विशिष्ट कवि : शांडिल्य सौरभ

पुनर्रचना

डूबना भी तैयारी है
नए सफर के में निकलने के पूर्व
पश्चिम में डूबना
पूरब में उगने की तैयारी है
पश्चिम और पूरब तर्क हैं महज़
तथ्य यह है कि
जीवन ही सत्य है ,
दो स्थितियों के बीच जो घट रहा है
वही प्रेम है, वही जीवन है
डूबना , प्रेम और जीवन की पुनर्रचना है
पुनर्रचना उन्हीं उपादानों के साथ ।
क्या चाँद कभी दूसरा ला पाऊंगा !

भागा हुआ लड़का

ट्रेन से कूद कर भागना
पागलपन है
यदि ऐसा तो मैं हूँ पागल
ज़मीन से जुड़ना एक बात है
अनुर्वर ज़मीन से जुड़ना
पत्थर पर दूब उगाना है
और दूब उगाते डूब जाना
सतत प्रयास के बाद किया गया आत्महत्या है
वे दिन याद आते हैं जब आधा पेट खा
मर धंस कर पढ़ाते थे
एक पसंदीदा सूत्र वाक्य था
वह टीचर कैसा जो भरपेट खा के पढ़ाए
अधूरापन, मनुष्य होने की निशानी है
चाहे अधूरापन पेट से जुड़ा हो
चाहे मन से
यही वह अधूरापन है जो रोकता है
पत्थरनुमा शहर से जाने से
चाहे माँ रोये
बाप चिल्लाए
दूब उगाने और डूब जाने के बीच
तलाश रहा हूँ जीवन
खींच रहे हैं सभी अपनी तरफ
हर जगह से कूद कर भाग जा रहा हूँ
पूर्ण होना, एक धब्बा है मनुष्यता पर।

पहला ड्राफ्ट

महज़ 13 वर्ष की आयु है मेरी
होश संभाले कोई आठ वर्ष हुए होंगे
इन आठ वर्षों में
महज़ आठ वर्षों में
बहुत देखा छल-छद्म
दिखे चूहे ही चूहे
चूहा दौड़ में भागते लोग
जो लंबे हैं, भागते हुए कंगारू लगते हैं
कोई मुंशी तक नहीं बनना चाहते
कोई नहीं बचाते कागज़
कुतरते और कुतर्कते एक दिन मर जाएंगे चूहे
हांफते दौड़ते, खांसते छींकते
गाते रोते, बिलखते झींकते
केवल और केवल
उन्माद फैलाया है बौद्धिकता का
बौद्धिक चूहे ख़बर तक नहीं लिख सके
इन आठ वर्षों में
आठ दिखे जो मनुष्य हैं लेखन में
वो भी कहते हैं, भाई मेरी आयु कम है यहाँ
अभी जवान हो रहा हूँ
जवानी में ही देख रहा हूँ अपनी मृत्यु का षड्यंत्र
हँस रहा हूँ षड्यंत्रकारियों पर
क्या करोगे भाई?
तुम भी हँसो
मेरी अल्पायु पर हँसो
उनके दीर्घायु होने पर हँसो
और हँसो अपने अति अल्पायु होने पर
तुम अधिक उर्यावान हो तो ज़रा ज़ोर से हँसाना
इस आयु में चूहा दौड़ के अलावे
एक और चीज़ देखा
यह समय बड़ा हंसोड़ है
इतना कि हँस रहा है ठठा कर
हँस रहा है हर घटना पर
पेशावर में मारे गए बच्चों पर भी
गोरखपुर में मारे गए बच्चों पर भी
सीरिया और फिलिस्तीन के बच्चों पर भी
धर्मयुद्ध लड़ रहे बच्चों पर भी
न जाने इस हँसी की आयु कब समाप्त होगी
कहीं मेरी आयु से लंबी न हो जाए
इस चूहा दौड़ और इस हंसी की आयु

सच यह है कि

मैंने सच कहा सच को
झूठ का प्रतिकार किया
झूठ का प्रतिकार पचा लिया भक्तों ने
सच को सच कहना,
भारी पड़ा मुझे।
मेरे जैसे न जाने कितने हैं
सच को सच कहते हैं
संत्रास झेलते हैं
हमसब जानते हैं साथियों
आज का भारी पड़ा संत्रास
आपसब के कल की बेहतरी का रास्ता बनेगा
हम सच पर टिके लोग हैं जो जल्दी हिलते नहीं
हम संविधान पर टिके लोग हैं जो जल्दी हिलते नहीं
हम सच का संपादन भी करते हैं
संपादन में विश्वास भी
सच के विस्तार का उपक्रम भी
ऐसा ही करते हैं संविधान के परिप्रेक्ष्य में
हम लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध हैं
जन हैं
भेंड़ नहीं
हमारी संकल्पना है
सच की सत्ता
हर संत्रास को झेल
संविधान और सच की स्थापना

