विशिष्ट कवयित्री : मीरा श्रीवास्तव

स्त्रियाँ कहीं से आएँ

स्त्रियाँ कहीं से आएँ
कहीं भी जाएँ
तनाव, खीझ, झुँझलाहट की परत
चिकने , महीन फेस पाउडर की तरह
फैली होती है उनके चेहरे पर
अॉटो से उतरती, कंधे से लटकते
थैलेनुमा पर्स में ठुँसी सब्जियों में
कॉम्पैक्ट , मनपसंद लिपस्टिक
कंघे की लापता मौजूदगी भी
स्त्रियों के तनाव से खींचे चेहरे
झुँझलाहट में भिंचे होंठों की
सिकुडन मिटाने में
कामयाब नहीं हो पाती
पर्स में ढनमनाते लंच के
डब्बे सा खाली मन और
मनों भारी कधमों से
इन स्त्रियों के लिफ्ट में
घुसते ही लिफ्ट उनका
तनाव बिना बोले बाँट लेता है
लिफ्ट में सवार पुरुष क्यों
नहीं बाँट पाते उनकी खीझ
न ही देख पाता है घर पर
टी वी के सामने बैठा पुरुष
जिसकी नजर रह – रह
घडी की सूइयों पर जा टिकती है
क्यों नहीं देख पाते ये पुरुष
कि स्त्रियाँ बस, अॉटो, लिफ्ट
दफ्तर में ऐसी निगाहों को
झेलती रहती हैं लगातार
काईंयापन से कनखियों से
उन्हें टटोलते ये पुरुष
कहाँ होते हैं उस वक्त
जब स्त्रियाँ अपनी देह पर
पडे अदृश्य खरोंचों से
लहुलुहान हो रही होती हैं

छोटी -छोटी सी बात…

याद है मुझे ,बरसों पहले
अवगुंठित वधू वेश में
सकुचाई आई थी इस घर में
अंधेरी बीती रात में ,
घर ने हँसकर मुझे
भर लिया था बाँहों में ,
लेकिन चीजों से मेरा परिचय
नहीं हो पाया था -यह याद है मुझे
अंधेरा जो था ,सब अधजागे
अधसोये से थे -लोग और चीजें भी
अंधेरा आकृतियों की पहचान
लील जो लेता है
भोर की अँखुआईं किरण के आने के
पहले ही आदतन मैं जागी थी
सबसे पहले ….
उस भिनसारे में ,घर के भीतर दबे पैरों
दाखिल होती धूप की फैलती उजास में
मेरी जान -पहचान की शुरूआत हुई थी
घर के लोगों से और न जाने कितनी चीजों से
यह बरसों पहले की बात है !
बरामदे की रेलिंग से घर के बीच
चौकोर आँगन दीखा और
कुछ और भी देखा मैंने कि बस
चिहुँक सी गई -चक्की (जाँता ) ?
शहर के घर में इसका क्या काम ?
किससे पूछती ,नया माहौल और
अनजाने लोगों का संकोच !
धीरे-धीरे तो जान ही गई कि
बड़ी अम्माँ अपने दोनों पैरों को
जाँते के दोनों ओर फैलाये
अरहर, चना, मसूर, चावल को
सूप से फटकती ,भर -भर मुट्ठी दाल
जाँते में डालती जातीं और शुरु हो जाती
उनकी घर, परिवा, गाँव, मोहल्ले की
चटपटी ,खट्टी -मीठी और कभी-कभार
तीखी -कड़वी ,छोटी -बड़ी कहानियाँ
और किस्से, याद है मुझे जबकि यह
बरसों पहले की बात है !
कभी-कभी तो दिन -दिन भर हम
सम्मोहन में बँधे उन किस्सों के
कब शाम का अंधेरा चोर की तरह
उस छोटे कमरे में घुस आया
हम जान ही न पाते और उधर
शाम उतरने के साथ ही बड़ी अम्माँ के
अनवरत घूम रहे हाथों के लय के साथ -साथ
जाँते में गिरती रहर ,मसूर और चना
कब दालों की शक्ल अख्तियार कर लेते
हम कैसे जान पाते ?हम तो बड़ी अम्माँ के
किस्सों में मशगूल थे -बहुत बरस हो गये
इस बात को, लेकिन मुझे याद है
चना सत्तू की शक्ल में बदल ,बेसन की
सोंधी महक में डूब, जब हमारे सामने
जमीन पर बिखर जाती ढ़ेरियों में
तब टूटता तिलिस्म बड़ी अम्माँ के किस्सों का
तब हमपर जाहिर होता बड़ी अम्माँ और जाँते की
मिली -जुली साजिश ,जो चूल्हे पर चढ़ी
देगची से सोंधी -सोंधी महक उड़ाती है
वैसे तो यह बरसों पुरानी बात है ,लेकिन
मुझे अब भी याद आती है जब कुकर में
पक रही दाल में बरसों पहले की जज्ब
वही सोंधी महक मैं तलाशती रह जाती हूँ
न जाने क्यों बरसों पुरानी वह बात
आज भी याद है मुझे ……

फिर कुछ यूँ ही —-

एक बालिश्त भर दूर बैठी मैं तुमसे
और तुम्हारे हाथ का स्मार्ट फोन
सैकड़ों, सैकड़ों को पल भर में
कनेक्ट करता तुमसे
मैं तुम्हें छूती हूँ हल्के से
और – ‘इस रुट की सभी लाइनें
व्यस्त हैं’ सुनते ही हाथ
वापस खींच लेती हूँ !
कुछ देर बाद फिर वही कोशिश मेरी
और – आप जिस व्यक्ति से
सम्पर्क करना चाहते हैं ,
‘ वह किसी और नम्बर पर व्यस्त हैं
मैं हारती नहीं, जिदियायी सी
फिर कोशिश करती हूँ एक बार और ,
सुनती हूँ – ‘जिस व्यक्ति से आप ,
सम्पर्क करना चाहते हैं वह रिसपौंड नहीं कर रहे ‘
या –‘ आपकी काॅल अभी पूरी नहीं हो सकती ‘ ,
ओफ ! बालिश्त भर की दूरी और
इतनी पुअर कनेक्टिविटी !!!!!
………………………………………
परिचय :
एम.ए – हिंदी, पटना विश्वविद्यालय, पटना
पी.एच-डी,
पत्र-पत्रिकाओं में कविता, आलोचनात्मक लेख व साक्षात्कार प्रकाशित

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