श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / अमनुआ और मैं :: राहुल शिवाय

अमनुआ , यही कहता था मैं उसे, आखिर था भी मेरा लाडला.. अमन से मेरी पहली पहचान उसकी लघुकथाओं और दोहे के माध्यम से हुई थी.. मात्राओं की गड़बड़ी, भाव का बिखराव, पर स्वयं को स्थापित करने की एक चाह .. पहली नज़र में मैं इन्हें ही देख पाया था.. अमन से सात वर्षों के संबंध में बहुत सारे यादगार संस्मरण हैं.. मुझे याद है अरुणिमा सिन्हा( जो उसके ही जिले की थी) के एवरेस्ट पर चढ़ने के बाद वह किस प्रकार एवरेस्ट पर चढ़ने की ज़िद कर बैठा था तब मैंने उसे समझाते हुए पूछा था कि एवरेस्ट पर चढ़ने वाले दूसरे, तीसरे या बाद के लोगों का नाम क्या तुम्हें याद है? उसने उत्तर में नहीं कहा था , फिर मैंने कहा चढ़ना है तो साहित्य का एवरेस्ट चढ़ो और इस तरह से चढ़ो कि समय के शिलापृष्ठ पर अपना निशान छोड़ दो। तब उसका मासूम सा उत्साह भरा जवाब, भय्या जरूर.. मैं दस साल में आपसे बड़ा साहित्यकार हो जाऊँगा.. मैंने उसके गाल को छूते हुए कहा था कि बच्चों के बढ़ने से बड़ों को खुशी ही होती है..

मैं वर्ष २०१६ तक कुरुक्षेत्र में रहा करता था। इस दौरान अम्बाला से गरीब रथ से जब भी बेगूसराय लौटता, वह मुझसे पाँट मिनट की मुलाकात के लिये लखनऊ स्टेशन पर खड़ा रहता था। ट्रेन चाहे कितनी भी लेट हो जाये वह बिना मिले और अपने हिस्से की किताब लिये बिना नहीं जाता था। चाचा जी कस्तूरी झा कोकिल की किताबों सहित मेरी प्रारम्भिक किताबों पर उसने कई समीक्षाएँ लिखीं…
उसके कारण ही मैं कीर्ति शेष अनीस तांडवी (उसके गुरु) , डाॅ हरि फ़ैज़ाबादी, चेतन दुबे ‘अनिल’, ज्ञान प्रकाश आकुल, चन्द्रेश शेखर, शाहबाज तालिब, सहित अनेक ऐसे लोगों से जुड़ पाया, जो आज मेरे बहुत करीब हैं.. कविताकोश के प्रारम्भिक कार्यक्रमों ( अनीस तांडवी की याद में, लखनऊ शायरी फेस्टिवल आदि) में उसका योगदान सबसे ज्यादा रहा.. अमन की प्रतिभा और सीखने की ललक का सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि उसने मेरी मातृभाषा (अंग क्षेत्र की भाषा अंगिका) में भी क्षणिकाएँ लिखीं हैं.. अमन की तारीफ करने वाले लोगों में कीर्तिशेष अनवर जलालपुरी, डाॅ दरवेश भारती, अनिरुद्ध सिन्हा, डाॅ विष्णु सक्सेना जैसे अनेकों साहित्यकारों को मैं जानता हूँ… ऐसा नहीं था कि अमन हर जगह परिपक्व था, बचपना उसके अंदर भरा पड़ा था। कुछ दिन पहले ही मुझसे लड़ा था और फिर मनाने के लिये ३ सितम्बर २०१९ को वह जबरदस्ती अपने कमरे पर भी ले गया था। उस दिन ही उसने अपनी पहली पुस्तक की चाह मेरे सामने रखी थी, पर साहित्य का यह अभिमन्यु सांतवे द्वार को भेदने में असमर्थ रहा। काल को यह मंजूर नहीं था .. चूंकि उसकी सर्वाधिक लिखी सामग्री मेरे इनबाक्स में ही संग्रहित है, इसलिये भी मेरा दायित्व बनता है कि मैं अपने अमनुआ की इच्छा पूरी करूँ…
उसकी पुस्तक का नाम ‘अमन तुम्हारी चिट्ठियां’ उसके प्रसिद्ध दोहे से ली गयी है-
अमन तुम्हारी चिट्ठियां, मैं रख सकूं सम्भाल।
इसीलिये संदूक से, गहने दिये निकाल।।

इस कार्य में उसके सर्वप्रिय दोहाकार और भय्या महेश मनमीत, मित्र के. पी. अनमोल, गरिमा सक्सेना और डाॅ हरि फ़ैज़ाबादी (जिन्हें वह चाचाजी कहता था) का साथ मुझे मिल रहा है और सैकड़ों लोगों ने साथ देने की इच्छा जतायी है। यह ही तो है अमनुआ का कमाया हुआ धन, मान जो इस छोटी उम्र में एवरेस्ट चढ़ने जैसा ही है।

-राहुल शिवाय

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