सुरेन्द्र रघुवंशी की  पांच कविताएं

अन्नदाता

मौसम की मार से बड़ी होती है सरकार की मार
कि किसी भी मौसम के किसी भी सत्र में
वे सदन में बिल लाकर उसे पारित कर देंगे
और लोकतंत्र की तलवार से काट डालेंगे किसानों मज़दूरों के गले
इसे हत्या नहीं कहा जाएगा
कहा जाएगा कानून का लोकतांत्रिक राज्य
और राज्य का लोक लुभावन सुशासन

उनके हाथ आसानी से अपनी पीठ तक पहुंचकर
उसे थपथपाने में माहिर हैं
वे ऐसी कला जानते हैं कि जिसको मार रहे हैं
वही बहुसंख्यक क़ौम हत्यारों की जयजयकार कर उठे
मैं इससे अधिक ख़तरनाक यथार्थ से परिचित नहीं हूँ

वे हर बार खाने के बाद कहेंगे
“अन्नदाता सुखी भवः”
जबकि उनके लाए गए कानूनों और शासन प्रणाली का निर्णय होगा-
”अन्नदाता दुःखी भवः
अन्नदाता नष्ट भवः
अन्नदाता आत्महत्या कर”

कंकाल सदृश्य देह के पिचके चेहरों में लगी
करोड़ों मिचमिचाती आँखों ने अच्छे दिनों की उम्मीद में
बनाई थी तुम्हारी सरकार
मंचीय वादों पर भरोसा करके
इस देश में उंगलियों पर गिने जा सकते हैं उद्योगपति
वे मतदान द्वारा सरकार बनाने की हैसियत नहीं रखते

जब तुम्हारी मंडियां अन्नदाता के पसीने की लागत तक नहीं देंगीं
उनकी कृषि उपज को मिलेंगे बीस साल पुराने भाव
जबकि बड़ी हुई महंगाई उसकी लागत तो बढ़ा देती है
पर उस अनुपात में उसकी उसकी कृषि उपज के दाम बढ़ाने में
तुम्हें साँप क्यों सूंघ जाता है सरकार ?
ऐसे में घाटा उठाकर कर्ज़ में डूबकर मरने के लिए कौन खेती करेगा ?
फिर क्या अनाज उद्योगपतियों की फैक्ट्रियों में बनेगा?
पर आपकी नीयत तो यह है
कि क्यों न किसानों के खेत भी उद्योगपतियों के ही हो जाएं

पर तुम भूल गए हो सरकार !
कि दमन और शोषण से उपजे दुःख की चरम परिणति
भयानक सामूहिक आक्रोश में होती है
और जनाक्रोश की बाढ़ में तुम बचा पाओगे अपना अस्तित्व ?

सपने

सपनों की ज़मीन पर चलती है जीवन की रेल
सबसे पहले कोई देखता है सपना
फिर उसे पूरा करने में गुजार देता है सारी उम्र

सपने अंकुरित होते हैं विश्वास की नमी में
प्रयत्नों की धूप में वे बढ़ते रहते हैं

ज़िद की हवाओं में वे शाखान्वित होते हैं
संकल्प के सूर्य के प्रकाश संश्लेषण से पोषित होते हैं

प्रबल इच्छाएं उन्हें पुष्पित करती हैं
और अन्ततः फलित होकर वे जीत जाते हैं

सपने पीढ़ियों में स्थानांतरित होकर
अजर अमर हो जाते हैं

जिसका सूरज नहीं डूबता था कभी
उन साम्राज्य को हराकर
देश को आज़ाद कराने के सपने देखे थे
क्रांतिकारियों ने
और अन्ततः उन्होंने
अपनी बलिदानों की नींव पर
आज़ादी की सुन्दरतम इमारत खड़ी कर दी

वैज्ञानिकों ने सपने देखे
और दुनिया पहुंच गई विकास के इस मुकाम तक

जेल जैसी कैद में रहते हुए
प्रेमियों ने सपने देखे
और नफ़रत को नकारते हुए
तोड़ते हुए वर्जनाओं के परकोटों को
दुनिया सहित प्रेम के सुन्दर संसार को आबाद बनाये रखा

किसानों ने सपने देखे
और काले-कलूटे खेतों में
हरियाली का साम्राज्य खड़ा कर दिया
उनकी उम्मीदों के दानों ने
हम सबके पेट में खलबली मचा रहे चूहों को खदेड़ा

जिन्होंने भी देखे हैं सपने
निःसन्देह सृजन ही किया है
उन्होंने नहीं बढ़ाया एक भी कदम ध्वंस के लिए

हमारे सामने भी रचा जा रहा है इतिहास
उन स्वप्नदर्शियों द्वारा
जो दमनकारी व्यवस्था के शोषण के ख़िलाफ़
अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं
वे लड़ रहे हैं अपनी सामूहिक मुक्ति के लिए

हम सगर्व कह सकते हैं
कि हमने सपनों की ताकत देखी है
हमने देखा है इतिहास बनते हुए

मिशन पर कविता

जन सरोवर के किनारे
एक टांग पर खड़े होकर
बगुलासन में
धवल संत छवि के साथ
आतताई शिकार पर हैं

इस यथार्थ को
उजागर करते हुए
कविता है
अपने मिशन पर है

यहीं से निर्धारित होगा

जिन्होनें बंजर ज़मीन को आबाद कर
उसे खेतों में बदल दिया
खेतों में बोया जीवन
धरती के फेंफड़ों में भरी सांसे
वे आभावों के पहाड़ पर
उछाल कर फेंक दिए गए

वे झुलस रहे हैं अन्याय की तपती चट्टानों पर
जब कभी गहराती है व्यवस्था की घटा
उन्हीं के सिर पर बरसते हैं ओले
उन्हीं पर गिरती है
वादाख़िलाफ़ी की जानलेवा क्रूर बिजली

जो देश के सबसे बड़े सर्जक हैं
जिन्होंने दूध की नदियां बहा दीं
अन्न से भर दिए गोदाम
रसोईघरों को भर दिया जिन्होंने
आटे , शब्जियों, मसालों और मिठास से

उन्हें सड़कों पर ला दिया गया
वह भी पड़े हैं अपने खेतों और फसलों की तरह
खुले आसमान के नीचे
उनके जीवन पर संकट के बादल गहरा रहे हैं
मौसम बहुत बेईमान हो गया है
उसे मारें तो मार दें
सरकारी मौसम की बारिश, बिजली , ओले , सर्दी
अथवा लू और गर्मी
धरती के लालों की पूरी क़ौम ही संकट में है

संसद को जो मनमानी करनी थी,उसने कर ली
पर अब यहीं से , इन्हीं सड़कों से निर्धारित होगा
संसद और देश का भविष्य

 

भाषा की पाठशाला में मैं एक शिशु हूँ

भाषा हृदय के झरने से झरती है
वह आँखों से अभिव्यक्त होती है
और कभी कभार संकेतों से भी
अथवा भाव भंगिमाओं से

न वह वर्णमाला की मोहताज़ है
न स्वर और व्यंजन की
न ही इसे बोलने के लिए
जीभ और होंठों के सहयोग की ज़रूरत है
और न ही यह कंठ से निकलती है

पूरे संसार की एक ही भाषा है
जो हमारी भी है
और पशु -पक्षियों की भी

उसका उदगम स्थल है संवेदनाओं की धरती
और करुणा की हवा में पलती है
इसे मनुष्यता की वैश्विक भाषा भी कहते हैं
इसमें न कोई गूंगा होता है
और न ही कोई वाचाल
न कोई भाषायी कमजोर होता है
और न ही कोई दक्ष या निष्णात

भाषा की इस सुन्दरतम पाठशाला में
मैं एक शिशु हूँ
……………………………………………………………………………………..
परिचय :: कवि की पांच काव्य-संकलन प्रकाशित है. इनकी कई कविताओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है.
संपर्क -महात्मा बाड़े के पीछे , टीचर्स कॉलोनी अशोक नगर मध्य प्रदेश, 473331 ।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *