विशिष्ट कवयित्री : डॉ प्रतिभा सिंह  

अहल्या

सुनो राम !
पूरी दुनियाँ जानती थी
कि दोषी इंद्र था
पर मुझे ही क्यों श्राप का भागी बनाया
गौतम को महर्षि बनने का लालच था
या सामाजिक भय
जो इस तरह अपमानित कर चले गए
इस निर्जन से वन में छोड़कर।
वे तो मेरे अपने थे
हम लम्बे युग के सहवासी थे
फिर क्यों न समझ सके वे मुझको
जब रचा जा रहा था षड्यंत्र
मेरी अस्मिता को लूटने का
क्यों न जान सके वे
अपने तप के बल पर
चन्द्रमा की भी कुटिलता को
उसने भी तो पहरेदारी की थी रातभर
मुझको दुष्कर्म का भागी बनाते
क्या लाज न आई उसको
क्या ये जरूरी न था कि उससे
उसका सौंदर्य छीन लेते
जिसपर उसे दर्प है
मामूली से दाग का श्राप देकर क्या बिगाड़ा
ठीक है उसकी कलाएं घटती बढ़ती रहीं
पर मेरी तरह पत्थर तो न हुआ
और उस मुर्गे से भी
उसका कूकना छीन न लेना चाहिए था
जिसने समय से पहले ही
भोर होने की घोषणा की
उल्टा उसे कुसमय कूकने का श्राप देकर
तो और अनर्थ किया
कि कलयुग में मेरे जैसी न जाने कितनी
अहल्याओ का लज्जाहरण होगा
उषा और प्रातः के संदेह में
निमिष की गोद में
फिर किसी और के अपराध का भागी
कोई और होवे
यह कैसा न्याय है?
गौतम के न्यायशास्त्र का
मैने तो छोड़ रखा था उन्हें
तप और ध्यान के निमित्त
कि मनीषि होये मेरा पति
त्रिकालदर्शी होकर
लोक का कल्याण करे
छप जाए उसके मस्तिष्क पर
ब्रह्मांड का ज्ञान सारा
ऐसा भविष्यदृष्टा बन जाये कि
अनर्थ के आगमन से पहले
अर्थ को रास्ता दे दे
मुझे खुद पण्डिता बनने की
आकांक्षा कब थी
मन मे कभीं नही आया कि
मैं भी तप और ध्यान करती
जीवन को सफल बनाती
अपने पति की तरह
पत्नी धर्म निभाया मैने
भले ही गौतम
पति धर्म न निभा सके
कई अमावाश की रातों को
निर्जन वन में बैठ बिताया
आग उगलती गर्मी को
काटा है मैने
उनकी यादों की शीतल छाँव में
प्रचण्ड हो रही बरसातों में
टपक रहे टूटे छाजों में
स्मृतियों की छतरी ताने
सहम- सहम कर रात गुजारी
कहो दिलीप के वंशज
मेरी सेवा में कमी रही
या तप ही तपस्वी को ना आया
जो उसके जीतेजी शचीपति
कुटिल वेश को धरकर आया
थी अंजना अबोध बालिका
कैसे वो रक्षण कर पाती
जबकी जान रहे थे गौतम
मेरी रूप राशि से मोहित
इंद्र बना रहा घाती
जिसको मैने जीवन सारा
बन्द आँख अर्पित कर डाला
हाय उसी ने मेरे कर्मो का
कैसा निष्कर्ष निकाला……।

 

तारा

सुनो राम !

यह सच है

छलपूर्वक तुमने

मेरे पति को मारा है

अहो विधान देखो फिर भी

यह मरण पति को प्यारा है।

मैं सोच रही हूँ

क्षण- क्षण

खुद को कोस रही हूँ

समझ रही हूँ

मेरे वचनों का

किंचित कोई मूल्य नहीं

किंतु मूक होकर सह जाए

अधम भी उसके तुल्य नहीं।

सुनो सत्य मैं कहती हूँ,

जो निर्बल को छिपकर मारे

रीति- नीति तजकर सारे

कैसे कह दूँ

वह है महान

रघुवंशी कैसा विधान ?

तुम कहते हो धीर धरो

तारा !

सुग्रीव तुम्हारा है

मैने उसको मार गिराया

अनुज जिसे ना प्यारा है।

किन्तु कहो मेरी पीड़ा पर

लेपन कर सकते हो क्या?

अंगद पिता विहीन हुआ है

रिक्त को भर सकते हो क्या?

