समाज में सह अस्तित्व की भावना ही सामाजिक जीवन का आधार है . यहाँ बहुसंख्यक हिंदू धर्मावलंबियों के अलावा इस्लाम धर्म को मानने वाले मुसलमानों के अलावा बौद्ध , जैन और सिक्ख धर्म के अनुयायियों की भी मौजूदगी है और भारत की राष्ट्रीय संस्कृति के विकास में इन सभी धर्मों में समाहित जीवन मूल्यों की रचनात्मक भूमिका रही है . यहाँ मनुष्य को कुल – जनपद – राज्य – राष्ट्र – संसार की ईकाई के रूप में देखा गया है और समग्रता में एकात्मक रूप में समस्त जीवन संस्कृति का विवेचन किया गया है . वेद हमारे देश के प्राचीन ग्रंथ हैं और इनमें समुदाय और जीवन के प्रति संकीर्णता की जगह उदारता का समावेश है . इसी तरह औपनिषदिक चिंतन भी जीवन के प्रति उदात्तता का परिचायक है और अपनी व्यापकता में बौद्ध और जैन धर्मों ने भी तमाम रूढियों और कट्टरता की जगह ज्ञान और विवेक के आसन पर हमारी जीवन संस्कृति को आसीन किया . ब्रिटिश काल में हमारे देश के स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर करने के लिए औपनिवेशिक शासकों ने सांप्रदायिकता को अपना हथियार बनाया और हिंदू – मुस्लिम भेदभाव का जहर यहाँ फैलता चला गया इसकी वजह से देश विभाजन की त्रासदी का सामना हमें करना पड़ा . आज भी आये दिन सांप्रदायिक तनाव की खबरें प्रकाश में आती हैं और अंतत: इससे देश का नुकशान होता है . हमारे देश के संविधान में सबको समान अधिकार प्रदान किया गया है और अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा के प्रावधान बनाये गये हैं . इसलिए सरकार और जनता के बीच पारस्परिक विश्वास को कायम करके ही हम अपने सामाजिक – सांस्कृतिक जीवन को सुखी और समृद्ध बना सकते हैं

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लेखक की कई रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं

मो. 8102180299

 

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