*_वहीं आ जाना_*

शब्द ही
मेरा घर है
सबसे ज्यादा
सभी रंगों में
मैं वहीं मिलता हूँ
तुम भी
वहीं आ जाना…

*_हम वे नहीं थे_*

हमारी नजरें
अचानक ही मिलीं
हमें लगा
हम वही हैं
जिस कारण
नजरें मिली हैं
हमने
दूर ही से
अभिवादन किया
यह देखने के लिए
कि वही हैं
हम आगे बढ़े
बढ़े ही थे
कि लगा
हाय, हम वे नहीं हैं
हम तो और ही हैं
ऐसा लगना था
कि एक नदी
अचानक बहने लगी
हमारे बीच
हमारे चेहरे
अचानक ही
पत्थरों में तब्दील हो गए

*_पानी के प्रेम में_*

रेत पर
लिखा हुआ
मैं नाम हूँ

 

*परिचय*

*_जन्म :_* 15 अगस्त, 1970 |

*_स्थान :_* जढ़ुआ बाजार, हाजीपुर |

*_शिक्षा :_* स्नातकोत्तर (प्राणिशास्त्र) |

*_वृत्ति :_* अध्यापन | रंगकर्म से गहरा जुड़ाव | बचपन और किशोरावस्था में कई नाटकों में अभिनय |

_*प्रकाशन :*_ कविताएँ ‘आलोचना’, ‘वागर्थ’, ‘हंस’, ‘आजकल’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘बहुवचन’, ‘कथादेश’, ‘प्रगतिशील वसुधा’, ‘अहा! ज़िंदगी’, दैनिक ‘हिंदुस्तान’, ‘दैनिक भास्कर’, ‘प्रभात खबर’ और ‘आज’ सहित हिंदी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा ‘अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले‘ (सारांश प्रकाशन, दिल्ली), ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली) एवं ‘इश्क एक : रंग अनेक’ (साची प्रकाशन, दिल्ली) में संकलित | कविता-संकलन ‘उदय-वेला’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली) के सह-कवि | तीन कविता-संकलन ‘समय का पुल’, ‘नदी मुस्कुराई’ और ‘प्रेम में होने की तरह’ (प्रेम कविताओं का संकलन) शीघ्र प्रकाश्य |

*_संपादन :_* ‘संधि-वेला’ (वाणी प्रकाशन, दिल्ली), ‘पदचिह्न’ (दानिश बुक्स, दिल्ली), ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली), ‘प्रस्तुत प्रश्न’ (दानिश बुक्स, दिल्ली), ‘चाँद यह सोने नहीं देता’ (नंदकिशोर नवल की संपूर्ण कविताएँ) ‘कसौटी’ (विशेष संपादन-सहयोगी के रूप में ), ‘जनपद’ (हिंदी कविता का अर्धवार्षिक बुलेटिन), ‘रंग-वर्ष’ एवं ‘रंग-पर्व’ (रंगकर्म पर आधारित स्मारिकाएँ) |
फिलहाल ‘उन्मेष’ का संपादन |

*_संपर्क :_* साकेतपुरी, आर. एन. कॉलेज फील्ड से पूरब, हाजीपुर (वैशाली), पिन : 844101 (बिहार) |

*_मो. नं. :_* 9430800034, 7979062845 |
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*परिचय*

*_जन्म :_* 15 अगस्त, 1970 |

*_स्थान :_* जढ़ुआ बाजार, हाजीपुर |

*_शिक्षा :_* स्नातकोत्तर (प्राणिशास्त्र) |

*_वृत्ति :_* अध्यापन | रंगकर्म से गहरा जुड़ाव | बचपन और किशोरावस्था में कई नाटकों में अभिनय |

_*प्रकाशन :*_ कविताएँ ‘आलोचना’, ‘वागर्थ’, ‘हंस’, ‘आजकल’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘बहुवचन’, ‘कथादेश’, ‘प्रगतिशील वसुधा’, ‘अहा! ज़िंदगी’, दैनिक ‘हिंदुस्तान’, ‘दैनिक भास्कर’, ‘प्रभात खबर’ और ‘आज’ सहित हिंदी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा ‘अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले‘ (सारांश प्रकाशन, दिल्ली), ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली) एवं ‘इश्क एक : रंग अनेक’ (साची प्रकाशन, दिल्ली) में संकलित | कविता-संकलन ‘उदय-वेला’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली) के सह-कवि | तीन कविता-संकलन ‘समय का पुल’, ‘नदी मुस्कुराई’ और ‘प्रेम में होने की तरह’ (प्रेम कविताओं का संकलन) शीघ्र प्रकाश्य |

*_संपादन :_* ‘संधि-वेला’ (वाणी प्रकाशन, दिल्ली), ‘पदचिह्न’ (दानिश बुक्स, दिल्ली), ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली), ‘प्रस्तुत प्रश्न’ (दानिश बुक्स, दिल्ली), ‘चाँद यह सोने नहीं देता’ (नंदकिशोर नवल की संपूर्ण कविताएँ) ‘कसौटी’ (विशेष संपादन-सहयोगी के रूप में ), ‘जनपद’ (हिंदी कविता का अर्धवार्षिक बुलेटिन), ‘रंग-वर्ष’ एवं ‘रंग-पर्व’ (रंगकर्म पर आधारित स्मारिकाएँ) |
फिलहाल ‘उन्मेष’ का संपादन |

*_संपर्क :_* साकेतपुरी, आर. एन. कॉलेज फील्ड से पूरब, हाजीपुर (वैशाली), पिन : 844101 (बिहार) |

*_मो. नं. :_* 9430800034, 7979062845 |
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कभी मिटूँगा

पानी के प्रेम में…

*_आँख आ गई_*

सुबह-सुबह
आँख आ गई
वर्षों से अलक्षित कोई अतिथि
तमाम बाधाओं को पार कर
जैसे पहुँचता है किसी के द्वार
वैसे ही आ गई
स्वागत है आगता का!
यह आई है
तर्कों की पोटली लेकर
मसलन–
काफी दिन हो गए थे आँखों की सुध लिए
कि आई है दुनिया को बताने
कि चिकित्सा-चमत्कार के दावों के बीच
यह बची हुई है पृथ्वी पर
आँखें लाल देखकर डरना मत
अपने संघर्ष में
बहुत लाल हो जाएँगी बहुत जल्द
इनके जो आँसू होंगे
उनके नेपथ्य-दृश्य में
बहुत कुछ ऐसा होगा
जो गँदला हो जाएगा दृगों के मंच पर
कुछ प्रतिक्रियाएँ चलेंगी
आँसुओं के समर्थन में लगातार…
इस दौरान
स्वप्नकार-सा ज्यादा ही दिखूँगा मैं
स्वयं में भूला…
स्वप्नवन में उलझा…
परमनिष्काम…
आने को तो मुँह भी आता है
सुस्वादु संसार के विरुद्ध
पर जाता है स्वादों के नए द्वार खोलकर
आता है ज्वार प्रेम का
जाता है गुलाबों की खुशबू देकर
आता है मौसमों का ज्वर भी
और तोड़ता है देह को अपने पत्थर पर
पर जाते-जाते उसे कंचन बना जाता है
वैसे ही यह आई होगी
आई होगी कुछ देने
देने ज्योति नई…रास्ते खोलने कई…
जो हो
शुक्र है आँख का आना
जाने से
तो बेहतर है आँख का आना!

*_नदी सबसे लंबी कविता है_*

कवि पहाड़
अनादि काल से
काव्यपाठ कर रहा है…
सारे वन-प्रांतर
निश्चल-निःशब्द
सुन रहे
सबसे लंबी कविता
अध्यक्षाकाश
कवि को
निहार रहा निर्निमेष
तेजोबल से
चराचर को दिखा रहा
दृश्याभिराम अविराम…
कविता
जीवनदायिनी
बह रही जन-जन तक
उल्लसित
समुद्रालोचक
हृदय में
निरंतर उसको भर रहा
गर्जन-तर्जन से कह रहा–
‘यही तुम्हारा घर रहा…
यही तुम्हारा घर रहा…’

*_पुनर्जन्म_*

मैं उसी क्षण जान गया था, प्रिये,
कि तुम अब नहीं पुकारोगी मुझे
जान गया था
कि एकदम अकेला पड़ जाऊँगा
समय के रेगिस्तान में
जान गया था कि मुझे
अब कोई सूरत नहीं सुहाएगी
कोई बात अच्छी नहीं लगेगी
सूरज डूबने चलेगा
और डूब जाएगा आसमान में
चाँद उगने चलेगा
और उग जाएगा क्षितिज से
सितारे चमकेंगे और गुम हो जाएँगे
परिंदे उड़ेंगे और लौट आएँगे घोंसलों में
जो होगा, होता रहेगा और हो जाएगा
मैं कुछ नहीं जान पाऊँगा
जान गया था
जान तो यह भी गया था, प्रिये,
कि विहँसती इसी दुनिया में
अगले ही क्षण मेरा पुनर्जन्म होगा
दुखी कवि के रूप में…

*_अबोले के बाद_*

अबोले के बाद
मैं जान नहीं पाता हाल तुम्हारा
जान नहीं पाता उदासी अभी की
अभी की नाराजगी
प्रेम में तुम्हारा लौट आना
जान नहीं पाता
हालाँकि
जाता हूँ मैं बार-बार तुम्हारे पास
पर हर बार देखता हूँ कहीं और
तुम्हें न देखने का नाटक
मुझे बेहतरीन अभिनेता बनाता है उस वक्त का
शायद तुम भी
देखती हों कहीं और
मुझे न देखने का वह नाटक
तुम्हें भी बेहतरीन अभिनेत्री बनाता हो उस वक्त की
इस तरह
देखकर भी हम देखते नहीं एक-दूसरे को
सुनकर भी सुनते नहीं परस्पर
और लौट आते हैं अपनी दुनियाओं में बारंबार
मैं निस्तेज अपनी दुनिया में
तुम आभाहीन अपनी दुनिया में…

_*प्रेम का फ्रेम*_

हर प्रेम का
एक फ्रेम
होता जरूर है
हालाँकि
करनेवाले
ज्यादातर
उसके बाहर के
छूटे हुए
दृश्य होते हैं…

_*कुछ देर पहले*_

कुछ देर पहले
जब बात हो रही थी तुमसे
तो सामने पलाश-वन लहक रहा था
पास ही झूम रही थीं मंजरियाँ
चिड़ियों से समूचा दृश्य गुंजित था
दृश्यों से आच्छादित–
मंजरियों से सुवासित मैं
तुम्हारे करीब आने को
कितना बेचैन हो गया था
कुछ देर पहले
जब बात हो रही थी तुमसे!

_*तेरे साथ होना*_

तेरे साथ होना
खुद के साथ होना है
खुदा के भी साथ होना है
तेरे साथ होना
समझी पगली!
मेरा खुद और खुदा
दोनों तू है…तू ही है…