पूरक

आकाश रिक्त स्थान है
पर रिक्ती है कहाँ
यहाँ कुछ रिक्त नहीं है
शेष,
आकाश नहीं है
छूटा या छोड़ा हुआ स्थान है
वह तो भरा है स्मृतियों से
प्रेम,
भले ही कम समय की,
पर तय की गई असीम दूरी है
सघन स्मृतियों के क्षणों का विस्तार ही ज़मीन आसमान है।
तोड़ कर लाने का वादा चाँद-तारों का सच्चा था
तब यह नहीं सोचा होगा कि चाँद-तारे तोड़ देने से आकाश लज़्ज़ित हो जाएगा और संकुचित हो कर एक फुटबॉल में तब्दील हो जाएगा
जब सोचा तब हमारे आकाश में कुछ नक्षत्र झिलमिलाने लगे
एक पुच्छल तारा भी
उसके मनहूस होते भर से दिक्कत नहीं हुई
उसका आकार झाड़ू सा था और दिक्कत तब हुई जब तुमने उससे एक छोटा सा हिस्सा बुहार भी दिया
कागज़ फाड़े कुछ टुकड़े वही थे जिसपर मैंने तुम्हारे लिए एक कविता ड्राफ्ट की थी
मैं चाहता तो यह हूँ कि
मेरे आकाश में
कई ब्रह्मांड समाहित हो जाएँ
मेरे चाहने से क्या होता है प्रिय
यह हमें चाहना चाहिए

गुलाबो बनाम ग्रे गिरगिट
जैसे रोगाणु थेथर हो जाते हैं
एक ही फॉर्म्युला से
लंबे समय तक इस्तेमाल के बाद
किसी रोग की दवाई काम नहीं करती उतनी
जैसे अब मच्छर नहीं भागते कॉइल से
और फसलों को चट करने वाले कीड़े
जड़ें जमा रहे हैं जड़ों में
जाड़े में सरकार लकड़ियां बांट रही है अलाव के लिए
लेकिन
मोड़ मोड़ पर मर रहे हैं मज़दूर ठंड से
जैसे कर्ज़ ले रहा है किसान और
पाई पाई चुकता कर दे रहे हैं किसान सूद समेत
जो नहीं चुका पा रहे ,
सरकार , माफ़ कर दे रही है
लेकिन फिर भी न जाने क्यों
फांसी लगा ले रहे हैं ये लोग
जैसे विश्वास टूट जा रहा है क्षण भर के भूल से
जो मानवीय भूल है
जिस भूल को भूल जाना चाहिए
बच्चा सच में भूल जा रहा है
मौसमी फलों के नाम
उसे केवल याद रहता है तरह तरह के पिज्ज़ाओं के नाम
जिसके नाम भूल जाने भर से
उसका बचपना गुम हो जाएगा
प्रेम रह गया है केवल बाज़ार के उपादानों में
टीनऐज के पहले ही
बचपन जान गया है ब्रा – पैंटी के बड़े ब्रांडों के नाम
बचपन चोरी छिपे खरीद लाता है मंहगे कार्ड्स
जिनमें काम के आसनों के चित्र पर प्रेम की पंक्तियाँ स्वर्णाक्षरित हैं
मज़े की बात देखिए कि
गिफ्ट कार्नर वाला उनके बालीग होने का सुबुुत नहीं मांगता
इशारे से सेल्सगर्ल पूछती है
कुछ और दिखाऊँ ? परफ्यूम . . .
यहाँ तो प्रेमपक्ष जो शुरू होता है . . .
बच्चा बच्चा जानता है मिया ख़लीफ़ा और जूलिया एन को
अधिकांश बच्चे उन्हें भूल जाते हैं स्कूल के बाद
जिनका लिखा पढ़ना अनिवार्य था
उधर
अभिभवाकों की ज़िम्मेदारियों में बचपन शुमार नहीं
यह समय एक बदलते रंग का पहाड़ है
सुविधा के लिए मैं इसे गुलाबो कहता हूँ
गुलाबो पर बैठा ग्रे गिरगिट
नहीं तैयार अपना रंग बदलने को
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परिचय : कवि आलोचना में भी पहचान रखते हैं.
आयुर्वेद विधा के चिकित्सक हैं

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