अजीब सी लड़कियां

वो अजीब लड़की
सिगरेट पीते हुए साँसे तेज अन्दर लेती थी
चिहुँक कर आँखे बाहर आने लगती हैं पर खुद को संभालते हुए,
खूब सारा धुंआ
गोल छल्ले में बना कर उड़ा देती है !

ठुमक कर कहती है
देखो कैसे मैंने उसे उड़ा दिया धुंए में, बेचारा
न मेरा रहा, न जिंदगी रही उसकी !
फिर, नजरें बचा कर भीगती आँखों से कह देती
उफ़, हिचकी आयी न,
अन्दर तक चला गया धुंआ !
अजीब ही है वो अजीब लड़की !

वही अजीब लड़की, गियरवाली साइकिल को चलाते हुए
फर्राटेदार उडाती है, और ठोक देती है
मर्सिडीज का बोनट
मुस्काते हुए कहती है सहेली से
गलती से आँख भींचते हुए मैंने आगे देखा
तो मुझे लगा, वही बैठा है उसमें !
तभी तो जान से मारने का मन हुआ उसको
सायकिल से मर्सिडीज का क़त्ल !
अजीब लड़कियां ऐसे ही तो मारती हैं किसीको !
है न !

प्यार में पागल हो कर
फिर मरने के बदले मारने का तरीका बताती हैं
अजीब सी लड़कियां ….. !
जिंदगी जीना जानती हैं
शायद ये अजीब सी लड़कियां !

अपने पहले ब्रेकअप के बाद
दुसरे वाले बॉयफ्रेंड के उँगलियों को
अपने मध्यमा और तर्जनी में दबाये
खिलखिलाते हुए
उसके मर्दानेपन को ढूंढते हुए कह उठती है
यार उस जैसा नहीं तू !

खूब सक्सेस का झंडा गाडती हैं,
सीरियसनेस ऐसा कि भुल जाती है
मम्मा पापा तक को
पर अकेलेपन में चुपके से बिलख कर रोती हैं
और अगर कोई सामने दिख जाए
तो उसके आँखों में आँखे डाल
कह उठती हैं, देखना तो कुछ चला गया है आँखों में
ऐसी तो होती है ये अजीब सी लड़कियां !

अजीब सी जिंदगी के
अजीब अजीब पन्नों को
अजब गजब पलों में रंगते हुए
बेशक लगती हैं अलग ये अजीब सी लड़कियां
पर धडकते धडकनों के साथ
सीने पर रख कर अपना सर
आँखे मूंदे, बेहद अपनी सी लगती हैं ये अजीब सी लड़कियां !!

गुड बाय पापा

‘पापा’ तो होते है ‘आसमान’
एक बेहद संजीदा अभिव्यक्ति
कहती है ये
फिर अंतिम बार उनसे मिलने
समय के कमी की वजह से
कर रहा था हवाई यात्रा
बेहद ऊंचाई पर था शायद
पड़ रहा था दिखाई
विंडो के पार दूर तलक
फटा पड़ा था आसमान
बिखड़े थे बादलों के ढेर इधर-उधर
पापा दम तोड़ चुके थे।

तेज गति से भाग रही थी ट्रेन
उसके स्लीपर कूपे में बैठा
द्रुत गति से भाग रहा था अशांत मन
टाइम फ़्रेम को छिन भिन्न कर
बना रहा था रेतीली मिट्टी के घरौंदे
पर, गृह प्रवेश से पहले
टूट चुके थे ख़्वाब
मिट्टी में ही तिरोहित हो चुके थे पापा
ट्रेन फिर भी भाग रही थी
अपने सहज वेग के साथ।

अब ऑटो से चल पड़ा
रेलवे स्टेशन से पापा के करीब तक
खटर-पटर करता रिक्शा
उछल कूद कर रही थी
सुषुप्त संवेदनाएं,
सड़कों ने चिल्ला कर बताने कि
की कोशिश
स्मृति पटल पर चल पड़ी
पापा की ‘मोपेड’
उनके कमर पर हाथ था मेरा।

मर चुके थे पापा
फिर भी उनकी ठंडी हथेली ने
भर दी थी गर्माहट
बेशक आंखे छलछलाई
पर रो नहीं सका एक भी पल
कंधे पे था स्नेहसिक्त हाथ
छोटे भाई का,
कहना चाहता था कुछ
लेकिन कुंद हो गयी आवाज
रुआंसा हो कह पाया
बस
गुड बाय ‘पापा’

एक्वारजिया

‘एक्वारजिया’
अम्लराज या शाही जल,
अम्लरानी क्यों नहीं ?

ज़िन्दगी की झील में
बुदबुदाते गम
और उसका प्रतिफल
जैसे सांद्र नाइट्रिक अम्ल और
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का ताजा मिश्रण
एक अनुपात तीन का सम्मिश्रण
जो धधकता बलबलाता हुआ
पहले से जलते जलाते द्रव
मिल जाने के बाद बन जाता है
एक नया खदबदाता समुद्र
ख़ाकोगर्द हो जाती है दुनिया
पिघला कर बहा देता है सब कुछ !!

जैसे लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल के उस पार से
ताक रहा पाकिस्तान
और फिर उसकी ताकती नज़रों से
खुद की औकात दिखाते
कुलबुलाते कुछ कीड़े इस पार
वही तीन अनुपात एक जैसा ही
और फिर ऐसे ही एक असर का नतीजा
आखिर
क्यों नहीं समझ पाते हम
रोकना ही होगा इस सम्मिश्रण के
कनेक्शन को

रूमानी शब्दों में कहूँ तो
तुम और तुम्हारी नज़र
वही ख़ास अनुपात
कहर बन कर गिरती है मुझपर
अम्लीय होती जिंदगी में
खट्टा खट्टा सा
नमकीन अहसास हो तुम
हाँ तभी तो, जब भी
नजरें गिरी तुमपर
मर ही तो गया
गल कर, पिघल कर …….
मिटा लेता हूँ सर्वस्व !!

वो तो है प्यार का डी.एन.ए
कुछ ऐसा
जो हर बार, दूसरे पल ही
जी उठता है, फिर से
मरने के लिए
कुछ फिनिक्स जैसा तो नहीं ?
है द्रवीय अम्लराज का दखल
जिंदगी के हर परिपेक्ष्य में
अलग अलग नज़रिये से
सुनो इस बार नजरों के मिलते ही
मिटटी डाल देना
शहीद होना है मुझे
तुम्हारे लिए नहीं !
तुम्हारे नजरों के लिए !

ज़िन्दगी में रसायन जैसे
कभी खुशी कभी गम
एक्वा रेज़िया में घुलनशील धातु
लोहित हो या स्वर्णिम हम 😎
बेबस हो जाते है स्वतः ही
अब इसे लाचारी कहो मेरी
या शहीद करार दो तुम
नज़रे इनायत का तलबगार
रहूँगा सदा!
समझी न, एक्वा रेजिया
अम्लराज नहीं अम्ल रानी !!

‘एक बोसा’

केदारनाथ सिंह के प्रेम से लवरेज शब्दों को
याद करते हुए मैंने भी,
उसके हाथ को
अपने हाथ में लेते हुए सोचा
दुनिया को इस ख़ास हाथ की तरह
गर्म और सुंदर होना चाहिए

पर, सोच हाथों से होते हुए
रुकी उसके ठुड्डी पर
और फिर अटकी
उसके रहस्य से गहराते गालों के डिंपल पर
तत्क्षण वो मुस्काई
और मैंने भी कह ही दिया
दुनिया क्यों नहीं, इस तरह मुस्कुरा सकती

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
कहते हुए झाँकता चला गया
फिर उसकी आँखों में
वो बेपनाह गहराई वाली नजरों में
डूबते उतरते, महसूस पाया मैं
उन प्रेमसिक्त आंसुओं में नहीं था नमक
थी तो सिर्फ़ गंगा की पाकीज़गी
क्या दुनिया गंगा सी पवित्र नहीं हो सकती
चलो नहीं हो सकती तो क्या
उसकी आँखों में चमकती एक बूँद जो
पलकों से बस गिरने को थी,
और फिर आ गिरी मेरी उंगली पर

मैंने फिर उस ऊँगली को तिरछी कर
और उसमे से झांकते हुए उसको ही देखा
था एक प्रिज्मीय अनुभव
दुनिया सिमट चुकी थी
सतरंगे अहसास से इतर
एक चमकती शख़्सियत के रूप में, मेरे सामने

मैं फिर से बुदबुदाते हुए हौले से बोला
दुनिया तुम इसके जैसी बनो
मेरी दुनिया ने भी खुश होकर
मेरे बित्ते भर माथे पर
बस ले ही लिया
‘एक बोसा’

अलविदा

कहा था
“अलविदा”
अंतस तक गूंजती रही आवाज
सन्नाटे को चीरती हुई
जैसे लेह के बर्फीली वादियों में
अन्दर तक पिघलाती हवाओं को सहते हुए
गर्म जैकेट से निकाल कर
गुलाबी चिट्ठी
पढ़ रहा हो, सीमा पर खड़ा सैनिक
प्रेम माने दर्द !