हाँ सच है बालि अधम- पापी था

अनुज पत्नि पर कामातुर

पर सुग्रीव कहाँ कम था?

जो मेरे लिए हुआ व्याकुल।

यदि रूमा थी

कन्यासम

मैं भी तो माँसम ही थी

क्या पिता काल का ग्रास बने तो

माँ बिसराई जाए

या वो भी आश्रय के बदले

शैय्या पर लाई जाये।

कहो राम!

गलत यदि दोनों ही हैं तो

दण्ड एक ही क्यों भोगे।

दण्डित करो

मित्र को तुम भी

जब न्यायधीश हो

बनकर आये ।

क्योंकि

इसके कर भी पहुँचे मुझतक

कामुकता से होकर तर।

तुम कहते हो यही उचित था

रक्षा हेतु तुम्हारे

और यही अंगद के हित में

विधि को कौन बिसारे।

राजा की पत्नी हूँ फिर भी

कुछ भी मेरे पास नहीं

शरणागत सुग्रीव की हूँ अब

था इसका आभास नहीं

क्या स्त्री देंह मात्र ही है

जो बांट -बांट कर भोगी जाए

रूमा ,तारा बनकर वो

कामुकता से रौंदी जाए।

सुनो राम!

स्त्री अधिकारों का

कोई औचित्य नहीं क्या?

बड़ी,जटिल इच्छाओं का

विस्तार यहां संक्षिप्त नहीं क्या?

तुम्ही कहो,

यह मृत्यलोक का कैसा नियम?

क्यों स्त्री देह ही बटती है?

तन- मन का संयोग न होता

रोज ही बढ़ती- घटती है।

क्या गति तुम रूमा की जानो

क्या जानो तारा की पीड़ा?

आहत कितनी बार हुआ मन

परपुरूषों से करते क्रीड़ा।

कहो राम!

स्त्री मूक रहे तो ही

वह उत्तम है

सर्वोत्तम है

प्रतिरोध नहीं शोभित होता

स्त्री के कोमल भावों पर

हाँ,

वह लेपन कब कर पाती है

मन के चुभते घावों पर।

इसपर भी

दुख मुझे यही है

मानव देह का लोभ त्यागकर

जिस वानर को अपनाया था

उसने ही मुझको कुलटा कह

हिय से ही बिसराया था।

जबकि मेरी मजबूरी थी

शरणागत बनने की

किंतु सुनो

दोनो वानर को

क्या दोष मुक्त कर सकते हो?

इनकी अपनी महत्वाकांक्षा

और शत्रुता इनकी थी

किंतु घुटी

तारा -रूमा

जब -जब कामातुर हो आये

सहज प्रस्तुता इनकी होकर

दुख में कितने रैन बिताये।

मुझे पता है,

नहीं कहोगे

क्योंकि यह पुरुषोचित है

स्त्री देंह सदा से ही है।

बुद्धि -चित्त तक पहुंचे कौन

मुझे पता है

रीति -नीति और ज्ञान पुजारी

मेरे प्रश्नों पर होंगे मौन……..।

मन्दोदरी
रुको राम!
जाने से पहले
मेरी भी सुनते जाओ
विजय पुष्प का हार तुम्हारा
मेरे हिस्से हार सही
तुमने जीवन धन्य बनाया
मेरा मरण हजार सही
पर मेरी राहों के चुभते
थोड़े काँटे चुनते जाओ।
वैधव्य दोष से युक्त
मेरा यह,
जीवन जटिल हुआ जाता है
स्वर्ग सुंदरी, प्रेमयुक्त
मुझे पता क्या मृत्युलोक में
कैसे किसे छला जाता है?
रावण को विद्वान समझ
त्रैलोक्य विजेता वरण किया
पर उसने ही मिथिला की
राजकुमारी हरण किया।
तुम्हीं बताओ
कैसे कोई
निज भगिनी अपमान सहे
राज वंश की नेहदुलारी
का यौवन में रक्त बहे।
आसक्त अगर थी तुमपर वह
तो क्या अपराधिनी थी?
सुनो राम!
यह प्रेम बड़ा चंचल होता है
किन्तु प्रेम में हारा मन
पावन सा चंदन होता है।
पर तुमने प्रेमातुर मन को
खंडित कितना कर डाला
और दर्प से व्याकुल होकर
लक्ष्मण ने आहत कर डाला।
इस प्रेम नगर का
मोह बड़ा निराला है
राजा- रंक सभी ने इसपर
जीवन ही बिसरा डाला है।
पाप -पुण्य और
स्वर्ग नर्क की बात नहीं
प्रेमी मन का पीर हिमालय
विरह में कोई साथ नहीं।
वैरागी मन हो जाता है
सुखद स्वप्न में खो जाता है
मन की बंजर धरती पर
करुणा को वह बो जाता है।
प्रेम और ईश्वर में कोई
अंतर है क्या तुम बोलो
अपने मन के पलड़े में
निष्पक्ष भाव से तुम तोलो।
सूर्पनखा को शांत चित्त से
यदि समझा लेते तुम
और लखन सदृश भाई को
स्नेह अंक भर लेते तुम
तो सीता का हरण न होता
और मेरे कुलवंशो का
ये दुखदाई क्षरण न होता।
किन्तु पता है मुझको,
तुम्हें लालसा विष्णु पद की
पुरुषों में सर्वोत्तम की
और यहां रावण ठहरा
महामूर्ख अज्ञानी पंडित
अपने ही हाथों से उसने
कुल गौरव कर डाला खंडित।
तुम्ही कहो भला कैसे
कोई भाई चुप रहता
एक दुलारी भगिनी उसकी,
कटी नाक यौवन सहता।
तुम्हें अगर प्यारी भार्या है
उसे भी प्यारी भगिनी थी
तुम्हीं कहो
कैसे चुप बैठे?
आंखों में जब अग्नि थी।
क्रोध सदा ही
बुद्धि क्षरण का वाहक है
सर्वनाश की अग्नि हेतु यह
घृत जैसा ही दाहक है।
किन्तु यहां किसका वश चलता
ज्ञानी -अज्ञानी सब हारे
अपने झूठे अभिमान पर
रावण ने सुख -वैभव वारे
दर्प यदि आ जाये मन में
स्वार्थ ,लोभ बढ़ जाता है
निर्मल सी आंखों पर भी
भ्रम का पट चढ़ जाता है।

