वायरस

जानते हो समय

भूमंडलीकरण में जितने

हम-सब पास-पास आयें थे

उतने ही दूर होते जा रहे हैं

इंसान अपने हाथों

अपनी सभ्यता को नष्ट करने पे तुला है

एक देश महादेश बनने की लिप्सा में

अणु- परमाणु के आगे वायरसों से

खेलने लगा है

पूरी धरती को संकट में डाल दिया है

 

आज करोना कल हंता

परसों न जाने क्या ले कर आए –

अदृश्य वायरसों का रास्ता खोल दिया है

जो आंखों से दिखाई नहीं देता

और महसूस होते-होते

गले दबाने लगता है

हृदय बैठाने लगता है

एक जीवन को दर्दनाक मौत में

बदल देता है – यह वायरस

 

संक्रमण का दायरा बढ़ता  जा रहा है

देश-महादेश क्या शहर -गांव क्या

घर की चौखट लांघ गया है – यह वायरस

 

अब घर में आमने-सामने

मां को मां नहीं कह सकता

बहन को बहन नहीं–

पिता बच्चों को बे-खौफ दुलार नहीं सकते

अन्य संबंधों की क्या कहूं- उफ्फ।

घर में दूरीयां  बढ़ा दिया है वायरस

 

समय तुम ही बताओ?

इससे भयावह और क्या हो सकता है?

अपने हाथों से अपने चेहरे को छू नहीं सकते

खुद के हाथों का खौफ इतना कि

कही चेहरे को छूते

आत्महत्या न हो जाए

 

बेचैनी बढ़ती जा रही है और

एक कहानी याद आ रही है

एक राजा को एक आशिर्वाद प्राप्त था

वह जिसे छूता सोने का बन जाता –

और यह दुआ है कि उस देश को

यह आशिर्वाद  जल्द प्राप्त हो जाए

और पुरी धरती बे-मौत मरने से बच जाएं !

 

इत्तफाक 

इत्तफाक कुछ नही होता

कुछ कारण होते है

विचारों की एक सोची-समझी

विचारधारा होती है।

इत्तफाक कुछ नहीं होता

 

वायरस का वैश्विक नक्शे पे रेंगना

और उठकर दौड़ने लगना

इत्तफाक नही है

संक्रमण का घर की चौखट लांघ जाना

प्रवासी शब्द – –

सिर्फ दिहाड़ी  मजदूरों के लिए प्रयोग होना

ईत्तफाक नही है

 

नीतीयों के कारण रातों रात

देश में बेघर हो जाना

राजधानी में भी लोगों का

बदहवास हो जाना

मुठ्ठी भर अनाज के लिए

मुठ्ठीयों का कस  जाना

इत्तफाक नही होता – –

 

इत्तफाक होता है

अचानक मन का संकल्पित हो जाना

मुंह पर पट्टी बांध लेना,

पेट पे जांता

और एक सांस में

मीलों तय कर जाना – –

इत्तफाक होता है

 

संक्रमण

जानती हो कविता

वर्तमान समय जो-

संक्रमण का शाप  झेल रहा है

अचानक से नही – –

अक्ल से दिव्यांग सोच के कारण –

अपनी लिप्साओं के कारण झेल रहा है

 

जानती हो कविता –

अचानक  नही मिटी होगी? कोई सभ्यता

हड़प्पा, मोहेंजोधड़ो , मेसोपोटामिया

रातोंरात धरती से  गायब नही  हुआ होगा?

संकेतों को नजरअंदाज करना

मिट्टी में मिल जाना होता है।

 

सुनो – – ध्यान से

एक बार फिर धरती की अकुलाहट को

एक बार फिर

एक संपन्न सभ्यता पर

काल के बादल मंडरा रहे हैं

यह समय आत्मविश्लेषण का है

अहम का नहीं – – तो – –

 

इस अज्ञान- विज्ञान समय की

साक्षी रहोगी-  तुम

कि शब्द बह्म होते है

उसका क्षय नही होता

और तुम बह्म हो कविता।

 

व्यर्थ नहीं जाती प्रार्थना

प्रार्थना से –

खुलते हैं ह्रदय पट

होता है

समग्रता में –

विश्वास बोध ।

 

ठीक कहा आपने,

कोई  नहीं उतरता आकाश से

 

उतरती है एकाग्रता – प्रार्थना से

उतरता है मसकते मर्मस्थल में

सात छिद्रों से निकलता संगीत।

 

तब खुलते हैं हाथ

चमकता है हंसिया

मुस्कुराता हैं खेत

हंसता है खलियान और बच्चा ।

 

प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती

व्यर्थ जाती है – –

संकाय, भ्रम, और अविश्वास

 

स्त्री  

स्त्री हठात् नही तोड़ती

परम्पराओ की मर्यादा

हठात् नही लांघती

घर की चौखट

धरती की तरह

सहनशील होती है

 

समग्रता में

सहना जानती है

महसूसना चाहती है

आत्मसात करना जानती है – स्त्री

 

संबंधों के विषम परिस्थितियों से

उपजे विष को

सहजता से

पीना जानती है – स्त्री

 

पीती रहती है

जबतक पी सकती है—

 

घर की नींव हिलने से पहले

मर्यादा के अमर्यादित होने से पहले

 

हठात् तोड़ देती है – –

सभी मर्यादाओं के बंधन

और समय से

संवाद करती है –   स्त्री

 

 

 

By admin

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