संस्मरण :: बाघ की गुर्राहट सुन पेड़ पर कटी रात

बाघ की गुर्राहट सुन पेड़ पर कटी रात!

– बिभेष त्रिवेदी, वरीय पत्रकार

यह बनौली फारेस्ट गेस्टहाऊस है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के बड़े परिसर में बेतिया राज का गेस्टहाऊस। यहां शिकार के लिए आने वाले अंग्रेज अधिकारियों की मेजबानी की जाती थी। आजादी के बाद बेतिया राज का जंगल वन विभाग को सौंपा गया। इसी कैंपस में डीएफओ और रेंजर के भी आवास हैं। कैंपस में घुप अंधेरा पसरा है। बीच-बीच में अलग-अलग प्रजातियों के चिड़ियों की आवाज। शायद वे एक-दूसरे से कह रही हैं- तू इत्मीनान से सो जा, मैं पहरा दे रही हूं। दूर-दूर पर दूधिया रोशनी वाले लैंप पोस्ट कोहरे को चीर रहे हैं, लेकिन अंधेरे के सामने बेबस हैं। दूर से कभी-कभी कुत्तों के भौंकने की आवाज आती है। उसी आवाज में गीदड़ की आवाज विलुप्त हो जाती है। कुछ अजीब आवाजें मैं पहचान नहीं पा रहा हूं।
कुत्तों की आवाज सुनकर मुझे बेतिया के फोटोग्राफर छोटेलाल भगत की बात याद आ रही है। छोटेलाल के पिता होमगार्ड के जवान थे। वाल्मीकि नगर के जंगल में किसी फारेस्ट आफिस में उनकी तैनाती थी। एक रात कुत्तों के भौंकने के बाद बाघ की गुर्राहट सुनाई दी। छोटेलाल के पिता और दो अन्य जवान पेड़ पर चढ़ गए। कुछ ही देर में बाघ प्रगट हुआ। तीनों जवानों ने पेड़ पर ही रात गुजारी थी।
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में कई दुर्लभ प्रजाति के जीव-जंतु अकस्मात दिख जाते हैं। खासकर हिरनें तो कहीं भी दिख जाती हैं। अगर छोटेलाल की बातों पर विश्वास करें, तो जहां हिरन दिखाई दे, वहां बाघ के पहुंचने की आशंका बनी रहती है। ऐसी रोमांचक कथा सुनाने वाला छोटेलाल आज बेतिया लौट गया।मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में फोटोग्राफी के बाद शीघ्र तस्वीरें भेजने के लिए उसका लौटना जरूरी था। मैंने मुख्यमंत्री की सभा से गेस्टहाऊस लौटकर यहीं खबर लिखी। शाम के पांच बजे मैं आज का टास्क पूरा कर लिया । हिमालय की गोद में ठंड अधिक है। रास्ते में कोहरे की आशंका का अनुमान करते हुए मैंने रात में छह घंटे की यात्रा को (मुजफ्फरपुर लौटने का प्रोग्राम) सुबह तक के लिए टाल दिया है।
आज करीब 25 फीट की ऊंचाई पर ट्री काटेज में अकेला हूं। अपने बिहार में ऐसे काटेज की रात में रोमांचित हूं। करीब 50 फीट की दूरी पर गेस्टहाऊस है। नेपाली शैली की दो मंजिली कोठी के चारों ओर लकड़ी का पोर्टिको, बरामदे, टेरेस और बालकनी! लेकिन कोठी के बजाय काटेज में रात गुजारने का मजा ही कुछ और है।
करीब 35 फीट की दूरी पर खड़े आम के दो विशालकाय पेड़ों पर लकड़ी के काटेज का निर्माण कराया गया है। करीब 75 फीट ऊंचे आम के जिस पेड़ पर प्लेटफॉर्म बना है, उसकी मोटाई की माप दो हट्टे-कट्टे इंसान अपने हाथ जोड़कर नहीं ले सकते हैं। मैं इतने ऊंचे, मोटे और निरोग आम के पेड़ पहली बार देख रहा हूं। प्लेटफॉर्म पर चढ़ने के लिए लोहे की चक्करदार सीढ़ी बनी है। सीढ़ियों से चढ़कर प्लेटफॉर्म पर पहुंचे तो 35 फीट दूर आम के दूसरे विशाल पेड़ पर बने काटेज तक जाने के लिए लकड़ी-लोहा का झूलता हुआ पुल बना है। चलते समय जब पुल झूले की तरह झूलता है तो रोमांचक अनुभूति होती है।
कल रात इस गेस्टहाऊस में काफी चहल-पहल थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की निकटवर्ती चंपापुर गांव में सभा ( जागरूकता सम्मेलन) की पूर्व संध्या पर अधिकारियों की जमघट लगी थी। कुछ क़िस्मत वाले अधिकारियों को गोनौली गेस्टहाऊस में कमरा मिला। अधिकांश को तो आसपास के स्कूलों में डेरा डालना पड़ा। आज सभा संपन्न हुई। मुख्यमंत्री का हेलीकाप्टर उड़ा और साहबों का अमला भी निकल पड़ा। आज गेस्टहाऊस के कैंपस में सन्नाटा पसरा है। कमरे बंद हैं। खाना बनाने-खाने के बाद स्टाफ भी सो रहे हैं। एक चिड़ियां शायद दूसरे से पूछ रही है, अरी कल कौन-कौन मेहमान आए थे? मैं उनसे पूछने तो गई नहीं कि आप कौन हो और कहां से आए हो?
आज रात डीएफओ नहीं लौटे हैं। बेतिया में मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक की वजह से वे संभवतः वहीं कैंप कर रहे हैं। कल रात उन्होंने वाल्मीकि नगर में इको टूरिज्म और टूरिस्ट के लिए हर शाम आयोजित हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद लेने का आग्रह किया था। अगर उन्होंने बताया नहीं होता तो मैं थरुहट का रोमांचक नृत्य-संगीत देखने से वंचित रह जाता। उनका कार्यक्रम देखकर अभिभूत हूं। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में आदिवासी युवक-युवतियों की प्रस्तुति अकल्पनीय है। सुखद संभावनाओं के कई दरवाजे खुल रहे हैं।

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