विशिष्ट कवयित्री :: स्मृति शेष रश्मिरेखा

समय के निशान
एक अर्से बाद जब
तुम्हारे अक्षरों से मुलाक़ात हुई
वे वैसे नहीं लगे
जैसे वे मेरे पास हैं
भविष्य के सपने देखते
मेरे अक्षर भी तो
रोशनी के अँधेरे से जूझ रहे हैं
अब तो ख़ुद से मिलना भी
अपने को बहुत दुखी करना है
यह सब जानते हुए भी
एक ख़त अपने दोस्त को लिखा
और उसे बहुत उदास कर दिया
पत्र पाने की खुशी के बावजूद
सचमुच समय चाहे
जितनी तेजी से नाप ले डगर
अमिट ही रह जाते हैं
उसके क़दमों के निशान
2
रोशनदान
कमरे में स्याह अँधेरा था
मैं खोज रही थी सूई
आँखों ने दे दिया था जवाब
आसपास नहीं थी कोई माचिस की तीली
नहीं था रोशनी का कोई दूसरा हिसाबो-किताब
कि तभी चमका
ईशान कोण में धूप का चकत्ता
मैंने जाना उसी दिन ‘रोशनदान’ का मतलब
अँधेरे में रोशनी की सेंध लगाने की बेचैनी।

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