विशिष्ट कवयित्री: पूनम सिंह

(बाबा की सजल स्मृति को समर्पित)
एकमुश्त बहुवचन है तुम्हारी कविता 
फक्कड़ अक्खड़ और घुमक्कड़
तीन विशेषणों से परिभाषित तुम्हारा नाम
अपनी बहुपरती संरचना में
पूरी एक कविता है
जब भी पढ़ती हूँ इसे
अर्थों की तलाश में
बिबाइयां फटे खुरदुरे पैरों की
अंतहीन यात्रा मेरे साथ होती है
अदम्य जिजीविषा का उत्कट आवेग लेकर
तुमने लड़ी थी कठिन लड़ाईयां
पूछे थे व्यवस्था से खतरनाक सवाल
और अनुतरित प्रश्नों  के साथ गये थे आम तक
सकर्मकता की सामर्थ्य पहचानने
बाबा! यहीं से शुरू होती है न
तुम्हारी कविता
बंजर तोड़ते  मजदूर
खेत जोतते किसान
धान कूटती किशोरियों के श्रम सौंदर्य में
उभचुभ करते तुम
पूरी धरती पर शब्दों के बीज बन बिखर गये
तरौनी की धरती से एक नयी लहर के साथ
सचर अचर सृष्टि  से तुम कैसे सम्बध्द हुए
तुम्हारी प्रतिबद्धता सम्बद्धता आबद्दता
कहाँ किस रूप में?  किसके साथ थी?
सब बताया तुमने बहुत खुलकर हमें
लक्षणा  व्यंजना तुम नहीं जानते थे बाबा
लेकिन अराजक समय के विरुद्ध
मुट्ठियां कसना खूब जानते थे
कविता से कैसे शर्मशार होती है व्यवस्था
शब्दों की रोशनी में तुमने
दिखाया था हमें
मौन रचने वाली रूपसी नहीं
एकमुश्त बहुवचन थी तुम्हारी कविता
दुर्वासा  की तरह आंखें तरेर कर
जब देखती थी समय की ओर
बुनियादी सच्चाईयों से डरकर
दुबक जाते थे समय के नायक
बाबा तुमने गुलमोहर की छाँव में
सिखलाई थी तरुणाई को आंदोलन की भाषा
सिर से पांच तक धूल से सना चेहरा लिए
जनसंघर्षों की विरासत सौंपते हुए कहा था  उनसे
“आओ आगे आओ अपना दायभाग लो
अपने स्वप्नों को पूरी करने की खातिर
तुम्हें नहीं तो और किसे  हम देखें  बोलो?”
चिकने चमकीले पन्नों पर
पसर  जाती थी तुम्हारी स्याही
बाबा तुमने ऋतुओं,वनस्पतियों
खेत खलिहानों से सियासत की
कंदराओं तक डुबकी लगाकर
की थी कविताई
तुम्हें पता था
बहंगी ढ़ोते कंधों का दुःख
मायावी चेहरे की हकीकत भी
पहचानते थे तुम
बाबा तुम “सभी रसों को गला लगाकर
अभिनव द्रव तैयार करने वाले
महासिद्ध नागार्जुन ” थे
समय के जहर को मात देने
तुमने तैयार किया था जो जीवन द्रव्य
आज मैं उसे कविता की धूसर सांसों में
शब्द शब्द उड़ेल रही हूँ
बाबा तुम्हें मैं
अंधकार के महा समुद्र में
रोशनी के अजस्र झरने की तरह
देख रही हूँ

Related posts

Leave a Comment