नम आँखों से
कहा गया विदा का शब्द
था अपने में समेटे हुए
सुनहला निमंत्रण
– क्या फिर कभी मिलेंगे ?

कलपती खनकती आवाज के साथ
दिया था उत्तर,
बिना सुने ही उस आवाज को
“मिलेंगे न पक्का-पक्का”

सुनो
अलविदा या गुडबाय
के बदले
विदा या बाय ही बोला करों न ।

~मुकेश~

6.कवि की डायरी

देखी है कभी कवि की डायरी ?

अधिकतर कवियों के पास होती है
पुरानी, जर्द पन्नो वाली किसी कंपनी की
उपहारस्वरूप प्राप्त डायरी !

शुरूआती पन्ना,  ज्यादातर कवियों का
होता है अम्मा को समर्पित
माँ का लाड़ प्यार, मार-कुटाई, सब घालमेल कर
लिख डालते हैं,  एक मार्मिक रचना !!

फिर, कलम घिसती बढती है
बढ़ता है सफ़र, जिंदगी का,  दर्द का
लिखने लगता है कवि प्यार भरे नग्मे, कुछ पन्नों पर
शेर की छोटी छोटी पंक्तियाँ
छलकता झलकता प्यार,  मनुहार, प्रेम की चाशनी में डूबा !
तुम आना करूँगा इन्तजार जैसा !!

बढ़ते पन्ने, मुड़े तुड़े,
जैसे लिखा हो टूटी कलम से, या स्याही सूखने लगी हो
प्यार में दरार या जिंदगी बन गयी तन्हाई
जिंदगी से पाई बेवफाई
चल पड़ी इस विषय पर कलम,  रक्ताभ स्याही
बेशक हो ज़िंदा कवि, पर उन पन्नों पर मरता है
मर मर कर जी उठता है !

अब, कवि की कलम मेहनतकश बन जी उठती है
लिखता  है  हल,  लिखता  है खेत
भूख, श्रम, श्रम शक्ति सब डालता है कविताओं में
मेहनत, मजदूरी, लाल सलाम, सब सहेजता  है  शब्दों  में
कवि कॉमरेड  बन जाता है  कुछ पन्नों में !

पन्ने उलटते हैं
कवि की कलम होने लगती है वाचाल
स्त्रियों के जिस्म, उतार चढ़ाव
सेक्स, सेंसेक्स, इंडेक्स
कर देता है मिक्सिंग सब कुछ
एक ही रचना में वो चूमता है
और फिर जिस्म से उतरता हुआ
पहुँच जाता है राजनितिक पार्लियामेंट !!

पर, ऐसे पन्ने ही पाते हैं इनाम
आखिर साहित्यिक समीक्षक को भी चाहिए कुछ तो रस !!
अलहदा !!

कवि कभी कभी पन्नों पर लिख डालता है
बलात्कार !!
गिराता है पल्लू, दिखाता है चित्कार तो, कभी अपनी ही जेब के अंदर से,
टपकते पैसों का करता है जिक्र !

कवि की नजर, कवि की कलम, और
उसकी वो पुरानी डायरी
बस, ऐसे ही मुद्दे दर मुद्दे
सहेजता है शब्द, सोच, भाव !!

कुछ शब्द कांपते हैं, कुछ बिलखते हैं
कुछ खिलखिलाते हैं, कुछ रह जाते हैं मौन !

इन सबके बीच, हर कवि ढूंढता है
कुछ कालजयी और श्रेष्ठ !!

पर, ये तलाश बस चलती रहती है
तब तक, या तो भर जाती है डायरी
या फिर कवि पा जाता है अमरत्व !

फिर कुछ श्रद्धांजलि रचना लिखी जाती है उस पर  !!
…………………………….
परिचय : “हमिंग बर्ड” कविता संग्रह, ब्लॉग: “जिंदगी की राहें” (http://jindagikeerahen.blogspot.in/)
सम्प्रति :  केंद्रीय राज्य मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली के साथ सम्बद्ध
पता –  लक्ष्मी बाई नगर, नई दिल्ली 110023, मोबाइल: 9971379996

By admin

One thought on “विशिष्ट कवि : मुकेश कुमार सिन्हा”
  1. कविताएँ अच्छी हैं। लेकिन कुछ शब्द (धुएँ, चीत्कार) ग़लत लिखे हुए हैं। पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगा, जैसे खाना खाते-खाते मुँह में कँकड़िया आ गई हो। सम्पादक की ज़िम्मेदारी है कि ग़लतियाँ न छपें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *