देशज” पत्रिका समूह के  मंच पर वरिष्ठ साहित्यकार व पत्रकार  *अवधेश प्रीत* जी से कुछ रोचक सवाल और उनके तथ्यपूर्ण जवाब :

*प्रस्तुतकर्ता : अरुण शीतांश व कुमार विजय गुप्त*
01. *अरुण शीतांश* : *सुपरिचित और सुप्रतिष्ठित हिन्दी साहित्य के कथाकार व उपन्यासकार अवधेश प्रीत जी हमारे पास उपलब्ध हैं।गौरव का विषय है।
हाल हीं में राजकमल प्रकाशन समूह से एक दमदार उपन्यास “अशोक राजपथ ” आया है।
वैसे पिछले दिनों “चांद के पार एक चाभी”(कथा संग्रह) चर्चा में रहा ।
लगभग तीन दशक से मैं भी इनसे जुड़ा हुआ हूं।
इनकी  कथा की खूबसूरती विशेष रूप से दिखाई देती है।
अवधेश प्रीत जी गांव और शहर दोनों से वाकिफ हैं।
किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।अगर आपसब नहीं जानते हैं इन्हें, तो आपको खोजकर पढ़ना चाहिए।
बिहार से फिलवक्त जिन कथाकारों में नाम लिया जाता है उनमें श्रेष्ठता लिया जाता है। भारतवर्ष की सूची बनेगी तब भी दस में से एक नाम आयेगा।
आज हम बातचीत करेंगे। साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े सवाल को लेकर।
आप सब प्रश्न यहां रख सकते हैं।
सुविधानुसार दे सकते हैं।
इसमें कुछ कठिनाइयां भी हैं।वो है -टाईप एण्ड टाईम टेकिंग।
इसलिए अभी प्रश्न आपसब छोड़ सकते हैं । अवधेश प्रीत जी से सबसे पहला सवाल यह कि
*-अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं*
जवाब : प्रिय शीतांश, अपनी रचना प्रक्रिया बताने के लिए एक लेख लिखना पड़ जाएगा, इसलिए यूं ही बात करने का कोई अर्थ नहीं. संकेत में कहूं तो बकौल मुक्तिबोध ‘रचना प्रक्रिया घुप्प अंधेरे में सुनसान इलाके में एक लालटेन लेकर चलने का उपक्रम है. जितने दायरे में प्रकाश होता है उतना ही बढ़ना हो पाता है. फिर संधान..फिर गति… ये लालटेन के सहारे में गंतव्य का अन्वेषण करना ही रचना-प्रक्रिया है. मेरी रचना प्रक्रिया भी यही है. अली मंज़िल मेरे कथाकार  मित्र संतोष दीक्षित के घर से प्रेरित है. सिर्फ एक फ़्लैश था कि उनके पिता ने घर एक मुस्लिम परिवार से खरीदा था. लिखते हुए कुछ धुंधला सा था जो अंधेरे में, लालटेन की रौशनी में यथार्थ को आविष्कृत करने की कोशिश थी. ये कहानी बेहद मक़बूल हुई थी. 🙏🏻
-शीतांश का मेरे प्रति अतीव स्नेह है. वो मेरे लेखन यात्रा के कई पड़ावों के साक्षी हैं. कई सम्मान समारोहों, लोकार्पण आयोजनों में उपस्थित रहे हैं. हां गांव, शहर दोनों मेरे कथा की ज़मीन हैं , लेकिन मुख्य बात संघर्ष शील, मेहनतकश, आम आदमी जहां भी हैं, मैं वहां की कहानी कहता हूँ ।
02. *सुदेश कुमार मेहर* : आपकी भाषा में जो कसावट है,जो शैली है वह बांध लेने वाली है। क्या उस पर किसी का प्रभाव है?
जवाब : सुदेश जी, भाषा में कसावट तो अभी और लाना है, क्योंकि लगता है, कहीं कुछ कमी रह गई. हां लिखने के बाद पढ़ता हूं हर बार जो खटकता है उसे दुरुस्त करता हूं. प्रवाह और सहजता आने तक प्रयास करता हूं. शैली हमेशा कहानी स्वयं चुनती है. कहानी का कथ्य किस तरह अपनी बात कहने में सक्षम होगा यही शैली का आधार है, मेरे मामले में तो यही है. प्रभाव तो नहीं कह सकता लेकिन भाषा पर हिन्दी और उर्दू के कई लेखकों से प्रभावित रहा हूं. प्रेमचंद, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, कमलेश्वर, और संजीव की भाषा से प्रभावी रहा हूं. उर्दू के रामलाल, कृश्न चंदर, ख्वाजा अहमद अब्बास, सज़्ज़ाद ज़हीर, मंटो और शायरों को बहुत पढ़ा, लिहाज़ा उनकी रवानी और लफ्ज़ बरतने के तरीके ने असर डाला. ज़ाहिरन, मेरी भाषा पर उन लेखकों का प्रत्यक्ष -परोक्ष असर पड़ा.
03. *गीता पंडित* : नमस्ते अवधेश जी। पहली कहानी कौन सी थी ? कहानी लिखने का विचार क्यूँ और कैसे आया?  कहानी से उपन्यास तक की यात्रा के विषय में भी जानना चाहूँगी। एक प्रश्न और … प्रश्न क्या प्रीत सर उत्सुकता है और समृद्ध होने की- एक रेखीय कहानी से क्या अभिप्राय है? अगर कहानी एक रेखीय है तो वह कहानी नहीं है क्या? फिर कहानी को कैसा होना चाहिये? क्या बहुत सारे  चरित्रों से और घटनाओं से कहानी बेहतर बनती है या पाठक को उलझा देती है? कहानी में चमत्कारिक भाषा के प्रयोग को आप किस तरह देखते हैं?
जवाब : गीता जी, कहानी लिखने का ख़याल का कोई वक़्त याद नहीं, हां, जब लगा कि मुझे अपनी लेखन की राह तय करनी चाहिए तो मुझे कहानी ज़्यादा क़रीब लगी.. कविता लिखना कम हुआ… कहानी में कुछ सराहना मिली तो, बस यात्रा ज़ारी रखी. नियमित कहानी लेखन आठवें दशक से करने लगा. कहानी में जीवन, समय और समाज के बाबत लिखने का स्कोप और स्पेस ज़्यादा बड़ा नज़र आया. कैसे आया? मैं जहां रहता था वहां  रिफ्यूजी कॉलोनी थी, उनके संघर्ष ने मुझे बहुत परेशान किया, मेरे गांव के दलित बैलों के गोबर से गेंहू निकालते थे… ये सब मेरी चेतना और संवेदना को उत्प्रेरित करते थे… इन्हें ही लिखने की इच्छा ने कहानी लेखन की ज़मीन बनाई. कहानीकार के लिए
कहानी के बाद उपन्यास लिखना अगली यात्रा होती है. ये एक रवायत भी है. मेरे पास कई विषय थे, जिनके  कैनवास उपन्यास लायक थे. मेरे उपन्यास ‘अशोक राजपथ’ का कैनवास सन 74के बाद और सन 90 से 2005तक का फैला कालखंड है. ज़ाहिर है, सामजिक न्याय, मंडल आंदोलन और शिक्षा जगत में कोचिंग के जाल जैसे बहुत सारे मुद्दे रहे हैं, जो उपन्यास में ही कहना मुफ़ीद था.
गीता जी, एक रेखीय कहानी वो होती है, जो आनन-फानन टू प्लस टू बराबर फोर कह देती है, जो परिस्थितियों,  घटनाओं, चरित्रों और कार्य-कारणों की तार्किक परिणति तक न जाये और उसकी बहुस्तरीयता को न एड्रेस करे. मान लीजिए एक पुरुष या महिला जो हमारी कहानी का मुख्य चरित्र है उसकी बनावट की कई परतें हो सकती हैं, क्या कहानी वहां तक जाती है. एक बात और समझें कि पात्र और चरित्र में फ़र्क होता है. जब तक पात्र को चरित्र समझेंगे घालमेल संभव है. अब बात, कहानी एक रेखीय है तो वह कहानी नहीं है क्या? एकरेखीयता होती है, जैसे एक सीधी सपाट रेखा जो अपने आरम्भ से अंत तक चले और बगैर किसी वक्रता, उठान या गिरान के ख़त्म हो जाये. इसे कहानी मानें या न मानें ये आप तय करें.
-बहुत सारे चरित्रों और घटनाओं से कहानी बेहतर बनती है या पाठक को उलझा देती है? प्रेमचंद की अधिकांश कहानियों में बहुत कम पात्र हैं,उदाहरण के लिए,  ईदगाह और  पंच परमेश्वर को लें. दोनों में बमुश्किल तीन या चार चरित्र हैं, क्या उलझाती हैं ये? ईदगाह में दादी अमीना और उनका पोता हामिद मुख्य चरित्र हैं, ये कहानी यूं ही नज़रअंदाज़ की जा सकती. पंच परमेश्वर में भी जुम्मन शेख, अलगू चौधरी और बूढ़ी खाला के जरिये ये कहानी बहुस्तरीय, बहुआयामी, बहुअर्थी बन गईं है. कफ़न में भी महज़ तीन चरित्रों से कहानी गढ़ी गई है. कहने की ज़रूरत नहीं कि ये कहानी हिन्दी की कालजई कहानी है. ये उदाहरण पर्याप्त है कि सरलता में भी असधारणता की पहचान कैसे हो सकती है. प्रेमचंद हर कहानी लेखक के लिए पाठ, पाठशाला और गुरु हैं,.. प्रेमचंद पठनीयता, लोकप्रियता, जनपक्षधरता के अप्रतिम कथाकार हैं.
  -गीता जी, भाषाई चमत्कार संबंधी प्रश्न का उत्तर विस्तार से शरद भाई के प्रश्न के उत्तर में दे चुका हूं. आशा है, किसी हद तक आपके प्रश्नों का उत्तर दे पाया होऊं.
04. *शिवनंदन सलिल* : माना जाता है कि कहानी हो या उपन्यास, उसमें रचयिता स्वयं कहीं न कहीं उपस्थित रहता है। इस सम्बन्ध में आप का क्या विचार है ?
