विशिष्ट कवि : अरविंद भट्ट

चारदीवारी

तुम्हारे अपने शहर में,
अतिव्यस्त मार्केट की चकाचौंध,
और लोगों की रेलमपेल के सहारे आगे बढ़ते,
जहाँ सड़क और फुटपाथ के अंतर की सीमा रेखा,
शायद अपना अस्तित्व बचाते बचाते,
कब का दम तोड़ चुकी थी.
अब सब निर्बाध था,
बिना किसी सीमा का मूल्यांकन किये,
कोई कहीं से भी चल सकता था,
किसी को भी धकिया सकता था.
मैं बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे,
इस धकापेल और अनचाहे शोर से ,
दूर जाने की छटपटाहट में,
एक इमारत की तलाश में.
पर इस अतिव्यस्त से दिखने वाले ,
शहरों की बड़ी-बड़ी इमारतों में,
जिसकी जगमगाती लाइटों की रोशनी की साये में,
जीती हैं कुछ जिंदगियां,
किसी के आने की तलाश में,
उनकी बातों, चिल्लाहटों को सुनने की तड़प में,
खाली पड़ी कुर्सियों पर,
किसी के बैठे होने के दिवास्वप्न में, झपकियों में.
कि काश, कोई तो बेधता,
इन कमरों में पसरे सन्नाटों को.
खैर! कालबेल बजाने और दरवाजे के खुलने का,
समयांतराल थोडा सा लम्बा था.
इससे पहले की मेरा मन मस्तिष्क,
किसी प्रकार की गणना-निष्कर्ष में उलझता,
एक हलकी सी आहट के साथ,
एक झुकी हुयी आकृति का आभास हुआ था मुझे.
निःशक्त प्राय हाथों की अँगुलियों ने,
दरवाजों के कुंडों को अंततः,
बंधन मुक्त कर ही दिया था.
कुछ संक्षिप्त परिचय के बाद उस बूढ़ी देह में,
जीवन्तता के कुछ लक्षण प्रकट होने लगे थे.
बूढ़ी स्याह आँखों की पुतलियों में,
चमक सी कौंधती दिखाई दी थी.
उन धीरे धीरे क़दमों में अब,
अप्रत्याशित गति आ चुकी थी.
अचानक से कुछ क्षणों पहले की,
बूढ़ी, अशक्त और झुकी हुयी आकृति में ऊर्जा का प्रवाह,
उनकी गति और आँखों की चमक में,
प्रत्यक्ष नज़र आ रहा था.
“कोई नहीं आता यहाँ,
आखिर कोई क्यों मिलेगा एक अकेले बूढ़े से”
एक धीमी शांत और बेधती हुयी आवाज़ कौंधी थी,
उस सन्नाटे में.
यही सुना था मैंने उस आकृति से,
एक अजीब सा सन्नाटा फ़ैल गया था ,
मेरे चारों तरफ.
एक एक शब्द मेरे मस्तिष्क को,
झनझनाते चले गए.
मेरे पास कोई उत्तर न था.
होता भी कैसे, सच कहूँ तो,
मैं उस पीड़ा को और उस कसक को,
महसूस कर ही नहीं सकता था.
करता भी कैसे,
जीवन और शरीर की इस अवस्था के मिलन से
शायद मैं अभी बहुत दूर था.
इतना कहते कहते वो बूढ़ी देह
थोड़ी सी शिथिल हो गयी थी.
कंधे का झुकाव भी,
थोडा सा और बढ़ गया था.
आँखों की उस क्षणिक चमक के पीछे का पनीलापन,
साफ़ नज़र आ रहा था.
मैं न तो हतप्रभ था और न ही अवाक्.
आज के समय में जहाँ रिश्तों के सारे शिष्टाचार,
सीमित रह गए हैं महज़,
फेसबुक और व्हाट्सएप की,
खोखली और आभासी दुनिया के अपडेट तक.
एक ऐसी आभासी दुनिया जहाँ,
रिश्तों के महिमामंडन की सारी शब्दावलियाँ
और साधन तो उपलब्ध हैं,
पर दुर्भाग्य, वास्तविकता और समय की मार से जूझते,
कुछ लोगों की सुध लेने की फुरसत,
शायद किसी को नहीं.
अब मेरा मन उसी बाज़ार में वापस भटकने लगा था,
जहाँ की धकापेल, शोर सब,
इस कमरे की चारदीवारी में तिरोहित हो चूका था.
अब मुझे कुछ नहीं सुनायी दे रहा था उस भीड़ में
और न ही भीड़ में धकियाते लोगों की परवाह.
बस याद रह गयी थी उस कमरे की ,
चारदीवारी का सन्नाटा, कसक, बेबसी
और उन आँखों की,
क्षणिक चमक के पीछे का पनीलापन

