आत्मकथा और आत्मछलना के विभिन्न रूप : राजेन्द्र यादव
  –  बातचीत : रूप सिंह  चंदेल
दलित और नारी विमर्श आज साहित्य और वैचारिक विमर्श की मुख्यधारा बन गया है तो उसका बड़ा श्रेय वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र यादव को जाता है। उन्होंने इसके लिए ‘हंस’ का मंच ही उपलब्ध नहीं करवाया बल्कि इन मुद्दों को साहित्य की बहस बना दिया। वे जब कुछ बोलते हैं तब तो विवाद होता ही है, लेकिन जब नहीं बोलते, तब बोलने से अधिक विवादित होते हैं। प्रस्तुत है राजेंद्र जी के साथ कथाकार रूपसिंह चंदेल की आत्मकथा पर केंद्रित बातचीत…
रूपसिंह चंदेल-आत्मकथा को आप स्वतंत्र विधा मानते हैं या इसे किसी विधा के अंतर्गत व्याख्यायित करना चाहेंगे।
राजेंद्र यादव- मैं आत्मकथा को स्वतंत्र विधा मानता हूं; क्योंकि उसके अपने नियम, अनुशासन और अपना रूपबंध है। मैं उसे दूसरी विधाओं से अलग रखता हूं।
रूपसिंह चन्देल – लेकिन अभी तक आत्मकथा को स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान क्यों नहीं मिल पाई?
राजेंद्र यादव- नहीं, साहित्य के क्षेत्र में उसे पहचाना गया है। इस पर चर्चाएं भी हुई हैं, बहसें भी हुई हैं, समीक्षाएं भी हुई हैं। यह एक स्वतंत्र विधा है।
रूपसिंह चन्देल – कुछेक अपवादों को छोड़कर हिंदी के बड़े रचनाकारों ने आत्मकथा नहीं लिखी, इसका आप क्या कारण मानते हैं?
राजेंद्र यादव- इस पर मैंने बहुत विचार किया कि क्यों नहीं लिखीं। दरअसल इसके पीछे एक खास किस्म की छद्म विनम्रता के सूत्र हमारे धर्म और संस्कारों में बहुत गहरे हैं कि मनुष्य जीवन कुछ नहीं है। यह जीवन एक भ्रम है, माया है। यह मानसिकता हमें अपने बारे में बोलने से रोकती है क्योंकि कहीं इसके पीछे अपने विशिष्ट होने का अहंकार झलकता है। यही कारण है कि लोगों ने रचना को सामने रखा है। कहा गया है कि बात बोलेगी हम नहीं। मुझे लगता है सामंतवादी समाज में व्यक्ति चेतना को एक अपराध की तरह देखा गया है। “खुदी को कर बलंद इतना” का बोध सामंती ईश्वर के खिलाफ पैदा होने वाला विद्रोह है।
रूपसिंह चंदेल- कहीं यह तो नहीं कि लोग सच बोलने न बोलने के खतरे से घबराते रहे हैं?
