विशिष्ट कवि : असलम हसन

मुश्किल है आसाँ होना

कितना मुश्किल है आसाँ होना
फूलों की तरह खिलखिलाना
चिड़ियों की तरह चहचहाना
कितना मुश्किल है
सुनना फुर्सत से कभी दिल की सरगोशियाँ
और देखना पल भर रंग बिरंगी तितलियों को
कितना मुश्किल है फ़िक्र से निकल आना
किसी मासूम बच्चे की मानिंद मचल जाना
कितना सख्त है नर्म होना,मोम होना,और पिघल जाना
कितना आसां है दिल का जाना ,दुनिया में ढल जाना
और आदमी का बदल जाना…
ऊपर उठता है सिर्फ धुंआ

पोटली में बांध कर चाँद
जब कोई निकलता है निगलने सूरज
तब गर्म पसीने की उम्मीद में सांवली मिट्टी
कुछ और नम हो जाती है …
और दिनभर पिघलती हुई ख्वाहिशें
सिमट कर कुछ और कम हो जाती हैं
शाम ढले घास और जलावन लेकर घर
लौटती उस गोरी पर चस्पाँ होता है चुपचाप
एक और स्याह टुकड़ा …
रात गए तपता है गोल गोल चाँद
गर्म तवा पर
सिर्फ खोखला धुआँ
ऊपर उठता है आसमान

मैं  मजदूर हूँ

मैं एक मजदूर हूँ
मेरी भुजाओं में फरकती है मेहनत
ये तोड़ सकते हैं पहाड़ों को
और मोड़ सकते हैं नदियों की धाराओं को….
मेरे पाँव बड़े बलशाली…
थकते नही रुकते नही
उठाता हूँ कन्धों पर संसार
मेरी मुठ्ठी में क्रांति है
मेरे होठों पर गीत हैं और आँखों में पानी
मेरा पेट…
मेरा पेट…
नहीँ मैं झूठ नही बोल सकता
घर

लगता था कोई मेला लगा है
घर में…..हमउम्र बच्चों की तो
टोलियाँ बन जाती थी
बाजी आपा की हँसी ठिठोली
हुक्के की गुड़गुड़
दादी की दमतोड़ती खाँसी
और नखरीली बातूनी कामवालियाँ
क्या शोर शराबा
रहता था घर में ,
हमे कहाँ रास आती थीं दादा की
शायराना नसीहत कि “खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब
पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब”
औरतों की शिकवे –शिकायत से बहुत दूर थे
घर के लापरवाह  से मर्द जो अक्सर
दस्तरख्वान पर नजर आते
और बावर्चीखाना
मानो एक कारखाना था
बदस्तूर काम करता  हुआ
इस भागदौड़ में भी एक इत्मिनान था
सब्र से पान लगाते हुए हाथ  और
गप्पबाजी करती गिलोड़ियाँ
कभी हमारे घर में एक” पानदान” था
कभी हमारा घर एक “खानदान”था
फेसबुक के नाम एक कविता

काश हर चेहरा किताब होता,
कितनी आसानी से पढ़ लेता
हर दिल की इबारत,और पहचान लेता
हर सूरत की हक़ीक़त,Q
काश हर चेहरा किताब होता तो लफ़्ज़ों की
धूप छाँव में ढूँढ आता ज़िन्दगी,
भांप लेता खिलखिलाते लोगों का दर्द
काश हर चेहरा किताब होता…..
चुपके से देख लेता खामोश अदावत
नर्म व नाजुक लहजों की बारीक साजिशें और
मुहब्बत भरी निगाहों से झाँकती हिक़ारत
शायद चेहरा किताब नहीं नक़ाब होता है
जिसमे छुपे होते हैं कई कई चेहरे…

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परिचय : कवि असलम हसन की कविताएं हंस, पाखी, बया ,कथादेश, आजकल सहित कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. ये नवसाक्षरओ के लिए भी लेखन कर रहे हैं.

सम्प्रति- भारतीय राजस्व सेवा के अधीन पटना में पदस्थापित

पता -5/3 आशियाना दीघा रोड पटना 25

मोब 7032613786

 

 

 

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