कुंती
सुनो कर्ण!
अधिकार तुम्हें है
जो चाहे कह लो
कर दो माँ की ममता खंडित
अथवा यह दुःख भी सह लो।
यदि दंडित करना चाहो तो
नतमस्तक हूँ
अपराधिनी बनकर
किन्तु अगर मैं दोषमुक्त हूँ
न्यायधीश बन खड़े रहो क्यों
जननी के यूँ आगे तनकर।
तुम कौन्तेय हो
यह क्या है पर्याप्त नहीं
की अपनी माँ का मान करो।
अधिकार नहीं है तुम्हें
बिना कुछ जाने की
एक स्त्री का अपमान करो।
तुम क्या जानो?
पुत्र वियोग में तड़पी हूँ मैं कितना
मेरी पीर की थाह लगा पाने में
स्वयं समुद्र थक जाएगा
कैसी विडंबना
जीवन भर कष्ट उठाकर
जीवन को वारो खुदपर
चुपचाप हृदय को पत्थर कर
ना जीवन को हारो रोकर।
आसमान से पूछो
क्या होता शून्य को सहना
घाव नहीं सूखने देता
चुपचाप पीर का सहना।
माँ की अकुलाहट को समझो
अश्रु बहा नहीं सकती थी
पीड़ा बता नहीं सकती थी
एक साथ कितने शस्त्रों के वार सहे
पर मात -पिता को भी पुत्री
वह घाव दिखा नहीं सकती थी।
वह महादेव साक्षी हैं
पांडु पुत्रों से भी अधिक
तड़पी हूँ तुम्हारे लिए
मुझको आजीवन सजा मिली
बचपन में जो अपराध किया।
पर अपराध कहूँ भी कैसे?
वह भी छोटी भूल ही थी
जब पुरुष काम की ग्रास बनी
अधखिला हुआ सा फूल ही थी।
सुनो पुत्र!
कहाँ मिला सुख मुझे भी कोई
जीवनभर भटकी दुःख बांधे
निज पिता ने मुझको दान किया
जननी के आँचल की छांव मिली ना
पृथा बनी कुंती हो मौन
विधि ने बड़ा विधान किया।
शूरसेन थे जनक मेरे
और कुन्तिभोज की पालित पुत्री
एक राजकुमारी गृहविहीन पर
लगे कई बंधन बहुसूत्री।
जीवन के दो रंग सुख -दुःख
इनके रंग में रंगी हुई
जीवन पथ पर बढ़ती आई
इस युग से थी छली हुई ।
दुर्वासा मुनि का अति स्नेह
बना मुझे घातक दुःखदाई
पर सूर्यदेव को भी बाला पर
कैसे कोई तरस न आई।
था दुर्वासा का अपना ध्येय
और सूर्य की अपनी माया
दोनो की अबूझ पहेली में
मुझ अबोध ने धोखा खाया।
तुम क्या जानो?
कितना घुटकर
एक माँ ने काटे दिन अपने
पुत्र वियोग के दुःख में व्याकुल
आँखों में आये ना सपने।
कहो कर्ण तुम
कर्म -धर्म का भेद
भला क्या कर पाओगे
कर्म ही बने धर्म
अथवा
धर्म ,कर्म बन जाये
तो फिर जीवन ही समझो
उत्सव सा हो जाये।
मैने हर मोड़ पर जीवन के
कठिन परीक्षाएं दी है
कर्म ही मेरा धर्म मानकर
हंसकर बड़ी चुनोती ली है।
बचपन से मुझको आदत है
दुख से नेह लगाने की
कहाँ ठहर पाया सुख मेरा
क्षमता सब सह जाने की।
किन्तु समय यह मौन देखता
देगा इतिहास प्रमाण
जय -विजय का मुझको लोभ नही
सत्कर्म से निकले प्राण।
इसलिए पुत्र जीवनभर
जीवन का मोह है त्यागा
और मेरे तन मन पर केवल
कर्म का झीना धागा।
हाँ मैं मान रही हूँ
अन्याय हुआ तुम्हारे साथ
किन्तु पुत्र मैं विवश अकेली
भाग्य लेख नहीं मेरे हाथ।
तुम सोचो
एक माँ पर क्या बीती होगी
जब गंगा में पुत्र बहाया होगा
सौप के लहरों को नव शिशु
कैसे खुद को समझाया होगा।
माँ ने अपने हिय से कैसे
शिशु को बिसराया होगा
आँचल में बहता दूध
किस तरह भला सुखाया होगा।
तुम्हीं बताओ
मैं समाज के प्रश्नों का
कहाँ तक उत्तर दे पाती
खुद को कुलटा सुन भी लेती
पर तुम अबैध कब सुन पाती
तुम भी कहते
किसने मुझको जन्म दिया?
किसका हूँ मैं अंश बताओ?
क्या मेरी पहचान बताओ?
मैं दुनियाँ के सह लेती वार
पर यह कैसे सह पाती
आज भी उतनी श्लील हूँ मैं
कैसे तुझसे कह पाती।
मेरे अबोध कर्मों पर यदि
मेरे पालक पिता लज्जित हों
और जनक का सिर झुक जाए
तो भला बताओ
किस गति मैं जी पाती
और लोक की बातों का
कहाँ तक उत्तर दे पाती।
तुम समझ सकोगे मेरा दुःख
जलती हूँ मैं रोज
हृदय में अग्नि लेकर
कितना तड़प रही हूँ
लोक ,लाज,भय वश
तुझसे पुत्र की आहुति देकर।
क्या समझ सकोगे
कितने अश्रु बहाए होंगे
माँ की ममता को कुचला होगा
हृदय के टुकड़े को बिसराते
रोम -रोम पिघला होगा।
सारी दुनियाँ का सुख वैभव
जिस माँ की ममता से हारा
क्या मजबूरी आई होगी
की माँ ने अपने पुत्र बिसारा।
इसी घुटन में तड़प -तड़पकर
काट दिया जीवन सारा
किन्तु आज कटु शब्दों से
तुमने जीतेजी मारा।
ठीक चलो,
कौन्तेय नहीं,
राधेय ही तुम्हें कहती हूँ।
तुम हो अधिरथ के कुलदीपक
मैं भाग्यहीन चुप रहती हूं।
किन्तु सुनो यह जीवन भी
कोई साधारण खेल नहीं
तुम्हारी धमनी में
राजवंश का रक्त भरा है
किसी अधिरथ से सुनो
तुम्हारा कोई मेल नहीं।
भले तुम्हेँ राधा ने हाथों से
रोज कराया होगा भोजन
किन्तु इसी सुख से वंचित मैं
मन रेंगा है कितने योजन।

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परिचय : डॉ प्रतिभा सिंह की कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं

वर्तमान निवास-ग्राम+पोस्ट-किशुनपुर, जिला-आजमगढ़(उत्तर प्रदेश)

 

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