ग़ज़लकार डॉ अनिरुद्ध सिन्हा से  कुसुमलता सिंह की बातचीत

प्रश्न –आप पिछले कई दशकों से रचनकर्म से जुड़े कवि,कथाकार आलोचक हैं । इधर कुछ वर्षों में आपने हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में मजबूत पहचान बनाई है । आपमें बहुमुखी प्रतिभा है । हिन्दी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल सामानांतर विधा है या इन्हें अलग –अलग विधाएँ मानते हैं ?

उत्तर –लेखन का गणित उम्र और विरासत से हल नहीं होता । हाँ भले हम ये परिकल्पना कर सकते हैं , हमारी लेखकीय उम्र क्या है ? लेखन का उत्कर्ष परिपक्वता है ।  लेखन की सामाजिक सरोकारों के प्रति क्या भूमिका है? आनेवाले भविष्य को उज्जवल और आशाजनक रंगों में रंगने में हम कितने सफल हुए हैं आदि …आदि । हिन्दी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल शिल्प की दृष्टि से दोनों में एकरूपता है । मिज़ाज दोनों के अलग –अलग हैं । उर्दू ग़ज़लों में प्रतिक्रिया के स्वर हैं जबकि हिन्दी ग़ज़लों में आधुनिकताबोध है …प्रजातिवाद ,भाषावाद और क्षेत्रीयतावाद से बिल्कुल अलग ।  हमारी पहचान हमारा लेखन है । पाठक हमें कितना पसंद करता है , यह देखना है ।

प्रश्न –क्या हिन्दी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल दोनों ने ही सामाजिक सरोकारों के साथ किया है ?

उत्तर –उर्दू ग़ज़ल के साथ सबसे बड़ी समस्या है कि वह मंचो के साथ गहरे रूप में जुड़ी हुई है । मंच पर कैसी चीज़ें पढ़ी जाती हैं , पता होगा । एक बात और….  रूपवाद और कलावाद का प्रभाव अभी भी इसके ऊपर है । ऐसी परिस्थिति में सामाजिक सरोकार तो खंडित होंगे ही ।हिन्दी ग़ज़ल में विचार ,भावना और सौंदर्यबोध सारे तत्व मिल जाएंगे । हिन्दी ग़ज़ल वर्तमान विसंगतियों से मुठभेड़ करने में पूरी तरह सक्षम है ,कर भी रही है ।

प्रश्न –हिन्दी ग़ज़ल के क्रमिक विकास के बारे में बताएं ?

उत्तर –कुछ लोगों का मत है कि हिन्दी ग़ज़ल की यात्रा अमीर खुसरो  से आरंभ होती है । लेकिन यह खयाल पूरी तरह भ्रामक है । इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता किअनभ्यस्त विचार सरल होने पर भी कठिन होते हैं और उन्हें स्वीकार करने में असुविधा होती है लेकिन जब मंथन आरंभ होता है तो धीरे धीरे सच पर पड़ी गांठें खुलने लगती हैं । अमीर खुसरो की ग़ज़लों के मूयांकन के साथ ही भाषा ,परिवेश और औचित्य को देखना होगा । साक्ष्य की सारी संभावनाओं को उद्घाटित करने के बाद ही कोई ठोस निर्णय की बुनियाद रखी जा सकती है । अमीर खुसरो के बाद ग़ज़ल लेखन में कबीर का नाम आता है । कबीर की ग़ज़लों की संख्या के बारे में साफ तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता । अभी तक उनकी एक ग़ज़ल ही चर्चा में है –“हमन हैं इश्क़ मस्ताना हमन को होशियारी क्या “बदलते परिवेश में हिन्दू –मुस्लिम में आ रही खटास को रोकने की एक अनूठी पहल भारतेन्दु ने ग़ज़ल लेखन के माध्यम से की । भारतेन्दु मूलतः खड़ी बोली के साहित्यकार थे । यद्यपि वे स्वयं उर्दू में कवितायें /ग़ज़लें लिखते थे । उनका उपनाम रसा था । उनकी ग़ज़लें इसी नाम से उपलब्ध हैं । शमशेर बहादुर सिंह की तनी हुई मुट्ठियों के साथ ही दुष्यंत कुमार का युग आरंभ होता है । मोटे तौर पर हिन्दी ग़ज़ल का विकास हम इस रूप में भी देख सकते हैं —-कबीर से भारतेन्दु

