विशिष्ट कवयित्री : प्रतिभा चौहान

सिलवटें

एक दशक पुरानी है चट्टान खामोशी की
और खर्च किये जाने से बचा हुआ है धीरज
आकाश के पर्दे पर टका हुआ है
जगमग संसार
तुमसे मांगना है सारे पिछले पलों का हिसाब
आखों के स्याह गड्ढों को भरते हुये
कर लेने हैं सभी हिसाब चुकता

हम तो यूं ही
हमेशा शहर की सरस्वती में
सिक्के ढूंढते पकड़े जाते हैं
तुम्हारी भनक भी नहीं लगती
समूचे भूखण्ड निगल जाते हो

नदियों की मचलती ताजगी
संदेश आज का
जब लौटोगे
शब्दों की नही बनेगी प्रतिमा
बस उबासी के समय से निचोड़े कुछ भाव
बह जायेंगे धाराप्रवाह
मुझे पता है नहीं दे पाओगे
कोई भी संज्ञा उन्हें तब

तुम मुझे दो एक राहत
प्रतीक्षा के अंकगणित के
सारे सवालों का हल बता दो
ताकि लिखती रहूँ कविता
एक सही अंतिम निष्कर्ष तक

 ख्वाहिशों की नमी

इन दिनों गर्म हवाओं में
नमीं है ख्वाहिशों की
जोश है जुनून का
रंगों के झूलते महल
हमारी आत्माओं के लरजते सबूत हैं
चुप रहूँ या जगा दूँ संसार को
अपनी आवाज की झनकार से
अमरत्व की गहन अनुभूति लिये
दुर्गम हिमालय की शान्त ललकार
है आमन्त्रण युवाओं को
नव जागरण का
जो निकला वेद ऋचाओं से
उपनिषदों की शिराओं से
बुद्ध की आत्मिक प्रेरणा ने दी ललकार
जिसको छुआ आचार्य हृदय ने
प्रवाह में हैं
हमारे धार्मिक उन्माद
और हमारा धर्म है राष्ट्र जिसकी हर धड़कन से बँधी है
तुम्हारी स्वांस
तुम्हारा लहू
तुम्हारी ऊर्जाओं का प्रक्षेपण-
पूर्व शर्त है
कर्म के लिये नवजागरण
प्रकाशदीपों की पगडण्डियाँ नहीं होतीं
रास्ते बनाते हैं वे खुद
उनकी गतिशीलता ही तब्दील होती है प्रकाशपुँज में

सिलसिला

चेक पोस्ट पर खड़ी लड़की
प्रतीक है आधुनिकता की
लाल -गुलाबी बिन्दियां बिखरी हैं समूचे लिबाास में
जैसे अर्ध रात्रि का चाँद बिखरा हुआ आकाश में
लम्बी कतारें चिंघाड़ता ट्रैफिक
समेटता बजूद
अथक यात्रा के लिये
इस रात्रि की माँग में पीला सिंदूर बिखेरता
हेड लाइटों का आईना
सुरमई बिछी हुई है
अनंत पट्टियों पर
वीरान होने से पूर्व की आखिरी लौ हैं ये गाड़ियां
एक शव यात्रा भी शामिल है
आज की  यात्रा में
एक आदमी के जाने से रूक नहीं सकता ये सिलसिला
आने जाने के नियमों में बंधीं हम सब की लम्बी छोटी  यात्राएं
नींद की स्लेट पर लिखे गये ख्वाब होंगे
अगली यात्राओं के सबब
एक फीकी सी मुस्कुराहट ने
छीन लिये धुंध के आईने
बेशक ओस में भीगी लाईटें
अधूरी गीतमालायें हैं
पर सुबह की हथेली छूने की ललक में
लड़खड़ाती रात पहुँच ही जायेगी सुबह की कोर पे

उधेड़बुन

खामोशी की किताब में
जीवन को पढ़ना जरूरी है
जागने और सो जाने के मध्य की खामोशियां ही
असली भाषाई हर्फ़ हैं…

स्वप्नों के रंग नहीं होते
बस रंगे जाते हैं अंतर्चेतना के गर्म लहू से
डूबते सूरज और उगती चाँद की परछाईयाँ
आत्मा पर खरोच जैसी हैं
बाहर सौम्य सा बहता मौसम
भीतर एक ज्वालामुखी
उधेड़ी बुनी जाती
सुर्ख यादों का सिलसिला जारी है…

लहरों में तैरते चाँद सी
खिंची है रेखा क्षितिज में
छूने को झील की गहराई
उतरते तारों भरे आकाश की थाली
परोसी हुई तुम्हारे आलिंगन को खामोश प्रहर में।

मेरी यादों के कर्ज में जकड़ते  वजू़द पर

जिस दिन तुमने
दी मुझे लम्बी प्रतीक्षा
तभी से लिख रही हूँ
मेरी यादों के कर्ज में जकड़ते तुम्हारे वजू़द पर,

एक लम्बी कविता
उजालों को निगलती रातों पर
रातों को कुतरते उजालों की उबासियों पर
लिख रही हूँ कविता ,

मौसमों की बेरहमी
बदलते रंगों और अतीत के रहस्यों पर
सुगबुगाते धुंधलके चित्रों
वापसी की खुशनुमा ध्वनि पर
रेत पर , नदी पर ,
पानी पर, समय पर
उस भूमिका पर
जो किसी लम्बे उपन्यास पर लिखी जानी है
शोक पर , संताप पर
गीत और आनंद पर
लिख रही हूँ कविता

तुम्हारी मुस्कुराहट के खजाने पर
आहट पर , खिलखिलाहट पर
थम गये पानी के हस्तक्षेप पर
लिख रही हूँ एक लम्बी कविता

उस पार

भीड़ में घिरे होने पर भी
अकेलेपन का कानून
मीठी खट्टी यादों के नियम लागू हैं
और लागू है
तमाम दुनिया के सिद्धांत
अपनी-अपनी जगह
लांघ जाते हैं अक्सर देश की सीमाएं भी वे सब
जो प्रतिनिधित्व करते हैं सारे जग के प्रेमियों का
पर कुछ लांघ नहीं पाते
अपने अहम
और जिद को भी ….
सुस्ती में पेंडुलम भी नहीं बताता
समय
और रिश्तो की शांत धड़कन
और बढ़ते हुए फीकेपन को
कब लांघ जाता है प्रेम
पता ही नहीं चलता…..

 खोज अभी जारी है

बस गया आंखों में धूल का आखरी कण  भी
इस तरह से पी लिए हैं
तुम्हारे तारों के कर्कश गुबार
धो दी आखिरी थाली भोज की
सुला दिए आखरी तह में सारे ख्वाब
मिथ्या- खूबसूरत परी चांदनी
चुराए हैं उसने सूरज के सातों रंग
उड़ेला है आंखों में गुलाब

तुम चुप्पी में गुजार दोेगे जिंदगी
मैं सितारों से शब्द मांगती हूं
बेमेल रात्रि के प्रहर में
लिबास उजला सा उधार माँगती हूँ

मेरी धरा बन जाती फिर रुपहली दुनिया  की मानिंद
तुम्हारी हंसी बरमूडा ट्रायंगल
सब कुछ लापता अभी तक
खोज जारी है…..

आंसू के कतरे
समुंदर से गहरे होते जाते
उलझती लटें सुलझाने में
और उलझ जाती है
यही जीवन है ?

खोज अभी जारी है…..

चाँद का सिरहाना

तुम्हारा खुशनुमा होना भी
एक हद है
खुश्क पत्तों के एक ढेर मानिंद…..

चंचल हवा से बैर कभी ठीक नहीं
अकस्मात टूटेगा
चाँद का सिरहाना
और रोयेगी शीशे की दीवार
फिर छा जायेगा -धुँधलका आँखों में

जख्मी नजर में
शिकायतों के कंकर
धुल जायेंगे फिर भी

रूह की कसक
सूरज की पिघलती दीवार
पीओगे कब तक…..
……………………………………..
परिचय : प्रतिभा चौहान, 10 जुलाई, हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश) में
शिक्षा- एमo एo( इतिहास ), एलo एलo बीo
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित
एक कहानी संग्रह का प्रकाशन
संप्रति- न्यायाधीश, बिहार न्यायिक सेवा

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