विशिष्ट कवयित्री :: मृदुला सिंह

वसंत और चैत

वसंत जाते हुए ठिठक रहा है
कुछ चिन्तमना
धरती के ख्याल में डूबा
मुस्काया था वो फागुन के अरघान में
जब गुलों ने तिलक लगाया था
अब फागुन बीता तो
दस्तक हुई दरवाजे पर
आगंतुक है चैत
नीम ढाक महुये के कुछ फूल लिए

संवस्तर का चांद
जड़ा है सर के ऊपर
छिटकाता नवल चांदनी
पेड़ों ने आहिस्ता से
झाड़े हैं पीले पत्ते
और नव कोंपल उग आई हैं
उदास ठूंठों पर

खेतों का सोना किसानों के
घर जाने को आतुर है
खलिहानों की रानी ने
छेड़ दिया है चैती का मादक राग
लय पर उसकी
थिरक उठा खलिहान
झूमकर पुरवा नाचती
बटा रही है उनका हाथ
दाने आएंगे भरेगा खाली भंडार
जीवन की आंच पड़ेगी अब कुछ मध्यम

उपकारी चैत बड़ा संस्कारी है
जीवन से भरा मनोहारी है
वह शक्ति के जस गीतों से
कर रहा बसंत की विदाई
प्रकृति के सुनहरे रंग चैत को भेंट कर
बसंत भी अब धीरे धीरे लौट रहा अपने देश
धरती की हरी गुलाबी कामनाओं के साथ

रेल, जनरल डिब्बा और देश

जनरल डिब्बे में
पहली सीढ़ी पर जगह बनाना है सिर्फ
फिर यात्रियों का सैलाब
खुद ही बहा ले जाता है भीतर तक
यहां जगह का मिलना
उतना ही काल्पनिक है
जितना बहुत से गरीबो को
भरपेट खाना मिलना

इन डिब्बों में सफर करती महिलाएं
पानी की तरह अपनी जगह बना लेती हैं
सीट न सही फर्श तो है
जहां बैठ दूध पिलाती है बच्चे को
और लोगों से बतियाती
काटती है यात्रा सफर की
जीवन की तरह

जनरल डिब्बों के इन बच्चों के लिए
कोई अजनबी नही होता
हैरत भरी आंखों से दूसरों को देखते
इन बच्चों को हंसाने दूसरा यात्री
बच्चों सी हरकतें करता है
हंसती है हवा तब खिड़कियों पर
और घर लौटते ये मजूर
किसी के अधखाये बड़े समोसे को भी
करते है सहर्ष स्वीकार

ट्रेन की आवाज के साथ
उतरने लगते हैं इनकी आंखों में
खिड़की पार के खेत और सूखी नदी
ऊँची बिल्डिंग और बाजू की झोपड़ी भी
विचारों में सुख दुख की पटरी
दूर कहीं एक हो रही है
पर होती वह हमेशा अलग अलग ही

कोई भी स्टेशन हो
छोटा शहर या महानगर
जनरल डिब्बे का दृश्य एक ही होता है
तारीखे बदलती है
लोग बदलते हैं
पर कभी नही बदलता यह दृश्य

रोज देश की आधी दुनिया
इसी तरह अपने छोटे छोटे सपने बचाती
निकल पड़ती है जिंदगी की जद्दोजहद में
क्योंकि परिवार की जिम्मेदारी
साथ रखी मोटरी में बंधी है
जिसे समेट हर रोज निकलना है
रेल की इन अंतिम बोगी का सच
देश की आधी दुनिया का सच है

 पोखर भर दुःख 

आते जाते देखती हूँ
यह उदास पोखर
और उस पर गुजरते
मौसमों को भी
कुमुद का बड़ा प्रेमी
पुरइन पात पर लिए प्रेम उसका
अंतस में सोख लिया करता है
और पी लिया करता है
धरती का दुख भी
तपिश के दिनों में

करेजे पर उगे उसके प्रेम साँचें को
सौदाइयों ने नोच फेंका एक दिन
और रोप दिया कमल
क्योंकि यह जरूरी था दिवाली
और बाजार के लिये

खिल गए देखते ही देखते
अनगिनत गुलाबी कमल
पोखर भी मुस्कुराने लगा
कमलिनी कितनी खुश थी
पीले वल्वों से सजे घाट
मेल मुलाक़ातों से उभरी खुशी
बच्चों की खिलख़िलाहट देखकर

कार्तिक बीता
और बाजार को भेंट हुए कमल -कमलनी
कमलनाल के ठूंठों से बिंधी
बची रही पोखर की छाती
रोपी गई सुंदरता अस्थाई थी
जो बिक गई बाजार
अब कौन आएगा इस ठाँव
ठूँठ की बस्ती में भला कौन ठहरता है

गाय गोरु आते हैं
पूछते हैं हाल
दादुर मछली और घोंघे बतियाते है मन भर
पांत में खड़े बगुले किनारे से
सुनते हैं उसके मन का अनकहा
नया फरमान आया है कि
यहां अब बनेगा बारात घर
फालतू जगह घेरे है
स्विमिंग पूल तो हैं
फिर शहर में पोखर का क्या काम

ओ मेरे रास्ते के साथी!
तुम्हे देख कर ही सीखती आई हूँ
दुर्दिनों में खुश रहने का राग
तुम्हारे वजूद को नष्ट कर देना
जीवन की नमी को नष्ट कर देना है
तुम्हारे जाने के बाद
बजता रहेगा साज
जैसे शहनाइयों पर धुन
किसी
करुण विदागीत की
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परिचय : मृदुला सिंह पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित हो रही हैं.
संप्रति -होलीक्रोस वीमेंस कॉलेज अम्बिकापुर,छत्तीसगढ़ में विभागाध्यक्ष( हिंदी)
मेल -mridulas439@gmail.com
मो. 6260304580, 7581968951

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