संबल (1)

मेरे पास सेनाएँ नहीं

संबल है

जागीरें, धरोहरें, वसीयतनामे नहीं

कुछ संकल्प और स्वप्न हैं

खेत खलिहान बाग बगीचे

मिल कारखाने उद्योग-तंत्र नहीं

ऊर्जा से भरे सिर्फ अपने दो हाथ हैं.

अन्तरिक्षयान, विमान हेलिकॉफ्टर

गाडियाँ, रथ, हाथी घोड़े कुछ भी नहीं

अपने कदमों की रफ्तार है.

आकाश में उड़ान के लिए

इरादों के फड़फड़ाते पंख हैं।

मंच, सभाग्रह नहीं

माइक, लाउडस्पीकर, प्रिंटिंग प्रेस नहीं

मीडिया चैनल तो हरगिज नहीं…

दर्शक और श्रोता भी नहीं,

एकांत में पन्नों पर उभरते

कुछ काले अक्षर हैं

अनबिके शब्द है,

भयमुक्त स्वर हैं,

इनाम और दंड से अविचलित

अपने निर्णय और निश्चय है।

 

संबल (2)

अंतिम नहीं होती कोई पराजय।

अंधेरे, घुटन और अपमान के

अवसाद भरे कोनों में,

कहीं न कहीं छिपी ही होती है

संभावना की हल्की सी किरण,

दिये की लौ सा टिमटिमाता  कुछ उजाला।

 

गहराती डरावनी अमावस की ,

लंबी सघन रातों के बाद

होती ही है पूर्व दिशा में कुछ सुगबुगाहट ,

सन्नाटे और स्तब्धता को चीरते

पखेरूओं के गीत,

सूरज की पहली किरणों के स्वागत में

खिलती पंखुड़ियों के रंग।

अंजुरी में ओस की बूँदें सहेजे

पत्तियां चमकती हैं

और जीवंत हो जाती है

रुकी थमी हुई सी यह दुनिया।

 

सूख जाती है जब धरती

सूरज की दहकाती आँच से

और कटी फटी दरार भरी जमीन पर

बूँद बूँद के लिए तरसते हैं पखेरू ,

झुलसते हैं

उन्हें बसेरा देते जंगल…..

भाप बन कर उड़ जाते हैं

नदियाँ बावड़ी कुएं ….

ठीक तभी आकाश बुन रहा होता है

बादलों के साथ एक स्वप्न

और सैलाब बन कर

बहने लगती हैं खुशियाँ।

 

जब भी लगता है मुझे कि

मुरझा गई है शब्दों की क्यारी,

सूख चूकी कलम की स्याही

और बाँझ हो चली है संवेदनाओं की धरती……

ठीक उस वक्त,

किसी अंकुर से प्रस्फुटित होते हैं शब्द

संवेदनाओं के गीले-अंधेरे कोने में,

और बांध तोड़ बहने लगते हैं कागज़ पर.

 

एक अर्से बाद

मैं पूरी करती हूँ अपनी कविता।

 

चुप नहीं रहती औरतें 

चुप नहीं रहती औरतें ;

बोलती रहती हैं बेवजह, बेवक्त

जानती हुईं भी कि

कोई नहीं सुन रहा है

उनकी बातें।

 

प्रोग्राम कर दी गई मशीन सी,

सबकी जरूरतें पूरी होने के बाद

अस्तित्वहीन समझ कर

छोड़ दी गईं हैं,

घड़ी- दो घड़ी के लिए,

अगली जरूरतों के वक्त

वैसी ही तत्परता की अपेक्षा के साथ।

 

मगर उसे

मशीन से औरत बनते

देर नहीं लगती—–

फुर्सत का छोटा सा लम्हा

लौटा देता है खोया  वजूद।

यादों का उपवन, रेगिस्तान,

कल्पनाओं का मुक्त आकाश

हकीकत की पथरीली, तपती

या बर्फीली जमीन भी।

 

अपने से ही

कुछ  कहती- बुदबुदाती हैं

अस्फुट शब्दों मेँ,

तो कभी

आँखों से  बहते सैलाब में

ढूंढती हैं अपनी भाषा।

शिकायतों का पिटारा ही

नहीं होता हरदम,

दुआओं-प्रार्थनाओं ,

ड़र-आशंकाओं,

तो कभी उल्लास-उम्मीदों को भी

शब्द देती हैं।

 

अपने ही लोगों के जीवन से

क्रमश: निर्वासित होती,

एकाकी पाती है अपने को ।

कोई नहीं,

जिसे सांझा कर सकती

मन की  बातें- सपने, आशंका, हसरतें।

खिलखिला सके थोड़ी देर

बहते झरने सी,

रो कर बेबात,

बदलियों सी बरसने के बाद

खुल सके  आसमान की तरह,

उजास से भर कर।

कुछ कहने से पहले ही

पढ़ लेती हैं

सबके चेहरे पर चिपके

उपहास और

अवांछित हस्तक्षेप जैसे इल्ज़ाम।

 

सुबह से शाम

एक एक बात सुनाने की

मनुहार  करते बच्चे,

वक्त के साथ बहते हुए,

जान छुड़ाकर भाग जाना चाहते हैं।

उड़ा देते हैं हंसी में

उसकी परोंसी नसीहतें

और हिदायतें

या खीझते हैं

बस हो गया बहुत,

हमें सब पता है यह जताते हुए।

 

छोटी-बड़ी फरमाइशों को

जन्मसिद्ध अधिकार की तरह

रात दिन सौपते हुए,

अचानक व्यस्त हो जाते हैं

मित्रों, मोबाइल और लैपटॉप की

अलग दुनिया में।

जानती हैं

पति से कुछ कहना तो,

भैस के आगे

बीन बजाने से अलग नहीं।

बिना सुने ही करना है- हाँ हूँ ,,,,

एक कान से सुनकर

दूसरे कान से निकाल देने की भी

जहमत नहीं उठाना चाहते हैं वह।

आंखे और कान किसी स्क्रीन पर

मजबूती से जमी,

अभ्यस्त उँगलियों से

रिमोट अथवा माउस को साधे हुए,

त्रस्त और व्यस्त होने के

मिलेजुले भाव…

सोच ही नहीं सकते

कुछ नया, सार्थक,

जरूरी भी हो सकता है

अनर्गल ठहरा दी गई

उसकी बातों में ।

 

खाने की मेज पर

किसी गोल, किसी रन

अथवा राजनीति पर

गरमागरम बहसें।

सोचती है कभी

किसी को पता भी है,

उनकी पसंद के बनाए गाजर के हलवे

अथवा दहीबड़े के लिए

देर रात जागी है वह।

न चाहते हुए भी

याद आ जाता है

ऑफिस में अचानक उठा सिरदर्द,

लौटते हुए

सब्जी के थैलों का भारीपन।

 

बहुत समय  से

छाँट कर रखी कुछ पत्रिकाएँ,

मुंह चिढाती है।

फुर्सत से पढ़ने के लिए,

ऊपर रखी पसंदीदा लेखक की

पुस्तक का एक पन्ना

फड़फड़ाने लगता है।

 

उड़ेलती हैं गुबार जब तब

बहरे लोगों के आगे।

किसे है मगर

एक धधकते हुए ज्वालामुखी का ताप

महसूस करने की चाह।

अवरोधों-बांधों के बावजूद,

एक नदी की

बहते रहने की आकांक्षा।

फूल-पत्तियों के विलग होने,

डालियों के काँट-छाँट के बाद भी,

दोपहरी के ताप से सबको बचाने की,

ममता भरी चाहत,

जिद और जद्दोजहत

कहाँ मानी रखती है।

 

बार बार याद दिलाती है

पैक कर रखे लंच-बॉक्स

पानी की बोतल साथ रखने की,

ठीक वक्त पर दवाइयाँ लेने,

चार्जर और चश्मा न भूलने की…..

तेज बाइक न चलाने

और रात के खाने तक लौट आने की।

 

सबकी शांति में

विध्न डालती हैं

रात दिन की चिकचिक से।

सच, चुप नहीं रहती औरतें…….

 

 तानाशाह के लिए 

तानाशाह के लिए

जरूरी बस इतना ही है कि

खडे कर दिये जाए ,

वे तमाम लोग

एक दूसरे के विरोध में,

जिन्हें असल में होना चाहिए

एक दूसरे के साथ,

हमदर्द

और मददगार।

 

कल्पित शत्रुओं के नाम से

 

डराये  गए,

छले , भरमाए हुए लोग,

बहुत उपयुक्त होते है

बारूद की तरह

इस्तेमाल होने के लिए।

उसके प्रचारतंत्र को,

झूठे किस्सों की

बम्पर पैदावार चाहिए।

वर्तमान की

अंधेरी खोह में,

रोटी और रोजी की नाकामयाबी से

तिलमिलाती भीड़ के द्वारा

जवाबदेही की मांग से पहले ही,

पेशेवर जादूगर की तरह

वह दिखाता है अपनी टोपी

नए करतब से पहले।

 

दूर किसी डाली पर

सोने की चिड़िया होने का

अहसास दिलाना है उसे ,

वर्तमान के दुर्दिनों को सहने की ऐवज में।

मसीहा बन कर पैदा होने का

अहसास कराता है,

दरबारियों और

बिके बुद्धिजीवियों के द्वारा।

इतिहास के चमकते सितारों को

खलनायकों में बदलने का

षडयंत्र रचता है।

 

सूखी भाव-स्वप्नहीन आंखों की दहक

उसे भस्म कर दे

इससे पहले

मुट्ठी भर अनाज़

अपनी तस्वीरों के साथ बाँट कर,

कर्ज अदायगी की याद दिलाता है।

प्रशिक्षित करता है

अपनी उन्मत्त सेना के द्वारा,

त्रासदी को

अवसर में बदल देता है।

 

एक उन्मादी भीड़,

लहराती है  मुट्ठियां।

दिशाओं को थर्राते हुए,

चाकू-तलवार-बंदूकें लेकर

झपटती है।

 

किसी गौरव तो किसी आस्था के नाम।

 

हँसता है तानाशाह।

अब आपस में ही ले लेंगे

वे एक दूसरे की जान,

वस्त्र और प्रतीकों के आधार पर,

नाम-जाती-धर्म –प्रांत-खाद्य

भाषा-सोच-मान्यता-परंपरा…..

अपनी फ्रेम के भीतर

ठीक से फिट न हो सकने वाले

किसी की भी।

महसूस कर लेंगे

पुण्य हासिल होने का सुकून।

 

इतिहास की किन्ही

गलत-सही घटनाओं का

हिसाब चुकता कर देंगे,

बस उनकी पीठ पर

अभयदान का तुम्हारा हाथ चाहिए।

 

बिन रोशनदानों की

उनकी तंग कोठरियों के भीतर

ताजी हवा, सूरज की किरणें

झांक भी न सके।

इतना भर करना है तुम्हें

कि मंडराती रहे

वहाँ की हवा मेँ,

नफरत और दहशत की परछाइयाँ,

उनकी आँखों मेँ सुलगती रहे

अविश्वास और आक्रोश की चिंगारियाँ।

 

कच्चे माल की तरह

जुटाए गए

इन्हीं लोगों के भरोसे,

सफल होते  रहेंगे तुम्हारे

अश्वमेध के आयोजन।

प्रायोजकों के

मिल और कारखाने

उगलते रहेंगे अथाह दौलत,

तुम्हारे साम्राज्य के विस्तार के लिए

और अकूत ताकत

तुम्हारी निरंकुशता के लिए।

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परिचय : कवयित्री की तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं. तेल एवम प्राकृतिक गैस आयोग में भूवैज्ञानिक के तौर पर उप महाप्रबंधक (तेलाशय) के पद से सेवानिवृत

सम्पर्क :  B 8/803 ला मरीना, शांति ग्राम , S G हाई वे, दँताली, गांधी नगर 382421  (गुजरात)

मो. 09969221570.

 

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