जवाब : सलिल जी, कहानी हो या उपन्यास उसमें  सीधे सीधे उपस्थित न हो तो भी वह अपनी वैचारिकता और प्रतिबद्धता में उपस्थित रहता है.मैं इसे ही ज़रूरी समझता हूं. शुरूआती कहानियॉं में तो बतौर लेखक पात्र के रूप में भी उपलब्ध हूं. बाद में लेखक अपनी रचना में अपने अनुभव के ज़रिये उपस्थित रहता है. मेरे तई तो यही है.
05. *स्मिता जी*  (एक भारतीय) : लिखने का विचार आपको पहली बार कब आया? और क्यों ? वे कौन से कारण थे ? और आपने पहली ,बिल्कुल पहली बार लिखने जैसा (रचना ) क्या लिखा ?
एक भारतीय जी को *एक भारतीय का ज़वाब* : स्मिता जी, लिखने का विचार तो सातवीं की परीक्षा के बाद अवकाश में आया. जो विचार आया वो कहानी का ही था, जिसे मैंने लिख भी डाला था. कारण? बस, कुछ मोरल लेशन और राजा रानी और राजकुमारी, राजकुमार की कहानियों का असर था.  पढ़ा तो लगा कि ऐसा ही कुछ मुझे भी लिखना चाहिए. समकालीन कथाकारों में प्रिय संजीव,हृषीकेश सुलभ, पंकज  मित्र, संतोष दीक्षित, मधु कांकरिया, अल्पना मिश्र,  वंदना राग  और अनंत कुमार सिंह हैं. होने को तो और भी हैं पर प्राथमिकता यही है. एक भारतीय जी संभवतः आपके प्रश्न का उत्तर पूर्ण नहीं हो पाया था.
पहलीबार लिखने जैसा जो लिखा वो कहानी थी ‘कांता’. ये 77 के आसपास लिखी और स्थानीय साप्ताहिक ‘रचनात्मक संघर्ष’ में छपी.
06. *अभिनव कुमार उपाध्याय* : आपकी कौन सी कहानी या उपन्यास आपको सर्वाधिक पसंद है?. किसी अन्य कहानीकार की उस कहानी का नाम भी बताएँ जो आपको सबसे अधिक पसंद है। समकालीन कथाकारों में सबसे प्रिय कौन है ?
जवाब : अभिनव भाई, मुझे अपनी हर कहानी अलग अलग वजहों से पसंद है. प्राथमिकता के आधार पर कहूं तो नृशंस, अली मंज़िल, ग्रास्सरूट, अम्मी, तीसरी औरत, और अलभ्य को कह सकता हूं. प्रेमचंद की कफ़न, भुवनेश्वर की भेड़िये, निर्मल वर्मा की परिंदे मुझे  सर्वाधिक पसंद हैं. भारती जी की सूरज का सातवां घोड़ा, कमलेश्वर का मांस का दरिया, खोई हुई दिशाएं, कितने पाकिस्तान और राजेन्द्र यादव का उपन्यास सारा आकाश, अज्ञेय का नदी के द्वीप, श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी, भीष्म साहनी का अमृतसर आ गया, साग मीट और तमस, संजीव का अपराध, ऑपरेशन जोनाकी, सागर सीमान्त और तिरबेनी का तड़बन्ना. उदय प्रकाश का और अंत में प्रार्थना, मोहनदास, वारेन हेस्टिंग्ज का सांड़, अमरकांत का दोपहर का भोजन, डिप्टी कलक्टरी, मंटो की सभी कहानियां, और भी हैं जो पसंद हैं.
07. *ऋचा वर्मा* : (i) आपके लिए लोग कथाकार से ज्यादा किस्सागो शब्द का प्रयोग करते हैं, वह शायद इसलिए कि, आपकी रचनाओं में उर्दू शब्दों का  प्रयोग धड़ल्ले से होता है, इसका क्या कारण है (ii) क्या आपकी रचनाओं के पात्र विशेषकर नयका पोखरा के वास्तविक जीवन के लिए गयें हैं।
जवाब : ऋचा जी, किस्सागो कहना मेरे लिए सुखद है. वज़ह शायद मेरी कहानियों का अंदाज़े बयां हो. दरअसल उर्दू शब्दों की अधिकता से कोई किस्सागो नहीं होता. कोई लेखक जब अपनी कहानी को पाठकों की संवेदना से जोड़ देता है तो वह आत्मीय हो जाती है. किस्सागोई कहन का अंदाज़ है, ये मुझे प्रिय है. उर्दू के आसर के बाबत मेहर जी उत्तर में कह दिया है.
हां,’ नयका पोखरा ‘के कई पात्र वास्तविक हैं. पोखरा भी वास्तविक है. स्थितियां भी वास्तविक हैं, लेकिन लेखीय कल्पना और आवश्यकतानुसार पात्रों का गठन मैंने किया है. रॉ मैटेरियल वास्तविक है. बाक़ी कलात्मक लेखकीय प्रयास. आदर्श कोई नहीं. पसंदीदा कई हैं. कुछ के नाम पहले ले चुका हूं. धर्मवीर भारती,शिवप्रसाद सिंह, राही मासूम रज़ा, मार्कण्डेय, स्वदेश दीपक,भीष्म साहनी, काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, चित्रा मुदगल,कृष्णा सोबती,  पंकज बिष्ट, शिवमूर्ति और उदय प्रकाश का विभिन्न कारणों से पसंद हैं . तीसरी, हिंदी साहित्य में आपके पसंदीदा या आदर्श लेखक कौन हैं।
08. *सीमा सिंह* : आप अपनी कहानियों की घटनाएँ एवं पात्र वास्तविक दिखाने के लिए क्या अतिरिक्त करते हैं?
जवाब : सीमा जी, किसी अन्य प्रश्न के उत्तर में इस बाबत काफी विस्तार से कह चुका हूं. वैसे आपका प्रश्न अपनी जगह अडिग है… मैं अपनी घटनाओं और पात्रों को वास्तविक दिखाने के लिए जो करता हूं वो मेरा सीक्रेट है. फिर भी…बता रहा. वास्तविक घटना या पात्र को हू ब हू रखना फोटो खींचना हुआ. दरअसल यथार्थ का पुनर्सृजन करना होता है, जो लेखकीय कौशल,  अनुभव सत्य और परकीय क्षमता पर निर्भर करता है. राजेन्द्र जी ने एक बार मुझे एक पत्र में लिखा था, मुनिया का चरित्र अपने आसपास की स्त्री से गढो. यही ऑब्ज़र्वेशन है. इसी प्रयास से कुछ संभव हो पाता है.
09. *लीना मल्होत्रा* : स्वलिखित प्रिय कहानी कौन सी है। आपकी कौन सी ऐसी कहानी है जिसे लिखने के बाद आपको ऐसा लगा कि आप इसे और बेहतर लिख सकते थे और वह कमी क्या थी। समकालीन कहानियों पर कुछ कहिए ।
जवाब : लीना जी, स्वलिखित प्रिय कहानीअभी तक तो  ‘नृशंस’ है. किस कहानी बोले तो मेरी या किसी अन्य लेखक की? मेरी अन्य में तो कई हैं जिनका ज़िक्र मैंने किसी अन्य मित्र के प्रश्न के उत्तर में किया है. मुझे हर कहानी लिखने के बाद लिखता है, इसे और बेहतर लिखा जा सकता था. कुछ को मैंने छपने के बाद फिर लिखा भी है. लेकिन इंगित ही करना हो तो मैं अपनी कहानी ‘आइस पाइस’ को फिर लिखना चाहूंगा. कमी तो नहीं है, उसे और चुस्त बनाना चाहूंगा.
समकालीन कहानी बहुत समृद्ध है, कथ्य के वैविध्य, एक साथ कई पीढ़ियों और कई पेशों से जुड़े लोग सक्रिय हुए है, स्त्री विमर्श से  जहां महिला कथाकारों के विविध अनुभव और स्वर मुखरित हुए हैं, वहीं दलित व आदिवासी विमर्श ने कहानी लेखन को उसकी बुनियादी चिंताओं से उत्तेजित और आंदोलित किया है, जिससे समकालीन कहानी का कैनवास बड़ा हुआ है. बाज़ार और आभासी अनुभवों ने हिन्दी कहानी को नया चेहरा दिया है. हां, इसके कुछ ख़तरे भी हैं, जिनका विस्तार से  ज़िक्र शरद भाई के प्रश्न के उत्तर में देना चाहूंगा.
10. *इन्दुबाला* : आपने कबसे लिखना शुरु किया और time management कैसे करते हैं,क्या आप लेखन में किसी से प्रभावित हैं?क्या लिख कर ज्यादा सुकून मिलता है गद्य या पद्य,प्रेमचन्द के बाद के लेखकों को वो स्थान क्यूं नहीं मिल पा रहा है।
जवाब : आपके पोस्ट में कई प्रश्न हैं. एक एक कर आता हूं. कब से लिखना शुरु किया, ये तो याद नहीं, लेकिन सातवीं आठवीं से लगातार लिखने लगा था. गंभीरता से जो लिखना शुरु किया वो 77के आसपास यानी इमरजेंसी के बाद से लेकिन पहचान बनी आठवें दशक में.
टाइम मैनेजमेंट कठिन रहा है. आप जानती हैं, मैं पत्रकार रहा हूं, जहां टाइम ही मुश्किल काम रहा , फिर भी जहां चाह, वहां राह. मैंने कई ऑफर नकार दिये… कई अवसर छोड़ दिये. लेखन मेरी प्राथमिकता रही, इसलिए घाटा सह कर भी नौकरी कर ली. फिर भी टाइम मैनेजमेंट कठिन रहा. सुबह लिखता था, ऑफ के दिन लिखता था, साल में औसतन दो कहानी ही लिखता था. घर के काम नहीं करने होते थे. ऑफिस का काम घर नहीं लाता था. लेकिन जब टॉप पर पहुंचा तो कई साल नहीं लिख पाया.नॉवेल इसी लिए दस दस साल से पेंडिंग रह गये… बहरहाल कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है. करत करत अभ्यास से हो जाता है आसान. रचनात्मक लेखन के लिए अपनी संवेदना को बचाये रखना पड़ता है.. मुझे पद्य पढ़ने और  गद्य लिखने में आनंद आता है… प्रेमचंद के बाद कौन सा स्थान? लोकप्रियता? मिला है स्थान… बस फ़र्क ये है कि अब पाठकों की रुचि का  दायरा बढ़ा है… चयन का आधार बढ़ा है.. लेखकों की वेराइटी बढ़ी है. इस लिए स्थान का फैलाव हुआ है.
