विाशिष्ट कवि : सलिल सरोज

1
ये सड़क कहाँ जाती है
इसके उत्तर भी कई हैं
और मायने भी कई हैं

एक तो
यह सड़क कहीं नहीं जाती
बस अपने पथिकों
का सफर देखती है
और मंज़िल मिलते ही उसको
आँखें मूँद लेती है।

दूसरा तो
यह सड़क पथिक की
सहगामी है
आरम्भ से गंतव्य तक की
परिणत आगामी है।

पर क्या सड़क
के बस इतने
ही मायने हैं
क्या यही
क्या सड़कें
सभ्यता का मार्ग प्रशस्त नहीं करती
समाज को अभ्यस्त नहीं करती
कुछ नियम से, कुछ कायदों से
कुछ तरक्की से, कुछ फायदों से

सड़कें निर्जीव नहीं हैं
धूप में
हमारी तरह ही
जलती हैं
और ठण्ड में
कपकपी से
सिकुड़ती है

सड़कें
मेरी मानो तो
हमारे साथ
वहां तक दौड़ सकती है
जहां तक हमारी नब्जों में
खून भाग सकती है।

सलिल सरोज

2
आज
कई दिन हो गए
गीले बालों को
धूप में सुखाए
और डर भी तो रहता है
तेज़ धूप
जब
सर पे जमी
खून के थक्के
पे पड़ेगी
तो दाग
बन जाएगा
जिसका
समाज के सामने
जवाब देते
तुम्हें
बन नहीं पड़ेगा

पैर के नाखूनों में
ये अलता
या
नेल पॉलिश नहीं है
धक्का खाने के बाद
ठोकर लगने से बने
ये चोट के निशान हैं
पर
पड़ोसियों को
पता है कि
मार्केट में
नए कलर का
नेल पॉलिश आया है
जिससे
मेरा घाव भी छिप जाता है
और तुम्हारी इज़्ज़त भी
बच जाती है

पीठ की खूजलियों को
हाथ भी नहीं लगाती
क्या पता
कितना चमड़ा निकल पड़े
कोई माँस का लोथरा गिर पड़े
या खून की धार चल पड़े
बस नमक-मिर्च लगा देती हूँ
और चीख को
बच्चों के लिए
लोरियों में बदल देती हूँ

क्योंकि

मुझे
मायके में माँ ने
और
ससुराल में सास ने
रोज़ सिखाया है
दर्द सहने का व्याकरण
घुटने का समीकरण
तड़पने का विज्ञान
चीखने का समाजशास्त्र
बिलखने का भूगोल
और
अबला होने का इतिहास

सलिल सरोज

3
क्या चाक पे
औरतें गढ़ी जा सकती हैं?

हास्यास्पद लगता है
असंभव भी
और
थोड़ा बेतुका भी
पर
ऐसा हो सकता है
क्योंकि
ऐसा ही होता आया है

थोड़ा मिट्टी
थोड़ा पानी
चाक का जोरदार घुमाव
और
हाथों की कारीगरी
बस
औरतें तैयार हो जाएँगी

बचपन से
कोमल मिट्टी को
सौ घड़े पानी में
पैरों तले कुचल कर
मनचाहे आकार में
मोड़ते जाओ
तो कभी
चाक की गति
और
उँगलियों की हरकतों से
पिटने से पीट-पीट कर
बेटी,बहन,बीवी,माँ
सब तैयार मिलती हैं

फिर
धूप में सुखाकार
आग में जलाकर
बाज़ार में
बेचने लायक भी
बनाई जाती हैं
और
बिक भी जाती है
जो शादी और उत्सवों में
रौनक बढ़ाती है
मान-सम्मान दिलाती है
और
सब खत्म होने के बाद
कूड़े में फेंक दी जाती है

ये चाक
हर घर में चलता है
रोज़ चलता है
सदियों से चलता है
सबके हाथों से चलता है
लेकिन
गढ़ने के क्रम में
हमारी
अमर्यादित लोलुपता
दंभी पौरुष
और
शाश्वत अहंकार
मुँह बाए खड़ा हो जाता है
और
कल्पनातीत
औरतें गढ़
दी जाती हैं।

सलिल सरोज

4
वो हँसती थी
वो खेलती थी
लोगों से मिलजुल के
वो अठखेलियाँ करती थी
जब तक कि
वो बड़ी नहीं हो गई
जवान नहीं हो गयी
और
सयानी नहीं हो गयी

