विशिष्ट कवयित्री : कल्पना मनोरमा

अग्निफूल

सूरज के अनुभव में
चाँद छोटा
चाँद के अनुभव में
तारा छोटा
तारे के अनुभव में
जुगनू छोटा
और
जुगनू भी समझता है
छोटा
दीपक को
लेकिन ज्यादा नहीं
फिर भी
कुछ तो जरूर होता है
अद्भुत
छोटे के निज में भी
समझाता है
दीपक
तेजस्विनी शिखा को
दिखाकर उसके पास में
अभी-अभी उगे
अग्निफूल

वसंत की आहट है

वसंत की आहट है
याकि शोर है पतझड़ का
कहना कठिन है

हाँलाकि कर दिया है
दिशाओं ने प्रारम्भ
रँगना अपने
होंठों को
रचने लगी है भोर अल्पनाएँ
नई -नई क्षितिज की
मुँड़ेर पर

किन्तु फिर भी
वन-उपवन और जंगलों के
गलियारों से आती है
सन्नाटे की अजीब ध्वनि

वसंत की , छीनने के बाद
देने की आदत
आती है देर में समझ
वृक्षों को।

भाषा
(एक)

नहीं बदलती है
भाषा
पैंतरे या मुखौटे
पैंतरे और मुखौटे
बदलते हुए
देखा गया है
अक्सर
शब्दों को ।

(दो)
संसद ,अदालत ,मन्दिर
मस्जिद,गिरजाघर और
गुरुद्वारे में भी
नहीं होती है भाषित इतनी

जितनी कि होती है
भाषित
भौतिक ताप से तपते हुए
चेहरों से
या बाल चेष्टाओं में
दरअसल
भाषा ज़ुबान नहीं
माँगती है कलेजा
व्यक्ति का ।

विनम्रता

गलतियाँ
बताना
होगा उचित
तब

जब दिया जाए
सुधरने का
भरपूर अवसर
उसको

जिसने
स्वीकारा हो अपनी
भूलों को

विनम्रता पूर्वक ।

शब्द
जब लगने लगे
दुनिया मौन

हवा गुमसुम

पानी तटस्थ
धरती बेबस

सूरज
असहाय
तब
आज़माना अपने
शब्दों को

सुना है
इन्हें आता है
पत्थरों को भी
हिलाना ।

शब्द सफ़र

जब भी होती हूँ
अकेली
निकल जाती हूँ
चुपचाप
शब्द-सफ़र पर फिर
कुछ ही पलों में
होता है तरह-तरह के लोगों का
हुजूम मेरे साथ

और मैं !हो जाती हूँ व्यस्त
पंक्तियों में
……………………………………
परिचय : गीत-नवगीत लेखन में सशक्त हस्ताक्षर . एक संग्रह प्रकाशित.
मोबाइल : 9455878280

 

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