विशिष्ट कवि : प्रभात मिलिंद

मौसम की रंगरेज़
(गिरिजा कुमार माथुर की एक कविता को पढ़ते हुए)

लोग कहते रहते हैं
कि ख़्वाबों की बदौलत
ज़िन्दगी के बरस नहीं कटते
फिर भी बो लिया है मैंने
अपनी शफ्फाक आँखों में
अदद सा एक ख़्वाब …

क्योंकि तुम्हें पता नहीं
ख़ामोश-खाली आसमान में
परिन्दे सी उड़ान भरता
एक अकेला ख़्वाब
कितना दिलफ़रेब लगता है !

तुमको शायद ख़बर नहीं
तुम्हारे इस भीने-पके
ख़ुर्शीद-बदन की गर्म-सोंधी भाप
फ़ैज़ होती हुई कितनी दूर तक उड़ती है

तुमको शायद ख़बर नहीं
कि तुम्हारी आवाज़ की रेशम-अना से
जो एक शोख़ बेख़ुदी पैदा होती है
वह कितनी बेगुनाह करवटों को
कैसी बेमुरव्वती से रौंदती चलती है

तुमको नहीं मालूम
कि तुम एक सूफ़ियाना क़लाम हो
हज़रत ख़ुसरो का
बारहाँ सुना होने के बावज़ूद
गूंजती रहती है जिसकी खनक
ज़ेहन में धीमी-धीमी, और मुसलसल.

मद्धम-मद्धम जलती सी
एक मुक़द्दस लौ हो तुम
जो मेरी नज़्मों को रूहानी ताब,
नज़रिए को एक रौशनी बख़्शती है

गुज़िश्ता सालों में तुम कहाँ रहीं
इस सवाल का अब कोई मतलब नहीं …

यह पूछने के लिए शायद
ज़रा देर भी हो चुकी है अब.

तुमको नहीं मालूम
रिश्ते कई बार नामों के
तलबगार नहीं भी होते …
न उनको महसूस करने की
ख़ातिर उम्र की कोई बंदिश
वक़्त और जगह की दरकार तो हरगिज़ नहीं.

तुमको नहीं मालूम
तुम्हारी बेतरतीब फ़ितरत की वह सब्ज़ हँसी
जिसको रूह के भीतर से परस कर
तुमने अभी तलक चखाया नहीं किसी को
उसमें कैसा जादू है … और कैसा नशा
जिसके तसव्वुर भर से ठहर जाती है उम्र
और लौट आता है वापिस गुज़रा हुआ वक़्त.

तुम एक जंगली ख़ुश्बू हो
बनफ्शे के फूल की सी
वजूद की हद से आज़ाद
लम्स की ज़द से परे !

इन नीमबाज़ मौसम की रंगरेज़ साथी, सुनो !
कि राग और नज़्म,  ख़ुशबू और रंग
दो मुख़्तलिफ़ ख़्यालों की तरह
एक-दूसरे से मिलते हैं जब कभी,
पूरी क़ायनात में तब कोई बेक़ाबू सी ख़लिश
एक वहशी तूफ़ान की तरह भटकती फिरती है ..

अलग-अलग दरिया की दो बंजारा मौजें
जब मिल कर एक धार की हमराह बनती हैं,
वह जगह इबादतगाह बन जाती है.

तुमको शायद ख़बर नहीं!!

‘ये धुंध है कि बादल है, साया है कि तुम हो’

यह तय है …
मैं मुक़म्मल था तुम्हारे साथ
कुछ छोटे-छोटे लम्हात में
यह तय है …
तुम आबाद होंगी मेरे बग़ैर भी
इन फूल-वनस्पतियों में
राग और रंग में
रूप और गन्ध में
मूर्त में … अमूर्त में.

कल ही तुमने कहा था
अलविदा मुझे
और आज मेरी यह ज़िद है
हम होंगे फिर साथ-साथ
कभी न कभी, जीवन के
किसी न किसी अक्षांश पर
यह तय है …

यह तय है …
वह कोई और आंधी थी
जब हम साथ-साथ थे
और यह कोई और मौसम है
जब एक-दूसरे को पार कर
निकल चुके हैं हम बहुत दूर
लेकिन फासला कितना भी बड़ा हो,
हर सुबहो-शाम
मैं तुम्हारी राह में रहूँ, न रहूँ
तुम होंगी मेरी निगाह में
यह तय है…
(★ शहरयार का एक मिसरा)

  एक ख़्वाबीदा इंतज़ार
(फ़ाकिर जय की एक नज़्म की याद में)

जब एकदम शफ्फाक
और पुररफ़्तार था दरिया
मेरे नाम के प्याले में
तब भी दुखों के ही अफ़साने थे.

कुछ याद नहीं ठीक-ठीक लेकिन इसी किनारे
कहीं बना था छोटा सा एक रेत-घर
कुहासों से चुरा कर रखी थी
जिसमें मैंने शादाब लम्हों की
धूप का एक मुख़्तसर सा टुकड़ा

इतना थका होने के बावज़ूद
जाने कैसे मुझमें ज़िंदा बची थी ज़रा सी जुम्बिश
कि मैं तलाशता रहा तुमको
इस रेत-घर से वक़्त की सरगोशियों तक
मुक़ाम दर मुक़ाम…

पता नहीं, यादों से बाहर तुम
नहीं मिलीं … कभी नहीं, कहीं नहीं.

देखो किस क़दर ख़ामोश है
आज दरिया का पानी
और कितनी बेमानी है
तुम्हारे होने को महसूस किए बिना
ख़ुद अपना मतलब जानने की ख़्वाहिश …

कभी नहीं जान पाया
कि कहाँ से शुरू हुई थी यह ज़िन्दगी
माँ की कोख़ से या फिर तुम्हारे लम्स से …
लेकिन कई बरस पहले जब
ज़िन्दगी बहुत बेखौफ़ लगती थी
और हौसले किसी ताज़ा खिले फूल की मानिंद
जज़्ब हुआ करते थे मुट्ठियों में
उसी वक़्त मैंने तुम्हारे नाम
एक ख़त लिखना चाहा था …

आज सालों बाद जब हौसले दरक कर
हथेलियों के पार कहीं गुम गए हैं
और ज़िन्दगी तब्दील हो गई है एक बिसात में,
मुझे जाने ऐसा क्यों लगता है
कि तुमको ख़त लिखने का
यह बिल्कुल माक़ूल वक़्त है.

अब जबकि न वह रेत-घर रहा
और न दरिया की वह रवानगी,
काश ! तुम देख पातीं
टूटे हुए रेत-घर में ज़र्द खाल चढ़ी
धूप के उस टुकड़े को
सिर्फ़ एक बार लौट आतीं
मेरी बंजारा ख़्वाहिशों को दुआ बख़्शने …

कि हयात जब बेतरह तंगदिल हो जाती है
और वक़्त बहुत खिलाफ़ होता है
तब और भी सुकून देता है
बंजारा ख़्वाहिशों को हवा देना.
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परिचय : प्रभात मिलिंद चर्चित कवि हैं. .
prabhatmilind777@gmail.com
मोबाइल : 70046 27459.

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