शरद कोकास के शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक मस्तिष्क की सत्ता की पांच कड़ियां

  1. हम पैदा ही नहीं  होते तो क्या होता ?
    ज़रा सोचकर देखिये अगर आप पैदा ही नहीं होते तो क्या होता ? कुछ नहीं होता , यह दुनिया जैसे चल रही है वैसे ही चलती , आपकी पत्नी का कोई और पति होता या आपके पति की कोई और पत्नी होती ,आपके बच्चों का बाप भी कोई और होता । हंसिये मत जब आप ही नहीं होते तो उनके लिए ‘ आपके शब्द कैसे प्रयोग कर सकते हैं ।
    हम ग़ालिब साहब की बात करते हैं , सबसे पहले उन्हीने सोचा था , ” न होता मैं तो क्या होता” मिर्ज़ा असदुल्ला खां ‘ग़ालिब’ अपने समय  के महत्वपूर्ण शायर रहे हैं ।  ‘ इश्क़ वो आतिश है ग़ालिब ‘ इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया ‘ ग़ालिब छुटी शराब ‘ जैसी उनकी पंक्तियाँ मुहावरों और कहावतों की तरह उपयोग में लाई जाती हैं ।  ग़ालिब साहब का वह मशहूर शेर है “ न था कुछ तो ख़ुदा  था ,कुछ न होता तो ख़ुदा  होता, डुबोया मुझको होने ने ,ना होता मैं तो क्या होता । ”
    दरअसल, इस शेर को ध्यान से देखिये इस शेर में एक प्रश्न छुपा हुआ है । यह स्पष्ट  है कि हमारा अस्तित्व ही हमारे जीवन के समस्त क्रियाकलापों के लिए  उत्तरदायी है । हम हैं इसलिए  हमारे लिए यह दुनिया है, इस दुनिया के सारे प्रपंच हैं, सुख – दुख हैं, रिश्ते- नाते हैं, दोस्त-यार हैं, घर – परिवार है, समाज है,बाज़ार है ,फेसबुक है,व्हाट्स एप है यानि सब कुछ हैं । संसार में उपस्थित सब कुछ उन्हीं के लिए  है जो इस धरती पर जन्म ले चुके हैं। जो लोग इस दुनिया से विदा ले चुके हैं उनके लिए भी यह दुनिया उसी समय तक थी जब तक उनका अस्तित्व था। हमारे लिए  केवल उनसे जुड़ी हुई चीजें, उनके द्वारा किए गए कार्य और उनकी स्मृतियाँ हैं, और वे  भी हमारे लिए  तभी तक हैं जब तक हम इस दुनिया में हैं ।
    तो आगे चलकर हम अपने इसी अस्तित्व के बारे में सोचेंगे कि हम हैं इस दुनिया में तो क्यों हैं ? और हैं तो हमें क्या करना चाहिए ।

    2. यह मनुष्य आखिर है क्या ?
    – फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना
    – मगर इस में लगती है मेहनत ज़ियादा
    (अल्ताफ़ हुसैन हाली)
    इंसान बनने के लिए हमारे पूर्वजों ने क्या नहीं किया ।यह वही मनुष्य है जिसने अपनी मेहनत से पत्थरों को तोड़कर अपने औज़ार बनाये , जो घास के मैदानों पर अपनी जीत के लिए  युद्ध करता रहा , फिर उन्ही पत्थरों में जिसने अपनी आस्था को आरोपित किया उसे देवता का नाम दिया , जिसने अपनी कल्पना को पंख देते हुए नए अविष्कारों के आसमान में ऊँची ऊँची उड़ाने भरीं । सहस्राब्दियों से मस्तिष्क में संचित यह ज्ञान, श्रुति परंपरा में वह अपनी संतानों को सौंपता गया । उसने किताबें लिखीं ,नए नए यंत्र बनाये , जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए  उसने अपनी जान तक दांव पर लगा दी ।
    आनेवाली पीढ़ियों ने भी उसे जस का तस ग्रहण नहीं किया बल्कि उसे आवश्यकतानुसार परिमार्जित भी किया । मनुष्य की बदलती हुई नस्ल के साथ उसके मस्तिष्क की परिपक्वता में भी वृद्धि होती गई ,यही नहीं उसके मस्तिष्क की आतंरिक संरचना में भी बदलाव हुआ लेकिन विडम्बना यही रही कि शरीर के इस महत्वपूर्ण अंग की उपादेयता को जानने के बावज़ूद  यह अंग उसके लिए उपेक्षित ही रहा ।
    उसने दिल और दिमाग को दो अलग अलग खानों में बांटकर संवेदना से समझौता किया और उसका सम्पूर्ण श्रेय दिल को दे दिया ।* यद्यपि यह बुरी बात नहीं थी लेकिन ज्ञान के अभाव में वह अंधे विश्वासों का गुलाम बनाता गया और जीवन को सुरक्षित करने के लिए उसने ऐसे विश्वास पाल लिए जो उसके जीवन में उपजी असुरक्षा की भावना को दूर तो करते थे लेकिन वहीं उसे शोषण  और गुलामी की ज़ंजीरों में भी जकड़ देते थे । मनुष्य की यह नियति नहीं थी लेकिन इसी मनुष्य जाति के कुछ चालाक लोगों ने उसे इसकी नियति बनाने के लिए  विवश कर दिया ।
    यह मनुष्य आज भी इन्ही ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ है । वह इनसे मुक्त होना चाहता है लेकिन परम्पराओं और विश्वास के नाम पर उसे मुक्त होने नहीं दिया जाता । उसके पास भी वही मस्तिष्क है जो उसका शोषण करने वालों के पास भी है लेकिन उनकी सत्ता के अधीन होकर वह मस्तिष्क की इस सत्ता से नावाकिफ़  है । *वहीं मस्तिष्क की इस सत्ता से वाकिफ़  लोग मनुष्य की इस कमज़ोरी से लाभ उठाकर मनुष्य जाति के बहुसंख्यक हिस्से को हमेशा के लिए  अपना गुलाम बना देना चाहते हैं ।
    आइये हम लोग इस गुलामी से मुक्त होने की दिशा में एक कदम तो रखें

    3.आन बाट से काह न आया ?

    – न ब्राह्मण पैदा हुआ मुख से
    – न क्षत्रिय पैदा हुआ भुजाओं से
    – वैश्य और शूद्र के
    – जंघा और पांवों से पैदा होने का
    – तो सवाल ही पैदा नहीं होता
    – हम अब इतने अज्ञानी भी नहीं
    – कि जान न सकें
    – कोई कहाँ से पैदा होता है

    एक समय था जब मनुष्य इस बात को नहीं जानता था कि मनुष्य का जन्म कैसे होता है । वह अपनी अज्ञानता में हवा , बादल, पानी को इसका ज़िम्मेदार मानता था । हमारी पुराण कथाओं में ही नहीं विश्व के तमाम मिथकीय साहित्य में मनुष्य के जन्म लेने के ऐसे ही किस्से हैं ।  कहीं कोई  पेड़ से पैदा हुआ तो कोई  समुद्र से, कोई किसी यज्ञ से , कोई फल खाने से । महाभारत नामक महाकाव्य में ध्रतराष्ट्र  के सौ पुत्र घड़े से पैदा हुए । अपने पिता ज्यूस द्वारा गर्भवती माता मेटिस को निगल लिए जाने के बाद ग्रीक देवी एथीना अपने पिता का सर  फाड़कर पैदा हुई वहीं ग्रीक देवता डायनोसिस का जन्म अपने पिता ज्यूस की जांघ से हुआ । यद्यपि यह बहुत बाद की बात है लेकिन यौनिकता की ठीक से समझ न होने के कारण तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण न होने के कारण किस्से -कहानियों में जन्म के ऐसे ही कारणों का उल्लेख होता रहा । धार्मिक और पौराणिक ग्रंथों के लेखन के समय जो तत्कालीन समाज व्यवस्था थी उसकी पड़ताल न करते हुए हम सिर्फ चमत्कारों और लिखे जा चुके शब्दों में विश्वास करते रहे । इसके अलावा कुछ दृष्टांत सामाजिक व्यवस्था में जानबूझकर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए भी गढ़े गए जैसे ऋग्वेद में ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण , भुजाओं से क्षत्रिय , जंघा से वैश्य तथा पांवों से शूद्र के जन्म लेने का दृष्टांत । इस वर्ण व्यवस्था का प्रभाव यह हुआ कि जातियों का निर्माण हुआ उनके अनुसार समाज में ऊँच -नीच जैसी अवधारणायें बनीं । सदियों तक समाज में निम्न वर्ग को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता रहा और उनका शोषण व उत्पीड़न जारी रहा । इसकी वज़ह केवल यही रही कि हमने सामाजिक नियामकों की अवैज्ञानिक सोच को समाज के मस्तिष्क पर हावी होने दिया । आज भी हम लोग धर्म में आस्था के कारण ऐसे किस्सों और धारणाओं पर सहज विश्वास कर लेते हैं और यही नहीं अतार्किक रूप से उन्हें छद्म  वैज्ञानिकता से जोड़ने का प्रयास भी करते हैं ।
    आज विज्ञान का युग है , आज स्कूल जाने वाले बच्चों तक को यह ज्ञात  है कि उनका जन्म कैसे हुआ है।   आप उन्हें फुसला नहीं सकते कि आप उन्हें अस्पताल से लाये हैं या कोई  परी आकर दे  गई  है , झूठ कहेंगे तो उल्टे  वे आपको समझा देंगे । लेकिन आप अपनी अंध आस्था के कारण बच्चों को भी उन झूठे किस्सों  में जबरिया विश्वास करने के लिए  बाध्य करते हैं ।  उनके सवालों के सही सही जवाब नहीं देते । यद्यपि एक ओर पढ़ा लिखा मनुष्य प्रजनन सम्बन्धी  वैज्ञानिक कारणों को भी जानता है वहीं दूसरी ओर उन पौराणिक किस्से -कहानियों में भी विश्वास करता है । इस दोहरी मानसिकता की वज़ह यही है कि धर्म और ईश्वर का भय उसे भयभीत करता है ।

    4. हे भगवान तूने मुझे पैदा क्यों किया ?
    न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
    डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता
    वस्तुत: गालिब ने यह शेर लाक्षणिक अर्थ में उस मनुष्य जाति के बारे में कहा है जिसने इस धरती पर लाखों वर्ष पूर्व जन्म लिया है ।  एक धार्मिक और ईश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति मुसीबत आने पर न तो  स्थितियों को स्वीकार करता है न ही उनका तार्किक समाधान खोजता है अपितु मुसीबतों से घबराकर वह सीधे ईश्वर से प्रश्न करता है  “ हे भगवान ! तूने मुझे पैदा ही क्यों किया ? “  या कष्टों से घबराकर वह कहता है ,’ईश्वर मुझे उठा ले’  । जन्म और मरण की अवधारणाओं से परिचित होने के पश्चात यह मनुष्य केवल जन्म के बारे में ही नहीं अपितु मृत्यु के बारे में भी निरंतर विचार करता रहा है । सुख की स्थितियों में यह जीवन उसे इतना प्रिय लगता है कि वह सामान्यत: मृत्यु के विषय में विचार नहीं करता। किसी ईश्वरीय सत्ता में विश्वास न करने वाले लोग भी दैनन्दिन व्यवहार में इस तरह के साधारण वाक्यों का प्रयोग करते हैं और जीवन –  मरण जैसे शाश्वत प्रश्नों का समाधान अन्य क्रियाकलापों में ढूँढते हैं ।

    क्या आप भी अमर होना चाहते हैं ?
    – लायी हयात आये, क़ज़ा ले चली चले
    – अपनी ख़ुशी न आये, न अपनी ख़ुशी चले
    – बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
    – पर क्या करें जो काम न बे दिल लगी चले
    (जौक)

    बहुत साधारण सा वाक्य है कि न हम अपनी मर्ज़ी से दुनिया में आते हैं न अपनी मर्ज़ी से दुनिया से जाते हैं  बल्कि सच्चाई तो यह है कि दुनिया में एक बार आ जाने के बाद दुनिया के निन्यानबे प्रतिशत लोग मरना ही नहीं चाहते । इसका सरल सा कारण है । यद्यपि स्वयं का जन्म मनुष्य के वश में नहीं है न ही वह इसके लिए  उत्तरदायी है लेकिन जन्म लेने के पश्चात यह जीवन और यह शरीर उसे इतना प्रिय लगने लगता है कि लाख कष्टों के बावज़ूद वह इसे जीवित रखने का भरसक प्रयास करता है । अब मनुष्य इतना जागरूक हो गे है कि वह इसके लिए वह तरह तरह के खाद्य पदार्थ और दवाएँ आजमाता है , व्यायाम करता है और स्वस्थ्य रहना चाहता हैं
    यह स्वाभाविक भी है । इसके अलावा वह उन समस्त सुख-सुविधाओं का उपभोग करना चाहता है जो उसके पूर्वजों द्वारा अनवरत परिश्रम से जुटाई गई हैं  । चूंकि वह स्वयं भी इस मनुष्य जाति के विकास हेतु कटिबद्ध है , आनेवाली पीढ़ी के लिए  वह भी अधिक से अधिक  सुविधाएँ जुटाने  की इच्छा रखता है और उसके लिए नित नये आविष्क़ार कर भविष्य के मनुष्य की बेहतरी के लिए कुछ करना चाहता है । मनुष्य के भीतर सारी सुख – सुविधाओं के साथ जीते हुए अमर होने की एक सुप्त इच्छा भी होती है , । *हालाँकि वह इस बात को बेहतर जानता  है कि न  कोई  अमर हो सकता है न कोई  इस जन्म में सुख पाने के विचार को स्थगित कर  अगले जन्म में सुख पाने की अभिलाषा कर सकता है ।
    इसलिए हमें जो चाहिए वह इसी एकमात्र जन्म में चाहिए क्योंकि मनुष्य इस बात को जानता है कि किसी भी प्राणी का सिर्फ एक ही जन्म होता है । चालाक लोग भी इस बात को जानते हैं लेकिन वे सामान्य मनुष्य की अमरता या पुनर्जन्म की इस सुप्त इच्छा को भुनाते हुए उसे पाप – पुण्य , मोक्ष , पुनर्जन्म आदि के जाल में फंसाते हैं । वे उन्हें बरगलाते हुए कहते हैं कि भाइयों इस जन्म में आपको सुख मिले न मिले अगले जन्म में जरूर मिलेगा , बस इस जन्म में हमें जरा दान – पुण्य करें ।  दान या आर्थिक मदद करना ग़लत नहीं है लेकिन वह केवल ज़रूरतमंद के लिए हो ऐसे पाखंडियों के लिए नहीं । यह वे लोग हैं जो आपको कर्म से विमुख करते हैं और भाग्यवादी बनाते हैं । यह लोग ईश्वर और धर्म के नाम पर आपका भावनात्मक शोषण करते हैं । इस दिशा मंल विचार करने की आवश्यकता है कि यह स्थितियाँ किन कारणों की वज़ह से हैं  । वैसे भी हम विचारवान मनुष्य हैं ,अपने पूर्वजों की तरह इस दिशा में लगातार प्रयत्नशील हैं और मनुष्य होने के कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं । बेहतर होगा हमें परलोक का लालच या भय दिखाकर हमारा शोषण करने वाले इन पाखंडियों का हम विरोध करें । ध्यान रखिये …अमर अगर आप होंगे तो अपने कर्मों से होंगे अपने शरीर से नहीं ।

    5.क्या बूढ़े होते जाने से चेतना कम हो जाती है ?
    एक मनुष्य के रूप में हर व्यक्ति एक चेतना संपन्न व्यक्ति है और एक सुदृढ़ मस्तिष्क का मालिक है । चेतना का अर्थ आप जानते होंगे, चेतना अर्थात हमें उद्वेलित करने वाली गर्व ,लज्जा,क्रोध,हर्ष, प्रेम, घृणा आदि भावनाएं ,हमारे नेत्र,नाक,कान, जिह्वा ,स्पर्श आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभूतियाँ ,और अंततः हमारे मस्तिष्क को सदा व्यस्त रखने वाले विचार यह सब चेतना है ।*   चेतना से बाहर  जो कुछ भी है वह सब पदार्थ है ।  पदार्थ मतलब हमारे चारों ओर उपस्थित वस्तुएं या पिंड जिनमें भौतिकीय ,यांत्रिकीय रासायनिक तथा शरीर क्रियात्मक प्रक्रियाएं घटती रहती है उन्हें ही भौतिकीय परिघटनाएं  अथवा पदार्थ या भूतद्रव्य कहा जाता है ।
    जैसे जैसे मनुष्य के शरीर का विकास होता है वह अन्य मनुष्यों के संपर्क में आकर विभिन्न कार्य सीखता है , रंग, ध्वनि व गंध में भेद करने लगता है इस तरह उसकी भावनाएं परिष्कृत होती हैं । लेकिन जब उसका शरीर दुर्बल पड़ने लगता है तब उसकी अनुभूतियों और विचार ग्रहण करने की क्षमता ,स्मरण शक्ति आदि पर भी प्रभाव पड़ता है । यद्यपि मस्तिष्क में अवचेतन की क्षमता बढ़ जाती है ,वहाँ भंडारण भी अधिक हो जाता है लेकिन उसे रिकाल करना मुश्किल होता है । इन सब बातों का सम्बन्ध हमारी चेतना से है  । इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य का यह भौतिक शरीर ही उसकी चेतना का वाहक होता है । सीधी सी बात है भौतिक शरीर के बाहर चेतना का अस्तित्व कैसे हो सकता है ?

 

 

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