11. *महेंद्र कुमार* : साहित्य आज ‘ घर बदर ‘ हो रहा है, वैसे में कहानियों की पहुंच पाठकों तक कैसे की जा सकती है?
जवाब : महेन्द्र जी, ये सत्य है कि हिन्दी में साहित्य दर बदर हो रहा, लेकिन कब बेहतर स्थिति में रही? हिन्दी भाषी समाज ने पढ़ने की, साहित्य पढ़ने की ज़रुरत समझी ही नहीं. लेखन बोले तो मुंडा बिगड़ गया. फिर भी मौज़ूदा पीढ़ी में पढ़ने की रुचि बढ़ी है. ऑनलाइन, अमेज़न, फ्लिफकार्ट आदि से पुस्तकों की बिक्री संतोषजनक है… लेकिन लोकप्रिय लेखन की बिक्री ज़्यादा है, जो पहले भी थी.जहां तक  पाठकों तक पहुंचने की बात है, प्रकाशकों ने कई प्रयास किये हैं…. पेपरबैक, ऑन लाइन आर्डर, व्हाट्सएप के साथ साथ घर बैठे पुस्तकें पहुंचाने के प्रयास हुए है. प्रकाशक बढ़े हैं. अब पाठकों को आगे आने की ज़रूरत है.
12. *अस्मुरारीनंदन मिश्र* : पत्रकारिता लेखन को कैसे और कितना प्रभावित करती है? सामान्य रूप से भी और आपके लिए भी।
जवाब : अस्मुरारी, पत्रकारिता ने लेखन की राह आसान बनाई है या कहिये लेखन ने पत्रकारिता को आकार दिया है. स्वतंत्रता आंदोलन को छोड़ दें तो भी, अज्ञेय, रघुबीर सहाय, भारती, मनोहर श्याम जोशी से लेकर हिमांशु जोशी तक. आप अगर रचनात्मक भाषा के साथ पत्रकारिता करें तो वो प्लस पॉइंट है. पत्रकारिता ने सहज भाषा और वाक्य विन्यास में मदद की. कई घटनाओं, समस्याओं को उसकी समग्रता में जानने का अवसर मिलता है. कई बार कहानी के लिए कथ्य का स्पेस नज़र आ जाता है. स्वभाविक रूप से मुझ पर इसका प्रभाव पड़ा है.
13. *मणि मोहन* : क्या जीवन का कोई ऐसा भी अनुभव है आपके पास जो अभी तक कहानी में रूपांतरित नहीं हो सका या उसे लाने में आप हिचक रहे हों
जवाब: मणि भाई, बहुत सारे अनुभव हैं, जिन्हें लिखना चाहता हूं.हिचक तो कतई नहीं, समयाभाव और प्रिऑरिटी की वज़ह से लिखा जाना रह गया है. हां रूपांतरित होने में वक़्त की बड़ी भूमिका है. कई कहानियों के बीज तो थे पर वे सही जलवायु पाकर ही पनपे. अभी मीडिया, ख़ासकर अपने प्रेस अनुभवों को पका चुका हूं, जो अगले उपन्यास का विषय होगा. पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से एक उपन्यास टलता रहा, अब आकर ले रहा. हां एक उपन्यास लिखने की हिचक बनी रही. एक अभिनेत्री की आत्मकथा जैसा, जो इतना वास्तविक है, कि उसे लिखने को लेकर हिचक थी, अब वो ख़त्म हो गया है. आपका स्नेह बना रहे.
14. *ऋतू त्यागी* : आपके लेखन में मैं एक सहजता देखती हूँ जो मैंने कहीं ओर बहुत कम देखी है और आश्चर्य है कि वह सहजता कहीं भंग नहीं होती ना आलोचना में और ना कथा संसार में क्या यह सहजता आपके व्यक्तिगत जीवन से चली आई है?
जवाब : ऋतु जी, सहजता से काम चल जाये तो जटिल क्यों हुआ जाये? ज़िंदगी के मरहले ख़ुद ही जटिल हैं, लेखक उन मरहलों को समझने समझाने में सहजता के बजाय जटिलता ही पैदा कर दे, तो आपकी (लेखक की )भूमिका क्या? मैं समझता हूं, लेखक, कवि अपने समय की जटिलताओं का व्याख्याकार होता है. हां, मैं जीवन में बेहद सहज हूं, इतना कि ये मुहावरा मुझ पर लागू होता है कि सीधे का मुंह कुत्ता भी चाटता है (कुत्ता महोदय से क्षमा याचना सहित!)
15. *अरविन्द अवस्थी* : जिस प्रकार कविता छंद के बंधन से मुक्त होकर समकालीनता तक पहुंची है , क्या उसी प्रकार कहानी भी किसी बंधन से मुक्त हुई है? इक्कीसवीं सदी की कहानी ने कौन से तत्व छोड़े हैं और कौन से अपनाए हैं?
जवाब : अरविन्द जी,मेरा मानना है, छंदमुक्त होने से कविता समकालीनता तक नहीं पहुंची, बल्कि अपनी अंतर्वस्तु और आधुनिकता बोध से समकालीन हुई. कहानी पर कोई बंधन था ही नहीं, उसके सामने जड़ताएं थीं, जिसे कभी प्रेमचंद ने झटका दिया, कभी प्रगतिशील आंदोलन के लेखकों ने, कभी कथा आंदोलनों ने और कभी कभी वर्गीय समूहों की चेतना ने. कहानी में प्रयोग बहुत हुए, लिहाज़ा वह कहीं बंधी ही नहीं. इन झटकों से कहानी का नुकसान भी हुआ और फ़ायदा भी. वो बहस का अलग विषय है.
16. *शैलेन्द्र जय* : नमस्कार सर किसी साक्षात्कार में आपने कहा था कि रचना को निरस्त करते रहने की प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए जब तक कि पूर्ण संतुष्टि न हो जाए तो यह संतुष्टि आप किस प्रकार प्राप्त करते हैं? किसी को रचना सुनाकर या उसमें काट- छांट करके, दूसरा शब्द या वाक्य पाकर।क्या लेखक को किसी विचारधारा से संबद्ध होना आवश्यक है? इसी का पूरक प्रश्न है ;किसी शहर या स्थान का कितना प्रभाव लेखन पर पड़ता है?
जवाब : शैलेन्द्र जय मेरी लेखन प्रक्रिया वही है. निरस्त करता हूं कई कारणों से. कभी लगता है, जो कहना चाहता था वो आकार नहीं ले रहा, कभी कथ्य में दुहराव से बचने के लिए और कभी ख़ुद को मजा नहीं आने से और कभी बहुत बहते जाने (महाविष्टता ) से बचने के लिए.  वैसे मन की मौज़ कॉमन फैक्टर है. निरस्त करने का अर्थ ख़त्म करना नहीं, उसके पकने, आकार लेने और मेरे पाठकीय संतुष्टि तक बार बार लिखते रहना है. किसी को रचना सुनाना एक संस्तुति है.इस मामले में  तत्काल और सहज उपलब्ध मेरी पत्नी हैं. उनकी आलोचना व्यावहारिक और ग़ैर अकादमिक होती है, जो मेरे काम की होती है. सुनाने से शब्द, वाक्य और प्रवाह का अंदाजा होता है. मेरे कुछ मित्र भी उपलब्ध रहते हैं. सुनाना बहुत कारगर होता है.
विचारधारा से मतलब पार्टी से नहीं.लेखक को विचारवान, वैज्ञानिक समझ और मनुष्यता के पक्ष में जो खड़ी करे, मैं उससे सम्बद्ध रहना चाहता हूं. मैं , मार्क्स, गांधी और बाबा साहेब के विचारों से प्रभावित हूं.विचारहीन होने से बेहतर है,  विचारधारा से जुड़ना. हां लेखन मेनिफेस्टो नहीं हो सकता. जब हुआ पाठकों ने नकार दिया.
17. *शरद कोकास* : वर्तमान कहानी अपने आधुनिकता बोध के कारण कहानीपन से कुछ दूर होती जा रही है। इसमें कहानी के तत्व और किस्सागोई कम हैं भाषा का चमत्कार अधिक । ऐसा लगता है कथाकार नये शब्दों को लेकर  कथाभाषा में स्वयं को आधुनिक सिद्ध करना चाहते हैं।  क्या ऐसी कहानियाँ पाठकों में लोकप्रिय होंगी ? किन पाठकों को पसंद आएंगी? क्या यह कहानियों का भविष्य है ? आपकी राय जानना चाहूँगा ।
जवाब : शरद भाई, आपका प्रश्न मेरी चिंता का विषय रहा है. भाषा का चमत्कार इस कदर बढ़ा है कि लगता है, चिकनी चुपड़ी, लच्छेदार भाषा ही कहानी का अभीष्ट हो. कहानी के एक महत्वपूर्ण समीक्षक सुरेन्द्र चौधरी कहते हैं, कहानियों की भाषा में जो आततायीपन है, वह उनकी आतंरिकता से मेल नहीं खाता. कोई लेखक विदेशी लेखकों के फ़िकरों, मुहावरों, सुभाषितों और वाक्यों का अनुवाद कर जातीय भाषा-संपदा को समृद्ध नहीं कर सकता. चमत्कार की इस सम्वादी भाषा में चमत्कार रह नहीं जाता, बोझ हो जाता है. भाई, आधुनिकता बोध भाषाई चमत्कार से नहीं आता, अपने समय की संवेदना और यथार्थ के अन्वेषण में निहित है.रॉल्फ फॉक्स कहता है, साहित्यकार का कर्म वस्तुजगत को मात्र धारण करना नहीं होता, बल्कि बल्कि नये सत्यों की उद्भावना करना भी होता है. बताने की ज़रुरत नहीं कि नये सत्यों की उद्भावना भाषा के गुंजल्के में नहीं होता.. एक फ़िल्मकार और नाटककार सेट की ज़रूरत समझता है, लेकिन अगर सेट भव्य हो, जिसमें पात्र और कथ्य ही खो जाये तो इस सेट का क्या फ़ायदा? सेट दृश्य को विश्वसनीयता और गति  देने के लिए होता है बस. भाषा का ये चमत्कार,  ये मनोहारिता वही है, जिसमें कहानी खो जाती है. मैंने आपके छत्तीसगढ़ के एक कथा मित्र से यात्रा के दौरान  उनकी कहानी का कथ्य पूछा तो वह बोले बताना संभव नहीं है.,  मेरी कहानी पढ़ने से ताल्लुक रखती है. यानी कहानी में कहानी का तत्व ही नहीं था. कथ्य ही नहीं,  तो भाषा की जगलरी से काम चलनेवाले कहानी का नुकसान कर रहे. किसी प्रेमचंद, भीष्म साहनी, अमरकांत, भुवनेश्वर, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, स्वयंप्रकाश को इस भाषिक चमत्कार की ज़रुरत नहीं पड़ती. दरअसल इसकी दो वज़ह है, एक तो यथार्थ से मुठभेड़ करने से बचकर ये इंद्रजाल रचा जा रहा, दूसरे विचारहीनता यानी विचार का अंत. ‘कहानी’के संपादक श्रीपत राय ने अपने एक सम्पादकीय में लिखा है,जहां शिल्प संवेदना और अनुभूति के स्थान का अपरहण कर लेता है वहां साहित्य और अधिक व्यापक अर्थ में कला की हत्या हो जाती है. ऐसी कहानियां पाठक में लोकप्रिय नहीं होतीं. आज भी वे ही कहानियां पढ़ी जा रहीं जो, यथार्थ से आंख मिला रहीं.