भारतेन्दु से शमशेर बहादुर सिंह

शमशेर बहादुर से दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार से आज तक

हिन्दी ग़ज़ल के विकास के साथ –साथ हम यथार्थ की तह में जाकर जैविक विश्वास , नैतिक श्रद्धा , बौद्धिक श्रद्धा और तार्किक निश्चय भी देखें । साहित्य योगदान और औचित्य के साथ चलता है ।

प्रश्न –आपने अपनी पहली ग़ज़ल कब लिखी ?

उत्तर –मैंने पहली ग़ज़ल 1 जनवरी 1995 में लिखी —:”-यातना सामर्थ्य से ऊपर न होने दीजिए”

प्रश्न –रचना –प्रक्रिया के दौरान आपके दिमाग में किसी पाठक की तस्वीर होती है ?

उत्तर –साहित्य का असल उद्देश्य ऊंचे विचारों के साथ समाज के अनुरूप यथार्थ का निर्माण करना है । जहां समाज है वहाँ व्यक्ति तो होगा ही । जब आप जल्दी में कोई प्रचारात्मक रचना कर रहे हों , तब कोई व्यक्ति या पाठक सामने आ जाता है । मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ । मेरी रचना –प्रक्रिया समष्टि को संबोधित पर आधारित है जिसमें युग और समय की प्रवृतियों की आहट होती है ।

प्रश्न –वह कौन सा दौर था जिसका प्रभाव प्रभाव आपके लेखन पर सबसे अधिक पड़ा ?

उत्तर –कुसुम जी ऐसे यह प्रश्न मेरे लिए काफी जटिल है , फिर भी कोशिश करता हूँ कुछ बातें बाहर आ जाएँ ।

पेट की आग कोई चेहरा नहीं देखती वह स्वयं को ही जलाती है । चिल्ला –चिल्ला कर प्रतिवाद करने का मौका भी नहीं देती । कहाँ होता है चट्टान की तरह दृढ़ता से खड़े रहने का शौक ।

मुझे अपनों ने तपाया और जलाया है । मेरा दोष मेरा दुर्भाग्य था । मैं जब चार साल का था मेरी माँ गुज़र गई । मेरा सिर पिता की गोद में आ गया । कुछ वर्षों के बाद जब मैं कॉलेज आया पिता जी गुज़र गए । एकाएक मेरा भविष्य फुटपाथ पर चला आया। चार भाई बहनों में मैं सबसे छोटा था । बहनों का विवाह हो गया था । मेरे बड़े भाई जो मेरी दोनों बहनों से भी बड़े थे । उनका भी विवाह हो गया था । वे सरकारी सेवा में थे । भाभी…….क्या कहूँ ….?बस इतना मान लें मैंने लगातार दस वर्षों तक कुत्ते की तरह दो रोटी का इंतज़ार किया । मित्रों से परोसियों से रो-कर फीस के पैसे मांगता रहा और पदता रहा ।सैकड़ों बार पैसे के लिए महफिलों और मंचों पर गाना गया तब कहीं जाकर मेरी शिक्षा पूरी हुई । स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त करने से पहले मैं सरकारी सेवा में आ गया । मैं अपने दर्द और आँसू को आठवीं कक्षा से ही  टूटी फूटी पंक्तियों में पिरोना शुरू कर दिया था । मैं विद्यालय और कॉलेज का दुलारा छात्र था ।

प्रश्न –आप अर्थशास्त्र जैसे विषय में डिग्री लेने के बाद हिन्दी ग़ज़ल की ओर आपका रूझान कैसे हुआ?

