सफेद झूठ

तस्वीर के इस तरफ खड़ी मैं
बताती रही उसे
कि यह बिल्कुल साफ और सफेद है
तस्वीर के उस तरफ खड़ा वह
मानने से करता रहा इंकार
कहता रहा
कि यह तो है खूबसूरत रंगों से सराबोर

मूक तस्वीर अपने हालात से जड़
खामोशी से तकती रही हमें
उसे मेरी नजरों से कभी न देख पाया वह
ना मैं उसकी आँखों पर
कर पाई भरोसा कभी

खड़े रहे हम
अपनी अपनी जगह
अपने अपने सच के साथ मजबूती से
यह जानते हुए भी
कि झक-साफ़-सफेद झूठ जैसा
नहीं होता है कहीं, कोई भी सच !!

सुकून

उसने कहा-
‘अच्छा, एक बात बताओ
कितना प्यार करते हो मुझसे’
और उसकी ओर
एकटक देखने लगी

बड़े गौर से देखा उसने भी
थोड़ा मुस्कुराया
फिर अपनी उँगलियों के पोरों से
चुटकी भर का इशारा करते हुए कहा-
‘इत्तु-सा’
और ठठाकर हँस दिया

बड़े सुकून से मुस्कुराई वह
और प्यार से बोली- ‘बहुत है!’

 दाँव

आज फिर
एक आदमी ने जुए में
अपनी पत्नी को दाँव पर लगाया
और हार गया

उसकी पत्नी को
महाभारत की कहानी से
कुछ लेना-देना नहीं था
न ही वह द्रौपदी जैसी थी
और न ही उसे किसी कृष्ण का पता था

खुद के दाँव पर लगने की खबर सुन
थोड़ी देर कुछ सोचा उसने
और फिर अपने घर के बाहर
खड़ी हो गई गड़ासा ले कर

दुनिया का सच

सौ कारण बताकर
हमारी बेटियाँ
इस दुनिया को बुरी बताती हैं
और दुखी हो जाती हैं
अगले ही पल
सिर झटक कर कहती हैं
जैसे कमर कस रही हों
‘आखिर रहना तो इसी दुनिया में है’
और अपने-आप में व्यस्त हो जाती हैं

हजार कारण बताकर
हमारी माँएँ
इस दुनिया को खूबसूरत बताती हैं
जीवन के प्रति विश्वास दिलाती हैं
तसल्ली देती हैं हमें
और फिर देर तक
डरती, सहमती, सशंकित होतीं
स्वयं अंदर तक थरथराती हैं

मेहनत की हँसी

अनाथ ‘चिंता’ के चेहरे पर
चिंता की कभी
कोई लकीर नहीं दिखती

‘पूनम’ का दाग भरा चेहरा
चमकता रहता है पूनम के चाँद सा

‘लक्ष्मी’ को घेरे रहती है दरिद्रता
फिर भी मुस्कुराती हुई
आ ही जाती है समय पर

इनके आने पर जाने कैसे
मुझमें आ जाती है हिम्मत
तैयार होती हूँ भाग-भाग कर
निकल जाती हूँ झट काम पर

सुनते ही गाड़ी की आवाज
कैंपस में झाड़ू लगाते उनके हाथ
ठिठक जाते है यकायक

कौतूहल से निहारतीं उनकी आँखें
मुझे देख मुस्कुराती हैं
हाल जो इनका पूछ लो तो
‘अच्छा है’ कह कर खिलखिलाती हैं

इन मेहनतकश औरतों की
निश्छल हँसी
ले आती है मेरे चेहरे पर भी मुस्कान
और…. थोड़ी और
बढ़ जाती है मेरी रफ़्तार

बेहतरीन सपने

बेटी अपनी आँखों से
देखती है इंद्रधनुष के रंग
और तौलती है अपने हौसलों के पंख
फिर एक विश्वास से भरकर
अपनी माँ से कहती है-
‘मैं आपकी तरह नहीं जीऊँगी’

मुस्कुराती हैं माँ
और करती हैं याद
कि वह भी कहा करती थीं अपनी माँ से
कि ‘नहीं जी सकती मैं आपकी तरह’

माँ यह भी करती हैं याद
कि उनकी माँ ने भी बताया था उन्हें
कि वह भी कहती थीं अपनी माँ से
कि ‘वह उनकी तरह नहीं जी सकतीं’

शायद इसी तरह
माँ की माँ ने भी कहा होगा अपनी माँ से
और उनकी माँ ने भी अपनी माँ से……
कि ‘वह उनकी तरह नहीं जीना चाहतीं’

तभी तो
युगों-युगों से हमारी माँएँ
हमारे इंकार के हौसले पर मुस्कुराती हैं
और अपने जीवन के बेहतरीन सपने
अपनी बेटियों की आँखों से देखती हैं !!

घबराहट

बढ़ती जा रही है भीड़ रास्तों पर
घबराए हुए लोग भाग रहे हैं इधर-उधर
भाग रही हूँ मैं भी उनके साथ
रास्ता कभी घर की ओर का लगता है
कभी लगता कि जा रही हूँ काम पर

भागते-भागते पड़ी नज़र
एक बूढ़े व्यक्ति पर
जो झोला टाँगे, डंडा पकड़े
चला जा रहा था धीरे-धीरे
धक से हुआ मन
जा रहे हैं पिता कहाँ इस तरह ?
अब तो उनसे चला भी नहीं जाता
मुड़-मुड़ कर टिक रही है उनपर नज़र
भागती हुई झट पहुँची उन तक
ओह !! नहीं… ये मेरे पिता नहीं….
पर किसी के तो पिता हैं  !

घबराई हुई वहाँ से भागी उस तरफ
जहाँ रास्ते के किनारे बैठी एक बूढ़ी औरत
हर आने-जाने वाले के आगे
फैला रही थी अपना कटोरा
देख रही हूँ गौर से, जा कर उनके पास
कहीं यह मेरी माँ तो नहीं
नहीं- नहीं….यह मेरी माँ नहीं….
पर किसी की तो माँ हैं !

हड़बड़ाई हुई
भाग रही वहाँ से भी
रोक रहे हैं रास्ता छोटे-छोटे बच्चे
फैलाये हुए अपनी नन्ही नन्ही हथेलियाँ
देखने लगी हूँ उन्हें भी बड़े ध्यान से
कहीं इनमें मेरे बच्चे तो नहीं
नहीं.. इनमें मेरे बच्चे नहीं…..
पर किन्हीं के तो बच्चे हैं !

बेचैन हो कर रो पड़ी हूँ बेसाख्ता
और भागने लगी हूँ बेतहाशा…

‘क्या हुआ मम्मा ? ….आप डर गईं क्या ?’
झिंझोड़ कर उठा रही है मुझे मेरी बिटिया !!

पँखों वाली लड़की

मैं ढूँढ़ रही हूँ
उस पगली सी लड़की को
जिसके पँख हुआ करते थे
बेवजह हँसती वह लड़की
पंजों के बल चलती थी
हौले से धरती पर पैर दबा
आसमान में उड़ती थी

परवाजों की तरह वह
इंद्रधनुष तक जाती थी
रंग-बिरंगे सपने अपने
बस्ते में भरकर लाती थी
उन्हीं सपनों के रंगों में
जीती और जगमगाती थी
अँधेरी रातों में भी
चमकती आँखों से मुस्कुराती थी

सुना है
उनमें से कई सपने
जीवन के जरुरी सपने थे जो खो गए
कई सपने कमजोर थे जो टूट गए
कई सपने तो यूँ ही भूखों मर गए
कई सपने जो जिंदा बचे थे
आँसुओं से लथपथ पड़े थे
जिन्हें वह छोड़ नहीं पाई
उन्हीं से भीगे पँखों के कारण
फिर कभी वह उड़ नहीं पाई

सुना है यह भी
कि उसके पँख
हवा से भी ज्यादा हल्के थे
और सपने समय से भी ज्यादा भारी
टूटते हुए पँखों के दुःख
और दर्द के बावजूद
वह हौसलों से भरी थी
अपने मरणासन्न सपनों को
जी-जान से बचाने में लगी थी

दोस्तो !! आपको भी कभी
मिल जाए अगर कहीं
पँखों वाली ऐसी कोई लड़की
बताना उसे –
‘कि सपनों के लिए पँखों को सहेजे
कि पँखों के बिना सपने नहीं बचते
कि सपनों के लिए जरुरी है
हमारे पँखों का बचा रहना ‘
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परिचय : पुस्तकों के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
संप्रति- झारखंड वित्त सेवा में अधिकारी
पता : मकान न0- 30, अशोक विहार एक्सटेंशन (वेस्ट)
राँची- 834002, झारखंड, मोबाइल न. 9430154549, 9431417339
Email:   sushmasinha19@gmail.com

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