पूर्व पीठिका

अब क्या लेने आयी हो.
कुछ तो सोचा ही होगा,
कुछ तो प्रपंच रचा ही होगा भूमिका के लिए,
कुछ तो पूर्व पीठिका लिखी ही होगी,
आने से पहले.
तुम्हारी दक्षता से मैं अनभिज्ञ तो नहीं.
आखिर इतना सहज कैसे हो सकता है,
तुम्हारा मेरे पास आना,
कुछ तो लेने आयी ही होगी.
तुम्हारे प्रयोजन से मुझे कोई संशय नहीं,
बस शंकित होता हूँ,
दोहन की तुम्हारी प्रक्रिया से.
न जाने कौन सा खेल खेलोगी अब,
भावनाओं के किस अनछुए हिस्से को,
बनाओगी तुम अपने प्रयोजन के निमित्त.
जितना मैं तुम्हे जानता हूँ
शायद उतना ही तुम मुझे.
मर्म भेदन का तुम्हारा स्वाभाविक गुण,
दे ही देगा तुम्हे कुछ सूत्र,
मुझे भेदने के लिए.
जानती हो,
मेरा तुम्हारे समक्ष आत्मसमर्पण करने का कारण,
तुम्हारी दक्षता नहीं होती है
और न ही सूत्रों को पिरोने की,
तुम्हारी सिद्धहस्त कला.
अपितु,
रिश्ते, नाते और आपसी विश्वास की,
जिन सीढ़ियों का प्रयोग कर,
तुम अतिक्रमण करती हो
मेरे विश्वास और स्वभावजनित भावनाओं का,
और जीती हो इस दंभ में, खुशफ़हमी में,
कि एक बार फिर तुमने,
आखिर सिद्ध कर ही दी अपनी दक्षता,
कर ही लिया मेरा दोहन,
अपनी विलक्षण प्रतिभा के परिणाम स्वरुप.
असल में वास्तविकता,
तुम्हारी इस कोरी कल्पना और झूठे दंभ से,
बहुत अलग है.
इतनी अलग कि
तुम्हारे विचारों की संकुचित सीमा रेखा,
उन वास्तविकताओं को कभी भेद नहीं पाएगी.
सब जानते हुए भी ,
मैं हमेशा निमित्त बना, तुम्हारे प्रपंचों का.
सिर्फ इसलिए कि,
मैं भावनाओं और आपसी विश्वास की सीढ़ियों को,
खंडित नहीं करना चाहता था.
सिर्फ इसलिए कि,
उन एहसासों में मैं तुम्हारे कुचक्रों की कालिमा को
नहीं घोलना चाहता था.
सिर्फ इसलिए कि,
मै देखना चाहता था,
क्रय-विक्रय की तुम्हारी सीमा को,
परखना चाहता था,
अपने विश्वास की गहराईयों को भी
जिसको तुमने हर बार अपने स्वार्थ से,
पाटने की कोशिश की थी.
और तुम्हे लगता रहा कि,
हर बार तुम मुझसे साधती रही अपना मंतव्य
मेरी अनभिज्ञता में,
अपनी स्वरचित पूर्व पीठिका के अनुसार.

बजरंग नगर मोड़

तुम्हे याद है
बजरंग नगर की पक्की सड़क का
अपने गाँव वाला मोड़?
पता नहीं ऐसा क्या था
बजरंग नगर के उस मोड़ पर
एक अजीब सा नाता जुड़ गया था उस जगह से.
चार-छह झोपड़ीनुमा चाय की दुकानें
कुछ किराने की भी
कभी कभी इन्ही दुकानों में कोई काकी
समोसे भी बनाती दिख जाती थी.
एक और खास पहचान थी उस मोड़ की
चिलबिल और बबूल के पेड़ों की श्रृंखला.
रोडवेज बस से
कादीपुर स्टेशन से आगे बढ़ते ही
सब कुछ अपना-अपना सा लगने लगता था.
जैसे जैसे गाड़ी आगे बढ़ती थी
मन की सुरसुराहट बढ़ती जाती थी
और वो उत्तेजना, सरगर्मी
उसी मोड़ पर आकर ही विश्राम पाती थी.
वहीं उसी मोड़ पर अक्सर
अगवानी के लिए इंतज़ार में खड़े लोग
किसी भी बस को देखते ही
चौकन्ने हो जाते थे.
अंततः उनमे से किसी एक में हम
दिख ही जाते थे.
कोई न कोई गाँव से आ ही जाता था लेने
साईकिलों पर, गाहे बगाहे स्कूटर से भी.
हमारी अटैचियाँ, सामान
सब बांध जाता था साईकिलों पर.
और फिर एक पलटन चल पड़ती थी
विजयी भाव से अपने पड़ाव की ओर.
टेढ़ी-मेढ़ी कच्ची चकरोडों से आगे बढ़ते
खेतों बागों को निहारते,
अशोकवा की बाग़ में सुस्ताते
कब गाँव का सगरवा आ जाता था
पता ही नहीं चलता था.
सगरवा और सरपत का झुण्ड
दोनों ही एक दुसरे के पूरक थे.
सगरवा के बाद
हमारे खेतों की श्रृंखला शुरू हो जाती थी
और अपने ट्यूबवेल तक आते-आते तो
पेड़ों के झुरमुट में छिपा अपना गाँव भी
कनखियों से देखने लगता था.
आते-जाते लोगों का कुशलक्षेम पूछना तो
पक्की सड़क के मोड़ से ही शुरू हो जाता था.
आगे बढ़ते क़दमों में
धीरे-धीरे उत्तेजना भरती जाती थी.
गाँव के छोर पर खड़ी दादी
हाँथ में पानी का लोटा थामे
सगरवा के सरपतों में से
हर आने वालों को निहारा करती थी हमारी आस में.
कभी कभी तो कोई बच्चा
साईकिल से कैंची चलाता भागा जाता था
हमारी दूरियों का टोह लेने
दादी के अघोषित संदेशवाहक थे वो सब.
वारती थीं दादी सभी टोने-टोटकों को
उसी लोटे के जल से
तब जाकर खुल पाता था अदृश्य प्रवेशद्वार
अपने गाँव का, घर का.
सामने ही दिख जाते थे
सियवहा, विशनहवा सहित सारे पेड़
अपनी बाहें फैलाये, आशीर्वाद देते.
मुझे सब याद है
कुछ भी नहीं भूला.
पर धीरे-धीरे दूरियों को तय करने का समयांतराल
बहुत ही कम रह गया
अब किसी को साईकिल पर कैंची मार कर
किसी की टोह लेने की जरूरत नहीं पड़ती
सब मोबाईल से पता लग जाता है
अब मोड़ पर कोई इंतज़ार नहीं करता
इंतेजारी ख़त्म हो गयी
कच्ची चकारोडें ख़त्म हो गयीं
रह गया तो बस वो बजरंग नगर का मोड़ और दूरियां
मन की दूरियां
रिश्तों की दूरियां
अपनों से अपनों की दूरियां.

माटी

कभी पूछा था किसी ने मुझसे
आखिर माटी का मोल होता ही क्या है
रज कण ही तो हैं.
मैं कोई उत्तर नहीं दे पाया था.
ऐसा नहीं था कि
उत्तर के लिए पर्याप्त शब्द बोध
नहीं था मेरे पास,
और ऐसा भी नहीं कि
मेरे मौन ने हस्ताक्षर कर दिए थे
उसके सहमति पत्र पर.
मैं असमंजस में था
उसकी अनभिज्ञता और अतिवादिता को लेकर
शायद ही वो आत्मसात कर पाता
मेरे उत्तर की गंभीरता को, उसके मर्म को.
काश उसने महसूस किया होता कभी
बारिश की पहली बूंदों से उठने वाली
माटी की सोंधी मादक सुंगंध को,
काश उसने देखा होता कभी
माटी में लथपथ, जूझते, खटते किसानों को
महसूस कर सकता
माटी से जुड़े उनके सरोकारों को,
काश वो अनुभव कर पाता
देह में समाहित माटी को
समझ पाता
देह के माटी में विलय के चरम सत्य को.
कितना अच्छा होता
यदि उसने पूछा होता
माटी में खेलते, लोटते बच्चों से
उनके अल्हड़पन से.
अखाड़ों में स्वेद बहाती देहों से,
माटी के कच्चे घरों में बसने वालों से
सने हाथों माटी को आकार देते कुम्हारों से
कितना अच्छा होता
यदि पूछ पाता वो
घट की शीतलता से, जलते दीयों से,
दीयों की टिमटिमाती शिखाओं से.
काश वो पूछ पाता और जान पाता
माटी के मोल को उसके सार को कि
जन्म का मूल है माटी
जीवन का अंतिम वरण है माटी
आदि है, अंत है माटी
समस्त कालचक्र की साक्षी है माटी.
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परिचय : रचनाकार की कई पुस्तकें प्रकाशित
सम्प्रति – बहुराष्ट्रीय कंपनी में टेक्निकल आर्किटेक्ट मैनेजर (सॉफ्टवेयर)
वर्तमान पता – F2-763, गौर होम्स, गोविन्दपुरम, गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश, 201013
Email – arvindkrbhatt@gmail.com, Mob – 9811523657

 

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