*_माफ करना_*

माफ करना
मैं आ नहीं सकता
जिसे भाषण देना है
उसे सुन नहीं सकता
वह बहुत फेंकता है भाषणों में
भाषणों में स्वयं को शेर की तरह पेश करता है
पर है असल में बकरी
सरकारी हर आदेश पर मिमियाता है
अधिकार माँगने के बजाय प्राण लेकर भागता है
ऐसी बकरी का भाषण मैं सुन नहीं सकता
सो, आ नहीं सकता
जिस कवि का श्रोता होना है मुझे
उसे कई बार सुन चुका हूँ
और जान चुका हूँ वह भाँड़ है
कविता के नाम पर भँड़ैती करता है
और उड़ना चाहता है राजनीतिक आकाश में
ऐसे चालबाजों को मैं कतई पसंद नहीं करता
सो, आ नहीं सकता
जिस गायक का वहाँ गायन है
वह झूठे सम्मान के लिए मरता है
इसके लिए आयोजकों को सूँघता-फिरता है
इस जुगत में लगा रहता है
कि कैसे चादर ओढ़ी जाए
सम्मान-पट्टिका थामी जाए
मैं जानता हूँ प्रतिष्ठा शूकरी-विष्ठा है
और यह भी
कि प्रतिष्ठारूपी राजकुमारी
उस राजकुमार से प्यार करती है
जो उसे जरा भी प्यार नहीं करता
गायकी में भी यह बात मुझे नहीं भाती
सो, आ नहीं सकता
ऐसे चित्रकार की कला-दीर्घा का उद्घाटन है
जो चित्रकला को मसखरे का खेल समझता है
उसको रंगों का बस मेल समझता है
चित्रों में जिसके आदमी का दर्द नहीं छलकता
रंगों में भूरा रंग नहीं झलकता
कला के नाम पर जहाँ धोखा हो
नजारों का मिला-जुला चोखा हो
वहाँ मैं जा नहीं सकता
सो, आ नहीं सकता
नेता के रूप में तुम बुला नहीं सकते
नेता मैं हो नहीं सकता
कवि के भी रूप में बुला नहीं सकते
मेरा कवि होना संदेहास्पद है तुम्हारे लिए
बुलाना तुम्हारी मजबूरी है
न आना मेरी इच्छा
तुम्हारी दुरिच्छा के लिए
मैं भीड़ नहीं बन सकता
सो, आ नहीं सकता
माफ करना!
मुझे माफ करना!

*परिचय*

*_जन्म :_* 15 अगस्त, 1970 |
*_स्थान :_* जढ़ुआ बाजार, हाजीपुर |
*_शिक्षा :_* स्नातकोत्तर (प्राणिशास्त्र) |
*_वृत्ति :_* अध्यापन | रंगकर्म से गहरा जुड़ाव | बचपन और किशोरावस्था में कई नाटकों में अभिनय |
_*प्रकाशन :*_ कविताएँ ‘आलोचना’, ‘वागर्थ’, ‘हंस’, ‘आजकल’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘बहुवचन’, ‘कथादेश’, ‘प्रगतिशील वसुधा’, ‘अहा! ज़िंदगी’, दैनिक ‘हिंदुस्तान’, ‘दैनिक भास्कर’, ‘प्रभात खबर’ और ‘आज’ सहित हिंदी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा ‘अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले‘ (सारांश प्रकाशन, दिल्ली), ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली) एवं ‘इश्क एक : रंग अनेक’ (साची प्रकाशन, दिल्ली) में संकलित | कविता-संकलन ‘उदय-वेला’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली) के सह-कवि | तीन कविता-संकलन ‘समय का पुल’, ‘नदी मुस्कुराई’ और ‘प्रेम में होने की तरह’ (प्रेम कविताओं का संकलन) शीघ्र प्रकाश्य |
*_संपादन :_* ‘संधि-वेला’ (वाणी प्रकाशन, दिल्ली), ‘पदचिह्न’ (दानिश बुक्स, दिल्ली), ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली), ‘प्रस्तुत प्रश्न’ (दानिश बुक्स, दिल्ली), ‘चाँद यह सोने नहीं देता’ (नंदकिशोर नवल की संपूर्ण कविताएँ) ‘कसौटी’ (विशेष संपादन-सहयोगी के रूप में ), ‘जनपद’ (हिंदी कविता का अर्धवार्षिक बुलेटिन), ‘रंग-वर्ष’ एवं ‘रंग-पर्व’ (रंगकर्म पर आधारित स्मारिकाएँ) |
फिलहाल ‘उन्मेष’ का संपादन |
*_संपर्क :_* साकेतपुरी, आर. एन. कॉलेज फील्ड से पूरब, हाजीपुर (वैशाली), पिन : 844101 (बिहार) |
*_मो. नं. :_* 9430800034, 7979062845 |

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