उत्तर –मुझे स्वर और कंठ ने ग़ज़ल लेखन की ओर प्रेरित किया । मैं हिंदीभाषी था । शिल्प की जानकारी प्राप्त कर ग़ज़ल लेखन की ओर मुड़ गया ।

प्रश्न –आपका पहला हिन्दी ग़ज़ल –संग्रह “तिनके भी डराते हैं “का शीर्षक चर्चित रहा ?आपने ऐसा जानबूझ कर रखा कि वह चर्चित हो या यही शीर्षक रचना से मेल खा रहा था ?

उत्तर –यह शीर्षक ग़ज़लों की मांग पर रखा था । यह पुस्तक 1997 में आई । उस समय बिहार में लालू राज था जो जंगल राज से प्रसिद्ध था । बिहार की जनता मृत्यु ,अपहरण आदि आपराधिक भय की पीड़ा से छटपटा रही थी ।

प्रश्न –क्या वर्तमान समय में ग़ज़ल की प्रासंगिकता कुछ कम हुई है ?

उत्तर –बिल्कुल नहीं । सच तो यह है हिन्दी ग़ज़ल के सहारे ही हिन्दी काव्य को पूरा किया जा सकता है । मुक्त छंद के नाम पर जो हिन्दी साहित्य में कचरा भरा गया था उसे साफ करने में हिन्दी ग़ज़ल हाँफ रही है । लेकिन भरोसे की बात है कि इसे पाठकीय अनुमति मिली हुई है वरना हिन्दी आलोचना के जल्लाद दुष्यंत कुमार के साथ ही हिन्दी ग़ज़ल को भी दफन कर देते ।

प्रश्न –इधर सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में देशों में बड़ी तेजी से परिवर्तन हुए हैं । आपके विचार से इसका असर ग़ज़ल विधा या समग्र रूप से साहित्य पर किस रूप में पड़ेगा ?

उत्तर –देखिए कुसुम जी आप यह अच्छी तरह से जानती हैं साहित्य का सरोकार समाज के साथ रहता है । समय का अत्याचार और उसकी प्रतिरोधात्मक स्मृति समझने के लिए साहित्य सर्वोत्तम उदाहरण है । समाज के पूरे परिदृश्य में ज्ञान और विरोध की स्थिति क्या होगी यह साहित्य तय करता है । समय के साथ साहित्य में भी बदलाव आता हैं । साहित्य का सीधा सिद्धांत है —ज्ञान दो और विसंगतियों का विरोध करो । साहित्य ही विसंगतियों की कल्पना के स्वायत्त एवं मिथकीय जगत को ध्वस्त करता है । इस बदले परिवेश में साहित्य अपनी भूमिका निभाने में सक्षम है ।

प्रश्न –ग़ज़ल की प्राचीन परंपरा आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल के परिप्रेक्ष्य में कितनी प्रासंगिक है ?

उत्तर –प्राचीन ग़ज़लों में आवाज़ों का तन्हा अहसास ,प्रेम की भावुकता और सहजता ,शृंगार और भक्ति का रहस्यलोक था । उर्दू साहित्य में जब इश्केमजाजी और इश्क़ेहक़ीक़ी की बात होती है तो तो ईश्वर को प्रेमिका और आत्मा को प्रेमी माना जाता है । लेकिन अब स्थितियाँ बदल चुकी हैं । जहां हिन्दी ग़ज़ल की बात है तो यह निःसंकोच कहा जा सकता है आज की ग़ज़लों में हृदय को झकझोर देनेवाले भावनाचित्र और नई ज़मीन मिलती है । इसने सम्पूर्ण परिस्थितियों का सांगोपांग चित्रण कर मानवमन को रसस्निग्ध करने की क्षमता से युक्त एक नए काव्यक्षितिज का निर्माण किया है ।

प्रश्न –ग़ज़ल की मौजूदा हालत के बारे में आप क्या सोचते हैं ?

उत्तर –आज हिन्दी ग़ज़ल लेखन ने आंदोलन का रूप धारण कर लिया है । जब कोई विधा आंदोलन का रूप लेती है तो वह एक निश्चित परिणाम छोड़ जाती है । छायावाद काल को ही लीजिए । क्या हिन्दी साहित्य को  छायावाद की चर्चा से मुक्त किया जा सकता है । आज जो ग़ज़लें वर्गवैषम्य ,आर्थिक वैवैषम्य  और सामाजिक वैवैषम्य से पीड़ित होकर लिखी जा रही हैं कल वह मील का पत्थर साबित होंगी । ऐसा मेरा मानना है ।

प्रश्न –जनजातीय चेतना के प्रति साहित्य की अन्य विधाओं कविता कहानी आदि की प्रतिबद्धता जग जाहीर है । पर क्या कारण है किग़ज़ल विधा उस प्रकार से नहीं जुड़ पाई ?

उत्तर –देखिए कुसुमजीआप  जानती हैं  ग़ज़ल हिन्दी के लिए सर्वथा नई विधा है । इतने अल्पकाल में सारे विषयों को एक साथ समेट पाना थोड़ा मुश्किल तो है , असंभव भी नहीं । जन जातीय विषय पर भी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं लेकिन उस ओर ग़ज़लकारों का रूझान थोड़ा कम है । धीरे – धीरे यह कमी भी पूरी हो जाएगी ।

प्रश्न –क्या ग़ज़लकारों को लगता है जन जातीय चेतना से जुड़ी रचनाओं को बाज़ार नहीं मिलेगा ?

उत्तर –बाज़ारवादी सिद्धान्त छ्द्म विचारधाराओं पर आधारित होता है । साहित्य इससे मुक्ति सुनिश्चित करता है जिससे इसका यथार्थ और औचित्य तृप्त होते हैं । बाज़ारवादी सोच प्रचार चालबाजी और सच्चाई को विकृत रूप में प्रस्तुत करने के उपाय है । हिन्दी ग़ज़ल बाज़ार की वस्तु नहीं है । मैंने रूझान के बारे में कहा है ।

प्रश्न –कहीं ऐसा न हो कि गजलें , नज़्में ,रूबाई पुराने जमाने की यादगार बनकर ही न जाए । इस बारे में आप की क्या राय है ?

उत्तर –सामाजिक सरोकार ही किसी विधा को ऊपर या नीचे करते हैं । नई समाज व्यवस्था का साहित्यिक वर्चस्व कोई हानि नहीं पहुंचाता है । हिन्दी ग़ज़ल के साथ सामाजिक आदर्श है । डरने की कोई बात नहीं ।

प्रश्न –समकालीन ग़ज़ल कारों में किसे पसंद करते हैं ?

उत्तर –मैं उन सारे ग़ज़लकारों को पसंद करता हूँ जो सामाजिक आदर्श से जुड़े हैं । जिनकी दृष्टि हमेशा स्वस्थ और नव आदर्शमय अनागत की तरफ रही है ।

प्रश्न –नए रचनाकारों के लिए कुछ संदेश देना चाहेंगे ?

उत्तर –नए रचनाकार प्रचारात्मक स्तर पर लेखन नहीं करें । प्रतिबद्धता को अपना लेखकीय हथियार बनावें ।

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लेखक :  अनिरुद्ध सिन्हा,   गुलजार पोखर , मुंगेर (बिहार )811201,  मोबाइल -09430450098

बातचीत : कुसुमलता सिंह , संपादक =परिंदे , सी -54 रिट्रीट अपार्टमेंट ,20-आई ॰पी॰एक्सटेन्सन

पटपड़गंज ,दिल्ली -092

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