राजेंद्र यादव- हां, व्यक्तिगत सच बोलने से हम कतराते हैं। समाज का सच तो हर लेखक ने बोला है। जहां सच न बोलने की सावधानी होती है वहां झूठी आत्मकथाएं होती हैं। मुझे तो लगता है कि आत्मकथा मात्र से ही भारतीय मानस को—हिंदी मानस को विरक्ति है। वे अपने आंतरिक सत्य को छुपाना चाहते है “रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।” इसके दो कारण हो सकते हैं—या तो रचना और जीवन में इतना द्वैत और दूरी है कि हमारे यहां लेखक जो लिखता या बोलता है, जीवन उससे बिल्कुल अलग है। दोनों समान्तर चलते हैं। अक्सर लेखक भीतरी या निजी जीवन को सामने नहीं लाना चाहता; क्योंकि वह जीवन में बोले, लिखे और सोचे गए के विरोध में होता है। यह द्वंद्वात्मकता ही इस मानसिकता के पीछे होती है। डा. नगेन्द्र की आत्मकथा ‘अर्धकथानक’ इस छदम का सबसे बड़ा उदाहरण है। डा. नगेन्द्र की व्यक्तिगत नैतिकता छल-छद्म, जोड़-तोड़,कन्या-प्रेम को सब जानते हैं—वे अहंकारी व्यक्ति थे क्योंकि दिल्ली जैसे केंद्र में प्राध्यापन के सर्वोच्च पद पर रहे, राजनेताओं के आगे-पीछे रहे और सत्ता का दुरुपयोग करते रहे-मगर आत्मकथा में लगता है जैसे नैतिकता की प्रतिमूर्ति हों।
रूपसिंह चन्देल -हिंदी साहित्यकारों की अब तक प्रकाशित आत्मकथाओं में आप किसे श्रेष्ठ मानते हैं। श्रेष्ठता का मापदंड क्या है?
राजेंद्र यादव- यदि मैं पहली बात का ही विस्तार करूं तो ये जो हिंदू संस्कारों में पले हए लोग हैं, उन्होंने आत्मकथा से अपने आपको बचाया है क्योंकि हिंदी साहित्य में सबसे पहली आत्मकथा एक गैर-हिंदू यानी जैनी ने लिखी थी जिसका नाम था बनारसी दास जैन । अकबर का समकालीन था। उसने ब्रजभाषा के दोहों में अपनी आत्मकथा लिखी, नाम था ‘अर्धकथानक’ । यह बहत लोकप्रिय आत्मकथा है। डा. नगेन्द्र ने अपनी आत्मकथा का नाम तो वहां से उड़ा लिया, मगर साहस कहां से लाते। यह ऐसी आत्मस्वीकृति के भाव में लिखी गई कि ताज्जुब होता है कि क्या उस समय–यानी अकबर के जमाने में लोग इतनी साफ बात बोल सकते थे। वह कहता है कि बचपन में वह एक बदमाश, शैतान और बिगड़ा हुआ लड़का था। बाप सुनार था। वह दुकान की चीजों को चुरा ले जाता था, जुआ खेलता था, रण्डीबाजी करता था, दोस्तों में पैसे उड़ाता था…ये ऐसी ही सब बातें थीं, जो भारतीय प्रायः नहीं लिखता। हां, सेण्ट आगस्तीन ने अपनी ’आत्मस्वीकृतियां’ (कन्फैशन्स) में यह सब लिखा है। ताज्जुब की बात है कि रूसो ने जब आत्मकथा को ‘कन्फैशन्स’ नाम दिया तो स्वीकार करने के साहस को ही केंद्र बनाया। हिंदू परंपरा से आए हुए जो लोग हैं, उन्होंने आत्मकथाएं नहीं लिखीं। हां, कुछ आत्मकथात्मक संकेत अवश्य तुलसीदास या दूसरे लोगों में मिल जाते हैं। जीवनीनुमा घोड़ा कुछ है—जैसे ‘छप्पन वैष्णवों की वार्ता’ या ‘राजतरंगिणी’ में कुछ राजाओं की वंशावलियां आदि। उधर मुसलमानी परंपरा में प्रायः हर बादशाह ने जिंदगीनामे लिखे हैं। हमारे यहां तो छत्रसाल और छत्रसाल की विरुदावलियां या रासो हैं। मैं कहूंगा जो पदार्थवादी दर्शनों की पृष्ठभूमि से आए हैं, उन्होंने आत्मकथाएं भी लिखीं ओर जीवनियां भी। अश्वघोष का दुउचरित ही इस समय ध्यान में आ रहा है.