और अब
जब माँ बोलती है
तो लड़केवालों के सामने
चेहरे पे बस
छोटी सी रेख खिच जाती है
ताकि
माँ की परवरिश पे
सवाल न हो जाए

अब खेलती है
तो नज़रें चुराके
ताकि कोई चेहरा देखता न हो
उस चेहरे में आंखें सकता न हो
क्या पता इस आँख मिचौली में
पापा की इज़्ज़त न बिगड़ जाए

घर में मेहमान आते हैं
तो दादी पूछती है
पल्लू कहाँ है
ओढ़नी कहाँ खो गयी
पैर क्यों फैला रखे हैं
बाल क्यों नाहिंन बाँधे है
और तमाम
अप्रत्याशित सवाल
वो पूछती नहीं
बताती है
धमकाती है
और समझाती भी है
अब तू
इंसान नहीं रही
एक वस्तु है
जिसको ढकना जरूरी है
नुमाइश के लिए
दूसरों के घर
आकर्षण का सामान बनाकर
भेजने के लिए
और
उस वस्तु से
एक और वस्तु
पैदा करने के लिए।

सलिल सरोज

5
हर औरत के अंदर
एक जंगल होता है
जिसमें
वो कई चीज़ें भुला देती है
या
हम उस जंगल में घुसते ही
कई चीज़ें भूल जाते हैं

उस जंगल के रास्ते
उसके लिए बड़े सीधे हैं
जिसपे चलके वो
अपनी परेशानियां
यूँ छिपा देती है
जैसे
कोई गिलहरी
मिट्टी में अखरोट रखके
भूल जाती है
अपने सपनों को
जिन्हें कभी पंख लगे थे
गृहस्थी में फँस कर
दबरे की मुर्गी जैसी
उड़ना भूल जाती है

अपने अस्तित्व को
जो शादी,बच्चे होने से
पहले तक
बहुत जीवित था
चहारदीवारी की खूंटी
में बंधकर
खुद से ही मिलना तक
भूल जाती है

उसी सीधे रास्तों पे
जब हमारे मर्दों के पाँव
चलते हैं
तो बड़ी उबाड़-खाबड़
और कष्टकारी प्रतीत होती है
चलने के क्रम में
पीड़ाओं का सामना करते हुए
हम कई चीज़ें भूलने लगते हैं

हमारी खुशी
जो कभी उनकी
भी खुशी थी
उसपे एकाधिकार
कब्ज़ा हो जाता है
आदमी बस मर्द
बन जाता है
पति,सहगामी और दोस्त होना
सब भूल जाता है

जो मेहंदी,बिंदी,टिकुली
चोरी ,सिंदूर,काजल,लाली
जेवर,श्रृंगार शोभा देते थे
पति के मन को हर लेते थे
दुनियादारी की नफासत में
पत्नी को भी भूल जाता है

रश्म, रिवाज़,धर्म,संस्कार
संस्कृति की आड़ में
अपमान से तपा-तपा के
ग्लानि से गला-गला के
वस्तु बनाके बाज़ारू कर देता है
बस
औरत को औरत रहने दिया जाए
हर बार
यही भूल जाता है।
सलिल सरोज

 

6
काम काजी औरतें
हाशिए पे खड़ी
दोहरी ज़िन्दगी
जीने की
बाशक्ल मिशाल हैं

घर में
गृहिणी
मां
पत्नी
बहू
के रूपों
को जीते-जीते
खुद के लिए ही जीना
भूल जाती है
अनवरत आवृत्त से
दोलन की तरह
झूल जाती है

घर से निकल
अबला का धूल झाड़ते हुए
ऑफिस में काम
जब करती है
बॉस,कैलीग की
बातों में आकर
एक नया वजूद
ढूंढती है
जो कि अंततः
वृत की दो शिराओं
से प्रतीत होता है
कितनी भी कोशिश हो
मिल ही नहीं पाते
एक सकल स्वरूप
में
परिणत हो ही नहीं पाते

ये थोपी हुई
औरतों पर
दोहरी ज़िन्दगी
एक ज़िन्दगी
पर इतनी भारी है
कि
काम-काजी औरतों
को जीने की
लाचारी है
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परिचय : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सलिल सरोज की कविताएं प्रकाशित
संपर्क : बी 302, तीसरी मंजिल
सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट्स, मुखर्जी नगर
नई दिल्ली-110009
संप्रत्ति : कार्यालय महानिदेशक लेखापरीक्षा, वैज्ञानिक विभाग, नई दिल्ली में सीनियर ऑडिटर के पद पर 2014 से कार्यरत

 

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