शरद भाई, कहानियों का भविष्य कभी धूमिल नहीं होगा, इसकी वज़ह है हमारी आदम प्रवृति कथा कहने और सुनने की, हां, उसके रूपाकार में प्रयोग और परिवर्तन होते रहेंगे. आप जानते ही हैं, जहां कथ्य है वहां कहानी है, कभी सुनने के फॉर्म में, कभी देखने के फॉर्म में. आज भी कहानी की दो धाराएं दिख रहीं, आप देखें लोकप्रियता के लिहाज़ से शिवमूर्ति के सामने प्रियंवद नहीं टिकते.
उम्मीद है, आपके प्रश्न का अपनी समझ भर जो उत्तर दे पाया उससे आपको मेरा पक्ष स्पष्ट हुआ हो.
18. *डॉ सुनीता* : एक दशक की हिंदी कहानी को आप किस तरह के टूल्स में मापना पसंद करेंगे ?
या , यह जो दशक चल रहा है उसमें कहानी का जो स्वरूप बदला है वह साहित्य की दृष्टि से कितना हितकर है ? या ,नई वाली हिंदी और साहित्यिक हिंदी का जो बाज़ारीकरण व भूमण्डलोत्तर फेनोमिना तैयार हो रहा उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है ??
जवाब : सुनीता जी, टूल्स तो बतौर आलोचक आप देखें, एक कहानीकार के  तौर पर मैं ये कह सकता हूं कि पिछले एक दशक से आभासी समय में जी रहे हम, आभासी संसार वास्तविकता, तर्क, विज्ञान और ज़िन्दगी के सत्य की चेतना को भ्रमित करता है. हम यथार्थाभास से बढ़कर मिथ्याभास पैदा कर रहे. इंटरनेट, संचार, तकनीक, सोशल मीडिया का करिश्मा है कि हम इन्द्रियबोध का इस्तेमाल कम से कम करने की ओर बढ़ रहे.
बहरहाल, ऑरी प्येर ने अपने एक प्रसिद्ध पत्र में कहा था साहित्य में इतिहास से कम महत्वपूर्ण उसका भूगोल नहीं है. इसे यूं देखें कि अब लेखन से देश का विशाल भू क्षेत्र जुड़ा है. इससे रचनाशीलता में विस्तार आया है. हिन्दी कहानी का ये दशक, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श और स्त्री विमर्श पर केंद्रित हुआ है. बाज़ार ने जीवन, समाज और समझ को प्रभावित किया है. नये कर्मक्षेत्रों के नये अनुभवों का विस्तार हुआ है. ज़ाहिरन, ये और ऐसे तमाम कारक हैं, जिनके बगैर आज की कहानी का चेहरा नहीं बनता. मैं तो मुक्तिबोध के शब्दों में कहूंगा, कभी अकेले में मुक्ति नहीं मिलती, यदि वह है तो सबके साथ ही . मेरा मतलब यह कि ये जो हाशिये का समाज है, उसके बगैर मुक्ति नहीं हो सकती.
-विचारों का द्वन्द
-नायकत्व का संकट
-व्यवस्थाओं का केन्द्रीकरण,
-लोकतंत्र का छद्मीकरण
-युद्धोन्माद और मनुष्यता का भयादोहन
-बाज़ार और उपभोक्तावाद से उपजी व्यक्तिपरकता
-डिजिटल समाज और मनुष्य की संवेदना का कुन्दीकरण
-साम्प्रदायिकता और पुनरुथानवाद का  नया चेहरा ये और ऐसे कई मुद्दे मेरी चिंताओं के केंद्र में है.
-देखिये, हर बदलाव न पूरी तरह अच्छा होता है, न पूरी तरह ख़राब. सवाल हमारे प्रयोग, परिस्थिति और दृष्टि का है. स्त्री को, दलित को, आदिवासी को अधिकार मिले, मानवीय गरिमा मिले ये तो ज़रूरी ही है, लेकिन इनके नाम पर राजनीति से नुकसान ही होगा. साहित्य की दृष्टि से समाज के हित में खड़ी,वंचित के पक्ष में खड़ी और मानवीय सरोकारों वाली रचनाएं ही हितकर होंगी. मनोरंजक, मनोहारी और विचारहीन रचना किसी काम की नहीं.
-प्रेमचंदवाली हिन्दी में क्या दिक्क़त है? भाषा बाज़ारी नहीं होती, उसके कथ्य, सरोकार बाज़ारी होते हैं. जिसे हिन्दी साहित्य में हिंदुस्तानी भाषा कहा जा चुका है, उसे नये नाम देकर कोई कहना क्या चाह रहा? नई वाली हिन्दी में ऐसा क्या है, जिसमें नया है? समय के साथ नई शब्दावलियां शामिल होती रही हैं, देगची, कनस्तर, पतलून से लेकर टेलीफोन, टेबल, लैंप सब हिन्दी में निर्मल वर्मा से अवधेश प्रीत तक इस्तेमाल करते रहे हैं. पहले तो नाईवाली हिन्दी है क्या? किसने इस शब्दावली को मान्यता दी, ये तो तय हो? भूमंडलोत्तर नई वाली हिन्दी में लिखा लेखन क्या विश्व साहित्य में स्थान पा गया है? मेरे स्वयं बड़े सारे प्रश्न हैं.
सुनीता जी, अन्यथा न लेंगी  मुद्दाविहीन, सरोकारहीन लेखन का ये वितंडा है.
आशा है अपनी बात कह पाया होऊंगा.
19. *ज्ञानेंद्र विक्रम सिंह* : आलोचक के रुप में किसी भी रचना को देखने का आप का अपना नजरिया क्या है ..?
जवाब : रवि, मोटे प्रश्नों की भीड़ में आपका दुबला सा प्रश्न अदीठ रह गया. क्षमा. नज़रिया बड़ी गहन और अर्जित पूंजी है. विश्लेषण में मदद मिलती है. फ़िलहाल, जो रचना अपनी संपूर्णता में तर्कसंगत लगे और दिल को छू जाये,  वही मेरी पसंद है. मैं आलोचक नहीं हूं और रचना को पहले पाठक के तौर पर पढ़ता हूं और उसपर लिखने के दौरान उसके सुसंगत होने, कहन में स्पष्टता होने और लेखक की दृष्टि के परिप्रेक्ष्य में परखता हूं. जिससे असहमति की गुंजाइश बनी रहती है.
20. *जय शंकर प्रसाद* : उसने कहा था से अब तक कहानी ने एक लंबी यात्रा तय की है। इस शुरुआती कहानी और आपकी कहानियों में क्या आप किन्ही तत्वों (कथ्य और शिल्प)की समता और विषमता को रेखांकित करना चाहेंगे?
जवाब : भाई जय, उसने कहा था के लेखन से अबतक सौ साल से ज़्यादा गुज़र चुके हैं. इस बीच दुनिया वही नहीं रही जो 1915 में थी, ज़ाहिरन कहानी भी वही नहीं रही. लेकिन उस कहानी का जो मर्म है, केंद्रीय भाव है वह आज भी है यानी प्रेम, उत्सर्ग और कर्तव्यबोध  विवाह बाद एक प्रेमी प्रेमिका का आमना सामना. ये आज भी विभिन्न रूपों और प्रकारों में कहानी में है.
मेरी कहानी में समता कतई नहीं है, शिल्प में फ्लैशबैक का प्रयोग वहां हुआ है, जो मेरी कहानियों में अपने अंदाज़ में है. किसी एक कहानी से आज मेरी या किसी भी कहानी की तुलना उचित नहीं. वो इतिहासिद्ध कहानी है, हमे अभी सिद्ध होना है.
21. *नवनीत शर्मा* : (i) कहानी कभी अपने तत्वों के लिए जानी जाती थी, बीच में कई प्रयोगों से गुजरी। आपकी दृष्टिमें सबसे खास तत्व क्या है? (ii) आपकी कहानियों के पात्रों को आप जीवन से ही लेते होंगे, क्या कहानी में उन्हें काम पर लगाने से पहले उन्हें जीते भी हैं? (iii) कभी सारिका के मुख पृष्ठ पर एक वाक्य पढा था, ‘जब तक ज़िंदगानी है,कहानी ही कहानी है’…आप भी मानते हैं कि यह सच शाश्वत है?
जवाब : नवनीत भाई, आपके पहले प्रश्न में ख़ास तत्व की जिज्ञासा है, भाई, अपनी बात के लिए ‘कहानी’ के संपादक श्रीपत राय से उधार लूं तो, ‘एक अच्छी कहानी का चरम उत्कर्ष यह है कि वह आपकी संवेदना को उजागर करती हो, सोई हुई चेतना को प्रबुद्ध करती हो, भावनाओं का उन्नयन करती हो. वह किन साधनों से इस लक्ष्य तक पहुंचती है, वह न केवल गौण है, बल्कि इसका पूरा विश्लेषण किया ही नहीं जा सकता. ‘ मेरे लिए ख़ास तत्व है दृष्टि और कथापन. आपने मेरी कुछ कहानियां पढ़ी है,  उम्मीद है मेरी बात नज़र आती हो. हां देश, काल और नये यथार्थ के लिए स्पेस के साथ.
-भाई, कहानी के पात्र यथार्थ से ही लेता हूं, लेकिन वे लेखकीय स्पर्श से अपना रूपाकार लेते हैं. उन्हें जीने के लिए उनका आब्जेर्वेशन करता हूं, उनके साथ किसी न किसी रूप में उठना -बैठना भी रहा है .काम पर लगाते हुए परकीया प्रवेश करता हूं. उनकी विश्वसनीयता बनी रहे उसके लिए मैं ज्यादातर अपने आस पास के लोगों की प्लास्टिक सर्जरी करके चेहरा बदल देता हूं. 🙏🏻😁
कहानी तब तक ही है, जबतक मनुष्य समाज है. कई सभ्यताओं की यात्रा के बावजूद कहानी का अतीत इसी बात की तस्दीक है. भाई,  जिंदगानी क्या ख़ुद ही कहानी नहीं है? तो जब तक जिंदगानी है, कहानी तो है ही, हां हम चुनते क्या हैं और उन्हें बयां कैसे करते हैं, इस पर तो गौर करना ही होगा. अज्ञेय का एक ज़ुमला है, ‘पढ़ता सभी, लेकिन क्या पढ़ना चाहिए, ये बहुत कम लोग जानते हैं.’मेरी समझ से ये बात कहानी की शाश्वतता के बाबत भी कही जा सकती है.
22. *अमनदीप कौर गुजराल* ( विम्मी ) : (i) आप अपनी कहानियों में विशेष तौर पर किन चीज़ों को महत्व देना पसन्द करते है – समाज , प्रकृति इस कुछ और ? (ii) आपकी कहानियाँ औरों की कहानियों से अलग किस प्रकार हैं
जवाब : अमनदीप जी, मैं अपनी कहानियों में मनुष्य को और उसके समाज को महत्व देता हूं. मेरी कहानियों की चिंता का केन्द्र ये  मनुष्य ही रहा है.
-मेरी कहानियां औरो से किस प्रकार अलग हैं ये तो आप जैसे सुधी पाठक ही तय करेंगे. मैं आधिकारिक पात्र नहीं. हां, मैं प्रसिद्ध आलोचक डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव जी को कोट करना चाहूंगा -अवधेश प्रीत की कहानियां आज के उस क्रूर यथार्थ का बयान करती हैं, जिसे छिपाने के अनेक गूढ़ तर्क प्रभुत्वशाली सत्ता में न सिर्फ प्रचलित हैं, बल्कि आतंकित करनेवाले हैं. विडंबना भी उनके लिए भाषा का कौतुक नहीं, यथार्थ का ही हिस्सा है”.
23. *विजय सिंह* : अवधेश जी, आपकी कहानियां  मैं पढ़ता रहा हूँ  आपको सुनने का मौका भी मुझे  मिला है ।  एक कहानीकार  के रूप में  अनगढ़, अनचिन्हें पाठकों ( आलोचकों  की नहीं  )की राय को  आप किस तरह स्वीकारते हैं  ? क्या पाठकों की हिस्सेदारी  से एक कहानीकार  और परिपक्व होता है?  आज जब पाठकों की हिस्सेदारी  कविता  – कहानी में नगण्य है क्या यह चिंता का विषय  नहीं  है? आप इस चुनौती  को एक कहानीकार  के रूप में किस तरह स्वीकारते हैं….
जवाब : विजय भाई, आपने मुझे पढ़ा, सुना है, यह किसी भी लेखक का बड़ा हासिल है. दिल से धन्यवाद. अनचीन्हे और अनगढ़ पाठकों का मुझे बहुत प्यार मिला है, नासिक में एक आइसक्रीम पार्लर चलनेवाला, हरियाणा के एक गांव में ढोर डंगरों के बीच बैठकर कहानी पढ़ते ही फोन करनेवाला, बिजली ऑफिस जाने का काम छोड़कर कहानी पढ़ने वाला पाठक, एक देहाती अस्पताल का कंपाउंडर जब कहानी पढ़कर फोन करे तो समझिये लिखना सार्थक हुआ. ये ही मेरे लक्षित पाठक हैं, इनकी प्रतिक्रिया से समृद्ध होता हूं. आलोचक, विद्वान जब कुछ लिखते हैं तो वह साहित्य समाज में स्वीकृति होता है. सामान्य पाठक की हिस्सेदारी मेरा प्राप्य है.
पाठकों की हिस्सेदारी का ओवरफ्लो नहीं है, लेकिन पाठकों की कमी नहीं है. मेरे पाठक तो कभी भी, कहीं भी मिल जाते हैं. पाठक बढ़ें ये इच्छा तो है, पर चिंता नहीं है, क्योंकि आज भी नॉवेल की मांग बनी हुई है. विजय भाई, जिस लेखक को लगातार  प्रकाशक छाप रहा हो, वह आशान्वित है कि स्थिति बदलेगी. फिलहाल मैं निराश नहीं.
24. *दीपक मिश्र* : (i) क्या वजह है , हिंदी में, कफ़न के बाद वैसी कोई रचना नहीं लिखी जा सकी। क्या हिंदी भाषा “वार्ड न.6” जैसी कहानियों के संवहन में सक्षम है? (ii) नई कहानी का आंदोलन हिंदी साहित्यिक इतिहास में सबसे बड़ा क्षद्म था, क्या आप इस कथन से सहमत हैं?
जवाब : भाई दीपक, अगर कहूं कि भेड़िये,मलबे का मालिक,  डिप्टी कलक्टरी, से लेकर जलते मकान में कुछ लोग कहानियों का नाम लूं कि इन्हें कितना पढ़ा गया? क्या हमारी  अपने पढ़ने की प्राथमिकता को  कई रूढ़ियां संचालित नहीं करतीं? जब हम विश्व साहित्य से तुलना करेंगे तो भारतीय भाषाओं की व्यापकता को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते? बंगला, तमिल उर्दू में बहुत सारा विश्वस्तरीय है. बहरहाल, क्या विश्व साहित्य में’ मैला आंचल ‘है? मेरा विनम्र आग्रह यह है कि हमारे उपमहाद्वीप ने इतिहास में सबसे बड़ी बंटवारे की त्रासदी झेली है, उस पर कहानियां अद्भुत हैं. हर समाज का भूगोल, यथार्थ और संघर्ष की अपनी परिस्थितियां होती हैं, जो रचनाओं में व्यक्त होती हैं. खोल दो, तोबा टेक सिंह, एक चादर मैली सी,तमस,  मिरदंगिया जैसी कहानियां विश्वभाषाओं में नहीं हैं. हम अपनी कहानियों को विश्व में क्यों नहीं पहुंचा पाते? भारतीय भाषाओं के लेखकों /प्रकाशकों के पास प्रमोट करनेवाला  मैनेजमेंट नहीं है. मेरा विचार को अन्यथा न लेंगे.
-‘नई कहानी सबसे बड़ा छद्म था’ का आशय नहीं समझ पाया.मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, अमरकांत, शिवप्रसाद सिंह, मन्नू भंडारी, मार्कण्डेय, शेखर जोशी आदि का लिखा छद्म था? मुझे तो इन लेखकों के लेखन में छद्म नहीं दिखता. नई कहानी की भूमिका में भी नामवर सिंह ने नई कहानी को छद्म नहीं कहा. वह तो नई कहानी के व्याख्याकार के रूप में आज भी याद किये जाते हैं. आपका आशय नई कहानी आंदोलन के अवसान से है, तो हर आंदोलन का एक महत्व होता है. उसे खत्म होना ही होता है ( इस जवाब पर लीना मल्होत्रा के कथन : विश्व तक तो क्या हम उन्हें अपने ही देश के अंग्रेज़ी बोलने वालों तक नहीं पहुंचा पाते। हिंदी पढ़ने को इस देश के आभिजात्य वर्ग ने मूढ़ता से जोड़कर और अब धर्म से जोड़कर इसका इतना नुकसान किया है। प्रकाशक को अपने मुनाफे से मतलब है वह लेखक को सही विक्रय की संख्या तक नहीं बताना चाहता। इस दुष्कर  स्थिति में लेखक बेचारा और निरीह हो गया है।)
दीपक मिश्र: सर दोनों उत्तरों ने सन्तुष्ट नहीं किया। सम्भव है मेरे पूछने में कमी रही हो। लेकिन जिन सन्दर्भों की आपने चर्चा की वे बढ़िया तो हैं, उत्तम भी लेकिन महान नहीं। अंग्रेजी के good और great में जो फर्क है। बहरहाल यह चर्चा निश्चय ही अनेक जाले साफ़ करती है।
अवधेश प्रीत: दीपक भाई, आपको असहमत होने का हक़ है. मेरे उत्तर से आप संतुष्ट नहीं हुए, तो ये मेरी जानकारी की सीमा और मेरी कमतरी है. मैंने good और great सोच कर उत्तर देता भी नहीं, इसलिए मेरे उत्तर अंतिम हों ये कभी नहीं कहा. विषय विशद है, बहस, चर्चा लम्बी हो सकती hai, तो इस पर फिर कभी.
मेरा कुल आशय ये था कि हम विदेशी साहित्य की महानता के मारे हैं और उससे इस कदर ऑब्सेस्ड हैं कि भारतीय साहित्य को कमतर मानने की फ़तवेबाज़ी के शिकार हैं. ऐसे प्रश्नों के ज़वाब कुछ सवालों में ही छुपा हो सकता है, मसलन विदेशी साहित्य में क्या कोई मैला आंचल है? क्या,  कब तक पुकारूं है? गणदेवता है?  राग दरबारी है?
प्रश्न बहुत हैं… मैं धारणाएं नहीं बदल सकता. बस अपनी जानकारी भर पक्ष रख सकता हूं. आशा है, अन्यथा न लेंगे. असहमत होना संवाद की संभावनाओं को प्रशस्त करता है… स्वागत !
25. *कुमार विजय गुप्त* : इनदिनों स्त्री विमर्श विषयक कहानियां खूब लिखी गईं। लेकिन  ये मूल मुद्दे से भटककर देह विमर्श या पुरुष निंदा पर केंद्रित हो गईं । एक कहानी याद दिला दूँ , देह का गणित ! इस तरह का कहानी में प्रयोग , किस प्रकार का संकेत है ?
जवाब : भइया, कुमार विजय, एक मुहावरे में बात करूं तो तुम बिल्ली के गले में घंटी बांध दिये हो… बाबू, आगे तुम बूझो !
-स्त्री के मुद्दे अगर लेखिकाएं उठा रहीं तो ये उनका चयन और वो आकुलता है जिसे व्यक्त करने की उसकी पीड़ा, आकांक्षा है. क्या पुरुष लेखक ने किसी से पूछा था कि वो क्या लिखे? स्त्री कथा लेखन का वितान बड़ा और बहु आयामी हुआ है. वो घर, रसोई, पति, सास बहू के किस्सों से आगे गईं है. उसका मूल्यांकन जब होगा तब संपूर्णता में होगा.
-देह विमर्श में बुराई है? उसकी देह,  उसकी यातनाएं, उसकी आत्मा, उसका सम्मान वह तय करेगी, कर रही… देह अलग नहीं…  टैबू नहीं. हां आप जो यौन संबंधों और चित्रण की ओर खुल कर बोल भी नहीं पा रहे, उसे वह लिख रही… अगर ये साहित्यिक मूल्यों के मानदंड में होगी तो मान्यता पायेगी… वर्ना खारिज़ हो जायेगी. यौन चित्रण के नाम पर अगर आनंद लेने वाला काम कला- कौशल दिखाया गया है तो, उसे मेरा समर्थन नहीं होगा. हिन्दी की अपनी जातीय(कौमी) मर्यादा है.पहले भी ऐसे प्रयोग हुए हैं, उनका ज़िक्र तक नहीं होता. किसी ज़माने में मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘चितकोबरा’ में कहीं थोड़ी-सी यौन संबंधी देह चर्चा  हुई थी, मृदुला आज तक वह गलती दुहरा न सकीं. देह का गणित पढ़ा था… लेकिन उसमें जो रिश्ते में देह सम्बन्ध की बात है, वह आपत्तिजनक है. हां, यौन शोषण का स्याह सच ये है कि लड़कियां /स्त्रियां घर में ही इस इस त्रासदी से गुजरती हैं. लेकिन समाज ने और मुल्कों ने जो क़ायदे कानून बनाये उनका कोई महत्व है या नहीं? अगर उन हदों का उल्लंघन होता है, तो क्या ये अपराध नहीं? देह की ज़रूरत और विवेकपूर्ण नियंत्रण का कोई मनोविज्ञान नहीं? विवेकहीनता की जगह कहीं नहीं. अपराध अपराध है. ऐसे यौन संबंधों की वक़ालत अपराध के पक्ष में खड़ा होना है. आपको याद होगा इडिपस काम्प्लेक्स, मनोविज्ञान में इसका अध्ययन हुआ और ऐसे यौन संबंध को नाम ही इडिपस काम्प्लेक्स हो गया. यानी यह भी एक मनो विकार ही है. प्रश्न है ऐसे संबंधों से  कहानी मज़े ले रही या इसे नैतिक प्रश्न बना रही या इसकी वक़ालत कर रही?
विजय भाई, अभी के लिए इतना ही. आपका स्नेह वैसा ही है जैसा मैं चाहता रहा हूं. इस स्नेह और श्रम के लिए दिल से आभार.
मल्लिका मुखर्जी के पूरक प्रश्न : प्रीत सर, इस प्रश्न के संदर्भ में मैंने एक जवाब लिखा था कि वास्तव में ऐसी घटना हुई है। उससे लिखा जाना चाहिए कि नहीं वह एक अलग बात है। लेकिन मेरा प्रश्न यह है कि देह की जरूरत और विवेक पूर्ण नियंत्रण का कोई मनोविज्ञान है और विवेक हीनता की जगह कहीं नहीं है तो फिर यह बात पुरुष पर भी तो लागू होना चाहिए। एक पिता अपनी बेटी के साथ अगर ऐसा कोई रिश्ता कायम करता है तो उसके लिए आप क्या कहेंगे? मुझे पता नहीं है कि पिता पुत्री के ऐसे रिश्तो पर कुछ लिखा गया है या नहीं लेकिन सुना है। प्रभा खेतान ने ‘छिन्नमस्ता’ उपन्यास में भाई बहन के ऐसे रिश्ते पर विस्तृत लिखा है। पहली बार मैं इस विषय पर इतना खुलकर लिख रही हूं क्योंकि देशज ने बड़े खुले मन से या अवसर दिया है कि साहित्य के हर विषय पर आपसे प्रश्न पूछा जाए।
अवधेश प्रीत  :  मल्लिका जी आपकी उस टिपण्णी को मैंने पढ़ा था. लिखते वक़्त काफी लिखने के दबाव में रहने के कारण उसका उल्लेख छूट गया. मेरे उदाहरण का मतलब कतई पिता पुत्री, भाई बहन या अन्य रिश्तों को छूट देना नहीं है. मेरी बात को उसकी समग्रता में देखें. सभी इस दायरे में अपराधी हैं. नैतिक तौर पर भी और crpc के लिहाज़ से. मैंने तो लेखक /लेखिका की पक्षधरता और उसकी दृष्टि की चर्चा करते हुए इसपर विस्तार से अपनी राय रखी है और इस लेखन को खारिज़ किया है.  अमान्य माना है. कृपया, एक बार उस पोस्ट को पुनः पढ़ें. जो ग़लत hai, वो सबके लिए ग़लत है और मैंने कहीं पुरुष को इस से बरी नहीं किया है. प्रभा खेतान के उपन्यास ‘छिन्नमस्ता’ में जो याद आ रहा, उसमें जो भाई – बहन हैं, संभवतः  वो मुंह बोले है. बहरहाल, ग़लत ग़लत है. 🙏🏻
मल्लिका मुखर्जी : आपकी बात से सहमत हूं सर, गलत हर हाल में गलत है। समाज के कुछ नियम तो अच्छे के लिए ही बनाए गए हैं। छिन्नमस्ता में सगा बड़ा भाई  अपनी सिर्फ 9 साल की बहन के साथ ऐसा बर्ताव करता है और नायिका की 20 वर्ष की उम्र तक यह सब चलता रहता है। इस उपन्यास को पढ़कर मुझे गहरा आघात पहुंचा था कि क्या ऐसा हो सकता है और लिखा भी जा सकता है? इस उपन्यास के लिए प्रभा खेतान को भी बहुत विरोध का सामना करना पड़ा था।
कभी-कभी सच्चाई इतनी भयानक भी होती है। बस मेरा कहना सिर्फ यही था कि अगर ऐसे विषय पर लिखा भी जाए तो कैसे? लिखना भी चाहिए या नहीं।आपने हर प्रश्नों के बहुत विस्तार से और सार्थक जवाब दिए हैं। धन्यवाद सर।
26. *मल्लिका मुखर्जी* : कहानी के जो छह तत्व हैं – कथानक या कथावस्तु, पात्र चरित्र चित्रण, कथोकथन या संवाद, देशकाल या वातावरण, भाषा शैली और उद्देश्य – क्या इनमे से कोई एक या दो तत्व के बल पर कहानी सफल हो सकती है?
जवाब : मल्लिका जी, इन सारे तत्वों से कहानी का एक क़द बनता है, लेकिन क़द से तो काम चलेगा नहीं, थोड़ा मेकअप, गेटअप, वस्त्र विन्यास,केश विन्यास,  चप्पल, सेंडिल, पर्स, वॉलेट आदि भी तो चहिये. इससे एक रूपाकार मिलता  है. थोड़ा कम या  ज़्यादा तो चल जायेगा पर एक दो तत्वों के बूते तो कहानी एकांगी हो जायेगी.
वैसे इस छह तत्वों को अब स्कूली सुविधानुसार विभाजन कह कर नाकारा जाता है, लेकिन मैं इसे बुनियादी तत्व मानता हूं.
27. *अनिल अनलहातू* : प्रीत सर के जवाबों से एक रचनाकार की उज्ज्वल आत्मा और आत्मा के स्निग्ध और मनोहारी उजाले से परिचित हुआ। वैसे उनके निष्कलुष ,निर्मल, निर्ग्रन्थ, निश्छल और पारदर्शी रूह से रूबरू होने के एकाधिक अवसर मिले हैं।
इन जवाबों में मुझे प्रीत सर का यह कथन सर्वाधिक पसंद आया कि -“रचनात्मक लेखन के लिए अपनी संवेदना को बचाये रखना पड़ता है …और मुझे पद्य पढ़ने और गद्य लिखने में आनंद आता है।”
मेरा स्पष्ट मानना है कि एक मनुष्य के रूप में यदि एक लेखक में इंसानियत,मनुष्यता और व्यापक चराचर जीवन और जगत के लिए करुणा ,सहानुभूति ,तदनुभूति और एकात्म का भाव नहीं है तो उसकी  रचनाएं तथा एक रचनाकार के रूप में वह खुद पाठकों के साथ कभी तादात्म्य नहीं बैठा सकता।
इसी परिप्रेक्ष्य में मेरा एक प्रश्न है कि क्या हमारे चारों पसरे जीवन और जगत के यथार्थ को भाषा और शिल्प के कौशल और सामर्थ्य से कला के उत्पाद में ढाल देना ही रचनाशीलता है ,रचनाकार की मौलिकता है ? या इसमें रचनाकार के जीवनदृष्टि द्वारा यथार्थ का चयन और उस चयन को प्रस्तुत करने का लोकेशन और गेज़ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ? पूरी कायनात ही, जड़ -चेतन सभी रचना का विषय हो सकते हैं ,लेकिन एक रचनाकार के रूप में विषय वस्तु का चयन कितना जरूरी है ? क्या हर रचना व्यक्ति और समाज की बेहतरी और एक नई दिशा देने के लिए नहीं लिखी जाती ?
जवाब : प्रिय अनिल, आपने हर बार संवेदनशील मनुष्य होने के लिए प्रेरित किया है. आपकी विनम्रता, सदाशयता का मैं अधिकारी हूं, ये मेरा सौभाग्य है. आपकी कविताओं और गहन अध्ययन के हम सभी क़ायल हैं.
