विशिष्ट कवि :: अरुण शीतांश

चोंप

पारिस्थितिकी संतुलन के लिए हर घर मे
एक बागीचा चाहिए
पेडो़ं में फल हो
छोटे पौधों मे फूल

रोज़ नई घटना की तरह
बना रहे सुंदर पर्यावरण

जंगल की तरह घेरे में पक्षियों के कलरव
घोड़ों का टॉप सुनाई दे
ठक ठक ठक ठक
शुद्ध हवा में

कोई माउस लैपटॉप न हो और मोबाईल
बस
संवाद हो निश्चल हँसी के साथ भरपूर

आम का पेड़ खूब हो
जिस पर बैठकर ठोर से मारे मनभोग आम पर
एक दिन गिरे तो चोंप कम हो
धोकर खा जाँए सही सही
मुँह में चोंप का दाग हो कोई बात नहीं

हर भारतीय को नसीब कहाँ
बाल्टी में भरकर खा लें भरपेट आम

कुत्ता बेचारा खा नहीं सकता देखता है कातर नज़र से
बच्चे हुं हां करते ओ ओ ओ
आ आ आ आ आ
दौड़ते भागतें भैंस गाय के साथ चिलचिलाती धूप में
माँए गाली देती
अरे अरे ! खा ले खा ले लू लग जइहें

महुआ को पसारती
सुखाती भांड़ी में रख आई
नयका चाउर के भात का माड़ कुत्ता खाता
चपर चपर चपर

चमकती बिजली की तरह टाल का खेत
कौंधती धमकती आँच लहकती सी देह
तप्त पसीने से सराबोर
पेंड़ की छाँव हीं काम आया
गमछी बिछाकर ..
दू बात सबसे करके
सानी पानी गोबर डांगर सब निफिकीर
पीते हुए पनामा सिगरेट

जो पनामा नहर को याद दिलाती है किसानो को

कल पेड़ और खेत के गीत गाए जाऐगें
रोपे जाऐगे फ़सल
रात भर भरे जाऐगें
खेत ….

नया साल

तुम आओ तो इस तरह कि
फूल खिलने वाले हों
रंग चटख लगें
खटिया ,चौकी ,पलंग राह देखें

तुम आओ तो इस तरह कि
खपड़े के ऊपर बैठे मिलें
कौआ , गिलहरी
शादी वाले दिखें छानी पर हाथी,
घड़ा , ढक्कन
ठीक नीचे चापाकल पर कबूतरों की बीट
एक कोने में तुलसी का पौधा

घर खाली न दिखे

तुम आओ तो इस तरह कि
लिपट जाएँ गाँव के एक – एक आदमी
कह दें एक साँस में सब बातें
और नई भौजाई करे सास की शिकायत
और सास करे बदलती हुई दुल्हनों की मोटरसाईकिल पर चलने वाली बात

तुम आओ तो इस तरह कि
खेतों में लगें सरसो के फूल और बगल के टोपरे में लगे आलू
आम के पेड़ में आ रहे हों ऋतुुमंगलपुष्प
करहे में पानी
खेतों की जोत दिखाई दे
वहाँ बात करतीं हँसती हुईं झूण्ड में लड़कियाँ
और
लड़के लगा रहे हों कहकहे
सोन नदी के कछार पर

हमारा काम है सबसे मिलकर रहना
मिलकर रहना ही है गाँव का गहना

रोटी

हवा सब जगह बह रही है
यह बात वैज्ञानिक से पूछने की जरुरत नहीं है
जरुरत है कि
आज रोटी किसने नहीं खायी या बनाई

इतनी सारी पुस्तकें हैं दुनिया में
जिनमें विचारों के खजाने हैं
रोटी कैसे नही बन रही है घरों में
यह भी प्रश्न उन तक पहुँच रहा होगा

प्रिये! तुम रात को फूल तोड़कर मत दो
रोटी तोड़कर दो ताकि
दिल्ली दरबार में गरज कर या चाकू के बल पर
या तलवार की नोक पर टाँग दूँ तिरंगे की तरह

मुझे अपने तमाम बच्चों ओर सैनिकों के लिए चिन्ता हो रही है
बजाय पुस्तक संग्रह देखने, बनवाने और दिखाने के
पुस्तकें दुनिया की ढेर में बडे़ आराम से शामिल हो जाएँगी
और नीम का पेड़ पास में कट रहा होगा।

मृत्तात्माओं से जाकर क्या कहूँगा कि छल हो रहा है
मनुष्य के सामने और सरकार के ठीक नाक के नीचे
इतनी ठंड और इतनी धूप के बीच
आसमान के नीले आँगन में एक खिड़की खुल जाती हमारी तो क्या दिक्कत थी

पृथ्वी की तमाम ऊर्जा अकेले कैसे चुरा सकता हूँ
जब रोटी का स्वाद कंठ तक नहीं आ रहा
थूक कितनी बार घोटूँ
और सो जाऊँ

रात को खर्च नहीं करना चाहता
दिन तो रोटी की तलाश के लिए है
रोटी जो किसी मंत्री के तसले में बू मार रही है

मेरी रोटी घर में है
जिसे बाबा ने छोड़ रखा है कुछ कठ्ठे खेतों में

वहाँ आलू कबर रहा है
रोटी नहीं

अब पृथ्वी को रोटी बनानी पडे़गी
और आकाश को पानी…..

मुस्कान में बदल दो समय

समय को बांधो
और फेंक दो सूर्य पर

समय का क्या करेंगे हम

समय में इतने प्रधानमंत्री ,
राष्ट्रपति ,न्यायाधीश बन रहें हैं

हत्याएँ समय में हो रहीं हैं
समन्दर में समय को फेंको
समय में बहुत कम बच रहे हैं वृद्ध

प्रेमिका समय में भाग रही है
पर्वत उठाओ और समय को ढ़क दो दबाकर

समय सुलग रहा है
सरकार से खुश नहीं हैं जन
दिल से कह रहा हूँ
संभव हो तो
मुस्कान में बदल दो समय

हर जगह
और हर नागरिक की आँखों में झाँको
देश खाली मिलेगा हर समय….

कैमरा मैन

कितना अच्छा था
कुछ भी ले जाने का
झंझट नही था

कितना अच्छा था

अब घर से पहनकर जाओ
तब खिंचो या खिचवाओ

सेल्फी है अब
रिश्ते बदल गए

अब कोट पहनो तब जाओ
जूते पॉलिस करो
पाउडर लगाओ

पहले सबकुछ वहाँ मिल जाता रहा
कंघी ऐनक मुस्कुराहट

कैमरा मैन!!!

अब सबकुछ होते हुए
कुछ नहीं मिलता

लड़की चुपके से आ जाती बैठ जाती धीरे से
कैमरा मैन दोनो का बाँह पकड़कर डाल देता गले में
पसिना होकर भी
धड़कन बढने पर भी
चुपचाप लौट जाते घर
और तकिए के नीचे फोटू छूपा रोते पूरजोर

अब हमारा कोई नहीं कैमरा मैन

न वैसी कुर्सी
न वैसा जीवन
न वैसा गुलदस्ता
न स्टुल
न वैसा बस्ता

न वैसा विचार
न वैसा घर
न वैसा क्रोध
एक फोटो देखकर सोच रहा हूँ
मुक्तिबोध..

………………………………………….
परिचय : कवि के कई काव्य-संग्रह प्रकाशित हैंङ
संपर्क – मणि भवन, संकट मोचन नगर, आरा भोजपुर
मो ० – 09431685589
arunsheetansh@gmail.com

__________________
[18/12/2018, 7:24 AM] ARUN SHEETANSH:

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