रामवृक्ष बेनीपुरी  की जीवन दास्तान
                                 – मंहथ राजीव रंजन दास
छात्र जीवन मे ही महात्मा गांधी के आह्वाहन पर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ना ,किसान आंदोलन से जुड़ते हुए ,समाजवाद की अलख जगाने के साथ साथ अपनी लेखनी से आज़ादी के आंदोलन में अपने आप को झोंक दिए ।करीब 9 साल जेल की काल कोठरी में बिताए ।अंत समय तक पूरे शरीर मे ,अंग्रेजों की हुकूमत में बरसाए गए ,कोड़ों के दाग ‘गुलाम भारत ‘की तस्वीर बयां करता रहा ।
  इन सेनानियों ने किस किस तरह के सपनों को देखा और हकीकत में क्या हुआ ?
  खुद बेनीपुरी जी की ही कलम से  उनके विधायक जीवन की ही एक शुरुआती घटना से समझा जा सकता है ।बाद के दिनों में तो राष्ट्रपति द्वारा शिलान्यास किया ‘बागमती कॉलेज ‘ को भी सत्ता ने बागमती में ही डुबो दिया ।
“कहाँ फंस गए बेनीपुरी “
रामवृक्ष बेनीपुरी की डायरी बताती है कि यह चलन  1957 में
भी था।हालांकि कुछ जेपी आंदोलनकारियों ने भी वह काम 1977 में किया था।
  पर,बहुत सारी बातों क ‘श्रेय’ आप स्वतंत्रता सेनानियों  के अलावा किसी अन्य को नहीं दे सकते।
जिस तरह आजादी के तत्काल बाद साठी की जमीन पर कई प्रमुख कथित गांधीवादियों ने कब्जा शुरू कर दिया था,उसी तरह सरकारी मकानांे पर भी।
 1957 में कटरा नार्थ से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी  के विधायक बने ‘कलम के जादूगर’ बेनीपुरी जी के शब्दों में पढि़ए उस समय का आंखों देखा हाल और भोगा हुआ यथार्थ !!
‘क्वार्टर के लिए स्पीकर से मिला।
उन्होंने कहा ,किसी खाली मकान में घुस जाइए।
सुनकर चकित हुआ और स्पष्ट कह दिया,मुझसे यह नहीं होगा।
यदि जिन्दगी में यही करना होता तो , फिर आज मकान की क्या कमी होती ?
जहां जाऊंगा,डंका बजाकर जाऊंगा।
यह घुसने – घुसाने की मेरी आदत नहीं रही है।
उन्होंने एक दरखास्त लिखवाई।इस्टेट अफसर ने आर.ब्लाॅक में एक मकान मेरे नाम अलाॅट किया।
किन्तु जब उस मकान में गया ,एक अजीब बात !
वहां एक हारे उम्मीदवार का परिवार है।बातों में उन्होंने कहा कि रात टेलिफोन से बात करके भोर में खबर दूंगा।
भोर में देवेन्द्र गए,तो पाया ,एक दूसरे एम.एल.ए.साहब वहां आसन जमाए हुए हैं।
  संध्या को गया ,तो पाया, मकान के बाहरी दरवाजे पर मोटे -मोटे ताले लटक रहे हैं और भीतर कोलाहल है।
सामने के एक मकान में एक मित्र रहते हैं।उनसे बातें करने लगा।बीच -बीच में । खिड़कियां खुलती थीं-रोशनी होती थी,फिर खिड़की बंद,रोशनी गायब !
  मित्रों ने बड़े दिलचस्प दास्तान सुनाए। यहां यही होता है।लोग घर छोड़ते नहीं,यहां तक कि किराए पर उठा देते हैं।जिनके नाम पर अलाॅट हुआ ,जब तक वे जबर्दस्ती नहीं करते,कोई टस से मस नहीं होता !
बेचारे चांद बाबू ऐसे शरीफ आदमी को भी जबर्दस्ती पर उतारू होना पड़ा था।
दस -पंद्रह आदमियों के साथ पहुंचे ,घर में घुस गए ,तब कहीं वहां रम पाए।
  एक देवी जी अभी -अभी एक मकान में पिछले दरवाजे से घुस गईं हैं ! सीढ़ी लगा कर भीतर आती -जाती हैं।अभी बाहर ताला ही लटक रहा है।
  एक सज्जन किसी प्रकार घर छोड़ने को तैयार नहीं हुए ,तो उन पर सरकार ने नालिश की,बिजली का संबंध काट दिया,पानी का संबंध काट दिया।
तो भी दो साल तक डटे रहे !
   एक सज्जन को मेरी ही तरह हाल में मकान मिला।किन्तु जो सज्जन पहले से थे, वे हटने को तैयार नहीं।
तब एक दिन एक तमाशा लोगों ने देखा।पहले सज्जन एक ट्रक लोगों को ढोल झाल के साथ ले आए और भीतर घुस कर ऐसा शोर करने लगे कि दूसरे सज्जन को निकल भागना पड़ा।
 बेनी पुरी ,तुम भी यही करोगे ?
जिस विधान सभा के सदस्यों की यह हालत है,वहां से कोई अच्छा विधान कैसे निकल सकेगा ?
भगवान इस राज्य के रक्षक तुम्हीं हो ! और स्वराज्य की रूपरेखा यही है !
 कांग्रेस पार्टी के नेता के चुनाव में क्या -क्या नहीं हुआ है ?
श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू में चालीस वर्षों की दोस्ती थी।
दोनों ऐसे लड़े कि कुत्ते भी मात !
कौन -कौन से कुकर्म नहीं किए गए।लाखों रुपए बंटे,सदस्यों की चोरी हुई।
कुछ बेचारे पिट भी गए।दिल्ली से लोग आए,शांत कहां तक करते ,आग लगा कर गए।
किसी तरह श्रीबाबू जीत गए !
 अब मंत्रिमंडल को लेकर छीछालेदर मची हुई है।
पटना-दिल्ली एक हो रहा है।
चारों ओर अराजकता है।जनता ने लड़  मर कर स्वराज्य लिया।वह स्वराज्य ऐसे हाथों में पड़ा है कि उसकी छीछालेदर हो रही है !
  गांधी जी ने कहा था,कांग्रेस को तोड़ दो।दिन -दिन सिद्ध हो रहा है,सारे अनर्थों की जड़ यही है।
 गांधीवादी भूदान में लगे हैं।नेहरूवादी शासन को हथिया कर जमे हैं।
बेचारी जनता जहां की तहां मौन-मूक खड़ी है !
 और मेरे ऐसे आदमी एम.एल.ए.होकर भी सड़क की धूल फांक रहे हैं !

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