रूपसिंह चन्देल..-अब तक हिंदी में जो आत्मकथाएं प्रकाशित हुई हैं उनमें से कौन-सी आत्मकथा आपको सर्वावाधिक पसंद आई।
राजेंद्र यादव- उनमें सबसे अधिक चर्चा जिस आत्मकथा की होती है वह है उग्र की ’अपनी खबर’। वैसे बहुत दिलचस्पी से जो आत्मकथा पढ़ी जाती है उनमें राहुल की है जो बहुत विराट-विस्तार वाली आत्मकथा है या बच्चन की आत्मकथा। लोग अधिककतर जिस आत्मकथा की चर्चा करते हैं वह बच्चन की ही है।
रूपसिंह चंदेल- अन्य भारतीय भाषाओं में किस साहित्यकार की आत्मकथा ने आपको प्रभावित किया और क्यों?
राजेंद्र यादव- इस समय मझे याद नहीं आ रहा है। लेकिन पढ़ी बहुत हैं और मुझे आत्मकथा पढ़ना बहुत पसंद है। दलितों और  महिलाओं की अनेक आत्मकथाएं अवश्य याद आ रही हैं.
रूपसिंह चन्देल – विश्व साहित्य में किस भाषा के साहित्यकार की आत्मकथा को आप उत्कृष्ट मानते हैं. उसने आपको कितना प्रभावित किया?
राजेंद्र यादव- विश्व साहित्य की बात करना गलत है। वैसे तीन-चार आत्मकथाएं हैं, जिनसे मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत प्रभावित रहा। एक जो विश्व प्रसिद्ध आत्मकथा है, वह है गोर्की की, दूसरी आत्मकथाएं चार्ली चैप्लिन और बट्रेण्ड रसेल की हैं। जिस एक अन्य आत्मकथा ने मुझे झकझोरा है, वह एक ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा है जिस पर हत्या का आरोप था- हेनरी शेरर की ’पैपिलॉन’, पहले लिलियन रॉथ की ‘आई विल क्राई टुमारो’ और पैपिलॉन दोनों बहिष्कृत लोगों ने लिखी हैं। एक वेश्या है और दसरा हत्यारा। बौद्धिक किस्म की आत्मकथाएं भी हैं, जैसे-सिमोन द बोउआ की है–सात्र की है।
रूपसिंह चन्देल- साहित्यकारों के अतिरिक्त अन्य कलाकारों-पत्रकारों आदि ने भी आत्मकथाएं लिखी हैं। निश्चित ही आपने अनेक पढ़ी होंगी। साहित्यकारों और कलाकारों की आत्मकथाओं में आपको क्या अंतर दिखा?
राजेन्द्र यादव- दूसरे क्षेत्र के जिन कलाकारों की आत्मकथाएं हम पढ़ते हैं तो उनके संघर्ष का जो क्षेत्र है, जीवन का जो क्षेत्र है, हम उससे प्रायः परिचित नहीं होते। हमारे पास उनका परिचय सूचनात्मक स्तर पर है, हम उपलब्धियों का मूल्यांकन कर सकने की स्थिति में नहीं हैं। इधर यहां हम साहित्य और साहित्यकार दोनों के विषय में इतना अधिक जानते हैं इसलिए आत्मकथा लेखक के साहित्यिक वक्तव्य और साहित्यिक उपलब्धियां दोनों हमारे दिमाग में होती है, उन्हीं के संदर्भ में उसकी जीवनी हमारे सामने खुलती है। दूसरे क्षेत्र के कलाकारों की आत्मकथा पढ़ते हुए एक दूरी महसूस होती है–वह एक खास किस्म की रोचकता पैदा करती है। हम उसे ज्यादा तटस्थता से पढ़ सकते हैं। साहित्यकार की आत्मकथा को कहीं अपने साथ लगाकर भी देखते हैं। उसे पढ़ना जीवन और साहित्य को समांतर पढ़ना है।
रूपसिंह चन्देल- क्या यह सच है कि भारतीय भाषाओं में महिलाओं ने आत्मकथा लेखन में अधिक स्पष्टता और साहसिकता का परिचय दिया है?
राजेंद्र यादव- मैं यहां दोनों को मिलाना चाहता हूं, महिलाएं और दलित भी दोनों वंचित और प्रवंचित हैं। इधर दोनों की ही आत्मकथाएं साथ-साथ आई हैं। पहली बात तो यह कि हम मध्यवर्गीय जो लोग लिखते हैं वह व्यक्ति की आत्मकथा होती है। एक ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा जो सामान्य या असामान्य स्थितियों-अवरोधों के बीच संघर्ष करते हुए आगे बढ़कर हमारे पास तक आया है। आत्मकथा वही लिख सकेगा जो सफलता की विशेष सीढ़ी पर पहुंच चुका होगा। यानी तूफानी लहरों से गुजरकर किनारे पर आ लगा है। बीच में डूबा हुआ व्यक्ति लोटकर अपनी कहानी नहीं सुनाता। सारा संघर्ष सामाजिक,आर्थिक विषमताओं से,संस्कारों से रूढ़ियों से, गरीबी-अमीरी से–इनसे संघर्ष करते हुए अपनी जिजीविषा–लगन की पूंजी लेकर ऊपर उठे हुए व्यक्ति की आत्मकथाएं ही हम तक आई हैं। जबकि दलितों और स्त्रियों को आत्मकथाएं बिल्कुल अलग धरातल प्रस्तुत करती हैं। वे व्यक्ति की नहीं अस्मिता के लिए लड़ी गई सामाजिक लड़ाइयां हैं। ये व्यक्ति माध्यम होने के बावजूद पूरे समाज की आत्मकथाएं हैं। जब एक स्त्री आत्मकथा लिखती है तब वह बच्चन की तरह एक अकेले व्यक्ति की आत्मकथा नहीं होती, पूरे उस विशेष स्त्री-समाज को आत्मकथा होती है। उसके साथ सामाजिकता जुड़ी हुई है। व्यक्ति में जो समाज के विरुद्ध या अलग होने की चेतना है, वह चेतना यहां संपूर्ण जाति के सम्मान को लेकर है। एक पूरी जाति या पूरा स्त्री वर्ग है जिसका संघर्ष एक विशेष सामंती मर्दवादी व्यवस्था से है, यह गुमनामियत के अंधकार से निकलकर अपनी पहचान बनाने का संघर्ष है। मैंने पिछले दिनों ‘हंस’ के संपादकीय में लिखा है कि यह एक व्यक्तिवाद और अस्मिताबोध का संघर्ष है। स्त्री की अस्मिता–दलित की अस्मिता को अपने पूरे स्त्रीत्व या दलित्व को मनुष्य के रूप में पहचान दिलाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, सवर्ण मालिक या मर्दवादी मानसिकता के परे संस्कारों के विरुद्ध। ये दो संस्कारों-दो व्यवस्थाओं के द्वंद की कहानियां होती हैं। जबकि व्यक्ति के संघर्ष में ऐसा नहीं है।
रूपसिंह चन्देल -इस दृष्टि से आप किस महिला साहित्यकार की आत्मकथा को बेहतर मानते हैं?
राजेन्द्र यादव – यह कहना तो बहुत कठिन है। इधर महिलाओं ने बहत अच्छी आत्मकथाएं लिखी हैं। अभी पिछले दिनों अनुवाद होकर आई है- ’इजाडोरा डंकन की  आत्मकथा’ (संवाद प्रकाशन-रू.सिं.च.), जिसकी बहुत चर्चा हुई। इसे मैंने सन पचपन-छप्पन में पढ़ा था। तब शायद इस अर्थ में महत्वपूर्ण नहीं लगी थी जिसमें आज लगती हैं। सिमॉन द बोउआ की आत्मकथा की एक ज़माने में बहुत चर्चा हुआ करती थी। इसके अलावा शांता आप्टे, हंसा कडेकर, नरीविनोदिनी या बेबी कांबले की आत्मकथाएं बहत प्रसिद्ध रहीं हैं। हैडी लेमार की-“मी एंड एक्सटैसी’ भी बहुत खूबसूरत आत्मकथा थी।
रूपसिंह चंदेल- ‘मुड़-मुड़ के देखता हूं’ में आप कहते हैं कि, “आत्मकथा वे लिखते हैं जो स्मृति के सहारे गुजरे हए को तरतीब दे सकते हैं। लंबे समय तक अतीत में बने रहना उन्हें अच्छा लगता है।..लाख न चाहने पर भी वहां तथ्यों को काट-छांटकर अनुकूल बनाने की कोशिशें छिपाए नहीं छिपतीं..दसरे शब्दों में इसे एक गढ़ंत’ कह सकते हैं।“ इसलिए मुड़-मुड़ के देखता हूं’ में संग्रहीत अंशों को आपने ‘स्मृति-खंड’ कहा है, जिन्हें दूसरे शब्दों में आत्म-संस्मरण कहा जा सकता है। ‘आत्मकथा’ के विषय में आत्मकथाकारों ने भी यदि इसी प्रकार सोचा होता तो शायद ही संपूर्ण जीवन को उद्घाटित करने वाली आत्मकथाएं लिखी गई होतीं।
राजेंद्र यादव- आत्मकथा के नाम पर जो हम देखते हैं वह प्रायः एक दिनचर्या का विस्तार होता है। आज क्या हुआ-कल क्या हुआ…जबकि मूल आत्मकथा, इनके बीच सबसे संवेदनशील अनुभवों की श्रृंखला–खंड-खंड में होती हैं। आत्मकथा एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक की यात्रा है। जैसे एक बहुत महत्वपूर्ण क्षण या कोई महत्वपूर्ण घटना है-उसे आपने आत्मकथा में लिख दिया या कोई महत्वपूर्ण अनुभव लिखा। बीच का हिस्सा भर्ती का हिस्सा होता है, क्योंकि वहां पात्र एक है, स्थितियां एक होती हैं–परिवेश एक होता है…आप उसी को निरंतरता मान लेते हैं। मुझे लगा कि यदि बीच के हिस्सों को छोड़ भी दिया जाए,जिनका काम सिर्फ एक द्वीप से दूसरे द्वीप के बीच सेतु बनना है, तो कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला। इस तरह पूरी आत्मकथा टुकड़ों-टुकड़ों में की जा सकती है। यह आवश्यक नहीं है कि अनावश्यक चीजें जोड़कर उसका विस्तार किया ही जाए। ‘उग्र’ की आत्मकथा ‘अपनी खबर’ इसी तरह लिखी गई है। खुद गांधीजी की आत्मकथा भी ऐसी ही है। मैंने जो कुछ समग्र आत्मकथाएं पढ़ी हैं, वे निहायत बोर और व्यर्थ की बातों से भरी हुई हैं। यदि नाम ही लेना हो तो रामदरश मिश्र की आत्मकथा को उदाहरण के लिए ले सकते हैं जिसमें दिनचर्या का इतना सतही और भोंडा वर्णन है कि उसे हर दिन का रोजनामचा कहा जा सकता है। आत्मकथा में होती हैं वे स्थितियां-घटनाएं, जो आपको बनाती, विगाड़ती या आपकी मानसिक बनावट में कुछ जोड़ती-घटाती हैं। सिर्फ यथार्थ वर्णन अखबारी होता है। कथाकार अपने कथ्य या पात्र के लिए जरूरी घटनाओं और स्थितियों का चुनाव करता है, क्या यह चुनाव हमारी आत्मकथा नहीं हो सकता?
१९५५ में जमशेदपुर में राजेन्द्र यादव (चित्र -सौजन्य वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा)

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