विशिष्ट कवि : शरद कोकास

धुएँ के खिलाफ
अगली शताब्दि की हरकतों से
पैदा होने वाली नाजायज़ घुटन में
सपने बाहर निकल आयेंगे
परम्परिक फ्रेम तोड़कर
कुचली दातून के साथ
उगली जाएँगी बातें
मानव का स्थान लेने वाले
यंत्र – मानवों की
सुपर कम्प्यूटरों की
विज्ञान के नए मॉडलों
ग्रहों पर प्लॉट खरीदने की
ध्वनि से चलने वाले खिलौनों की

मस्तिष्क के खाली हिस्से में
अतिक्रमण कर देगा
आधुनिकता का दैत्य
नई तकनीक की मशीन पर
हल्दी का स्वास्तिक बनाकर
नारियल फोड़ा जायेगा

ऊँची ऊँची इमारतों से
नीचे झाँकने के मोह में
हाथ – पाँव तुड़वा कर
विपन्नता पड़ी रहेगी
किसी झोपड़पट्टी में
राहत कार्य का प्लास्टर लगाए

कहीं कोई मासूम
पेट से घुटने लगा
नींद में हिचकियाँ ले रहा होगा
टूटे खिलौनों पर शेष होगा
ताज़े आँसुओं का गीलापन

मिट्टी के तेल की ढिबरी से उठता धुआँ
चिमनियों के धुयें के खिलाफ
सघन होने की राह देखेगा

दो तिहाई ज़िन्दगी
भुखमरी पर छिड़ी बहस
ज़िन्दगी की सड़क पर
मज़दूरी करने का सुख
कन्धे पर लदी अपंग संतान है
जो रह रह मचलती है
रंगीन गुब्बारे के लिये

कल्पनाओं के जंगल में ऊगे हैं
सुरक्षित भविष्य के वृक्ष
हवा में उड़ -उड़ कर
सड़क  पर आ गिरे हैं
सपनों के कुछ पीले पत्ते

गुज़र रहे हैं सड़क से
अभावों के बड़े- बड़े पहिये
जिनसे कुचले जाने का भय
महाजन की तरह खड़ा है
मन के मोड़ पर

धूप ढलने से पहले
ज़िन्दगी के अंधे कुयें से
वक़्त उलीचते हुए
हाथों के छाले बन जाते हैं
आनेवाले दिन

सुबह सुबह
दरवाज़ा खटखटाती है धूप
नींद की किताब का पन्ना मोड़कर
मिचमिचाती आँखों से
अतीत को साफ करता हूँ
बिछाता हूँ धूप के लिए
समस्याओं की चटाई
याद दिलाती है धूप
भविष्य की ओर जाने वाली बस
बस छूटने ही वाली है

उम्र की रस्सियों से बंधी
परम्पराओं की गठरी लादते हुए
मुझे उष्मा से भर देता है
धूप की आँखो में उमड़ता वात्सल्य

धूप को भी उम्मीद है
उसके ढलने से पूर्व
मैं बड़ा आदमी बन जाउंगा

तब
फटी जेब से निकल कर
लुढ़कती हुई
इच्छाओं की रेज़गारी
बटोर लेना आसान नहीं है
मशीनों पर चिपकी जोंक
धीरे-धीरे चूस रही है
मुश्किलें हल करने की ताकत

फिर भी
चोबीस में से आठ घंटे बेच देने पर
बची हुई दो तिहाई ज़िन्दगी
कई पूरी ज़िन्दगियों के साथ मिलकर
बुलन्द करती है
जीजिविषा
रोटी और नींद का समाधान

मध्यवर्गीय होना गाली नहीं
तकिये के ग़िलाफों पर
रंगीन धागों से कढ़े
‘ गुडनाइट ‘ और ‘ स्वीटड्रीम्स ‘
सार्थकता की दहलीज़ पर
दम तोड़ देते हैं

चूल्हे से निकलता धुआँ
अपनी कालिख से
अभावों की व्याख्या लिखता है

दस बाई दस के कमरे में
दिमाग़ बन जाता है बैठक
दिल शयन कक्ष
और पेट रसोईघर

अभावों के रेगिस्तान में
हरे-भरे इलाकों की तरह
पाई जाने वाली सुविधाएँ
वर्ग परिवर्तन की घोषणा नहीं करती

घर के किसी कोने में
छुपाते हुए
बेटे द्वारा लाये पोस्टर व बैनर
वह सुनती है
किसी दलित आन्दोलन के बारे में

बेटे से होने वाली बहस के बीच
अक्सर विचारों में फहराती है
रक्त में डूबी पति की लाश

अब उसे बुरा नहीं लगता
वह जानती है
ज़रूरतें बटोरने के दौर में
यह गाली नहीं है

पुण्य शेष नहीं है
जीवन के ठंडे होते हुए तन्दूर में
सिंकती हुई रोटी पर
हावी होने लगती है
स्वर्ग पाने की अतृप्त इच्छा
राख की शक्ल में

उदर और दिमाग़ के बीच में
त्रिशंकु बनकर
उलटी लटक रही होती है
मोक्ष की अवधारणा

दुनियादारी के
खोखले अनुभवों से भरे
परिपक्व मस्तिष्क में
फफून्द की तरह ऊगने लगती है
तीर्थयात्रा की इच्छा

ज्ञात होता है अचानक
उम्र भर संचय के बावज़ूद
परलोक सिधारने के लिये
आत्मा के अधिकोष में
पर्याप्त पुण्य शेष नहीं है

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परिचय :
कृतियाँ :  कविता संग्रह – गुनगुनी धूप में बैठकर, हमसे तो बेहतर हैं रंग
हंस, कथादेश, कादम्बिनी, पहल, वागर्थ, साक्षात्कार, कथन सहित कई पत्रिकाओं में पुस्तक समीक्षाएँ तथा अनुवाद प्रकाशित
चिठ्ठियों की एक किताब “कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ “ भी प्रकाशित
सम्प्रति : भारतीय स्टेट बैंक की नौकरी से स्वैच्छिक सेवा निवृति लेकर वर्तमान में स्वतन्त्र लेखन
पता –  शरद कोकास , सड़क 7 , ज़ोन 3 ,न्यू आदर्श नगर दुर्ग ( छ. ग.)
मोबाइल –   8871665060
इ-मेल sharadkokas.60@gmail.com

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