हिन्दी ग़ज़ल पर नक्काशियों की व्यापकता 

                                                                                                                          – अनिरुद्ध सिन्हा

हिन्दी ग़ज़ल के परिवेश और परंपरा को लेकर हिन्दी आलोचकों की ओर से  प्रायः नकारात्मक बयान आते रहे हैं । उनका मत है कि हिन्दी साहित्य में स्वतंत्र रूप से इसका वर्णन नहीं मिलता । यह सच है भी इसलिए कि इन्हीं आलोचकों के द्वारा इतिहास लिखा  गया  और लिखा जा भी रहा है । हिन्दी ग़ज़ल पर बात करने के लिए दुष्यंत कुमार और इनके  समकालीनों की ग़ज़लों तक जाना पड़ेगा क्योंकि समकालीन हिन्दी ग़ज़ल की जड़ें अधिकतर दुष्यंत कुमार के काल की ग़ज़ल में हैं  । ऐसे तो दुष्यंत कुमार के पूर्व भी ग़ज़लें लिखी गईं लेकिन वे सारी ग़ज़लें लेखकीय प्रतिबद्धता के अभाव में चर्चा में नहीं आ सकीं या आलोचकों के द्वारा नोटिस नहीं ली गई । खैर, दुष्यंत और उनसे पूर्व के ग़ज़लकारों मतलब इन दोनों परम्पराओं का सार्थक भाव रखकर दोनों को सामर्थ्य के साथ आत्मसात करते हुए ग़ज़ल लिखनेवालों में दुष्यंत कुमार आधुनिक काल के पहले ग़ज़लकार हैं । मैं समझता हूँ इसपर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।  ग़ज़ल की गंभीरता उसमें व्यक्त भावों की तीव्रता में निहित है।  , दुष्यंत जैसी गंभीरता बहुत कम ग़ज़लकारों में मिलती है  । प्रत्येक काल में साहित्य अपने गहरे संवेदनात्मक संस्पर्श का अहसास छोड़ जाता है । दुष्यंत की ग़ज़लों की प्रासंगिकता और उसकी तरलता को इससे जोड़कर देखा जा सकता है । हिन्दी ग़ज़ल की सामाजिक यथार्थवादी परंपरा का अधिकारी दुष्यंत को ही माना जाता है ।

दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें  आपातकाल की ऊपज हैं । दुष्यंत कुमार ने  ग़ज़ल से  सम्मानसूचक और मांसल प्रेम के शब्दों को बाहर किया ।उनकी ग़ज़लों के शेर आंदोलन के स्वर बने । पाठकों और श्रोताओं की मुहब्बत का अवार्ड उन्हें  दिल खोलकर मिला । उनके ढेर सारे अशआर आज भी सुने जा सकते हैं । केवल  चंद अशआरों से ही उनकी ग़ज़लों की महत्ता को आँका जा सकता है ………कहाँ तो तय था चिरागा हरेक  घर के लिए ……एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो ….आदि । हम यह भी कह सकते हैं दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें विचार और अवाम से सीधे- सीधे जुड़ी हुई हैं ।कई –कई रंगतें एक साथ प्रकट होती हैं । कभी –कभी तो

बूंद –बूंद  टपकती हुई शबनम की बूंदों की नशीली आवाज़ के साथ समय की दुश्वारियां आँखों में लहू उतार देती हैं । यह कमाल है उनकी ग़ज़लों का । दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों  में यथार्थ और देश प्रचलित बोलचाल की भाषा दोनों को महत्व दिया । यही कारण है कि उर्दू सहित अन्य भाषाओं में भी उनकी ग़ज़लों के मूल्य और यथार्थ नकारे नहीं जा सके ।

ग़ज़ल का समकालीन परिवेश विश्व की  अन्य कई भाषाओं में जीवन- यथार्थ के साथ जुड़ चुका है । कहानी और उपन्यास के बाद अगर कोई विधा का प्रसार इतना बढ़ा है तो वह ग़ज़ल है । यह जीवन और विश्व के दुर्भाग्यों को धीरे -धीरे खोलते हुए आगे बढ़ रही है । इसका कारण है ,संवेदना और सरोकार से गहरा लगाव,जीवन के साथ छंद का महत्व,  करुण लय की एक गहन अंतर्धारा का प्रवाह   ।

आज जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं उनमें भोगा हुआ दर्द और उस दर्द की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त विश्व में घटित होनेवाली घटनाओं के यथार्थ का वर्णन मिलता है । यथार्थ के प्रति हमारी दृष्टि या बोध को निर्धारित करते हुए हमें विश्व के नए रूपों और प्रकाशन से दर्शन करवाती हैं ….

ये सारी सरहदें बन जाएंगी पुल देखना एकदिन

पुकारेगी  कभी  इंसान  को  इंसान की  चाहत

अशोक मिजाज

आज के संश्लिष्ट विश्व की जटिल अनुभूतियों को उसकी सम्पूर्ण जटिलता को खारिज करते हुए अशोक मिजाज ने गुदगुदाती ऊष्मा का एहसास कराया है । ग़ज़ल की यही विशेषता भी है कि वह लहूलुहान परिस्थितियों पर मरहम डाल देती है । यह सौंदर्यबोध अगर आलोचकों को पसंद नहीं है तो समझ लेना चाहिए कि उनके सकारात्मक सपने जलकर राख हो चुके हैं । एक सच्चे कवि को दो कार्य करने पड़ते हैं ….एक ओर वह विधेयात्मक होता है तो दूसरी ओर निषेधात्मक और विरोधात्मक । आज की शब्दावली में इसे संरचनात्मक व विकेन्द्रीकरण ,संकेंटरण और संरचनात्मक कहा गया है । अशोक मिजाज का ग़ज़ल संसार इन दोनों को समाहित करता है ….जो मान्य है ,उसे स्वीकार करते हैं और जो त्याज्य है ,उसे अस्वीकार ।

अशोक मिजाज आगे कहते हैं ….

लहू का रंग गाढा और हल्का हो भी सकता है

मगर ये  एक  जैसे  हैं तेरे आँसू मेरे आँसू

यद्यपि दुष्यंत युग के ग़ज़लकारों ने पूरी शिद्दत के साथ ग़ज़ल –रचना शुरू कर दी थी उसमें अपेक्षित अभिव्यंजकता और सफाई भी थी मगर विश्व दर्शन थोड़ा कमजोर रहा । खैर यह अलग बात है । साहित्य की दशा और दिशा काल और समय निर्धारित करता है ।

किसी भी कवि की कविता,ग़ज़ल या कोई अन्य विधा हो उसमें उसका गंभीर वक्तव्य छुपा होता है जो पाठकों और कवि का  रिश्ता तय करता है । आलोचकों का यह भी आरोप है कि ग़ज़ल में अपनी भाषा विस्थापित हो रही है …अपने ही देश में परायी हो रही है । हाँ उनकी यह चिंता हद तक जायज भी है । कुछ ऐसे ग़ज़लकार जो स्वयं को हिन्दी ग़ज़लकार कहते हैं अपनी ग़ज़लों में उर्दू और फारसी के शब्द ठूँसते नज़र आते हैं । लेकिन कुछ ऐसे भी ग़ज़लकार हैं जिनकी हिन्दी के प्रति प्रतिबद्धता को खारिज नहीं कर सकते । यह सच है भाषा ही साहित्य को प्राकृत दिशा में  लाती है और पाठकों से जोड़ती है इस दिशा में ज़हीर कुरेशी,चन्द्रसेन विराट आदि की ग़ज़लें काफी सुकून देती हैं ।

कुछ  लड़ाके  लोग  संघर्षों  की  गाथा  बन गए

लोक –जीवन में ,वो जन मानस के वक्ता बन गए

या ………   खरीद  लेते  हैं  संसद  खरीदने  वाले

हों कल विदेशी ही शायद खरीदने वाले

ज़हीर कुरेशी

ज़हीर कुरेशी समय की तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बुनयादी लेखकीय सौंदर्य –दृष्टि

को बचाए रखते हैं । इनके भीतर आंतरिक क्षरण बाहरी दुनिया का विध्वंस नहीं है ।

ज़हीर कुरेशी के भीतर चिंतन और आशा की परस्पराश्रित स्थिति पर विचार करने पर यह संकेत अवश्य मिलता है कि उनकी असंदिग्धता ,कथ्य की एकाग्रता और अंतर्निष्ठा विदेशी विकास स्वप्नों की ओर है । ग़ज़ल की जो अपनी परिभाषा है कि यह संकेतों में बात करती है।  ज़हीर कुरेशी ने इसे प्रमाणित किया है । ऐसी भी बात नहीं है कि इनकी ग़ज़लों में क्षणिक आवेग , पराजय,अवसाद सीनिसिज़्म और नियतिवाद से समझौता है । एक अनोखे ऐंद्रिक लगाव

के साथ ग़ज़ल का रूप देते हैं । वहीं दूसरी ओर अदम गोंदवी की ग़ज़लों में दुख,क्रोध ,संकल्प निराशाएँ ,अपराधबोध और आत्मदयाएँ के चित्र उभरकर सामने आते हैं । हम इसे प्रतिरोध का साहित्य भी  कह सकते हैं जो भविष्य में नारों की शक्ल अख़्तियार कर लेता है और स्थूल असंतोष या कामचलाऊ से आरोपित हो जाता है………

मुक्तिकामी चेतना  अभ्यर्थना  इतिहास की

यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की

या …..

सभ्यता की मौत के डर से उठाए हैं कदम

ताज की  कारीगरी  या चीन की दीवार है

अदम गोंदवी

यह मानता हूँ समकालीन हिन्दी ग़ज़ल ने अपनी संवेदनाओं का विस्तार किया है लेकिन इसकी मासूमियत के साथ भी धोखा नहीं किया जा सकता । मुनव्वर राणा के इस कथन के आकर्षण –विकर्षण को भी देखा जा सकता है …जब तक लहजे में हलावत न हो ,लफ़्ज़ों में ज़िंदगी की हरारत न हो ।कलम की नोंक में तीर जैसी छटपटाहट न हो ,तहरीर में बेसाख्तगी न हो ,ज़ुबानों –बयान पर कुदरत न हो ,ज़ेहन में फलसफए-हयात की मुकम्मल तस्वीर न हो ,चेहरे पर कई रतजगों की थकन न हो ,आँखों से खूने –दिल न टपक रहा हो ,फिक्र के अंगारे न दहक रहे हों ,ग़ज़ल के खूबसूरत होंठ प्यासे ही रहते हैं ।

जाहिर है अदम गोंदवी का मिजाज यही  है । उनके अनुभव पीढ़ी दर पीढ़ी परिवर्तित होते गए और इस शृंखला में नए विरोधात्मक अनुभव स्वयं जुड़ते चले गए । इस प्रकार उनकी ग़ज़लों में आदिम मन और नए मन का सामंजस्य है उनका नया मन आदिम का प्रतिलोम नहीं ,पूरक है।

आधुनिक की धारणा विश्व साहित्य के केंद्र में है । विश्व साहित्य में संस्कृति को मिथक के रूप में लिया जाता है जो भारत जैसे देश के परिप्रेक्ष्य में मूल्यबोध के हनन के रूप में देखा जाता है । हिन्दी ग़ज़लकारों ने इस विषय को गंभीरता से लिया है । लेना भी चाहिए क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने परिवेश के मूल्यबोध के सहारे ही  आगे बढ़ता है । मैं समझता हूँ परिवेश अपने आप में जिज्ञासा और संधान का सार्थक क्षेत्र है ……

बदल न पाए कभी ख़ुद को ,सिर्फ बदले रंग

नकल उसी की करें हम यहाँ तो क्योंकर हो

सुल्तान अहमद

अपनी हस्ती को भुलाकर बेचेहरा होने की ख़्वाहिश पर  सुल्तान अहमद  संकेत के माध्यम से कटाक्ष करते हैं । उन्हें अपनी खुद्दारी का एहसास है । विदेशों की दहलीज़ पर मत्था टेकना अपनी मुहब्बत की कमी की ओर इशारा करता है ।कथ्य की वास्तविक सामर्थ्य शब्दों के उचित रख –रखाव से ही उजागर होती है । शब्द ही साधन हैं और साध्य भी ।

आज का यथार्थ हमें परेशान ही नहीं करता ,बेचैन भी करता है ,आज पूरा विश्व धर्म और आतंक के चंगुल में फंसा हुआ है , एक ओर जहां पौराणिक चमत्कार ,कृत्रिम भावजगत ,के नए तरीके अपनाए जा रहे हैं। जड़ –सैद्धांतिकी विरोधाभासी व धर्म आधारित संदिग्ध नियमों के आधार पर विश्वव्यापी वर्चस्व स्थापित करने की कोशिशें की जा रहीं हैं वहीं दूसरी ओर नई आर्थिक नीति के नाम पर मुट्ठी भर पश्चिमी देशों की दलाली भी हो  रही है । । हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए साहित्यकार भी एक सांस लेनेवाला जीव है ,उसे भी शांति, हवा और साफ वातावरण की आवश्यकता होती है । विश्व के बदलते रूपों को हिन्दी ग़ज़लकार अपने नजरिये से देखते हुए लगातार विरोध कर रहे हैं । यहाँ पर यह कह देना भी मैं उचित समझता हूँ कि हिन्दी ग़ज़लकारों की अनुभूति महज बौद्धिकता तक ही सीमित नहीं है बल्कि गहरे अर्थ बिम्ब के साथ पाठकों के समक्ष उपस्थित भी होती  है । अपनी कष्टदायी अनुभूति के साथ लक्षणिक संकेत के रूप में बहुत कुछ कहने में सक्षम हैं आज के हिन्दी ग़ज़लकार  ……….

आसमां से उठ रहा  काला धुआँ  किससे कहें

घर के लोगों ने जला डाला मका किससे कहें

इस तरह मुमकिन है बस तेरा मका रह जाएगा

सारी बस्ती  जल गई तो तू कहाँ  रह  जाएगा

जाने कब महसूस  करोगे  गहराई बाज़ारों की

घर आँगन सब लील गई है परछाई बाज़ारों की

…….माधव कौशिक

माधव कौशिक ने अपने शेरों में आज की विपरीत प्रवृतियों का चित्रण किया है और इनका यही वैपरीत्य का सुंदर समन्वय इनकी ग़ज़लों की पहचान है।

हिन्दी काव्य के वर्तमान काल को सामाजिक यथार्थवादी ग़ज़लों का युग भी कह सकते हैं क्योंकि साहित्य की वर्तमान काव्य विधाओं में ग़ज़ल की धारा ही सबसे सशक्त और विस्तृत है ।प्रेम से लेकर आतंक और गरीब होते हुए दर्शनों को काफी करीब से देखा,भोगा और महसूस किया है इसने। आज पूरा विश्व  पूंजीवादी चिंतन  के  साथ अपने भविष्य का सम्पूर्ण आकलन कर रहा है ।  पारिवारिक रिश्तों की चौहद्दी  भी छोटी  हुई  है। नई पीढ़ी विशेष रूप से प्रभावित हुई है । विज्ञापन के इस दौर में आर्थिक लाभों की लालच देकर जीवन प्रणाली की सोच पर ही हमला किया जा रहा है । यह समस्या गंभीर रूप से हमारे सामने खड़ी है । विचार संपन्नता की जगह वस्तु संपन्नता ने ले ली है । बहुत शोचनीय स्थिति है । फिर भी  साहित्य और समाज के बीच गहरे रिश्ते बने हुए हैं …….

रंजिशें  तल्खियाँ  गिला लेकर

मत चलो इतना फासला लेकर

किसके सीने में हम धडक जाएँ

हाथ  में  टूटी  पसलियाँ लेकर

…………….ध्रुव गुप्त

ध्रुव गुप्त की चिंता मनुष्य और रिश्तों के विखंडित होते सम्बन्धों की है । जाहिर है किसी भी महत्वपूर्ण ग़ज़ल की रचना का आधार उसकी रचना का संवेगात्मक फैलाव होता है । उपरोक्त शेरों में मनुष्य की असहाय होती नियति की शोकगाथा और उसके अधूरेपन का चित्र उपस्थित हुआ है ।

मूल सच्चाई से परे ,मूल्यह्रास और समयसंक्रमण के इस दौर में साहित्य की रचनात्मक दिशा प्रयोगधर्मी होने के साथ –साथ आरोपित पहचान से ग्रसित है,  कारण  विचारों के बाज़ार में वास्तविक विषमताएँ । आखिर इस विषमता की जड़ें कहाँ हैं जो घर परिवार और देश की चौहद्दी से बाहर होकर अप्रवासी विचारों से समझौता करने की प्रक्रिया में  हैं । विकासशील परम्पराओं के नाम पर कुछ साम्राज्यवादी ताक़तें अपनी क्रूरतापूर्ण मानवविरोधी नीतियों को मनमाने ढंग से लागू करने के लिए विवश कर रही हैं।   विचारधारा के नाम पर भी  चुप्पी  है  । क्या साहित्य में भी  विचार ,भावना और सौंदर्यबोध  इसी इच्छा से शाषित हो रहे हैं ?ऐसा तो नहीं  लेकिन  लेखन के तथ्य घटनाओं की व्याख्या होते हैं जो निश्चित सरोकारों के साथ अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करते हैं ।  सत्य की अनदेखी ,लेखन का स्वभाव नहीं होता बल्कि     अपनी बौद्धिकता का प्रदर्शन होता है  मतलब चिंतन का आतंक । प्रेमकिरण कहते हैं ……

करें हम क्या किसी से दोस्ती क्या

ये दुनिया हो गई है मतलबी क्या

………………………………………

पड़ोसी से  भी  थे रिश्ते  हमारे

न वो कुर्बत ,न वैसे आदमी अब

 

सर्वप्रथम तो यह समझ लेना चाहिए कि छंद के अभाव में ग़ज़ल लिखना या कहना संभव नहीं है । अगर छंद नहीं है तो ग़ज़ल नहीं है । इस बंधन के बावजूद समकालीन हिन्दी ग़ज़ल का  आम बोलचाल की भाषा के प्रयोग और आम आदमी की व्यथा के चित्रण किए जाने  पर अधिक बल  है । इसे हिन्दी कविता के विकास के रूप में भी  लिया जा सकता है या विकल्प के रूप में भी । एक तर्क संगत सोच तो विकसित होगी ही । पड़ोसियों के साथ हमारे रिश्ते  लगातार बिगड़ते जा रहे हैं चाहे वह पाकिस्तान ,चीन या फिर श्रीलंका ही क्यों न हो । रिश्ता यानी कैसा रिश्ता? प्रेमकिरण ने अपने शेरों में कई विरोधाभासी तरीकों से व्यक्त करने की कोशिश की है जिसमें उनका रिश्ता अमूर्त या विवशता के रूप में उभरकर सामने आता है । प्रेमकिरण के विचार और सत्य साथ –साथ चलते हैं, विचार का धर्म ही है अपने विषय की ईमानदारी के साथ पड़ताल ।

देश और समाज से आत्मीय लगाव के बिना आत्मीय अभिव्यक्ति असंभव है । युग की घटनाओं के प्रति समकालीन ग़ज़लकारो का दृष्टिकोण ऐतिहासिक ,सांस्कृतिक ,मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय है । जो लोग यह मानते हैं कि ग़ज़ल के माध्यम से सामाजिक रूपान्तरण संभव नहीं है तो उन्हें समकालीन ग़ज़लें पढ़नी चाहिए.। समकालीन हिन्दी ग़ज़ल का फ़लक इतना विशाल है कि छोटी से छोटी तथा बड़ी –बड़ी सभी भावनाएँ उसमें व्यक्त हो पा रही हैं …….

कभी तो हम भी बीते कल में आयें

छुटे रिश्तों  को वापिस  ले के आयें

डॉ भावना

जीवन एक प्रवाहमान सत्य है जिसमें वर्तमानकालीन प्रत्येक क्षण अगले भूतकालिक स्वरूप धारण कर लेता है और हृदय में खट्टी मीठी यादें रह जाती हैं । बीते पल को वापस तो लाया नहीं जा सकता लेकिन शब्दों के माध्यम से शाश्वत स्वरूप प्रदान किया जा सकता है जिसमें भाव ,कल्पना ,विचार और शैली सुंदर रूप में संगठित होते हैं । उत्तर आधुनिकता और विश्व बाज़ार की अंधी दौड़ में डॉ भावना अपने पुराने भारत की खोज करती हैं । यह ध्यान रहे कि साहित्य एक कला है और कला के क्षेत्र में एक ही विषय की कई परिभाषाएँ हो सकती हैं । डॉ भावना की चिंता को इस रूप में भी देखा जा सकता है ।

अतीत का मोह कायम रखते हुए भी व्यक्ति को वर्तमान में जीना होता है । आवश्यक है कि व्यक्ति या लेखक का परिवेश के साथ कैसा संबंध है । उसके होने और नहीं होने का संकेत उसके आचार विचार और साहित्य से पता चलता है जिसे हम सीधे शब्दों में वैज्ञानिक और मिथकीय मानसिकता के साथ  जोड़कर देख सकते हैं ।

अमरीका साम्राज्यवादी आतंकवाद इराक तथा अफगानिस्तान में अपना वर्चस्व दिखा चुका है लेकिन 11 सितम्बर की  घटना  ने उसे  हिला भी दिया  । इसी  संदर्भ में अशोक आलोक का शेर ………..दूसरों का घर जलाकर जश्न में शामिल हुए

आपका अपना जला तो आपको कैसा लगा

गौरतलब है कि अमरीका के अपने ही रवैये और गैर मुनासिब हरकतों के कारण आज आतंकवाद  विश्व स्तर पर उभरकर सामने आया । ग़ज़ल की मासूमियत भी इससे आहत होकर  समकालीन यथार्थ की सम्पूर्ण सच्चाईयों में रूपायित होती चली गई । इससे हिन्दी ग़ज़ल का विकास तो लक्षित होता है लेकिन इसका मूल स्वभाव भी कहीं न कहीं प्रभावित होता है । इसका अपना यथार्थ और  सफल अभिव्यंजना है । ग़ज़ल का संबंध रस से है जो बात ग़ज़ल के लिए कही जा सकती है वही बात व्यापक सौंदर्य के लिए भी कही जा सकती है जिसमें जीवन और मानसिक सौंदर्य भी आते हैं । पूरे ग़ज़ल- समाज की यह विवशता है कि इसे  अपने मूल स्वभाव से अलग होना पड़ा । जैसा कि ऊपर ही कहा जा चुका है साहित्य समयसापेक्ष होता है । समय के साथ इसके स्वर भी बदलते रहे हैं । लेकिन व्यंजना और शब्द –सौंदर्य नहीं बदलते। इसी क्रम में    सामाजिक यथार्थ से प्रतिबद्ध ग़ज़लकारों की सूची ऐसे तो काफी लंबी है लेकिन सुविधा के लिए उनके कुछ नामों और शेरों को उल्लेख करना आवश्यक समझता हूँ ….मसलन रामदरश मिश्र,बलस्वरूप राही,लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ,नूर मुहम्मद नूर,,रोहिताश्व अस्थाना,ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग,मधुवेश ,राममेश्राम,उदय प्रताप सिंह ,हस्तीमलहस्ती ,घनश्याम ,हरेराम समीप ,ओमप्रकाश यती,गिरिराजशरण अग्रवाल, विनय मिश्र,अशोक अंजुम ,बी॰आर॰विप्लवी ,शिव शंकर मिश्र ,सुरेन्द्र चतुर्वेदी ,विजय किशोर मानव ,कुमार विनोद ,प्रेम रंजन अनिमेष ,महेश अश्क़,गौतम रजरिशी ,आनन्द बहादुर ,दरवेश भारती,राजेंद्र तिवारी ,अखिलेश तिवारी ,मनोज अबोध ,चांद शेरी सिद्धेश्वर कश्यप ,कैलाशझा किंकर ,डॉ राजेंद्र मोदी ,डॉ मृदुला झा ।दिनेश तपन ,अंजनी कुमार सुमन ,सुधीर प्रोग्रामर ।रंजना श्रीवास्तव ,संजय कुमार कुन्दन ,विकास ,आदि

धूप से घुला –घुला सा आसमान हो

और एक  अन्तरिक्ष की उड़ान हो

विश्व सिद्ध हो समग्र साटी की प्रमेय

अश्वमेघ  यज्ञ  का  न आह्वान हो

अशोक रावत

हौसला  सुकून  का  दहल रहा

विश्व का मिजाज भी बदल रहा

विकास

विश्व में जिस प्रकार हिंसक घटनाएँ बढ़ रही हैं उनकी   व्याख्या या परिभाषा असंभव है।   इस अति हिंसक यथार्थ की लड़ाई सत्ता न होकर सत्ता के चिन्हों में परिवर्तित है । जहां सर्वथा क्रोध,मत्सर,भय जैसी भावनाओं के सिवा कुछ नहीं है ,,,,

जो मजहब के नाम पर अस्त्र और शस्त्र उठाते हैं

है  अधर्मी  बेईमान  हिन्दु  हो  या  मुसलमान

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मेहरबानी है  मेरे  दोस्तों  की

शहर में हूँ मगर मैं लापता हूँ

धर्मेन्द्र गुप्त साहिल

 

मैं खर्च हो गया  यारो जिसे बनाने में

हज़ारों ऐब निकल आए उस ठिकाने में

ज्ञान प्रकाश विवेक

इनिस का मानना है कि माध्यम ज्ञान के चरित्र को बदलता है और एक स्थिति ऐसी आ जाती है जहां ज़िंदगी नमनीय न रह जाए और एक नई सभ्यता का जन्म हो ।

इनिस की दृष्टि तथ्यात्मक है । इसी दृष्टि के आधार पर अनेक वादों का विकास साहित्य और कला के क्षेत्र में हुआ । हिन्दी ग़ज़ल भी इससे मुक्त नहीं रह सकी और एक नए वाद की ओर अग्रसर हो गई।  विरोध और आक्रोश का माध्यम बन गई ।

इनिस का यह भी मानना है कि किसी भी समाज का निर्णायक तत्व उसका संचार होता है। क्या संचारित किया जा रहा है ?यह सवाल प्रमुख नहीं होता बल्कि प्रमुख प्रश्न यह होता है कि कोई माध्यम कैसे काम करता है ,वह संस्कृति को कैसे बदलता है और अपने शक्तिकेन्द्र कैसे बनाता है । इनिस ने सिद्ध किया कि सांस्कृतिक बदलाव के केंद्र में हमेशा माध्यम रहे हैं ।

एक बात तय है कि ग़ज़ल पाठकों की पहली पसंद है । हिन्दी ग़ज़ल ने जनभाषा को ही नहीं अपनाया बल्कि बोलचाल की लय को भी पकड़ने की  चेष्टा की है ।  ग़ज़लों के शेर आम बोलचाल के साथ जुलूसों और नारों में भी सुने जा सकते हैं । इसे पाठकीय स्वीकृति के रूप में देखा जाना चाहिए । यह अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन चुकी है

कौन विधा हिन्दी में पठनीय और कौन नहीं यह निर्णय करना आलोचना का काम नहीं है। क्योंकि पठनीयता की कोई नीति नहीं होती है। जब जैसा तब तैसा,चतुर को लाज कैसा। समकालीन आलोचना और कुछ नहीं सिर्फ चतुराई और सम्बन्धों का खेल है। यह विरासत का प्रौढ़तम खेल है। जिन रचनाओं को पाठकीय स्वीकृति नहीं मिलती उन्हें सम्बन्धों वाली वैशाखी आलोचना में भरपूर अभिनंदन मिलता है। इसीलिए किसी आलोचक से यह अपेक्षा रखना कि वह किसी लेखक/कवि को बड़ा होने का प्रमाण पत्र दे सर्वथा अनुचित और साहित्य के लिए खतरनाक साबित होगा। ग़ज़ल को हिन्दी में सर्वथा गैर भाषाई विधा होने का आरोप लगता आया है। इतिहास गवाह है कि इस देश में हिन्दी और उर्दू भाषाई एकता के लिए दुनिया में अपनी खास पहचान रखती है। अपनी विशेष पहचान के लिए भाषा के नाम पे ये एक दूसरे से कभी नहीं लड़ी और आज भी उर्दू साहित्य या हिन्दी साहित्य में दोनों भाषाओं का सौहार्द बना हुआ है। आलोचक वर्ग अपना हित साधने के लिए दोनों के बीच विभाजन की रेखा खींचते रहते हैं। और एक बात यह भी है ग़ज़ल कठोर छंदवाली विधा है जिस आलोचक को छंद की जानकारी नहीं रहती वह ग़ज़ल की हिन्दी में उपस्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगा देता है। विचारणीय है कि यह किसकी देन है जिस कारण आज हिन्दी ग़ज़ल हिन्दी में स्थापना के संकट से जूझ रही है। ग़ज़ल के नाम पर एक अलग किस्म का भ्रम पैदा किया जा रहा है। लोगों को इसकी वास्तविकता से दूर ले जाने की कोशिश की जा रही है। हिन्दी में इसके लिए प्रवेश के रास्ते बंद किए जा रहे हैं। निश्चित रूप से यह आलोचना का लक्षण नहीं है। आलोचना का लक्षण सत्य होना चाहिए और एक सत्य है जो लिखावट में नहीं मिलता पाठक के अंदर होता है। कोई भी रचना पठनीयता के आधार पर ही कालजयी बनती है। ग़ज़ल जिस दिन हिन्दी में स्थापित हो गई आलोचना के नाम पर होनेवाली गुटबंदी पर विराम लग जाएगा और आलोचना के नाम पर भ्रम फैलाने वाले आलोचकों की दुकानें बंद हो जाएंगी। आज ग़ज़ल को लेकर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं। अलग-अलग परिभाषाएँ दी जा रही हैं सब अपने-अपने ढंग से परिभाषित करने में लगे हुए हैं और इसका क्षेत्र भी बता रहे हैं। बात समझ में नहीं आती। हिन्दी ग़ज़ल ने आखिर कौन सा तूफ़ान कर दिया है।

विश्व आधुनिकतावाद हिन्दी ग़ज़ल की प्रवृति की विशेषता है । अपने इस आंतरिक परिवर्तन के कारण  ही  हिन्दी ग़ज़लें पढ़ी और सुनी जा रही हैं ।

आज की हिन्दी ग़ज़लों में न हालावाद ,न मांसलवाद शुद्ध विश्व हृदयवाद है ……..एक स्वप्नदर्शी और प्रत्यक्षदर्शी संवेदना है । अच्छाइयों,सुदरता और स्मृतियों को बचाए रखने की छटपटाहट है । हमें आज की हिन्दी ग़ज़लों को समझना चाहिए जो अन्य विधाओं की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली हैं ।कारण है आज हम एक संवेदना-शून्य मुर्दा समाज में रह रहे हैं जहाँ नफ़रत फैलाकर घर तोड़ रहे हैं और अलग-अलग क्षेत्र बनाने की बात कर रहे हैं। आज़ादी के सत्तर साल के बाद भी राजनीति की भेद करनेवाली चाल समझ नहीं समझ पाए तो निश्चित रूप से हमें राष्ट्र भक्त कहलाने का हक़ नहीं बनता है। पड़ोसी की दीवार गिराकर हम अपनी छत को नहीं बचा सकते। हमें पता है जाति,धर्म और संप्रदाय के नाम पर हमारी अपनी ऊर्जा,शक्ति और प्रतिभा का शोधन किया गया है।

 

सिरफिरे कुछ लोग थे उनसे ही मिलकर

फिर से दंगा कर दिया है इन हवाओं ने

–अश्वघोष

हमें  गुमराह  कर देते हमारे रहनुमा ही ख़ुद

गढ़ा यदि रास्ते में मील का पत्थर नहीं होता

—चंद्रभान भारद्वाज

यह सबों को पता है मुक्त बाज़ार के शोरगुल में साहित्यकारों की आवाज़ थोड़ी धीमी पड़ रही है। इन विषम परिस्थितियों में भी साहित्य लिखा जा रहा है,खूब लिखा जा रहा है। चेतना के दरवाज़े पर दस्तक देना साहित्यकारों की प्रतिबद्धता होती है। लेकिन सावधान रहने की भी आवश्यकता है। लेखन की गति आवश्यकता के अनुसार या गुणवत्ता के की दृष्टि से हो जिसमें पठनीयता की पूरी संभावना हो। वही लिखें जिसमे पाठ के साथ प्राणवत्ता,शाश्वत और सार्वभौम तत्व दिखे। कोई भी साहित्य आंतरिक समीक्षा के सुदीर्घ अम्ल-परीक्षण के बाद ही पाठकों के समक्ष आए। जिसे पढ़कर लोग अपने अपने अतीत का आदर करे,वर्तमान में नवीन आयाम गढ़ सकें। जिससे भयमुक्त,आतंक मुक्त,ग़रीबी मुक्त,जातिवाद मुक्त,भ्रष्टाचार मुक्त एवं सांप्रदायिकता समाज का निर्माण कर सके।

आज जो हिन्दी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं वह अधिकांशतः देश की वर्तमान स्थिति बढ़ते कदाचार देश में बढ़ती विघटनकारी प्रवृतियों,सांप्रदायिकता,गुटबंदी आदि समस्याओं के आस-पास दिखाई देती हैं।

हिन्दी ग़ज़ल आज पूरी तरह पठनीयता को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। जब भी हम किसी ग़ज़ल को पढ़ते हैं नया उत्साह,नया अनुभव,नई प्रेरणा,नई सार्थकता की अनेकों ध्वनियाँ हमारे सामने उपस्थित हो जाती हैं। कहना नहीं होगा हिन्दी में ग़ज़ल के प्रवेश से हिन्दी कविता(ग़ज़ल)में आवेग,उत्कटता और चैतन्य का प्रवेश हुआ है।

 

दबी  ज़ुबान से जो  भी अवाम बोलता है

उसी को,अपने ही रंग में कलाम बोलता है

तलाश करना  मुकद्दर,तुम्हें मिले न  मिले

ये  शायरी है  यहाँ पर  मक़ाम बोलता है

————————डॉ महेंद्र अग्रवाल

डॉ महेंद्र  अग्रवाल का सम्पूर्ण ग़ज़ल लेखन संसार परपीड़न को  धिक्कारता है तथा परहित की प्रेरणा देता है। यह मानवीय संवेदना का ही रूप है। यूं तो संवेदना के अनेक रूप होते हैं। परंतु मानवी संवेदना ऐसी संवेदना है जिसके इर्द-गिर्द अन्य संवेदनाएँ घूमती हैं। करूणा,दया आदि का केंद्र मानवीय संवेदना ही होती है। डॉ अग्रवाल ने पीड़ा का गायन किया है और यह पीड़ा अपनी न होकर समाज की है जो इनकी मानवीय संवेदना के प्रति दृष्टि का उद्घाटन करती है।

पंकज सुबीर ने प्रेम को कई कई दृष्टियों से प्रेक्षेपित किया है। इस प्रेक्षपण में जीवन के माध्यम से प्रणय बिम्ब,मौसम के माध्यम से प्रणय उभारना या संवेदना के माध्यम से प्रणय बिम्ब उभारना सम्मिलित है। कुछ ग़ज़लों के अंश द्रष्टव्य हैं जो प्रणय की इन धाराओं को रेखांकित करते हैं …

 

अजनबी हम आज से हैं पर सफ़र तो है वही

सिर्फ़ कह  देने से होता है कहीं रस्ता अलग

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चाँद-सूरज की निगाहों में खटक जाओगे तुम

जुगनुओं यूं  स्याह रातों में चमकना छोड़ दो

— पंकज सुबीर

 

आज का समय बड़ा विषम है। राजनीतिक परिदृश्य ने इसे और भी विषम बना दिया है। “कस्मै देवाय हविषा विधेम”यानि किस देवता को हम अपना हविष्य अर्पित करें कि हमारा भविष्य सुरक्षित हो?उत्तर में हमें केवल एक ही शब्द सूझता है,वह है साहित्य। इसी आलोक में डॉ कृष्ण कुमार प्रजापति की ग़ज़लों की ओर रूख कर सकते हैं—

 

हमदर्द  सारे  झूठे  हैं,  देंगे  न  तेरा  साथ

मुश्किल में उनको देख ले इक दिन पुकार कर

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लगा हुआ है ख़ुशामद में रात-दिन जिसकी

तेरे  खिलाफ़  वही  शख़्स  वोट रखता है

—-डॉ कुमार प्रजापति

डॉ प्रजापति की ग़ज़लों में समय के यथार्थ का सजीव अंकन है,प्रगतिशील चेतना के नए आयाम उद्घाटित हुए हैं। ग़ज़लों का रूझान सामाजिक हित और मानवीय संवेदना से अनुप्राणित है। मानवीय संवेदना के उद्रेक के समय डॉ प्रजापति स्वयं को भूल जाते हैं। अपनी पृथक सत्ता की धारणा से छूटकर ,अपने आप को भूलकर,विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाते हैं तब वे मुक्त हृदय हो जाते हैं।

समग्र रूप से हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल को देखना ही कविता का सौंदर्यबोध है। कविता तब उत्तमोत्तम होता है,जब शब्द-सौंदर्य से भरपूर हो। शब्द-सौंदर्य से भाषा प्रांजल बनती है,क्योंकि भाव को रूप देना,अमूर्त को मूर्त बनाना ही तो हिन्दी ग़ज़ल का सौंदर्य है। ग़ज़ल में जो कथ्य का आंतरिक सौंदर्य होता है वही बाद में “अर्थ या संवेदन”के रूप में पाठक की अंतर्वृतियों को प्रभावित करता है। कविता के रूप हिन्दी में शामिल होने वाली यह बेहतरीन विधा पठनीयता की कसौटी पर खरी उतर रही है।

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संपर्क :  गुलजार पोखर ,मुंगेर (बिहार )811201

मोबाइल -09430450098/7488542351

Email-anirudhsinhamunger@gmail॰com

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