विशिष्ट कवयित्री : भावना सिन्हा

स्कूटी चलाती बेटी

एक दिन देखती हूँ क्या कि —
सहेलियों को अपने पीछे बिठाकर
फर्राटे से स्कूटी चलाती हुई
चली आ रही है बेटी

फटी की फटी रह गई मेरी आंखें
कब- कहाँ – कैसे
सीखा है बेटी ने स्कूटी चलाना
घर – भर के लिए
यह अचरज का विषय है
और बहस का मुद्दा भी
कम वय में
अधिक छूट देने से बिगड़ जाते हैं बच्चे
कहीं कुछ न कर बैठें ऐसा-वैसा
भुनभुनाती हैं दादी
जबकि
रोक टोक से बच्चों में
कुंठा घर कर जाती है —
अपने तर्कों से बीच में ही
हस्तक्षेप करती हूँ मैं
इन तमाम बहसों के दौरान
चुपचाप मुसकराते रहते हैं पापा
जो भी हो!
बेटी का स्कूटी चलाना
समाज में
स्थापित इस सत्य कोई नकारना है —
बेटियाँ बोझ होतीं हैं
आजकल ..
अपने छोटे छोटे काम
चुटकियों में निबटा रही अकेले ही
यहाँ तक कि–
बनवा लाती है
मेरा भी चश्मा
थके हारे
ऑफिस से लौटे पापा को
परेशान नहीं होना पड़ता अब

स्कूटी चलाना
बेटी का अपना निर्णय है
खुश हूँ–
जहाँ इतने सालों में
आत्मसंशय से मैं नहीं हो सकी मुक्त
बेटी! अभी से है मजबूत अपने इरादों में !
अब तो वो …
ढूँढ- ढूँढ कर बहाने
चला रही है स्कूटी
और!
मैं मंत्रमुग्ध
देखती रहती हूँ उसे
आते-आते
अपनी धुन में मग्न
स्कूटी चलाती बेटी
आसमान में
उड़ती चिड़िया- सी लगती है मुझे!

अहम अप्रियम

शब्द भी रखते हैं रुआब
अपने अपने मायनों में
मूँछों पर देते ताव
लिखने के बाद
बदल देने से
अपमानित महसूस करते
आखिर हैं तो वे शब्द ही
भले
आपकी जरूरत के नहीं
मेरा आग्रह है आपसे
लिखने से पहले करें
शब्दों का चयन
सोच समझ कर
अन्यथा–
नाहक ही दुखेगा उनका दिल
तीन बच्चों में बीच वाले की तरह
सोचकर —
अहम्
अप्रियम् ।

पिता ने कहा था

मनाने से मिटती है कटुता
बांटने से बढ़ती हैं खुशियाँ
पूछने से बचा रहता है सौहार्द
निभाने से टिकता है रिश्ता
साथ साथ रहना सीखो ! बेटा
साथ साथ रहना—
साथ साथ रहने से
देखते देखते कट जाती हैं
रास्ते की लंबी दूरियां
साथ साथ रहने से
बड़े से बड़े दुख में
जूझने का
मिलता है हौसला
अन्यथा
अकेलापन खा जाता है अंतःकरण
घुन की तरह
आदमी
अपनी ही आत्मा की
प्रफुल्लता से चूकता है और
सुख के तलाश मे
जीवन पर्यंत यात्री बना रहता है——-
अपने स्नेहिल हाथों को
मेरे माथे पर हौले से फेरते हुए
पिता ने कहा था
बाद पिता के
विलुप्त होती गौरैया की तरह
धीरे-धीरे कम होता गया
साथ साथ का अभ्यास ।

गौरैया

मेरी उदासी जब
आंसुओं में
ढल जाती है
चहचहाकर
एक गौरैया
मेरा ध्यान बांटती है …!

नदी
नदी किसी होड़ में शामिल नहीं है
वह अपनी रौ में दौड़ रही है
अपनी धारा में लिप्त
इठलाती…
बलखाती…
बदल – बदल कर दिशाएं….
बहना नदी की नियति है
नदी बह रही है
उसके रास्तों में
जैसे पहाड़ आया
जैसे जंगल आया
वैसे
समन्दर भी

नदी !
मैत्री-भाव से
सबको गले लगाती
बढ़ती है आगे
समन्दर के प्रेम में डूब कर
नदी मिटा देती अपनी हस्ती
यह कवियों की कल्पना है
मात्र!
कल्पना !

सपने

इस रंग के….
उस रंग के….
सपने !
रंग-रंग के…

सपने देखना और
सपनों को पूरा करना
दो अलग बातें हैं–

नानी कहती थीं–
छलिये होते हैं सपने
छीन लेते हैं तुमसे तुम्हारा वर्तमान
भविष्य भी रहता निरापद नहीं

मेरी मानों तो
मत भागना उन सपनों के पीछे
जो पांव- पांव साथ चलते तुम्हारे

और
चुराकर चुपके से नींद तुम्हारी
असमय ,
बूढ़ा बना देते हैं तुम्हें
अंततः
एक उदास आदमी।
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परिचय : भावना सिन्हा की कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं.

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