मिट्टी में जडे़ं

कसीदे कारी वाले गमलों में
आश्रय देकर
इतरा रही है
अपनी सम्पन्नता पर
तुम्हारी सोच ।
मेरी हरी भरी डालियां
खिला खिला यौवन देखकर
तन जाती है गर्दन तुम्हारी
हक़दारी के अहम में ।
मगर तुम्हें पता ही नहीं
सांवले बदन पर जंचती
पिली साडी़ का मर्म ।
आओ ! छुकर देखो !
कैसे पक्की मिट्टी को फोड़कर
समाई हुई हैं
कच्ची मिट्टी में
गर्भ में जड़ें मेरी …।।

नि:शब्द स्नेह

दर्पण सा पैगाम तुम्हारा
बांचू तेरा
आखर -आखर
सिर टिकाए
दरवाजे पर
बैठूं तुझको हाथ में लेकर ।
रह जाऊं
बिन बोले दिनभर
ए खयाल
रोम – रोम महकाओ तुम
मैं धर दूं तेरे माथे चुम्बन ।
जैसा तेरा प्यार है निश्छल
वैसे मेरी
आंखें जोगन …।

 

किताब

कई दिनो की जुदाई के बाद
अचानक
तुम्हें सामने पाकर
उल्लासित हो
चहक उठेगा वो ।
तुझे हथेलियो में भर कर
देखेगा लाड़ भरी नजरो से
करेगा बातें ढेर सारी
पूछेगा हाल …
कैसे रही इतने दिन
बिछड़ कर मुझसे ।
फिरायेगा हौले -हौले
ऊंगलियां तुम्हारे चेहरे पर
और पोंछ देगा
धूल यात्रा वाली ।
होगा सशंकित भी
जांचेगा तेरा अंग -प्रत्यंग
दौरान यात्रा के ,
कहीं तुम्हें खरोंच तो नहीं आई ..
खोलेगा वो बरक-बरक
बांटेगा एहसास कई …
आंखों से चुमकर
रख देगा
करीने से सजाकर
अपने
बुक -सेल्फ में ।।

तत्व

काश !
हम जिन्हें चुनते हैं
जिन्दगी में शामिल करते हैं
जीवन भर के लिए
उनका हृदय भी होता
“कमीज/समीज”की तरह
बटन खोलते
और
देख लेते हम
अंतस का
समुचा तत्व …।।।

नया जीवन

नवजीवन
पुर्नस्थापना
और
निर्भरता से मुक्ति के लिए
जरूरी है मन की शल्यचिकित्सा
ऐसे कि भरनी होगी स्वयं ही
पुरी ताकत से
उडा़न ऐसी की पहुंच जायं
शिखर की तेज धार वाली शीला तक ।।
तोड़नी होगी
भोथरी चोंच
झाड़ने होंगे
स्थुल पंजे
चमकाने होगे
ठोक पीट कर
मंद पड़े डैने ।
क्योकि
नवीन काया के लिए
सिर्फ सोच ,सपने ही काफी नहीं ..
जोश और जुनून भी चाहिए
ठीक वैसा
जैसा कि स्वयं को घायल करके
पीडा़ सहके
लहू लुहान होकर
पा लेता है
नवयौवन
नया जीवन
पक्षिराज गरुड़
(अंधविश्वास पालना नहीं है , अपने दुर्गुणों को ठोक पीट कर निकाल देना ही नयाजीवन पाना है )

भरम ही सही …

काश !की तुम
“थाली के बैगन “भी होते …।
मेरे पाले में भी होते
कुछ बनावटी शब्द
झुठा प्रेम
खोखली उम्मीद
भरम के साए
जिनके सहारे
रख लेती संजोकर
मैं भी मन के गुलल्क में
आशा के खनकते पल …
शायद टूट कर
बिखरने से
बच जाती मेरी भी दुनियां …।।।

काश ! ऐसा होता ।

आषाढ़ के दिन
और
तफरीह को निकलो तुम ।
अचानक
घिर आए काले घने बादल
तड़ -तड़ ,कड़-कड़ करती बिजुरी
डराए तुम्हें ।
पागल बौछारें
करने लगे सराबोर तुम्हें
तब छुपने के लिए
अनजाने में आ जाओ तुम
मेरे चौबारे ही …
बस इसी चाहना में
चकोर हुई बैठी है
मेरी चाहत …
क्या करुं …।
………………………………………………………….
परिचय : मंजुला उपाध्याय ‘मंजुल’ कविता के अलावा साहित्य की अन्य विधाओं में लिखती हैं.
हथेली भर धूप (कविता संग्रह) एवं तू मुझमें धड़कता है (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित
सम्पर्क : सम्राट चौक, पूर्णिया-854301
मोबाइल : +919470885245

 

By admin

One thought on “विशिष्ट कवयित्री : मंजुला उपाध्याय ‘मंजुल’”
  1. बहुत सुन्दर भावों से भरी गहरी कविताई
    साधुवाद आपको

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *