विशिष्ट कवयित्री : रुचि भल्ला

माफ़ीनामा

मैं क्षमाप्रार्थी हूँ
दुनिया के सारे बच्चों के प्रति
कि उन्हें मारा गया छोटी -छोटी बातों पर
हाथ उठाया उनकी छोटी गल्तियों पर
उन्हें चोट देते रहे

जबकि बड़ी मामूली सी बातें थीं
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टूटने की तरह नहीं था
उनके हाथ से काँच के गिलास का टूट जाना

और बच्चों ! जब तुमने स्कूल का काम
नहीं पूरा किया
लाख सिखाने पर पहाड़े नहीं याद किए
बाबू जी की छड़ी छुपा दी
टीचर के बैठने से पहले उनकी कुर्सी हटा दी
ताजा खिला गुलाब तोड़ डाला
स्पैंलिग मिस्टेक पर नंबर गंवा दिए
खो दिए ढेर पेंसिल रबर
कॉपी के पन्नों से हवाई जहाज उड़ा डाले
इतनी बड़ी तो नहीं थीं तुम्हारी गल्तियां
कि हमने तुम्हें जी भर मारा

मेरे बच्चों आओ ! मेरे पास आओ !
मैं पोंछना चाहती हूँ तुम्हारे भीगे हुए चेहरे
रखना चाहती हूँ तुम्हारी चोटों पर मरहम
मेरे बच्चों आकर मुझे माफ करो

हमने अब तक सिर्फ मासूमियत को मारा
हमने उन्हें नहीं मारा जहाँ उठाने थे अपने हाथ
वहाँ ताकत नहीं दिखलाई
जहाँ दिखलाना था अपने बाजुओं में दम
वहाँ हम खड़े अवाक रह गए …

न्यूटन ….सेब और प्यार का फ़लसफ़ा

जब तुम याद करते हो ……
स्तालिन लेनिन रूसो गाँधी
सुकरात टैगोर सिकंदर को
मैं उस वक्त याद करती हूँ न्यूटन को
देखती हूँ सपने न्यूटन के
सपने में धरती मुझे सेब का बगीचा दिखती है
न्यूटन बैठा होता है एक पेड़ के नीचे
और मैं उस पेड़ के पीछे

दुनिया वालों ! जब तुम खरीद रहे थे सेब
उलट-पुलट कर उसे खा रहे थे
ले रहे थे स्वाद कश्मीरी डैलिशियस
वाशिंगटन गोल्डन एप्पल का
ठीक उसी वक्त न्यूटन के हाथ भी एक सेब लगा था
सेब के ग्लोब को उंगली से घुमाते हुए
उसे मुट्ठी में मंत्र मिला था ‘ग्रैविटी फोर्स’

जब तुम सो रहे थे मीठा स्वाद लेकर गहरी नींद
न्यूटन ने सेब की आँख से
आसमान को धरती पर झुकते हुए देखा
धरती का आसमान की ओर खिंचाव देखा था

तुम नहीं समझोगे इस प्यार को
एडम ईव की संतानो !

रंग का एकांत

राग वसंत क्या उसे कहते हैं
जो कोकिला के कंठ में है
मैं पूछना चाहती हूँ कोयल से सवाल

सवाल तो फलटन की चिमनी चिड़िया
से भी करना चाहती हूँ
कहाँ से ले आती हो तुम नन्हे सीने में
हौसलों का फौलाद

बुलबुल से भी जानना चाहती हूँ
अब तक कितनी नाप ली है तुमने आसमान की हद

बताओ न मिट्ठू मियाँ कितने तारे
तुम्हारे हाथ आए

कबूतर कैसे तुम पहुँचे हो सूर्य किरण
को मुट्ठी में भरने

कौवे ने कैसे दे दी है चाँद की अटारी से
धरती को आवाज़

आसमान की ओर देखते-देखते
मैंने देखा धरती की ओर

किया नन्हीं चींटी से सवाल
कहाँ से भर कर लायी हो तुम सीने में इस्पात ….

मैं पूछना चाहती हूँ अमरूद के पेड़ से
साल में दो बार कहाँ से लाते हो पीठ पर ढोकर फल

मैं सहलाना चाहती हूँ पेड़ की पीठ
दाबना चाहती हूँ चींटी के पाँव
संजोना चाहती हूँ
धरती के आँगन में गिरे चिड़िया के पंख

पूछना चाहती हूँ अनु प्रिया से भी कुछ सवाल –
जो गढ़ती हो तुम नायिका अपने रेखाचित्रों में
खोंसती हो उसके जूड़े में धरती का सबसे सुंदर फूल

कहाँ देखा है तुमने वह फूल
कैसे खिला लेती हो कलजुग में इतना भीना फूल
कैसे भर देती हो रेखाचित्रों में जीवन

मैं जीवन से भरा वह फूल मधु को देना चाहती हूँ
जो बैठी है एक सदी से उदास

फूलों की भरी टोकरी उसके हाथ में
थमा देना चाहती हूँ

देखना चाहती हूँ उसे खिलखिलाते हुए
एक और बार

जैसे देखा था एक दोपहर इलाहाबाद में
उसकी फूलों की हँसी को पलाश सा खिलते हुए….

एक गंध जो बेचैन करे ………

एक अदद शरीफा भी आपको प्यार में
पागल बना सकता है

सुमन बाई आजकल शरीफे के प्यार में पागल है
शरीफे को आप आदमी न समझिए
पर आदमी से कम भी नहीं है शरीफा
कमबख्त पूरी ताकत रखता है मोहपाश की

मैंने देखा है सुमन बाई को
उसके पीछे डोलते हुए

उसके पेड़ की छाँव में जाकर
खड़े होते हुए

जब देखती है उसे एकटक
उसके होठों पर आ जाता है निचुड़ कर शरीफे का रस

मुझे देखती है और सकपका जाती है
जैसे उसके प्यार की चोरी पकड़ ली हो मैंने

आजकल उसका काम में मन नहीं लगता
एक-आध कमरे की सफाई छूट जाती है उससे

पर एक भी शरीफा नहीं छूटता है
उसकी आँखों से

उसने गिन रखा है एक-एक शरीफा
जैसे कोई गिनता है तनख्वाह लेने के लिए महीने के दिन

उसे याद रहता है कौन सा शरीफा पक्का है
कौन सा कच्चा

शरीफे को हाथ में पकड़ कर दिखलाती है
उसकी गुलाबी लकीरें

कि अब बस तैयार हो रहा है शरीफा
जैसे पकड़ लेती हो शरीफे की नब्ज़

कभी उसे फिक्र रहती है कि कोई पंछी न उसे खा जाए
कभी तलाशती है पंछी का खाया हुआ शरीफा
बताती है पंछी के खाए फल को खाने से
बच्चा जल्दी बोलना सीखता है

मैं शरीफे को नहीं सुमन को देखती हूँ
जब वह तोड़ती है शरीफा
उसके बच्चों के भरे पेट की संतुष्टि उसके चेहरे से झलकती है
शरीफे सी मीठी हो आती है सुमन
अब यह बात अलग है कि शरीफे के ख्याल में
उससे टूट जाता है काँच का प्याला

पर वह शरीफे को टूटता नहीं देख पाती
इससे पहले कि वह पक कर नीचे गिर जाए
वह कच्चा ही तोड़ लेती है
ले जाती है अपने घर

मैं देखती हूँ उसके आँचल में बंधा हुआ शरीफा
मुझे वह फल नहीं प्यार लगता है
जिसे आँचल में समेटे वह चलती जाती है आठ किलोमीटर तक
पर उसे गिरने नहीं देती
बारिश से भरी सड़कों पर अपने कदम
संभाल कर चलती है

उसे खुद के गिरने का डर नहीं होता
पगली शरीफा खो देने से डरती है
……………………………………………………..
परिचय : पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का निरंतर प्रकाशन, कुछ कविताएं साझा काव्य-संग्रह में व कहानियां गाथांतर…. यथावत पत्रिका में प्रकाशित.
संपर्क : Ruchi Bhalla, Shreemant, Plot no. 51, Swami Vivekanand Nagar, Phaltan , Distt-Satara, Maharashtra 415523
मो. 9560180202  email  Ruchibhalla72@gmail.com

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