श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / हिंदी ग़ज़ल का युवा चेहरा अमन :: अनिरुद्ध सिन्हा

श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / हिंदी ग़ज़ल का युवा चेहरा अमन :: अनिरुद्ध सिन्हा

रोक सकते हो तो रोको मजहबी तकरार को
खून यूँ बहता रहा तो ये सदी मर जाएगी

 

नफ़रतों की तीरगी फैली हुई है हर तरफ
प्यार के दीपक जलें तो तीरगी मर जाएगी

बहुत से दशकों तक विश्व शांति के लिए,सामाजिक हित,प्राकृतिक विधान और सामाजिक अनुबंध की सामान्य धारणा के घटक के रूप में राजनीति परिभाषित होती रही। अपनी सादगी और मानवी चिंतन पर आस्था के कारण लोगों को आकर्षित भी करती रही।यह वह नींव थी जिस पर जीवन और सामाजिक व्यवस्था का भवन खड़ा था।ऐसी धारणा थी कि राजनैतिक प्रवृति ही मानवता को शांति,सुरक्षा और सहयोग की परिस्थितियों के अंतर्गत आगे की सामाजिक प्रगति की असली संभावना एवं क्षमता प्रदान कर सकती है।

लेकिन आज की सारी राजनीतिक विचारधाराएँ आदर्श के कब्र में जाकर आदर्श की साँसें तलाश कर रही हैं। इसे संयोग कहा जाए या विचारधारा का अंत। निराशा और अंधकार के क्षितिज गहराते जा रहे हैं।प्रचार की मिथ्या गाथाओं का खेल चल रहा है। इन मिथ्या गाथाओं से जीवन दिनों-दिन उत्तेजित होता जा रहा है। वर्गवादी विचारधाराएँ उन क्रिया-कलाप को जिन्हें पहले चंद हिंसक आंदोलन द्वारा सम्पन्न किया जाता था अब मंचों के माध्यम से सामने आ रही हैं। निःसन्देह यह रवैया समूचे समाज के हितों को पूरा नहीं करता। जनता को भ्रम में डालकर,अपनी नीतियों का उपयोग कर निजी हितों की पूर्ति के लिए सत्ता फलों को हड़पने की कोशिश के सिवा कोई सामूहिक हित का फल सामने नहीं आता।
इसका हल विमर्श से तथा व्यवहार से निपटने से ही संभव है,ताकि राजनीति एक ऐसा आधार बने जिसमें दबी हुई आकाक्षाएँ,जरूरतें,हित आदि का समन्वित रूप देखने को मिले, जो सामूहिक सामाजिक शक्ति के रूप में काम आ सके।
अमन चांदपुरी का पहला शेर इसी चिंता का प्रकटीकरण है। शेर में किसी एक विशेष पक्ष पर आरोप नहीं है,भविष्य की संभावना की ओर लक्ष्य है। आज के जिस वातावरण को देखा और महसूस किया है उसे भावनात्मक औए सृजनात्मक रूप में रख दिया है। यह इनका प्रवाह और शब्दावली संकेत का प्रकार्य ही तो है “खून यूँ बहता रहा तो ये सदी मर जाएगी”
यह सुनकर बुरा तो लग सकता है,पर हम जानते हैं यह सच है। जो आज हो रहा है,वह ठीक नहीं है। इन्होंने जो शंका जाहिर की है वह कोई सारांश नहीं बल्कि आज के हालात का आलोचनात्मक तर्क है।
दूसरे शेर में भी कुछ इसी तरह की ध्वनि है आज हम लोगों की आदत हो गई है कि स्वयं को एक विशेषण साथ खुद को दूसरे के समक्ष प्रस्तुत करतना”हम क्या हैं” और यही वह विशेषण है जो हमलोगों एक दूसरे से अलग करता है। इस तरह के विशेषण का सामाजिक जीवन में कोई अस्तित्व नहीं होना चाहिए । यह विभाजन का एक खतरा है। इस खतरे को हमें नहीं भूलना चाहिए। विशेषण एक दंभ है। दंभ किसी भी समाज के लिए बुरी है,हमें दंभ के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए। एक दूसरे के प्रति गहरे आदर की भावना पैदा करनी चाहिए,और एक क्षण भी आपसी रिश्ते को सोचने पर बाध्य नहीं करना चाहिए। बस यही सोचना चाहिए। “प्यार के दीपक जलें तो तीरगी मर जाएगी “

युवा कवियों की यह विशेषता है कि अगल-बगल जो भी धुंधलके हैं,वे पहचान लेते हैं। जो कुछ हमारे पीछे है,हम बिल्कुल देख नहीं देख सकते और इसलिए उसका वर्णन भी नहीं कर सकते। मगर तरुण कवियों/लेखकों में यह विशेषता होती है हमारी छोड़ी हुई चीजों को भी पकड़ लेते हैं उनका वर्णन करने में सफल हो जाते हैं। मेरे ख़्याल से नई चेतना की खोज तरुण युवाओं में ही करनी चाहिए। युवाओं का नई जीवन पद्धति से सीधा संपर्क होता है।
ठीक ही कहते हैं अमन चांदपुरी —–
वक़्त नदिया का बहता पानी है
गर न संभले तो ये बहा देगा
————————————–
ये दुनिया दर्द की मारी बहुत है
यहाँ रहने में लाचारी बहुत है
यह युवा ग़ज़लकार कम उम्र में ही चिंतन से लेखन तक का लंबा सफ़र तय कर लिया है,जो अपने दृष्टिकोणों की बहुत-सी असंगतियों को तथा भ्रमों का दृढ़तापूर्वक विरोध करते हुए जीवन के सत्यपरक चित्रण के साथ अपने लेखकीय दायित्व को पूरा करने में सफल हुआ है।
ज़रूरत है शब्दों के चयन के प्रति गंभीर और सावधान रहने की।
ग़ज़ल
———
किसी भी शेर में अच्छा बुरा क्या
बस इतना देखिए किसने कहा क्या

अभी इंसां तो बन पाए नहीं हो
बनोगे आदमी से देवता क्या

सितारों में ये कैसी खलबली है
फ़लक पर आ गया सूरज नया क्या

किताबों से उसे फुर्सत नहीं थी
वो पढ़ता आपका चेहरा भला क्या

तुम्हारी ही तरह हो जाऊँ यानी
बदल लूँ मैं भी अपना रास्ता क्या

तरक़्क़ी कर रहा है मुल्क़ बेशक
तरक़्क़ी ने ग़रीबों को दिया क्या

अमन हम तो फ़क़ीर-ए-इश्क़ ठहरे
फकीरी में खसारा फ़ायदा क्या

 

Related posts

Leave a Comment