-भाई, आपके प्रश्न में कई प्रश्न जुड़े हैं.कोशिश करता हूं, अपने अध्ययन और समझ से हासिल विचार को शेयर करने की. भाषा और शिल्प के बाबत मैनेजर पांडेय के ज़रिये बात स्पष्ट करना चाहूंगा, ‘नये के नाम पर कुछ लोग भ्रमवश या चालाकी से नये प्रत्ययवादी सौंदर्यशास्त्र को, जो बुर्जुआ संस्कृति और कला के संरक्षण का शास्त्र है, इसे हमारे लिए उपयोगी न सिद्ध करने लगें, इसके लिए यह ज़रूरी है कि हम तय कर लें कि हमे नये प्रत्ययवादी सौंदर्यशास्त्र की ज़रूरत है या मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र की? ‘ मैं समझता हूं आपके प्रश्न के पहले हिस्से की उत्सुकता का शमन हुआ हो.
-मेरी समझ से जीवन -जगत के यथार्थ को भाषा शिल्प के कौशल से कला के उत्पाद में ढाल देना रचनाशीलता नहीं है.रचनाकार की जीवन दृष्टि द्वारा यथार्थ का चयन ज़रूरी है. इस बाबत नामवर सिंह कहते हैं, ‘कहानीकार की सार्थकता इस बात में है कि वह युग के मुख्य सामाजिक अंतर्विरोध के संदर्भ में अपनी कहानियों की सामग्री चुनता है.’ कहानी महज़ घटना, वस्तु और भावना-विचार का संघटन है. वह मनुष्य का यथार्थ है. कहानी की इस संरचना का संबंध सीधे उस यथार्थ से है, जिसे वह मूर्त करती है. अब लोकेशन की बात, इस पर किसी प्रश्न के उत्तर में अमेरिकी लेखक औरी प्येर को उद्धृत किया था कि कथा-साहित्य और उसकी रुचियों के लिए इतिहास में कम महत्वपूर्ण उसका भूगोल नहीं है. ज़ाहिर है वह लैटिन अमेरिकी साहित्य और अफ़्रीकी साहित्य की ओर संकेत कर रहे थे. हमारे लिए किसी भी विमर्श से परे लेखक की पक्षधरता ज़रूरी है. दलित, वंचित, शोषित के पक्ष में, न्याय और मानवीय गरिमा की हिमायत में खड़ा होना लेखीय दायित्व है. गेज़ भी उतना ही ज़रूरी है. यथार्थ की पहचान का प्रश्न अगर जीवन से जुड़ता है तो उसे जीवन दृष्टि का परिणाम होता है. सुरेन्द्र चौधरी कहते हैं, ‘ ठंडे , जमे हुए और प्रायः बासी दिखने वाले यथार्थ को वह नया अर्थ और आशय देता है. ‘  मैं समझता हूं आपके प्रश्नों के आसपास पहुंच पाया होऊं.
-कल फर्स्ट हैंड जो लिखा था वह सहज निःसृत प्रवाह था, उसके ग़ायब होने का मलाल है. आज जो लिखा कल के लिखे को याद कर कर के लिखा . हो सकता है, प्रवाह बाधित हुआ हो. अब तो जो है वो है ही.
28. *प्रभात मिलिंद* : मेरे दो सवाल : (i) केवल विचार कहानी या कविता नहीं हो सकते और विचारहीन रचनात्मकता का भी कोई औचित्य नहीं। इस मानक पर कथा-साहित्य में सरोकारों और भाषिक सौष्ठव का कैसा अंतर-अनुपात होना चाहिए? आप अपनी कहानियों में इसे कैसे बरतते हैं?
(ii) हमारे रचना-जगत से अब प्रकृति और मनोविज्ञान धीरे-धीरे बहिष्कृत होता जा रहा है। ऐसा लेखन अब कलावादी रचनात्मकता के नाम पर खारिज़ कर दिए जाने की नई परिपाटी शुरू हो गई है। मौजूदा लेखन समस्यामूलकता के बहाने अधिक स्थूल दिखता है। क्या हमारी विविध समस्याओं का कारण व्यक्ति और प्रकृति के बीच समन्वय और मन की जटिलताओं की मौलिक समझ का अभाव नहीं है? सनद रहे, मैं रोमांटिक लेखन के पक्ष में कतई नहीं हूँ किन्तु कल्चर्ड लेखन के विपक्ष में अवश्य हूँ। आपकी राय जानना चाहूँगा।
जवाब : प्रभात भाई, भाषिक सौष्ठव और सरोकारों का कैसा अंतर -अनुपात होना चाहिए? इस बाबत कहना ये है कि ये अंतर अनुपात तो गणित है, हुनर नहीं.मैं हुनर मानता हूं और सरोकार से जोड़ता हूं. आपका सरोकार क्या है? सरोकार से तय होता है आपका नैरेशन   क्या है और उसकी दिशा क्या है? मैनेजर पांडेय कहते हैं, नये के नाम पर कुछ लोग भ्रमवश या चालाकी से नये प्रत्ययवादी सौंदर्यशास्त्र को जो बुर्जुआ संस्कृति और कला के सरंक्षण का शास्त्र है, हमारे लिए उपयोगी न सिद्ध करने लगें, यह ज़रूरी है कि हम तय कर लें कि हमें नये प्रत्ययवादी हमे नये प्रत्ययवादी सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता है या मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र की? ‘ इस अर्थ में मेरे लिए सरोकार का अभीष्ट प्रमुख है, जिसे मैं भाषिक सौंदर्य में नहीं उलझा सकता. इसे बरतने के लिए कहानी में क्या कहना है, वह मेरी प्राथमिकता रहती है, भाषा का सौष्ठव मेरे लिए आत्मिक सुख नहीं, न ही विलासिता है, वह सिर्फ टूल है, जिसे यथार्थ को लक्षित करके चलना होता है.
-रचना जगत से प्रकृति और मनोविज्ञान बहिष्कृत हो रहा,. भाई प्रकृति पर कहानी लिख रहे तो ठीक, निबंध तो लिखना नहीं, आशय यह कि जब रचना में प्रकृति की उपस्थिति है, तो ही तो प्रकृति का चित्रण आयेगा. जब आप बाज़ार, उपभोक्ता, अपार्टमेंट , मॉल, मेट्रो की कहानियां लिखेंगे तो प्रकृति से पाला पड़ेगा कहां? जब कहानी में गांव, किसान नहीं आयेगा तो प्रकृति कहां से आएगी? प्रकृति जब जीवन से बहिष्कृत है तो साहित्य से तो बहिष्कृत  होगा ही. मनोविज्ञान पर आपके प्रश्न से बहुत सहमत नहीं हूं. मनोवैज्ञानिक कहानी और कहानी में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण दो बातें हैं, दोनों में फ़र्क है. मौज़ूदा लेखन समस्यामूलक होने के बहाने अधिक स्थूल दिखता है, भाई, क्या पूस की रात, दोपहर का भोजन में स्थूलता है. समस्या पर लिखना और समस्यामूलक यथार्थ को कथ्य के ज़रिये ट्रीटमेंट करना ज़रूरी होता है. सुरेन्द्र चौधरी कहते हैं, यथार्थ में सिर्फ यही नहीं होता कि क्या है, बल्कि क्या होना चाहिए, यह भी यथार्थ का एक नैतिक हिस्सा है. जो स्वप्न है, जनता की आकांक्षाएं हैं, वह भी यथार्थ है और इनका चित्रण किया जाता है तो इससे यथार्थ की कोई क्षति नहीं होती है. ‘कल्चर्ड लेखन के विरुद्ध मैं भी हूं. कॉसमेटिक लेखन से कहानी की क्षति तो नहीं होगी , हां, ऐसी कहानी की उम्र कितनी होगी, ये तो समय बताएगा.  In the end, fiction is the craft of telling truth through lies.
29. *प्रभा मुजुमदार* : अवधेश प्रीत जी ,क्या आपको लगता है कि संवेदनशील और समर्थ रचना, आज भी समाज की सोच को प्रभावित करती हैं?
जवाब : प्रभा जी, समर्थ रचना समाज को प्रभावित करती है. उदाहरण के लिए वो किताबें या रचनाएं जो प्रतिबंधित की जाती हैं, उसकी वज़ह क्या है? सोज़ेवतन, गणदेवता से लेकर सैटेनिक वरजेज तक तमाम मिसालें हैं. प्रेमचंद कहते थे साहित्य बदलाव नहीं लाता, बदलाव के लिए प्रेरित करता है, मशाल दिखाता है. मेरा विश्वास है कि समर्थ रचना समाज के सोच को प्रभावित करती है, तभी तो उन्हें समाज तक न पहुंचने देने के सारे उपक्रम ज़ारी हैं. शिक्षा में साहित्य की उपेक्षा, लइब्रेरी तक का खात्मा, समाज में साहित्यकार का उपहास को बढ़ावा देने का अर्थ ही है, व्यवस्थित ढंग से साहित्य को केंद्रीय चिंता और ज़रूरत से दूर कर दो. मनोरंजन के सारे संसाधनों को समृद्ध, आधुनिक और सबके लिए सुलभ करा दो. मुझे तो सब कुछ एक दूसरे से गुंथे लगते हैं.
30. *सुषमा सिन्हा* : मेरे भी कुछ प्रश्न- क्या लेखक का किसी कहानी में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहना ठीक नहीं ? यानी कि ‘मैं’ के द्वारा कहानी कहा जाना। क्या इससे कहानी  कमजोर मानी जाती है ?
कहानी में आदर्शवाद की क्या जगह है? उसका कितना महत्व है? समाज व्याप्त ब्लैक एंड ग्रे शेड्स आदर्श से हट कर होते ही हैं। तब क्या कहानी खराब हो जाती है ?
जवाब : सुषमा जी, ज़रूरी प्रश्न. लेखक का किसी कहानी में बतौर एक पात्र उपस्थित है, जैसा आपने कहा  ‘मैं’ के द्वारा कहानी कहा जाना तो ‘मैं’एक पात्र है, वो गृहिणी, वर्किंग लेडी, क्लर्क, इंजीनियर, डॉक्टर कुछ भी हो सकती /सकता है. इसमें कोई बुराई नहीं. आपत्ति तब होती है, जब लेखक कहानी का भाष्य करने लगता है, कहानी में आकर उपदेश देने लगता है  लेखक जो कहना चाहे कहानी के पात्र, घटना, ट्रीटमेंट के ज़रिये कहे तो कोई दिक्क़त नहीं. सुषमा जी, शायद बात स्पष्ट हुई हो. 🙏🏻
-कहानी में आदर्शवाद की बात !इसे उसने कहा था और पंच परमेश्वर के ज़रिये समझिये. नैतिक संकल्प की यह भंगिमा हिन्दी नवजागरण और राष्ट्रीय जागरण की भंगिमा थी. लेकिन वही प्रेमचंद आगे चलकर इस आदर्शवाद से निकल जाते हैं, क्यों? ये आदर्शवाद क्या है, इसे समझना जरूरी है और ये भी कि वह उपकारी अवधारणा से पुष्ट नहीं होती. मान लीजिए, सदा सच बोलने, गरीब का भला करने, पुण्य का फल मिलता है, दान करने आदि में आदर्श दिखता है, लेकिन ये आदर्शवाद नहीं है. ईमानदारी आदर्श है, लेकिन ये आदर्शवाद नहीं है. ह्रदय परिवर्तन एक मनो भाव है, आदर्शवाद नहीं. एक बेहतर दुनिया हो, समाज हो, लोग नफ़रत से लड़ें, भूख, गरीबी से लड़ें ये भी तो आदर्श स्थिति की चाहना है… लेखन का उद्देश्य भी तो यही है.
-ब्लैक एंड ग्रे शेड्स से मनाही कहां, लेकिन उसके कार्य कारण तो बताना  होगा. फिल्मों में भी अपराधी हीरो आदर्श नहीं होता… ‘ .. वह सत्य किस यथार्थ से जन्मा है और उसका कहानी में क्या रोल है, इससे तय होगा उसका अच्छा या ख़राब होना
सुषमा मैम, शायद मैं कुछ स्पष्ट कर पाया होऊं.
31. *रमेश ऋतम्भर* : भईया मेरा भी अंत में सवाल जोड़ लीजिएगा कि ‘क्या लेखक बनना आपका सपना था?’ या ‘आपने लेखक होना ही क्यों चुना?’,  ‘आपके लेखन का मूल ध्येय क्या है ? या ‘आप क्यों लिखते हैं?’ और ‘क्या आपने अपना श्रेष्ठ रच लिया है?’
जवाब : रमेश मेरा बाबू, मेरा सपना तो डॉक्टर बनने का था, लेकिन शेष कथा तुम जानते ही हो. पढ़ना मेरे घर में रिचुअल की तरह था, रोज जैसे लोग विभिन्न मंत्र पढ़ते हैं मेरे घर में पत्रिकाएं, किताबें साहित्य पढ़ा जाता. स्कूली दिनों में कुछ कुछ लिखने लगा, हाई स्कूल में था, जब मेरी बाल कविता नवभारत टाइम्स दिल्ली में छपी, संपादक थे अज्ञेय. खुश होकर शिव दा (शिव दत्त ) ने चाय और बिस्कुट फ्री में दिया. धीरे धीरे लिखने लगा, छपने लगा.कॉलेज के दिनों में किसी को इम्प्रेस करने के लिए लिखने लगा. बाद में ये रोग लग गया. नौकरी का वक़्त आया तो पत्रकारिता चुना, ये लिखने पढ़ने का काम था. बाक़ी उद्भव और अब तक की यात्रा को तुम जानते हो.
-लेखक होना चुना, क्योंकि मैं और कुछ और जानता ही नहीं था.
-लेखन का मूल ध्येय अंत्योदय. (इसे किसी वाद विवाद से न जोड़ा जाय )
-क्यों लिखता हूं? सारी रामायण हो गई और सीता कौन?
-हर बार जो लिखता हूं, लगता है वो श्रेष्ठ है. लेकिन कोई मानता ही नहीं. इसलिए लिखना ज़ारी है-
 दोनों हैं आमने -सामने, देख लो क्या कर दिया प्यार के नाम ने. और अंत में —
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के.
रमेश ऋतम्भर : आपकी साफगोई, सहजता और सरोकार को सलाम। कोई माने या न माने हम कुछ तो भईया मानते ही हैं कि आपने अपनी कतिपय श्रेष्ठ रचना रच ली है। वैसे यह लोभ-आशा तो सबको लगी ही रहती है कि सिद्ध कथाकार अवधेश प्रीत की कलम से कुछ और श्रेष्ठ व धारदार आए। यह आशा-उम्मीद ही लेखक से भी कुछ और लिखा ले जाती है, जिसका आपने बखूबी जिक्र किया है। आपके जवाब और प्रतिबद्धता के लिए एक बार फिर साधुवाद-सलाम।
32. *डॉ आरती कुमारी* :  एक अच्छा पाठक कैसे बन सकते हैं? किस प्रकार की तैयारी, कैसा साहित्य शुरू से पढ़ना चाहिए, विशेषकर युवा ?
जवाब : आरती जी, अच्छा पाठक तो हर कोई है, बस या तो वो पढ़ता नहीं या पढ़ने के महत्व को नहीं जानता. साहित्य पढ़ना अपने संवेदनात्मक ज्ञान को विस्तार देना और संवेदना को निरंतर परिष्कृत करने में है. साहित्य पढ़ने के लिए जिज्ञासु होना ज़रूरी है. तैयारी क्या… ये बहुत मुश्किल प्रश्न है… हम तो पढ़ते पढ़ते पढ़ने लगे यही कह सकता हूं… देखिये कैसा साहित्य शुरु से पढ़ना चाहिए का ज़वाब भी मुश्किल है… हमने , हमारी पीढ़ी ने तो गुलशन नंदा,रानू, ओमप्रकाश शर्मा से शिवानी, चतुरसेन, गुरुदत्त से होते हुए शरतचन्द्र और प्रेमचंद तक पहुंचे. दरअसल, तय ये करना होता है कि हम  सिर्फ मनोरंजन चाहते हैं या ज्ञान के नये क्षितिज को जानना चाहते हैं?
शुरु से अच्छा साहित्य पढ़ना ज़्यादा श्रेयस्कर होगा. युवा को तो मनोरंजन ही नहीं, दुनिया बदलने वाले साहित्य पढ़ना चाहिए.
33. *अरुण शीतांश* : प्रीत सर, गंभीर साहित्यकार का क्या परिभाषा है? उसकी रचना गंभीर होनी
       चाहिए या गंभीर व्यक्तित्व.
जवाब : साहित्यकार वह है जो गंभीर रहता है, वो उतना ही मुस्काये जितने में होंठ हिलें, बोले उतना ही
       जितना ख़ुद को ही सुनाई दे और अपने अलावा सबको हीन समझे.-रचना गंभीर नहीं,  तो व्यक्तित्व को
       लेकर पाठक क्या करेगा? उसकी रचना गंभीर होनी चाहिए या गंभीर व्यक्तित्व।
*इन्दुबाला का कमेन्ट* : आजकल ऐसे ही लोग अपने को गम्भीर लेखक साबित करते हैं सर! बड़ी
मुश्किल से किसी पर लाइक कमेंट करते हैं,बड़े मुश्किल से मुस्करा पाते हैं और छपाई,विमोचन का मकडजाल बुनते रहते हैं।फ़िर जब छपाई और विमोचन हो जाता है तब इनबॉक्स में पुस्तक की कीमत और कहाँ मिलेगी का पता बताते रहते हैं,उससे भी जी नहीं भरता तो खुद ही की किताब उपहार में बाँटते रहते हैं .
*मीनाक्षी कांडपाल* से प्रश्न मांगने पर स्पष्ट कहा कि सर से किये गए प्रश्न व उनके संतुलित उत्तर को पढ़कर  ऐसे ही आनंद आ रहा है । अवधेश सर से प्रश्न करने की मुझमें तो हिम्मत नहीं !
*डॉ राजवंती मान* : आज की  शाम पिछले दो दिन से देशज पर आ रहे सवाल और अवधेश प्रीत सर के  जवाब पढकर सार्थक हुई।  कहने की आवश्यकता नहीं कि देशज का  हिस्सा होना और अवधेश प्रीत जी जैसे   उत्कृष्ट साहित्यकार का सान्निध्य  प्राप्त होना किसी भी रचनाकार के लिए कितना महत्वपूर्ण है।  अनेक बार रचना प्रक्रिया के संबंध में  कई तरह के प्रश्न  संशय मन में उठते रहते हैं . यहाँ मित्रों के प्रश्नों और अवधेश प्रीत के तर्कसंगत जवाबों और   दिये गये  उद्धरणों  से मेरी  कई  उलझनें दूर हुईंं ।  पिछले दो दिवसीय देशज की पूरी प्रोसीडिंग्स  को  सहेज कर रख लिया  है  ताकि संदर्भ की तरह प्रयोग किया जा  सके । प्रीत सर आपका हार्दिक आभार।
*गजाला तबस्सुम* : आज प्रीत सर के सभी प्रश्नों के उत्तर पढ़ पाई। कुछ सवाल मुझे भी करने थे लेकिन उनके जवाब इन्हीं उत्तरों में मिल गए। बहुत गर्व महसूस कर रही हूँ कि प्रीत सर जैसे साहित्यकार के सम्पर्क में हूँ।ऊपर से  साक्षात्कार पढ़ते हुए मेरे मन मे ही यह विचार आ रहा था कि क्या ही अच्छा हो अगर यह साक्षात्कार कहीं प्रकाशित हो जाए।कहानी लेखन से जुड़े बहुत से लोग लाभान्वित हो पाएंगे।बाद में गीता जी ने जैसे मेरे मन की बात सुन ली। इस साक्षात्कार से बहुत कुछ सीखा,कई नई बातें भी पता चली।शुक्रिया सभी साथियों का , प्रीत सर का और देशज का।
मित्रों, मेरी विजय जी से कल हुई चर्चा में उम्मीद थी दसेक प्रश्न आ जायें तो सेशन निभ जायेगा. यहां तो सारे रिकॉर्ड ध्वस्त हो गये. सभी मित्रों ने खूब खूब जिज्ञासाएं जताई हैं. आभार

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